MN 135
Cūḷakammavibhaṅga sutta: चूल-कम्मविभंग-सुत्तन्त
Cūḷakammavibhaṅgasutta
Vibhaṅgavagga
Traduções
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।
तब तोदेय्यपुत्त शुभ माणव, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् के साथ…संमोदन कर एक ओर बैठा। एक ओर बैठे ॰ शुभ माणव ने भगवान् से यह कहा—
“भो गौतम! क्या हेतु हैं, क्या प्रत्यय हैं—मनुष्य ही होते, मनुष्य-रूपियों में हीनता, और प्रणीतता (=उच्चता, उत्तमता) दिखाई पडती है? भो गौतम! यहाँ मनुष्य अल्पायु देखने में आते हैं; दीर्घायु ॰, बहु रोगी ॰, अल्प रोगी (=अरोगी) ॰, दुर्वर्ण (=कुरूप) ॰, वर्णवान् ॰, अ-समर्थ (=अल्पेशाख्य) ॰, महोशाख्य (=महासमर्थी) ॰, अल्प-भोग ॰ (=दरिद्र) ॰, महा-भोग ॰, नीचकुलीन ॰, उच्चकुलीन ॰, दुष्प्रज्ञ (=निर्बुद्धि) ॰, प्रज्ञावान् ॰, भो गौतम! क्या हेतु है ॰ प्रणीतता दिखाई पडती है?”
“माणव! प्राणी कर्म-स्वक (=कर्म ही धन है, जिनका) हैं, कर्म-दायाद, कर्म-योनि, कर्म-बन्धु, कर्म-प्रतिशरण (=कर्म ही रक्षक है, जिनका) है। कर्म प्राणियों को इस (हीनप्रणीतता में) विभक्त करता है।”
“इस आप गौतम के संक्षिप्त से कही, विस्तार से विभाजित न की गई बात का अर्थ में नहीं समझता। अच्छा हो, आप गौतम इस प्रकार धर्म-उपदेश करें, जिसमें कि आपकी इस संक्षिप्त से कही ॰ बात का मैं विस्तार से अर्थ जान जाऊँ।”
“तो, माणव! सुनो अच्छी तरह मन में करों, कहता हूँ।”
“अच्छा, भो!”—(कह) ॰ शुभ माणव ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—“यहाँ, माणव! कोई स्त्री या पुरूष प्राणातिपाती, रूद्र, लोहितपाणि (=खून रँगे हाथ वाला), मार काट में रत, सारे प्राणि=भूतों के विषय में अ-दयापात्र होता हे। इस प्रकार गृहीत=इस प्रकार समादत्त उस कर्म से काया छोड मरने के बाद, अपाय=दुर्गति, विनिपात, नरक मे उत्पन्न होता है। यदि मनुष्यत्व (=मनुष्य योनि) में आता हैं, तो जहाँ जहाँ उत्पन्न होता है, अल्पायु होता है। माणव! ॰ प्राणातिपाती (=हिंसक) हो निर्दयी हो विहरता—यह प्रतिपदा (=मार्ग) अल्पायुता की ओर ले जाने वाली है। और यहाँ, माणव! कोई स्त्री या पुरूष दंडरहित, शस्त्ररहित ॰ दयापन्न प्राणतिपात छोड, प्राणातिपात से विरत होता है, सर्वत्र सारे प्राणि=भूतों का हित=अनुकम्पक हो विहरता है। वह इस प्रका गृहीत=इस प्रकार समादत्त उस कर्म से काया छोड मरने के बाद सुगति, स्वर्गलोक में उत्पन्न होता हे। यदि मनुष्य योनि में आता है, तो जहाँ जहाँ उत्पन्न होता है, दीर्घायु होता है। माणव! ॰ प्राणातिपात से विरत होना ॰ दयापन्न होना—यह प्रतिपदा दीर्घायुता की ओर ले जाने वाली है।
“यहाँ माणव! कोई स्त्री या पुरूष हाथ-डले-डंडे या शस्त्र से प्राणियों का मारने वाला होता है, वह ॰ उस कर्म से काया छोड मरने के बाद ॰ नकर में उत्पन्न होता है। यदि मनुष्य योनि में आता है, तो जहाँ जहाँ उत्पन्न होता है; बहुरोगी होता है। माणव! ॰ ॰ प्राणियों का मारने वाला होना—यह प्रतिपदा बहुरोगिता की ओर ले जाने वाली है। और माणव! यहाँ कोई स्त्री या पुरूष ॰ प्राणियों को मारने वाला नहीं होता; वह ॰ उस कर्म से ॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न होता है। यदि मनुष्य-योनि में आता है, तो ॰ निरोग (=अल्पाबाध) होता है। ॰ यह प्रतिपदा अल्पाबाधता की ओर ले जाने वाली है।
“यहाँ, माणव! कोई स्त्री या पुरूष क्रोधी बहुत परेशान रहने वाला (=उपायास-बहुल) होता, है—थोडा भी कहने पर बुरा मान लेता है, कुपित होता है, द्रोह कर लेता है, कोप=द्वेष=अ-प्रत्यय प्रकट करता है। वह ॰ उस कर्म से ॰ नरक में उत्पन्न होता है। यदि मनुष्य योनि में आता है, तो ॰ दुर्वर्ण (=कुरूप) होता है। ॰—यह प्रतिपदा दुर्वर्णता की ओर ॰। किन्तु, माणव! यहाँ कोई स्त्री या पुरूष ॰ न क्रोधी है, न बहुत परेशान रहने वाला—बहुत भी कहने पर बुरा कहीं मानता, कुपित नहीं होता, द्रोह नहीं कर लेता, कोप ॰ नहीं प्रकट करता। वह ॰ उस कर्म से ॰ स्वर्ग में उत्पन्न होता है। यदि मनुष्य योनि में आता है, तो ॰ प्रासादिक (=सुन्दर) होता हैं। ॰—यह प्रतिपदा प्रासादिकता की ओर ॰।
“यहाँ, माणव! कोई स्त्री या पुरूष डाह करने वाला होता है, दूसरे के लाभ, सत्कार, गुरूकार, मानन=बंदन, पूजन में, ईष्र्या करता है, द्वेष करता है, ईष्र्या बाँधता है। वह ॰ इस कर्म से ॰ नरक मे उत्पन्न होता है। यदि मनुष्य-योनि में आता है, तो अल्पेशाख्य होता है। ॰—यह प्रतिपदा अल्पेशाख्यता की ओर ॰। और, माणव! यहाँ कोई स्त्री या पुरूष डाह करने वाला नहीं होता; दूसरे के लाभ ॰ में ईष्र्या नहीं करता, द्वेष नहीं करता, ईष्र्या नहीं बाँधता है। वह ॰ इस कर्म से ॰ स्वर्ग में उत्पन्न होता हे। यदि मनुष्य-योनि में आता है, तो ॰ महेशाख्य होता है। ॰—यह प्रतिपदा महेशाख्य की ओर ॰।
“यहाँ, माणव! कोई स्त्री या पुरूष श्रमण या ब्राह्मण को अन्न, पान, वस्त्र, यान, माला-गंध-विलेपन, शय्या, निवास स्थान, प्रदीप (आदि) का देने वाला नहीं होता। वह ॰ इस कर्म से ॰ नरक में उत्पन्न होता है, यदि मनुष्य-योनि में आता है, तो ॰ अल्प-भोग (=दरिद्र) होता है। ॰—यह प्रतिपदा अल्प-भोगता की ओर ॰। और माणव! यहाँ कोई स्त्री या पुरूष श्रमा या ब्राह्मण को अन्न-पान ॰ का देने वाला होता है। वह ॰ इस कर्म से ॰ स्वर्ग से उत्पन्न होता है। यदि मनुष्य योनि में आता है, तो ॰ महा-भोग (=धनी) होता है। ॰—यह प्रतिपदा महा-भोगता की ओर ॰।
“यहाँ, माणव! कोई स्त्री या पुरूष स्तब्ध, अभिमानी होता है, अभिवादनीय को अभिवादन नहीं करता, प्रत्युत्थातव्य का प्रत्युत्थान नहीं करता, आसनाई को आसन नहीं देता, मार्गाई के लिये मार्ग को नहीं (छोड) देता, सत्कर्तव्य सत्कार नहीं करता, गुरूकर्तव्य का गुरूकार (=पूजा) नहीं करता, माननीय का मान नहीं करता, पूजनीय की पूजा नहीं करता। वह ॰ इस कर्म से ॰ नरक में उत्पन्न होता है। यदि मनुष्य-योनि में आता है, तो ॰ नीचकुलीन होता है। ॰—यह प्रतिपदा भी नीचकुलीनता की ओर ॰। और, माणव! यहाँ कोई स्त्री या पुरूष अ-स्तब्ध, अन्-अभिमानी होता है; अभिवादनीय को अभिवादन करता है, ॰ प्रत्युत्थान करता है, ॰ आसन देता है, ॰ मार्ग देता है, ॰ सत्कार करता है, ॰ गुरूकार करता है, ॰ मान करता है, ॰ पूजा करता है। वह ॰ इस कर्म से ॰ स्वर्ग में उत्पन्न होता है। यदि मनुष्य-योनि में आता है, तो ॰ उच्चकुलीन होता है। ॰—यह प्रतिपदा उच्चकुलीनता की ओर ॰।
“यहाँ, माणव! कोई स्त्री या पुरूष श्रमण या ब्राह्मण के पास जाकर नहीं पूछने वाला होता—भन्ते!
क्या कुशल (=अच्छा) हैं, क्या अकुशल है? क्या सावद्य (=स-दोष) है, क्या निरवद्य (=निर्दोष)? क्या सेवितव्य है, क्या नहीं सेवितव्य है? क्या मेरा करना दीर्घकाल तक अहित=दुःख के लिये होगा; और क्या मेरा करना दीर्घकाल तक हित=सुख के लिये होगा? वह ॰ इस कर्म से ॰ नरक मे उत्पन्न होता है, यदि मनुष्य-योनि में आता है, तो ॰ दुष्प्रज्ञ होता है। ॰—यह प्रतिपदा दुष्प्रज्ञता की ओर ॰। और, माणव! यहाँ कोई स्त्री या पुरूष श्रमण या ब्राह्मण के पास जाकर पूछने वाला होता है—भन्ते! क्या कुशल है ॰ दीर्घकाल तक हित=सुख के लिये होगा? वह ॰ इस कर्म से ॰ स्वर्ग मे उत्पन्न होता है। यदि मनुष्य-योनि में आता है, तो महाप्रज्ञ होता है। ॰—यह प्रतिपदा महाप्रज्ञता की ओर ॰।
“इस प्रकार, माणव! अल्पायुता की ओर ले जाने वाली प्रतिपदा (=मार्ग) अल्पायुत्व में पहुँचती है। दीर्घायुता ॰। बह्वाबाधता (=बहुरोगीपन) ॰। अल्पाबाधता ॰। दुर्वर्णता ॰। प्रासादिकता ॰ अल्पेशाख्यता ॰। महेशाख्यता ॰। अल्पभोगता ॰। महा-भोगता ॰। नीच कुलीनता ॰। उच्चकुलीनता ॰। दुष्प्रज्ञता ॰। महाप्रज्ञता ॰।
“माणव! प्राणी कर्मस्वक हैं ॰। कर्म प्राणियों को इस हीन-प्रणीतता में विभक्त करता है।”
ऐसा कहने पर तोदेय्यपुत्त शुभ (=सुभ) माणव ने भगवान् से यह कहा—
“आश्चर्य! भो गौतम! आश्चर्य!! भो गौतम!! जैसे औंधे को सीधा कर दे ॰ आप गौतम आज से मुझे अंजलिबद्ध शरणागत, उपासक स्वीकार (=धारण) करें।”
Sobre esta tradução
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Que todos os seres sejam felizes