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MN 152

Indriyabhāvanā sutta: इन्द्रिय-भावना-सुत्तन्त

Indriyabhāvanāsutta

Saḷāyatanavagga

Traduções

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् कजंगला में सुवेणुवन (=सुवेलुवन) में विहार करते थे।

तब पारासिवियका अन्तेवासी (=शिष्य) उत्तर-माणवक जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान् के साथ संमोदन कर…एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे पारासिवियके अन्तेवासी उत्तर माणवक को भगवान् ने कहा-

“उत्तर! क्या पारासिविय ब्राह्मण शिष्यों को इन्द्रिय-भावना (सम्बन्धी) उपदेश करता है?”

“भो गौतम! पारासिविय ब्राह्मण शिष्यों को इन्द्रिय भावना का उपदेश करता है।”

“तो उत्तर! कैसे ॰ इन्द्रिय-भावना का उपदेश करता है?’

“भो गौतम! आँख से रूप नहीं देखना, कान से शब्द नहीं सुनना। इस प्रकार भो गौतम! पारासिविय ब्राह्मण शिष्यों को इन्द्रिय-भावना का उपदेश करता है।”

“जैसा पारासिविय ब्राह्मण का वचन हैं, वैसा होने पर, उत्तर! अन्धा इन्द्रिय-भावना करने वाला (=भावितेन्द्रिय) हेागा, बधिर भावितेन्द्रिय होगा। क्योंकि उत्तर! अन्धा आँख से रूप नहीं देखता, बहिरा कान से शब्द नहीं सुनता।’

ऐसा कहने पर पारासिविय का अन्तेवासी उत्तर माणवक चुप, मूक, गर्दन झुाये, अधोमुख, सोचता, प्रतिभाहीन, हो बैठा। तब भगवान् ने ॰ उत्तर माणवक को चुप ॰ जानकर आयुष्मान् आनन्द को संबोधित किया—

“आनन्द! पारासिविय ब्राह्मण श्रावकों (=शिष्यों) को दूसरी तरह (=अन्यथा) इन्द्रिय-भावना उपदेश करता है, और आर्यो के विनय में दूसरी तरह अनुत्तर (=सर्वोत्कृष्ट) भावना होती है।’

“भगवान् इसी का काल हैं, सुगत! इसी का काल हैं, कि भगवान् आर्य-विनय (=बौद्ध-धर्म) के अनुत्तर इन्द्रिय-भावना का उपदेश करें। भगवान् से सुन कर भिक्षु धारण करेंगे।’

“तो आनन्द! सुनो, अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।” “अच्छा भन्ते!”…

भगवान् ने यह कहा—

“कैसे आनन्द! आर्य-विनय में अनुत्तर इन्द्रिय-भावना होती है? यहाँ आनन्द! चक्षु (=आँख) से रूप को देखकर भिक्षु को मनाप (=पसन्द मालूम) होता है, अ-मनाप होता है, मनाप-अमनाप होता है। वह ऐसा जानता है—‘यह मुझे मनाप उत्पन्न हुआ, अ-मनाप ॰, मनाप-अ-मनाप ॰। किन्तु यह संस्कृत (=कृत, कृत्रिम)=औदारिक=प्रतीत्य-समुत्पन्न (=हेतु-जनित) है। यही शान्त, यही प्रणीत (उत्तम) है, जो कि यह (रूप आदि से) उपेक्षा। (तब) उसका वह उत्पन्न मनाप, उत्पन्न अ-मनाप, ॰ मनाप-अ-मनाप निरूद्ध (=नष्ट) हो जाता है। उपेक्षा ठहरती है। जैसे आनन्द! आँखवाला पुरूष पलक चढा कर गिरा दे, पलक गिरा कर चढा दे; इसी तरह आनन्द! जिस किसी को इतना शीघ्र, इतनी जल्दी, इतनी आसानी से, उत्पन्न मनाप, उत्पन्न अ-मनाप, उत्पन्न मनाप-अमनाप दूर हो जाते हैं, उपेक्षा ठहरती है। यह आनन्द! आर्य-विनय में चक्षु से जाने वाले (=चक्षुर्विज्ञेय) रूपों के विषय की अनुत्तर इन्द्रिय-भावना कही जाती है। और फिर आनन्द! श्रोत्र से शब्द को सुनकर ॰। ॰ उपेक्षा ठहरती है। जैसे कि आनन्द! बलवान् पुरूष अप्रयास चुटकी बजावे; ऐसे ही आनन्द! जिस किसी को इतना शीघ्र ॰। यह आनन्द! आर्य-विनय में श्रोत्र-विज्ञेय शब्दों के विषय की अनुत्तर इन्द्रिय-भावना कही जाती है। और फिर आनन्द! घ्राण से गंध को सूँघ कर ॰। ॰ उपेक्षा ठहरती है। जैसे कि आनन्द! पद्म-पत्र में थोडी सी हवा से पानी के बुलबुले उठते हैं, ठहरते नहीं; ऐसे ही आनन्द! ॰। ॰ यह ॰ घ्राण-विज्ञेय गन्धों के विषय की अनुत्तर इन्द्रिय-भावना है। और फिर आनन्द! जिह्वा से रस चख कर ॰। ॰ उपेक्षा ठहरती है। जैसे कि आनन्द! बलवान् पुरूष जिह्वा के नोक पर खेल-पिंड (=थूक-कफ) जमा कर, अप्रयास ही फेंक दें; ऐसे ही आनन्द! ॰। यह ॰ जिह्वा-विज्ञेय रसों के विषय की अनुत्तर इन्द्रिय-भावना है। और फिर आनन्द! काया (=त्वक्) से स्प्रष्टव्य स्पर्श से ॰। उपेक्षा ठहरती है। जैसे कि आनन्द! बलवान् पुरूष समेटी बाँह को फैलावे, फैलाई बाँह को समेटे; ऐसे ही आनन्द! ॰। यह ॰ काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्यों के विषय की अनुत्तर इन्द्रिेय-भावना है। और फिर आनन्द! मन से धर्म को जानकर ॰। ॰ उपेक्षा ठहरती है। जैसे कि आनन्द! बलवान् पुरूष दिन में तपे लोहे के कडाह पर दो-तीन पानी की बूँद डाले;…आनन्द! पानी की बूँद पडकर…तुरन्त ही…क्षय को प्राप्त हो जाये। ऐसे ही आनन्द! ॰ यह मन-विज्ञेय धर्मो के विषय की अनुत्तर इन्द्रिय-भावना है।

‘यहाँ आनन्द! चक्षु से रूप को देखकर, भिक्षु का मनाप (=प्रिय) उत्पन्न होता है, अ-मनाप उत्पन्न होता है, मनाप-अमनाप उत्पन्न होता है। वह उस उत्पन्न मनाप, ॰ अमनाप, मनाप-अमनाप से दुःखित होता है, घबराता है, घिना करता है। श्रोत्र से शब्द सुनकर ॰। घ्राण से गंध सूँघकर ॰। जिह्वा से रस चखकर ॰। काया से स्प्रष्टव्य छूकर ॰। मन से धर्म मानकर, भिक्षु को मनाप ॰, अमनाप ॰, मनाप-अमनाप उत्पन्न होता हे। वह उस उत्पनन मनाप, अमनाप, मनाप-अमनाप से दुःखित होता है, घबराता है, घृणा करता है। इस प्रकार आनन्द! शैक्ष्य (=जिसको अभी सीखना है, सेख)-प्रतिपद् (=पटिपदा) होती है।

“कैसे आनन्द! भावितेन्द्रिय हो, आर्य (अर्हत्, अशैक्ष्य=अ-सेख) होता है? यहाँ आनन्द! चक्षु से रूप को देखकर ॰ श्रोत्र से ॰, ध्राण से ॰, जिह्वा से ॰, काया से ॰, मन से धर्म जानकर, मनाप ॰, ॰ अ-मनाप, ॰ मनाप-अमनाप उत्पन्न होता है। वह यदि चाहता है, कि प्रतिकूल में अ-प्रतिकूल जान विहार करूँ अ-प्रकिूल जानते ही वहाँ विहार करता है। यदि चाहता है, कि अ-प्रतिकूल में प्रतिकूल जान विहार करूँ; प्रतिेकूल जानते ही वहाँ विहार करता है। यदि चाहता है,-”प्रतिकूल, अ-प्रतिकूल दोनो वर्जित कर, स्मृति”सम्प्रजन्य-युक्त उपेक्षक हो विहार करूँ; वह स्मृति सम्प्रजन्य-युक्त उपेक्षक हो विहरता है। इस प्रकार आनन्द! भावितेन्द्रिय आर्य (=मुक्त) होता है।

“इस प्रकार आनन्द! मैंने आर्य-विनय की अनुत्तर इन्द्रिय-भावना उपदेश कर दी; शैक्ष्य-प्रतिपद भी उपदेश कर दी; भावितेन्द्रिय आर्य भी उपदेश कर दिया। हितैषी, अनुकम्पक शास्ता (=गुरू) को अनुकम्पा (=दया) श्रावकों के लिये जैसे करना चाहिये, वैसा मैने तुम लोगों के लिये कर दिया। आनन्द! वह वृक्षमूल (=वृक्ष के नीचे की भूमि) हैं, यह शून्य घर हैं, ध्यान करो आनन्द! मत प्रामद करो; पीछे अफसोस मत करना। यह तुम्हारो लिये हमारे अनुशासन हे।”

भगवान् ने यह कहा, आयुषमान् आनन्द ने सन्तुष्ट हो, भगवान् के भाषण का अनुमोदन किया।

Sobre esta tradução

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Que todos os seres sejam felizes