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Mahākaccānabhaddekaratta sutta: महाकच्चायन-भद्देकरत्त-सुत्तन्त
Mahākaccānabhaddekarattasutta
Vibhaṅgavagga
الترجمات
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् राजगृह में तपोदाराम में विहार करते थे।
तब आयुष्मान् समिद्धि रात को भिनसार में उठकर जहाँ तपोदा थी, वहाँ स्नान के लिये गये। तपोदाह में शरीर को पारिसिचितकर निकलकर गात्र को सुखाते हुए, एक वस्त्र. पहिने खडे हुये। तब प्रकाशयुक्त रात्रि में सारी तपोदा को प्रकाशित करता, कोई प्रकाशमान देवता जहाँ आयुष्मान् समिद्धि थे, वहाँ गया। जाकर एक ओर खडा हो गया। एक ओर खडे उस देवता हने आयुष्मान् समिद्धि को यह कहा—
“भिक्षु! भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग को तुम धारणस करते (=याद किये) हो?”
“नहीं, आवुस! मुझे याद (नहीं) है; भद्देकरत्तके उद्देश और विभंग। और क्या, आवुस! तुमको याद हैं ॰?”
“मुझे भी, भिक्षु! याद नहीं हैं ॰। क्या तुम्हें, भिक्षु! भद्देकरत्त की गाथायें याद हैं?”
“नहीं, आवुस! मुझे याद (नहीं) हैं ॰, क्या, आवुस! तुमको याद हैं ॰?”
“मुझे भी, भिक्षु याद नहीं हैं ॰। भिक्षु! भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग को सीखो, ॰ पूरा करो, ॰ याद करो। भिक्षु! भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग सार्थक हैं; आदि ब्रह्मचर्यक (=शुद्ध ब्रह्मचर्योपयोगी) है।”
उस देवता ने यह कहा। यह कह कर वहीं अन्तर्धान हो गया।
तब आयुष्मान् समिद्धि उस रात के बीतने पर जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये, जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् समिद्धि ने भगवान् से यह कहा—
“(आज), भन्ते! मैं रात को भिनसार में उठकर ॰ यह कह कर वहीं अन्तर्धान हो गया। अच्छा हो, भन्ते! भगवान् मुझे भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग का उपदेश करें।”
“तो, भिक्षु! सुन, अच्छी तरह मन में कर, कहता हूँ।”
“अच्छा, भन्ते!” (कह) आयुष्मान् समिद्धि ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—”॰ अतीत का अनुगमन न करे ॰ शान्त मुनि (जन) भद्देकरत्त कहते है।”
भगवान् ने यह कहा, यह कहकर सुगत आसन से उठकर विहार में चले गये। तब भगवान् के
चले जाने के थोडे ही समय बाद उन भिक्षुओं को यह हुआ—
“आवुसों! भगवान् जो यह हमें संक्षेप में उद्देश कर, विस्तार से विभाग किये बिना ही, आसन से उठकर विहार में चले गये—‘अतीत का ॰’। कौन है, आवुसो! जो भगवान् के इस संक्षेप से उद्देश किये विस्तार से न विभाजित किये विस्तार से अर्थ-विभाग करे।”
तब उन भिक्षुओं को यह हुआ—“यह आयुष्मान् महाकात्यायन शास्ता (=बुद्ध) से भी प्रशंसित, और विज्ञ ब्रह्मचारियों से भी संभावित हैं। आयुष्मान् महाकात्यायन भगवान् के इस ॰ विस्तार से न विभाजित किये का विस्तार से अर्थ’-विभाग कर सकते है। क्यों न हम, आवुसो! जहाँ आयुष्मान् महाकात्यायन है,…वहाँ चलकर आयुष्मान् महाकात्यायन से इसका अर्थ पूछे।”
तब वह भिक्षु, जहाँ आयुष्मान् महाकात्यायन थे वहाँ गये; जाकर आयुष्मान् महाकात्यायन के साथ…समोदन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे उन भिक्षुआं ने आयुष्मान् महाकात्यायन से यह कहा—
“आवुस कात्यायन! भगवान् यह संक्षेप से उद्देश कर, विस्तार से विभाग किये बिना ही, आसन से उठकर विहार में चले गये—‘अतीत का ॰’। ॰। तब हमको यह हुआ—‘यह आयुष्मान् महाकात्यायन ॰ इसका अर्थ पूछें। विभाग करें आयुष्मान् महाकात्यायन!”
“जैसे, आवुसो! (कोई) सार-अर्थी=सार-गेवेषी पुरूष सार को खोजते हुये, खडे महान् सारवान् वृक्ष के मूल और स्कंध को छोड, शाखा और पत्र में सार (=साल, लकडी का हीरा) ढूँढना पसंद करे। इसी प्रकार इस समय शास्ता के संमुखीभूत (=विद्यमान) होते, उन भगवान् को छोड, आयुष्मान् हम लोगों को यह बात पूछना चाहते हैं। आवुसो! वह भगवान् जानकार जानते हैं, देखनहार देखते (=समझते) हैं; चक्षुभूत (=आँख-समान), ज्ञानभूत, धर्मभूत, ब्रह्मभूत हैं; वक्ता, प्रवक्ता, अर्थ के निर्णेता, अमृत के दाता, धर्म-स्वामी तथागत हैं। अब यही काल था, कि उन भगवान् से ही यह बात पूछी जाये। जैसा भगवान् आपको बतलायें, वैसा इसे धारण (=याद) करना।”
“ठीक, आवुस कात्यायन! भगवान् जानकार जानते हैं ॰ भगवान् से ही यह बात पूछी जाये। ॰ वैसा हम इसे धारण करें। किन्तु, आयुष्मान् महाकात्यायन भी शास्ता से प्रशंसित ॰ विस्तार से अर्थ विभाग कर सकते है। भार न मानकर विभाग (=व्याख्यान), करें आयुष्मान् महाकात्यायन!”
“तो आवुसों! सुनों, अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।”
“अच्छा, आवुस!”—(कह) उन भिक्षुओं ने आयुष्मान् महाकात्यायन को उत्तर दिया।
आयुष्मान्-महाकात्यायन ने यह कहा—“आवुसो! जो हमें भगवान् ने यह संक्षेप से ॰ उठकर विहार में चले गये—‘अतीत का ॰’। आवुसो! विस्तार से अ-विभाजित भगवान् के इस संक्षिप्त भाषण का अर्थ मैं इस प्रकार विस्तार से जानता हूँ—‘कैसे, आवुसो! अतीत का अनुगमन करता है?’—‘अतीत काल में मेरा चक्षु इस प्रकार का था, रूप इस प्रकार का था’—यह (सोच) उसमें विज्ञान छन्द=राग प्रतिबद्ध होता है। विज्ञान (=चित्त) के छन्द=राग प्रतिबद्ध होने से, उसे अभिनंदित (=स्वागत) करता है। उसका अभिनंदन करते अतीत का अनुगमन कता है, ‘॰ मेरा श्रोत्र इस प्रकार का था, शब्द इस प्रकार का था’—॰ । ‘॰ मेरा घ्राण ॰, गंध ॰’—॰। ‘॰ मेरी जिह्वा ॰, रस ॰’—॰। ‘॰ मेरी काया ॰, स्प्रष्टव्य ॰’—॰। ‘॰ मेरा मन ॰, धर्म ॰’—॰।
इस प्रकार, आवुसों! अतीत का अनुगमन करता है। कैसे, आवुसो! अतीत का अनुगमन नहीं करता?—‘अतीत काल में मेरा चक्षु इस प्रकार का था, रूप इस प्रकार का था’—यह (सोच) उसमें विज्ञान (=चित्त, मन) छन्द=राग से प्रतिबद्ध नहीं होता। विज्ञान के ॰ प्रतिबद्ध न होने से, उसे अभिनंदित नहीं करता। उसका अभिनंदन न करने से अतीत का अनुगमन नहीं करता। ‘॰ श्रोत्र ॰, शब्द ॰—॰। ॰। ‘॰ मन ॰, धर्म ॰’—॰। इस प्रकार आवुसों! अतीत का अनुगमन नहीं करता।
“कैसे, आवुसो! अनागत की चिन्ता करता है?—‘अनागत काल में मेरा चक्षु इस प्रकार का हो, रूप इस प्रकार का’—यह (सोच) अ-प्राप्त की प्राप्ति के लिये चित्त में प्रणिधान (=आग्रह) करता है। चित्त के प्रणिधान द्वारा उसे अभिनंदित करता है। उसका अभिनंदन करते, अनागत की चिन्ता करता है। ‘॰ श्रोत्र ॰, शब्द ॰’—॰। ‘॰ घ्राण ॰, गंध ॰’—॰। ‘॰ जिह्वा ॰, रस ॰’—॰। ‘॰ काय ॰, स्प्रष्टव्य ॰’—॰। ‘॰ मन ॰, धर्म ॰’—॰। इस प्रकार, आवुसो! अनागत की चिन्ता करता है। कैसे, आवुसों! अनागत की चिन्ता नहीं करता?—‘अनागत काल में मेरा चक्षु इस प्रकार का हो, रूप इस प्रकार का’—यह (सोच) अ-प्राप्त की प्राज्ञित के लिये चित्त में प्रणिधान नहीं करता। चित्त के प्रणिधान के न होने से अभिनंदित नहीं करता। उसको अभिनंदन न करते, अनागत की चिन्ता नहीं करता। ‘॰ श्रोत्र ॰, शब्द ॰’—॰। ‘॰ घ्राण ॰, गंध ॰’—॰। ‘॰ जिह्वा ॰, रस ॰’—॰। ‘॰ काय ॰, स्प्रष्टव्य ॰’—॰। ‘॰ मन ॰, धर्म ॰’—॰। इस प्रकार, आवुसो! अनागत की चिन्ता नहीं करता।
“कैसे, आवुसो! प्रत्युत्पन्न (=वर्तमान)-धर्मो (=पदार्थो) में आसक्त होता है?—आवुसो! जो चक्षु है, और जो रूप है, दोनों ही यह वर्तमान है। यदि उस वर्तमान (=विद्यमान) में विज्ञान (=चित्त) छन्द=राग से प्रतिबद्ध होता है। विज्ञान के छन्द=राग प्रतिबद्ध होने से, उसे (=विद्यामान वस्तु को) अभिनंदित करता है। उसका अभिनंदन करते प्रत्युत्पन्न धर्मो (=पदार्थो) में आसक्त होता है। जो श्रोत्र है, और जो शब्द है ॰। ॰ घ्राण ॰, गंध ॰। ॰ जिह्वा ॰, रस ॰। ॰ काय ॰, स्प्रष्टव्य ॰। ॰ मन ॰, धर्म ॰। इस प्रकार, आवुसो! प्रत्युत्पन्न धर्मो में आसक्त होता है। कैसे, आवुसो! प्रत्युत्पन्न धर्मो में आसक्त नहीं होता?—आवुसो! जो चक्षु हैं, और जो रूप है; दोनों ही यह प्रत्युत्पन्न (=विद्यमान) हैं। यदि उस वर्तमान में विज्ञान छन्द=राग से प्रतिबद्ध नहीं होता। विज्ञान के छन्द=राग प्रतिबद्ध न होने से, उसे अभिनंदित नहीं करता। उसका अभिनंदनन करते प्रत्युत्पन्न धर्मों में आसक्त नहीं होता। ॰ श्रोत्र ॰, ॰ शब्द॰। ॰ घ्राण ॰, गंध ॰। ॰ जिह्वा ॰, रस ॰। ॰ काय ॰, स्प्रष्टव्य ॰। ॰ मन ॰, धर्म ॰। आवुसो! इस प्रकार प्रत्युत्पन्न धर्मों में आसक्त नहीं होता।
“आवुसो! जो हमें भगवान् ने यह संक्षेप से ॰ उठकर विहार में चले गये—‘अतीत का ॰’। आवुसो! भगवान् के इस संक्षिप्त भाषण का अर्थ मैं इस प्रकार विस्तार से जानता हूँ। इच्छा हो, तो तुम आयुष्मानों! भगवान् के पास भी जाकर इस अर्थ (=बात) को पूछो; जैसा तुम्हें भगवान् बतलावें, वैसा धारण करो।”
तब वह भिक्षु आयुष्मान् महाकात्यायन के भाषण को अभिनंदित=अनुमोदित कर, आसन से उठ जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे उन भिक्षुओं ने भगवान् से यह कहा—
भन्ते! भगवान् जो यह हमें…विस्तार से विभाग किये बिना ही, आसन से उठकर विहार में चले गये—‘अतीत का ॰’। तब भगवान् के चले जाने के थोड़े ही समय बाद हमें यह हुआ — …, तब हमको यह हुआ — … । … जहां आयुष्मान् महाकच्चायन थे, वहां गए । जाकर हमने आयुष्मान् महाकच्चायन से इस अर्थ को पूछा। तब हमें आयुष्मान् महाकच्चायन ने इस आकार से, इन पदों (=वाक्यों) से, इन व्यंजनों से अर्थ को विभाजित किया ।”
“भिक्खुओ! महाकच्चायन पंडित है। भिक्खुओ! महाकच्चायन महाप्रज्ञ है । मुझे भी, भिक्खुओ! यदि तुम इस बात को पूछते; तो मैं भी इसका इसी प्रकार व्याख्यान करता, जैसा कि महाकच्चायन ने व्याख्यान किया। यही इसका अर्थ है, इसी प्रकार इसे धारण करना।”
भगवान् ने यह कहा, संतुष्ट हो उन भिक्खुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।
عن هذه الترجمة
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
لتكن كل الكائنات سعيدة