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Mahākammavibhaṅga sutta: महा-कम्म-विभंग-सुत्तन्त
Mahākammavibhaṅgasutta
Vibhaṅgavagga
الترجمات
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् राजगृह में वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार करते थे।
उस समय आयुष्मान् समिद्धि (=समृद्धि) जंगल की कुटिया में विहार करते थे। तब पोतलि-पुत्र परिब्राजक जंघाविहार (=टहलने) के लिये टहलते विचरते, जहाँ आयुष्मान् समिद्धि थे, वहाँ गया। जाकर आयुष्मान् समिद्धि के साथ…संमोदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे पोतलि-पुत्र परिब्राजक ने आयुष्मान् समिद्ध से यह कहा—
“आवुस समिद्धि! मैंने इसे श्रमण गौतम के मुख से सुना है, मुख से ग्रहण किया है—‘मोघ (=निष्फल) है कायिक कर्म, मोघ है वाचिक-कर्म, मानस कर्म ही सच है। क्या ऐसी (कोई) समापत्ति (=समाधि) हैं, जिस समापत्ति को प्राप्त कर कुछ नहीं वेदन (=अनुभव) करता।’”
“आवुस पोतलिपुत्त! मत ऐसा कहो, आवुस पोतलिपुत्त! मत ऐसा कहो। मत भगवान् पर झूठ लगाओ (=अभ्याख्यान करो), भगवान् पर झूठ लगाना अच्छा नहीं। भगवान् ऐसा नही कह सकते—‘मोघ है कायिक कर्म ॰ मानसकर्म ही सच है।’ और आवुस! है ऐसी समापत्ति, जिस समापत्ति को प्राप्त कर कुछ नहीं वेदन करता।”
“आवुस समिद्धि! कितने चिर से प्रब्रजित हुये?”
“कुछ चिर नहीं, आवुस! तीन वर्ष (हुये)।”
“यहाँ, हम स्थविर (=वृद्ध) भिक्षुओं को क्या कहेंगे, जब कि (एक) नया भिक्षु इस प्रकार (अपने) शास्ता (गुरू) परि-रक्षा करने को तैयार है। आवुस समिद्धि! जानते हुये काय-वचन-मन से कर्म करके क्या संवेदन करता है?”
“आवुस पोतलिपुत्त! जानते हुये काय-वचन-मन से कर्म करके वह दुःख संवेदन करता है।”
तब पोतलिपुत्त परिब्राजक ने आयुष्मान् समिद्धि के भाषण को न अभिनंदित किया, न प्रतिक्रोशित (=निदित) किया। बिना अभिनंदित-प्रतिक्रोशित किये आसन से उठकर चला गया।
तब आयुष्मान् समिद्धि, पोतलि-पुत्त परिब्राजक के चले जाने के थोडी ही देर बाद, जहाँ आयुष्मान् आनंद थे, वहाँ गये। जाकर आयुष्मान् आनंद के साथ…संमोदन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् समिद्धि ने जो कुछ पोतलिपुत्त परिब्राजक के साथ कथासंलाप हुआ था, वह सब आयुष्मान् आनंद को कह सुनाया। ऐसा कहने पर आयुष्मान् आनंद ने आयुष्मान् समिद्धि से यह कहा—
“आवुस समिद्धि! भगवान् के दर्शन के लिये यह कथा (रूपी) भेंट है, चलो आवुस समिद्धि! जहाँ भगवान् हैं, वहाँ चलें। चल कर इस अर्थ (=बात) को भगवान् से कहेंगे; जैसे हमें भगवान् बतलायेंगे, वैसा उसे धारण करेंगे।”
“अच्छा, आवुस!” (कह) आयुष्मान् समिद्धि ने आयुष्मान् आनंद को उत्तर दिया।
तब आयुष्मान् आनंद और आयुष्मान् समिद्धि जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् आनंद जो कुछ आयुष्मान् समिद्धि का पोतलि-पुत्त परिब्राजक के साथ कथा-संलाप हुआ था, वह सब भगवान् को कह सुनाया, ऐसा कहने पर भगवान् ने आयुष्मान् आनंद से यह कहा—
“आनन्द! पोतलिपुत्त परिब्राजक को देखने की भी बात मुझे मालूम नहीं है, कहाँ से इस तरक का कथा संलाप होगा? आनन्द! इस मोधपुरूष समिद्धि ने पोतलिपुत्त परिब्राजक को विभाग करके उत्तर देने लायक प्रश्न का एकांश से उत्तर दिया।”
ऐसा कहने पर आयुष्मान् उदायी ने भगवान् से यह कहा—
“भन्ते! आयुष्मान् समिद्धि ने क्या ख्याल करके यह कहा—जो कुछ वेदन (=अनुभव) है, वह दुःख-विषयक है?”
तब भगवान् ने आयुष्मान् आनंद को सम्बोधित किया—“आनन्द! देख रहे हो, तुम इस मोघ पुरूष उदायी के उमंग को। आनंद! मैंने इसी वक्त जान लिया कि यह मोघपुरूष उदायी डुबकी लगाते हुये अयोनिशः (=मूल पर बिना ध्यान दिये) डुबकी लगायेगा। आनन्द! आराम में ही पोतलिपुत्त परिब्राजक ने तन वेदनायें पूँछी; और आनन्द! इस मोघ पुरूष समिद्धि को पोतलिपुत्त परिब्राजक के वैसा पूछने पर ऐसा उत्तर देना चाहिये था—‘आवुस पोतलिपुत्त! जानते हुये काय-वचन-मन से कर्म करके सुख वेदनीय (=जिसका अनुभव सुखमय) है सुख को वह अनुभव करेगा। आवुस! पोतलिपुत्त! जानते हुये काय-वचन-मन से कर्म करके दुःखवेदनीय दुःख को वह अनुभव करेगा। ॰ कर्म करके अदुःख-असुख-वेदनीय अदुःख-असुख को वह अनुभव करेगा। आनन्द! इस प्रकार पोतलिपुत्त परिब्राजक को उत्तर देकर मोघपुरूष समिद्धि ठीक से उत्तर देता। और आनन्द! कोई कोई अन्यतीर्थिक परिब्राजक बाल (=अज्ञ)=अ-व्यक्त हैं, कोई कोई तथागत के महाकर्मविभंग को जानेंगे। क्या, आनन्द! तुम सुनोगे, तथागत को महाकर्मविभंग विभाजित करते?”
“इसी का भगवान् काल है, इसी का सुगत काल है; कि भगवान् महाकम्मविभंग विभाजित करें। भगवान् से सुनकर भिक्षु धारण करेंगे।”
“तो, आनन्द! सुनो, अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।”
“अच्छा, भन्ते!” (कह) आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—“आनन्द! लोक में चार (प्रकार के) पुद्गल (=पुरूष) विद्यमान है। कौन से चार?—यहाँ, आनन्द! कोई पुद्गल हिंसक होता है, चोर, व्यभिचारी, झूठा, चुगुलखोर, कटुभाषी, प्रलापी, अभिध्यालु (=लोभी), व्यापाद (=द्रोह)-युक्त-चित्तवाला, मिथ्या-दृष्टि होता है; वह काया छोड मरने के बाद आपाय=दुर्गति, विनिपात, नरक में उत्पन्न होता है। और यहाँ आनन्द! कोई पुद्गल हिंसक ॰ मिथ्यादृष्टि होता है, (किन्तु) यह काया छोड मरने के बाद सुगति, स्वर्गलोक मेें उत्पन्न होता है। और यहाँ आनन्द! कोई पुद्गल अहिंसक, अ-चोर, अ-व्यभिचारी, झूठा नहीं, चुगलखोर-नहीं, कटुभाषी-नहीं, प्रलापी-नहीं, अन्-अभिध्यालु, अ-व्यापन्न-चित्त, सम्यग्-दृष्टि होता है; वह काया छोड मरने के बाद सुगति स्वर्गलोक में उत्पन्न होता है। और यहाँ आनन्द! कोई पुद्गल अ-हिंसक ॰ सम्यग्-दृष्टि होता है; (किन्तु) वह काया छोड मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न होता है।
(1) “यहाँ, आनन्द! कोई श्रमण या ब्राह्मण आतप्य=उद्योग, अप्रमाद (=गफलत-वगैर), और अच्छी तरह मन में करने से युक्त हो, इस प्रकार की चेतः समाधि (=चित्त की एकाग्रता) को प्राप्त होता है; कि जिस चित्त की समाधि के कारण अमानुष विशुद्ध दिव्य चक्षु स उस पुद्गल को देखता है।—वह देखता है—यह पुद्गल हिंसक ॰ मिथ्या दृष्टि था, वह (अब) काया छोड मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न हुआ है। वह (समाधि-प्राप्त पुरूष) ऐसे कहता है—पाप कर्म है, दुश्चरित (=पाप कर्म) का विपाक भी है। और हमने (ऐसे) पुद्गल को देखा है—कोई पुरूष यहाँ हिंसक ॰ मिथ्या-दृष्टि था, वह काया छोड मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न हुआ। वह यह (भी) कहता है—जो कोई हिंसक ॰ मिथ्या-दृष्टि होता है, वह सारे ही ॰ मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न होते हैं। जो ऐसे जानते हैं, वही ठीक जानते है। जो अन्यथा जानते हैं, उनका ज्ञान मिथ्या है। इस प्रकार उसे जो स्वयं ज्ञान, स्वयं दृष्ट, स्वयं विदित है, उसे वह दृढता से पकड कर, आग्रह करके आग्रह के साथ उसका व्यवहार करता है—यही सच है, और सब मिथ्या (=मोघ) है।
(2) “और यहाँ, आनन्द! कोई श्रमण या ब्राह्मण ॰ उद्योग ॰ से युक्त हो ॰ चित्त की समाधि के कारण ॰ दिव्य-चक्षु से ॰ देखता है—यह पुद्गल हिंसक ॰ मिथ्या दृष्टि था, वह अब ॰ मरने के बाद ॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न हुआ है। वह ऐसा कहता है—‘नहीं है पापकर्म, नहीं है दुश्चरित का विपाक; हमने ऐसे पुद्गल को देखा है—स्वर्गलोक में उत्पन्न हुआ है। वह ऐसा कहता है—जो (कोई) हिंसक ॰ मिथ्या-दृष्टि होता है, वह सभी ॰ मरने के बाद ॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न होता है। जो ऐसा जानते हैं, वही ठीक जानते हैं ॰ और सब मिथ्या है।
(3) “और यहाँ, आनन्द! ॰ दिव्य-चक्षु से ॰ देखता है—यह पुद्गल अहिंसक ॰ सम्यग्-दृष्टि था, वह (अब) ॰ मरने के बाद ॰ स्वर्ग लोक में उत्पन्न हुआ है। वह ऐसा कहता है—है पुण्य-कर्म, है सुचरित का विपाक; हमने ऐसे पुद्गल को देखा है—॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न हुआ है वह ऐस कहता है—जो (कोई) अ-हिंसक ॰ सम्यग्-दृष्टि होता है, वह सभी ॰ मरने के बाद ॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न होता है। ऐसा जानते है, वही ठीक जानते हैं ॰ और सब मिथ्या है।
(4) “और यहाँ, आनन्द! ॰ दिव्य-चक्षु से ॰ देखता है—यह पुद्गल अ-हिसंक ॰ सम्यग्-दृष्टि था; वह (अब) ॰ मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न हुआ है। वह ऐसा कहता है—नहीं है पुण्य-कर्म, नहीं है सुचरित का विपाक; हमने ऐसे पुद्गल को देखा है—॰ नकर में उत्पन्न हुआ है—वह ऐसा कहता है—जो (कोई) अ-हिंसक ॰ सम्यग्-दृष्टि होता है, वह सभी ॰ मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न होता है। जो ऐसा जानते हैं, वही ठीक जानते हैं ॰ और सब मिथ्या है।
(1) “वहाँ, आनन्द! जो श्रमण या ब्राह्मण यह कहता है—‘पाप कर्म हैं, दुश्चरित का विपाक है’—उसकी इस बात से मैं सहमत हूँ। और जो कि वह यह कहता है—‘मैंने ऐसा पुद्गल देखा है; ॰ हिंसक ॰ मिथ्या दृष्टि था, वह (अब) स्वर्गलोक में उत्पन्न हुआ। ॰—जो ॰ मिथ्यादृष्टि होता है, वह सभी ॰ मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न होता है’—उसकी इस बा से मैं सहमत नहीं हूँ। और जो वह यह कहता है—‘जो ऐसा जानते हैं, वही ठीक जानते हैं, जो अन्यथा जानते हैं, उनका ज्ञान मिथ्या हैं’—उसकी इस बात से भी मैं सहमत नहीं। और जो कि—‘जो उसे स्वयं ज्ञात ॰ वह ॰ आग्रह के साथ उसका व्यवहार करता है—यही सच है, और सब मिथ्या’—उसकी इस बात से भी मैं सहमत नहीं। सो किस हेतु?—आनन्द! महाकर्म-विभंग (=कर्म फलों के विभाजन करने) के विषय में तथागत का ज्ञान दूसरी तरह है।
(2) “वहाँ, आनन्द! जो वह श्रमण या ब्राह्मण यह कहता है—‘नहीं है पाप कर्म ॰, नहीं है दुश्चरित का विपाक’—उसकी इस बात से मैं सहमत नहीं। और जो कि यह वह कहता है—‘हमने ऐसे पुद्गल को देखा है ॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न हुआ है’—॰ मैं सहमत नहीं। ॰—जो ॰ मिथ्यादृष्टि होता है, वह सभी ॰ मरने के बाद ॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न होता है’—॰ सहमत नहीं। और जो कि वह यह कहता है—‘जो ऐसा जानते हैं, वही ठीक जानते हैं, जो अन्यथा जानते हैं, उनका ज्ञान मिथ्या हैं’—॰ मैं सहमत नहीं। और जो कि—‘जो उसे स्वयं ज्ञात ॰ वह आग्रह के साथ उसका व्यवहार करता है—‘यही सच है, और सब मिथ्या’—उसकी इस बात से भी मैं सहमत नहीं। सो किस हेतु?—आनन्द! महाकर्म-विभंग के विषय में तथागत का ज्ञान दूसरी तरह होता है।
(3) “वहाँ, आनन्द! जो वह श्रमण या ब्राह्मण यह कहता है—‘हैं पुण्य कर्म, है सुचरित का विपाक’—उसकी इस बात से मैं सहमत हूँ। और जो कि वह यह कहता है—‘हमने ऐसे पुद्गल को देखा है ॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न हुआ है’—॰ मैं सहमत हूँ। ॰—जो ॰ सम्यग् दृष्टि होता है, वह सभी ॰ मरने के बाद ॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न होता है’—॰ मैं सहमत हूँ। जो कि वह यह कहता है—‘जो ऐसा जानते हैं, वही ठीक जानते हैं, जो अन्यथा जानते है, उनका ज्ञान मिथ्या हैं’—॰ मैं सहमत नहीं। और जो कि—जो उसे स्वयं ज्ञात ॰ वह आग्रह के साथ उसका व्यवहार करता है—‘यही सच है, और सब मिथ्या’—उसकी इस बात से भी मैं सहमत नहीं’ सो किस हेतु?—आनन्द! महाकर्म-विभंग के विषय में तथागत का ज्ञान दूसरी तरह है।
(4) “वहाँ, आनन्द! जो वह श्रमण या ब्राह्मण यह कहता है—‘नहीं हैं पुण्य कर्म, नहीं है सुचरित का विपाक’—॰ मैं सहमत नहीं हूँ। ॰—‘हमने ऐसे पुद्गल को देखा है ॰ नरक में उत्पन्न हुआ है’—॰ मैं सहमत नहीं हूँ। ॰—जो ॰ सम्यग्-दृष्टि होता है, वह सभी ॰ मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न होता है’—॰ मैं सहमत नहीं। ॰—‘जो ऐसा जानते हैं, वही ठीक जानते है, जो अन्यथा जानते हैं, उनका ज्ञान मिथ्या है’—॰ मैं सहमत नहीं। और जो कि—जो उसे स्वयं ज्ञात ॰ वह आग्रह के साथ उसका व्यवहार करता हैं—‘यही सच है, और सब मिथ्या’—॰ मैं सहमत नहीं। सो किस हेतु?—आनन्द! महाकर्म-विभंग के विषय में तथागत का ज्ञान दूसरी तरह है।
(1) “आनंद! जो वह पुद्गल हिंसक ॰ मिथ्यादृष्टि होता है, ॰ मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न होता है; तो उस दुःखवेदनीय (=जिसका अनुभव दुःखमय होगा) पाप कर्म को उसने पहिले ही कर लिया होता है; या ॰ पीछे कर लिया होता है; या मरणकाल में उसने मिथ्यादृष्टि ग्रहण=समादिन्न की होती है; इसलिये वह ॰ मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न होता है। और जो कि वह यहाँ हिंसक ॰ मिथ्यादृष्टि होता है, उसका विपाक वह (या तो) इसी जन्म में भोग लेता है, या उत्पन्न होकर दूसरी बार।
(2) “आनन्द! जो वह पुद्गल हिंसक ॰ मिथ्यादृष्टि होता है, ॰ मरने के बाद ॰ स्वर्ग लोग में उत्पन्न होता है; तो उस सुखवेदनीय पुण्यकर्म को उसने पहिले ही कर लिया होता है, या ॰ पीछे कर लिया होता है; या मरण काल में उसने सम्यग्-दृष्टि ग्रहण ॰ की होती है, इसलिये ॰ मरने के बाद ॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न होता हे। और जो कि वह यहाँ हिंसक ॰ मिथ्यादृष्टि होता है, उसका विपाक वह (या तो) इसी जन्म में भोग लेता हैं, या उत्पन्न होकर दूसरी बार भोगेगा।
(3) “आनन्द! जो वह पुद्गल अहिंकस ॰ सम्यग्-दृष्टि होता है, ॰ मरने के बाद ॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न होता है; तो ॰ पुण्यकर्म को उसने पहिले ही कर लिया होता है, या ॰ पीछे कर लिया होता है, या मरणकाल में उसने सम्यग् दृष्टि ग्रहण ॰ की होती है; इसलिये ॰ मरने के बाद ॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न होता है। और जो कि वह यहाँ अ-हिंसक ॰ सम्यग्-दृष्टि होता है, उसका विपाक वह (या तो) इसी जन्म में भोगता है, या उत्पन्न होकर दूसरी बार।
(4) “आनंद! जो वह पुद्गल अहिंसक ॰ सम्यग्-दृष्टि होता है, ॰ मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न होता है; तो ॰ पापकर्म को उसने पहिले ही कर लिया होता है, या ॰ पीछे कर लिया होता है; या मरणकाल में उसने मिथ्यादृष्टि ग्रहण ॰ की होती है; इसलिये ॰ मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न होता है। और जो कि वह यहाँ अ-हिंसक ॰ सम्यग्-दृष्टि होता है, उसका विपाक वह (या तो) इसी जन्म में भोग लेता है, या उत्पन्न होकर दूसरी बार।
“इस प्रकार, आनंद! (1) अ-भव्य कर्म हैं; (बुरे की तरह दिखाई पडने वाले) अ-भव्य (=बुरे, पाप) कर्म हैं; (2) भव्याभास भी अ-भव्य कर्म हैं; (3) भव्याभास भी भव्य कर्म हैं; (4) अ-भव्याभास भी भव्यकर्म हैं।”
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् आनंद ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
لتكن كل الكائنات سعيدة