MN 145
Puṇṇovāda sutta: पुण्णोवाद-सुत्तन्त
Puṇṇovādasutta
Saḷāyatanavagga
Traductions
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।
तब आयुष्मान् पूर्ण जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठे। एक ओर बैठे आयुष्मान् पूर्ण ने भगवान् से कहा—
“अच्छा हो, भन्ते! भगवान् मुझे संक्षिप्त से धर्म-उपदेश करें, जिस धर्म को भगवान् से सुनकर मैं एकाकी, एकान्ती, अप्रमादी, उद्योगी, संयमी हो विहार करूँ।”
“पूर्ण! चक्षु से विज्ञेय रूप इष्ट=कान्त=मनाप, प्रियरूप=कामोपसंहित, रजनीय होते हैं। जब भिक्षु उनका अभिनन्दन करता=स्वागत करता, अध्यवसाय करता है। अभिनन्दन करते, ॰ अध्यवसाय करते हुये उसको, नन्दी (=तृष्णा) उत्पन्न होती है। पूर्ण! नन्दी की उत्पत्ति (=समुदय) से दुःख का समुदय कहता हूँ। पूर्ण! जिह्वा से विज्ञेय रस इष्ट ॰। पूर्ण! चक्षु से विज्ञेय रूप इष्ट ॰ है। यदि भिक्षु उन्हंे अभिनन्दन ॰ नहीं करता। ॰। उसकी नन्दी (=तृष्णा) निरूद्ध (=विलीन) हो जाती है। पूर्ण! नन्दी के निरोध से दुःख का निरोध कहता हूँ। ॰। पूर्ण! मन से विज्ञेय (=ज्ञातव्य) धर्म इष्ट ॰ है। ॰। पूर्ण मेरे इस संक्षिप्त में कथित अववाद (=उपदेश) से उपदिष्ट हो, कौन से जनपद में तू विहार करेगा?”
“भन्ते! सूनापरान्त नामक जनपद है, मैं वहाँ विहार करूँगा।”—”पूर्ण्! सूनापरान्त के मनुष्य चण्ड हैं, ॰ परूष (=कठोर) है। जो पूर्ण! तुझे सूनापरान्त के मनुष्य आक्रोशन=परिभाषण (=कुवाच्य) करेंगे, तो…तुझे क्या होगा?”
“यदि भन्ते! सूनापरान्त मनुष्य मुझे आक्रोशन=परिभाषण करेंगे, तो मुझे ऐसा होगा—‘सूनापरान्त के मनुष्य भद्र हैं ॰, सुमद्र हैं; जो कि यह मुझ पर हाथ से प्रहार नहीं करते’—मुझे भगवान्! (ऐसा) होगा, सुगत! ऐसा होगा।”
“यदि, पूर्ण! सूनापरान्त के मनुष्य तुझ पर हाथ से प्रहार करें, तो पूर्ण! तुझे क्या होगा?”
“॰ भन्ते! मुझे ऐसा होगा—‘यह सूनापरान्त के मनुष्य भद्र हैं, ॰ सुमद्र हैं; जो कि यह मुझे डंडे से नहीं मारते ॰’
॰। ॰ डंडे से नहीं मारते। ॰ ॰। ॰ शस्त्र से नहीं मारते। ॰ ॰। ॰ शस्त्र से मेरे प्राण नहीं ले लेते। ॰
“यदि पूर्ण! सूनापरान्त के मनुष्य तुझे तीक्ष्ण शस्त्र से मार डालें। तो पूर्ण! तुझे क्या होगा?”
“॰ मुझे, भन्ते! ऐसा होगा—‘उन भगवान् के कोई कोई श्रावक (शिष्य) हैं, जो जिन्दगी से तंग आकर, ऊब कर घृणा कर, (आत्म-हत्यार्थ) शस्त्र-हारक (=शस्त्र लगा लेना) खोजते हे। सो मुझे यह शस्त्र-हारक बिना खोजे ही मिल गया।’ भगवान्! मुझे ऐसा होगा। सुगत! मुझे ऐसा होगा।”
“साधु,! साधु!! पूर्ण!!! साधु पूर्ण! तू इस प्रकार के शम, दम से युक्त हो, सूनापरान्त जनपद में वास कर सकता है। जिसका तू काल समझे (वैसा कर)।”
तब आयुष्मान् पूर्ण भगवान् के वचन को अभिनन्दन कर अनुमोदन कर, आसन से उठ, भगवान् को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर, शयनासन सँभाल, पात्र-चीवर ले, जिधर सुनापरान्त जनपद था, उधर चारिका को चल पडे। क्रमशः चारिका करते जहाँ सूनापरान्त जनपद था, वहाँ पहुँचे। आयुष्मान् पूर्ण सुनापरान्त जनपद में विहार करते थे।
तब वहाँ आयुष्मान् पूर्ण ने उसी वर्षा के भीतर पाँच सौ उपासकों को ज्ञान कराया। उसी वर्षा के भीतर पाँच सौ उपासिकाओ को ज्ञान कराया, उसी वर्षा के भीरत उन्होंने (स्वयं) भी तीनों विद्याओं का साक्षात्कार किया। तब आयुष्मान् पूर्ण दूसरे समय परिनिर्वाण को प्राप्त हुये।
तब बहुत से भिक्षु जहाँ भगवान् थे, वहाँ,…जाकर भगवान् को अभिवादन कर,…एक ओर बैठे हुये यह बोले—
“भन्ते! यह पुण्ण (=पूर्ण) नामक कुलपुत्र था, जिसे कि भगवान् से संक्षेप से उपदेश दिया था, वह काल कर गया, उसकी क्या गति हैं, क्या अभिसंपराय होगा?’-’
“भिक्षुओ! पुण्ण कुलपुत्र, पंडित, सत्यवादी, धर्मानुसार (चलने वाला) था। उसने धर्म से मुझे कोई पीडा नहीं दी। भिक्षुाओ! पूर्ण कुलपुत्र परिनिर्वाण को प्राप्त हुआ।”
भगवान् ने यह कहा, संतुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनंदन किया।
À propos de cette traduction
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Que tous les êtres soient heureux