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MN 113

Sappurisa sutta: सप्पुरिस-धम्म

Sappurisasutta

Anupadavagga

Terjemahan

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथ-पिंडी के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे।

वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया — “भिक्षुओ !”

“भदन्त !”- (कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा- “भिक्षुओं ! तुम्हें सत्पुरूष धर्म और सत्पुरूष-धर्म उनदेशता हूँ। उसको सुनो, अच्छी तरह मनमें करो, कहता हूँ।”

“अच्छा, भन्ते!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया। भगवान् ने यह कहा-“भिक्षुओं! क्या है, अ-सत्पुरूष-धर्म?—(1)—(क) भिक्षुओं! (यदि) अ-सत्पुरूष ऊँचे कुल से प्रब्रजित (=संन्यासी) हुआ रहता है। वह ख्याल करता है—”मैं ऊँचे कुल से प्रब्रजित हुआ हूँ, और यह दूसरे भिक्षु ऊँचे कुल से नहीं प्रब्रजित हुये है। सो वह उस उच्च-कुलीनता के कारण अपने लिये अभिमान करता है, दूसरों को नीची निगाह से देखता है। भिक्षुओ! यह है, अ-सत्पुरूष-धर्म।

(1)—(ख) “भिक्षुओं! सत्पुरूष यह ख्याल करता है—‘उच्च-कुलीनता के कारण लोभ-धर्म (=लोभ) नहीं नष्ट हुआ करते, द्वेष-धर्म ॰, मोह-धर्म नष्ट नहीं हुआ करते। चाहे ऊँचे-कुल से न प्रब्रजित हुआ हो; किन्तु यदि वह है धर्म-र्मा पर आरूढ, ठीक मार्ग पर आरूढ, धर्मानुसार आचरण करने वाला; तो वह पूज्य है, वह प्रशंसनीय हैं।’ वह प्रतिपत्ति (=प्राप्ति) का ही ख्याल कर, उच्च-कुलीनता के कारण न अपने लिये अभिमान करता है, न दूसरों को नीची निगाह से देखता है, भिक्षुओ! यह है सत्पुरूष-धर्म।

(2)—(क) “और फिर भिक्षुओं! अ-सत्पुरूष महाकुल से प्रब्रजित हुआ रहता है। ॰ दूसरों को नीची निगाह से देखता है। भिक्षुओं! यह है अ-सत्पुरूष-धर्म।

(2)—(ख) ”॰ सत्पुरूष महाकुल से प्रब्रजित हुआ रहता है। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(3)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष महाभोग (=महाधनी) कुल से ॰। ॰।

(3)—(ख) ”॰ सत्पुरूष महाभोग कुल स ॰। ॰।

(4)—(क) ”॰ उदार-भोग (=महाधनी) कुल से ॰। ॰।

(4)—(ख) ”॰ सत्पुरूष उदार भोग कुल से ॰। ॰।

(5)—(क) ”॰ और फिर भिक्षुओं! (कोई) अ-सत्पुरूष ज्ञात (=प्रसिद्ध) यशस्वी होता है। वह ख्याल करता है—‘मैं ज्ञात, यशस्वी हूँ, यह दूसरे भिक्षु अल्पज्ञात अल्पशक्ति हैं।’ वह उस अपनी विज्ञानता के कारण अपने लिये अभिमान करता है, दूसरों को नीची निगाह से देखता है। भिक्षुओं! यह है, अ-सत्पुरूष-धर्म।

(5)—(ख) ”॰ सत्पुरूष ज्ञात, यशस्वी होता है। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। भिक्षुओं! यह है, सत्पुरूष-धर्म।

(6)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष वस्त्र, भोजन, शयन-आसन, पथ्य-औषध् का पाने वाला होता है। वह ख्याल करता है—॰। ॰ दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(6)—(ख) ”॰ सत्पुरूष वस्त्र, ॰ पाने वाला होता है। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(7)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष बहुश्रुत होता है। ॰ दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(7)—(ख) ”॰ सत्पुरूष बहुश्रुत होता है। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(8)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष विनयधर होता है। ॰ दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(8)—(ख) ”॰ सत्पुरूष विनयधर होता है। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(9)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष धर्म-कथिक (=व्याख्याता) होता है। ॰ दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(9)—(ख) ”॰ सत्पुरूष धर्मकायिक होता है। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(10)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष आरण्यक (=वनवासी) होता है। ॰ दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(10)—(ख) ”॰ सत्पुरूष आरण्यक होता है। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(11)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष पांसु-कूलिक (=चिथडेधारी) होता है। ॰ दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(11)—(ख) ”॰ सत्पुरूष पांसुकूलिक होता है। ॰ दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(12)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष पिंडपातिक (=मधुकडी वाला) होता है। ॰ दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(12)—(ख) ”॰ सत्पुरूष पिंडपातिक होता है। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(13)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष वृक्षमूलिक (=घर के भीतर न रहकर, सदा वृक्ष के नीचे रहने वाला) होता है। ॰ दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(13)—(ख) ”॰ सत्पुरूष वृक्षमूलिक होता है। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(14)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष श्मशानिक (=श्मशान में रहने वाला) होता है। ॰ दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(14)—(ख) ”॰ सत्पुरूष श्मशानिक होता है। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(15)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष कामों से विरहित ॰ प्रथम-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। ॰ दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(15)—(ख) ”॰ सत्पुरूष प्रथम ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। वह ऐसां ख्याल करता है—‘प्रथम-ध्यान की प्राप्ति के बाद भी भगवान् ने अ-तन्मयता होने (की बात) कही है। जो जो ख्याल करते हैं, उससे वह अन्यथा ही होता है।’ वह उस अ-तन्मयता को ख्याल कर, उस प्रथम-ध्यान की प्राप्ति से न अपने लिये अभिमान करता है; न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(16)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष ॰ द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। ॰। दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(16)—(ख) ”॰ सत्पुरूष ॰ द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। ॰ उस अ-तन्मयता को ख्यालकर ॰। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(17)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष ॰ तृतीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। ॰। दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(17)—(ख) ”॰ सत्पुरूष ॰ तृतीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। ॰ उस अ-तन्मयता को ख्यालकर ॰। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(18)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष ॰ चतुर्थ-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। ॰। दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(18)—(ख) ”॰ सत्पुरूष ॰ चतुर्थ-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। ॰ उस अ-तन्मयता को ख्यालकर ॰। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(19)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष रूपसंज्ञा को सर्वथा छोडने से ॰ आकाशानन्त्यायतन को प्राप्त हो विहरता है। ॰। दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(19)—(ख) ”॰ सत्पुरूष ॰ आकाशानन्त्यायतन को प्राप्त हो विहरता है। ॰ उस अ-तन्मयता को ख्यालकर ॰। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(20)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष ॰ विज्ञान-आनंत्य-आयतन को प्राप्त हो विहरता है। ॰। दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(20)—(ख) ”॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(21)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष ॰ आकिंचन्यायतन को प्राप्त हो विहरता है। ॰। दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(21)—(ख) ”॰ सत्पुरूष ॰ आकिचन्यायतन को प्राप्त हो विहरता है। ॰ उस अ-तन्मयता को ख्यालकर ॰। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(22)—(क) ”॰ अ-सत्पुरूष ॰ नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन को प्राप्त हो विहरता है। ॰। दूसरों को नीची निगाह से देखता है। ॰।

(22)—(ख) ”॰ सत्पुरूष ॰ नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन को प्राप्त हो विहरता है। ॰ उस अ-तन्मयता को ख्यालकर ॰। ॰ न दूसरों को नीची निगाह से देखता है। भिक्षुओं! यह है सत्पुरूष-धर्म।

(23)—और फिर भिक्षुओं! सत्पुरूष नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन को भी सर्वथा अतिक्रमणकर, संज्ञा-वेदित-निरोध को प्राप्त हो विहरता है। प्रज्ञा से उसे देख कितने ही (उसके) आस्रव (=चित्तमल) नष्ट हो जाते है। भिक्षुओं! यह भिक्षु न कुछ मान करता है, न कही मान करता हैं, और न किसी के साथ मान करता है।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो, उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

Tentang terjemahan ini

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Semoga semua makhluk berbahagia