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MN 118

Ānāpānassati sutta: आनापान-सति-सुत्तन्त

Ānāpānassatisutta

Anupadavagga

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान्, आयुष्मान् सारिपुत्र, ॰ महामौद्गल्यायन, ॰ महाकाश्यप, ॰ महाकात्यायन, ॰ महाकोट्ठित (=कोष्ठिल), ॰ महाकप्पिन, ॰ महाचुन्द, ॰ अनुरूद्ध, ॰ रेवत, ॰ आनन्द, और दूसरे अभिज्ञात (=प्रसिद्ध) अभिज्ञात स्थविर श्रावको (=शिष्यों) के साथ श्रावस्ती, मृगारमाता के प्रासाद, पूर्वाराम में विहार करते थे।

उस समय स्थविर (=वृद्ध) भिक्षु नये भिक्षुओं को उपदेश=अनुशासन करत थे। कोई कोई स्थविर भिक्षु दस भिक्षुओं को भी उपदेश ॰ करते थे; कोई कोई स्थविर भिक्षु बीस भिक्षुओं को भी ॰; ॰ तीस ॰; चालीस भिक्षुओं को भी ॰। स्थविर भिक्षुओं द्वारा उपदेशित=अनुशासित हो, वह नये भिक्षु अच्छी तरह (=उदारं) पूर्व के बाद पीछे आने वाले (विषय) को समझते थे।

उस समय, उपोसथ को पंचदशी प्रवारणी की पूर्णिमा की रात को, भगवान् भिक्षु संघ से घिरे खुली जगह में बैठे थे। तब भगवान् ने चुपचाप (बैठे) भिक्षु संघ को देखकर, भिक्षुओं को संबोधित किया—

“भिक्षुओं! मैने इस प्रतिपद् (=मार्ग) के लिये उद्योग किया है, इस प्रतिपद के लिये मैं उद्योग-युक्त-चित्त वाला रहा हूँ। इसलिये भिक्षुओ! संतुष्ट (=सोमत्त) हो, अप्राप्त की प्राप्ति=अनधिगत के अधिगत, न-साक्षात्कार किये के साक्षात्कार के लिये और भी उद्योग (=वीर्यारम्भ) करो। भिक्षुओं! यहीं श्रावस्ती में मैं कौमुदी (=चाँदनी; पूर्णिमा) चातुर्मासी को बिताऊँगा।”

जनपदवासी (=देहात के) भिक्षुओं ने सुना, कि भगवान् कौमुदी चातुर्मासी (=कार्तिक-पूर्णिमा) को श्रावस्ती में बितावेंगे। तब जनपदवासी भिक्षु भगवान् के दर्शन के लिये श्रावस्ती में आने लगे। वह स्थविर भिक्षु और भी सन्तुष्ट हो नये भिक्षुओं को उपदेश=अनुशासन करते। कोई कोई ॰ इस भिक्षुओं को भी ॰। ॰। ॰ चालीस भिक्षुओं को भी ॰। ॰ वह नये भिक्षु ॰ और भी ॰ समझतेथे।

उस समय उपोसथ को पंचदशी पूर्णा चातुर्मासी कौमुदी पूर्णिमा की रात को भगवान् भिक्षु-संघ से घिरे खुली जगह में बैठे थे। तब भगवान् ने चुपचाप (बैठे) भिक्षु-संघ को देख कर, भिक्षुओं को संबोधित किया—

“भिक्षुओं! यह परिषद् प्रलाप (=शोर-गुल) रहित है, =निष्प्रलाय है…, सार में प्रतिष्ठित, शुद्ध है यह परिषद्; उस प्रकार की, भिक्षुओं! यह भिक्षु-संघ है। उस प्रकार की, भिक्षुओं! यह परिषद् है इस प्रकार की यह परिषद् आहुणेय=पाहुणेय (=अतिथि सत्कार के योग्य), दक्षिणेय (=दान-पात्र) अंजलिय-करणीय (=हाथ जोडने योग्य), लोक में पुण्य के (बोने) का अनुपम क्षेत्र (खेत) है। भिक्षुओं! (यह) उस प्रकार का भिक्षुसंघ है, ॰ उस प्रकार की परिषद् है; जैसी परिषद् को थोडा देने पर बहुत (फल) हाता है; बहुत (दान) देने पर बहुतर (=फल) होता है।…(यह) उस प्रकार भिक्षु-संघ है, (यह) उस प्रकार की परिषद् है; जिस प्रकार (की परिषद्) का लोगो को दर्शन भी दुर्लभ है। ॰ जिस प्रकार (की परिषद्) को योजनों दूर होने पर (पाथेय की) पोटली बाँधकर भी जाना योग्य है।…भिक्षुओं! इस भिक्षु-संघ में (ब्रह्मचर्य) वास-समाप्त किये, कृतकृत्य, भारमुक्त, सद्-अर्थ (=निर्वाण) को प्राप्त, भव-बंधन-मुक्त सम्यग-ज्ञान द्वारा मुक्त क्षीणास्रव (=मल-रहित) अर्हत् भिक्षु है।…। भिक्षुओं! इस भिक्षु-संघ में ऐसे भिक्षु है, जो पाँच अवर-भागीय-संयोजनों के क्षय से, औपपातिक (=देव) हो वहाँ (स्वर्गलोक में) निर्वाण प्राप्त करने वाले, उस लोक में यहाँ न आने वाले (=अनागामी) है।…। ॰ ऐसे भिक्षु हैं, जो तीन संयोजनो के क्षय से राग-द्वेष-मोह के निर्बल (=तनु) हो जाने से सकृदागामी हैं, (वह) एक ही बार (और) इस लोक में आकर दुख का अन्त करेंगे। भिक्षुओं! इस भिक्षु-संघ में इस प्रकार के भी भिक्षु हैं, जो तीन संयोजनों के क्षय से स्रोतआपन्न, (निर्वाण-मार्ग से) न पतित होने वाले, नियत (=निश्चित), सम्बोधिपरायण (=परमज्ञान को प्राप्त करने वाले) है। ॰ जो चारों स्मृति-प्रस्थान की भावना में तत्पर हो विहरते है। ॰। ॰ जो चार सम्यक्-प्रधानों की भावना में तत्पर हो विहरते है। ॰। ॰ चार ऋद्धिपादों ॰। ॰। ॰ चार इन्द्रियों ॰। ॰। ॰ पाँच बलों ॰। ॰। ॰ सात बोध्यंगों ॰। ॰। ॰ आर्य-अष्टांगिक मार्ग ॰। ॰। ॰ मैत्री-भावना तत्पर हो विहरते है। ॰। ॰ करूणा-भावना ॰। ॰। ॰ मुदिता-भावना ॰। ॰। ॰ उपेक्षा-भावना ॰। ॰ अशुभ-भावना ॰। ॰। ॰ अनित्य-संज्ञा ॰। ॰। ॰ अनापान-सति (=प्राणायाम) भावना ॰। ॰।

“भिक्षुओं! अनापान सति की भावना करने पर, (उसके अभ्यास को) बढाने पर महाफल प्रद=महानृशंस्य होती है। भिक्षुओं! अनापान-सति की भावना=बहुलीकरण करने पर चार स्मृति-प्रस्थानों को परिपूर्ण करती है। भावना=बहुलीकरण करने पर चार स्मृति-प्रस्थान सात बोध्यंगों को परिपूर्ण करते है। ॰ सात बोध्यंग विद्या और विमुक्ति को परिपूर्ण करते है।॰

“भिक्षुओं! किस प्रकार भावना=बहुलीकरण करने पर, आनापानसति महाफलप्रद ॰ होती है?—भिक्षुआं! अरण्य-वृक्ष मूल या शून्यागार में बैठता है आसन मार, काया को सीध रख, स्मृति को सन्मुख उपस्थित कर, वह स्मृति (=होश) पूर्वक श्वास लेता है, स्मृतिपूर्वक श्वास छोडता है। दीर्घ श्वास लेते समय—‘दीर्घ श्वास ले रहा हूँ’—जानता है। दीर्घ श्वास छोडते ॰। ह्रस्व-श्वास लेते समय—‘ह्रस्व श्वास ले रहा हूँ’—जानता है। ह्रस्व-श्वास छोडते ॰। ‘सारी काया (की स्थिति) को अनुभव (=संवेदन) करते श्वास लूँगा’—सीखता है। ॰ श्वास छोडूँगा’—सीखता (=अभ्यास करता) है। ‘कायिक संस्कारों (=हर्कतों, क्रियाओं) को रोक कर श्वास लूँगा’—अभ्यास करता है। ॰ श्वास छोडूँगा’—अभ्यास करता है। ‘प्रीति-अनुभव करते आश्वास (=श्वास लेना) व प्रश्वास (=श्वास छोडना) लूँगा’—अभ्यास करता है। ॰ सुख-अनुभव करते ॰। ॰। ॰ चित्त-संस्कारों (=चित्त की क्रियाओं) को अनुभव करते ॰। ॰। ॰ चित्त-संस्कार को रोक कर ॰। ॰। ॰ चित्त को अनुभव करते ॰। ॰। ॰ चित्त् को प्रमुदित करते ॰। ॰। ॰ चित्त को समाहित करते ॰। ॰। ॰ चित्त को विमुक्त करते ॰। ॰। ॰ (सभी वस्तुओं के) अनित्य (होने) का ख्याल करते ॰। ॰। ॰ विराग का ख्याल करते ॰। ॰। ॰ निरोध का ख्याल करते ॰। ॰। ॰ प्रतिनिस्सर्ग (=त्याग) का ख्याल करते ॰। ॰। भिक्षुओं! इस प्रकार भावित=बहुली-कृत आनापानसति महाफलप्रद=महानृशंस होती है।

“भिक्षुओं! किस प्रकार भावित=बहुलीकृत आनापानसति चार स्मृति प्रस्थानों को परिपूर्ण करती है?—(1) जिस समय भिक्षुओं! भिक्षु दीर्घ श्वास लेते ‘दीर्घ श्वास ले रहा हूँ’—जानता है! दीर्घ श्वास छोडते ॰। ह्रस्व-श्वास लेते ॰। ह्रस्व-श्वास छोडते ॰ सारी काया को अनुभव करते ॰। ॰। कायिक संस्कारों को रोक कर ॰। ॰। उस समय, भिक्षुओं! भिक्षु लोक में अभिध्या (=लोभ) और दौर्मनस्य को हटाकर, स्मृति-संप्रजन्य-पूर्वक स्मृतिवान् हो, काया में कायानुपश्यी होकर विहरता है। भिक्षुओं! इस आश्वास-प्रश्वास को मैं काया में दूसरी काया कहता हूँ। इसलिये उस समय, भिक्षुओं! भिक्षु ॰ कायानुपश्यी होकर विहरता है। (2) जिस समय भिक्षुओं! भिक्षु प्रीति अनुभव करते ॰। ॰। ॰ सुख ॰। ॰। ॰ चित्त संस्कारों को अनुभव करते ॰। ॰। ॰ चित्त-संस्कार को रोक कर ॰। ॰। ॰ उस समय, भिक्षुओं! भिक्षु लोक में अभिध्या और दौर्मनस्य को हटाकर, स्मृति-सम्प्रजन्य-पूर्वक स्मृतिवान् हो, वेदनाओं में वेदनानुपश्यी होकर विहरता है। भिक्षुओं! आश्वास-प्रश्वास को इस प्रकार अच्छी तरह मन में करने को मैं वेदनाओं में इसे एक वेदना कहता हूँ। इसलिये उस समय भिक्षुओं! भिक्षु ॰ वेदनाऽनुपश्यी होकर विहरता है। (3) जिस समय भिक्षुओं! भिक्षु चित्त को अनुभव करते ॰। ॰ चित्त को प्रमुदित करते ॰। ॰ चित्त को समाहित करते । ॰ चित्त को विमुक्त करते ॰। उस समय भिक्षुओं! भिक्षु ॰ स्मृतिवान् हो चित्त में चित्तानुपश्यी होकर विहरता है। (4) जिस समय भिक्षुओं! भिक्षु अनित्य का ख्याल करते ॰। ॰ विराग का ख्याल करते ॰। ॰ निरोध का ख्याल करते ॰। ॰ प्रतिनिस्सर्ग का ख्याल करते ॰। उस समय, भिक्षुओं! भिक्षु ॰ स्मृतिवान् हो धर्मों में धर्मानुपश्यी होकर विहरता है। सो वह अभिध्या-दौर्मनस्य के नाश को प्रज्ञा से देख देखकर, अच्छी तरह उपेक्षित होती है। इसलिये, भिक्षुओं! उस समय भिक्षु ॰ स्मृतिवान् हो धर्मो में धर्मानुपश्यी होकर विहरता है। भिक्षुओं! इस प्रकार भावित=बहुलीकृत आनापानसति चार स्मृतिप्रस्थानों को परिपूर्ण करती है।

“भिक्षुओं! किस प्रकार भावित=बहुलीकृत चार स्मृति प्रस्थान सात बोध्यंगों को परिपूर्ण करते हैं?—(1) भिक्षुओं! जिस समय भिक्षु ॰ स्मृतिवान् हो काया में कायानुपश्यी हो विहरता है; उस समय इसकी स्मृति उपस्थित=असंमुषित रहती है। जिस समय भिक्षुओं! भिक्षु की स्मृति उपस्थित ॰ रहती है; उस समय वह भिक्षु स्मृति-संबोध्यंग में लग्न रहता है; उस समय भिक्षु स्मृति संबोध्यंग की भावना करता है। उस समय भावना द्वारा भिक्षु का स्मृति-संबोध्यंग परिपूर्ण होता है। (2) वह वहाँ वहाँ विहार करते उस धर्म की प्रज्ञा से (=विचयन=छान-बीन) प्रविचयन=मीमांसन करता है। जिस समय ॰ वहाँ वहाँ ॰ धर्म की प्रज्ञा से विचयन ॰ करता हैं, उस समय वह भिक्षु धर्म-विचय-संबोध्यंग में लग्न रहता है; उस समय भिक्षु धर्म विचय सं॰ भावना करता है। उस समय भावना द्वारा भिक्षु का धर्म-विचय-संबोध्यंग परिपूर्ण होता है। (3) उस धर्म की प्रज्ञा से विचयन ॰ करते ॰ उस भिक्षु ने वीर्य (=उद्योग) को निरामिष (=विषयों से परे की) प्रीति उत्पन्न होती है। जिस समय ॰ आरब्ध-वीर्य भिक्षु को निरामिषप्रीति उत्पन्न होती है; उस समय भिक्षु प्रीति-संबोध्यंग को आरंभ किया होता है। उस समय भिक्षु प्रीति संबोध्यंग की भावना करता है। ॰ उस समय भावना द्वारा भिक्षु का प्रीति संबोध्यंग परिपूर्ण होता है। (5) प्रीतिमान् (साधक) की काया और चित्त भी प्रश्रब्ध (=शांत) होता है ॰ प्रश्रब्धि संबोध्यंग परिपूर्ण होता है। (6) प्रश्रब्ध काय और सुखी का चित्त समाहित (=समाधि प्राप्त=एकाग्र) होता है ॰ समाधि-संबोध्यंग परिपूर्ण होता है। (7) वह वैसे वैसे समाहित चित्त अच्छी तरह उपेक्षायुक्त होता है। जिस समय, भिक्षुओं! भिक्षु वैसे वैसे अच्छी तरह उपेक्षा-युक्त होता है। भिक्षु ने उस समय उपेक्षा-संबोध्यंग को आरंभ किया होता है। ॰ उस समय भिक्षु का उपेक्षा-संबोध्यंग परिपूर्ण होता है! भिक्षुओं! जिस समय भिक्षु ॰ स्मृतिवान् हो वेदनाओं में वेदनानुपश्यी, चित्त में चित्तानुपश्यी, धर्मों में धर्मानुपश्यी हो विहरता है; उस समय उसकी स्मृति उपस्थित=अ-संमुषित होती है ॰ उस समय भिक्षु का उपेक्षा-संबोध्यंग परिपूर्ण होता है। भिक्षुओं इस प्रकार भावित=बहुलीकृत चारें स्मृति प्रस्थान सात बोध्यंगों को पूरिपूर्ण करते हे।

“भिक्षुओं! किस प्रकार भावित=बहुलीकृत सात बोध्यंग विद्या, विमुक्ति को परिपूर्ण करते हैं?—यहाँ, भिक्षुआं! भिक्षु विवेक-विराग-निरोध पर अवलंबित तथा त्याग (=व्यवसर्ग) परिणाम वाले स्मृति-संबोध्यंग की भावना (=अभ्यास) करता है। ॰ धर्म विचय ॰। ॰ वीर्य ॰। ॰ प्रीति ॰। ॰ प्रश्रब्धि ॰। ॰ समाधि ॰। ॰ उपेक्षा ॰। भिक्षुओं! इस प्रकार भावित=बहुलीकृत होने पर सात संबोध्यंग विद्या और विमुक्ति को परिपूर्ण करते है”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

Tentang terjemahan ini

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Semoga semua makhluk berbahagia