MN 151
Piṇḍapātapārisuddhi sutta: पिंडपात-पारिसुद्धि-सुत्तन्त
Piṇḍapātapārisuddhisutta
Saḷāyatanavagga
Terjemahan
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् राजगृह में वेणुवन-कलंदक-निवाप में विहार करते थे।
तब आयुष्मान् सारिपुत्र सायंकाल ध्यान से उठ, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये, जाकर भगवान् को अभिवादनकर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् सारिपुत्र से भगवान् ने यह कहा—
“सारिपुत्र! तेरी इन्द्रियाँ (=शरीर) विप्रसन्न हैं, छवि-वर्ण (=शरीर के चमडे का रंग) परिशुद्ध=पर्यवदात है। सारिपुत्र! आजकल किस विहार में अधिकतर विहार करता है?”
“भन्ते! आजकल मैं अधिकतर शून्यता-विहार से विहरता हूँ।”
“साधु, साधु, सारिपुत्र! महापुरूष-विहार से ही, सारिपुत्र! तू आजकल अधिकतर विहर रहा है। सारिपुत्र! यह शून्यता महापुरूष विहार है। इसलिये सारिपुत्र! जो भिक्षु भी आकांक्षा करे, शून्यता विहार से मैं अधिकतर विहरूँ; उस भिक्षु को, सारिपुत्र! यह सोचना चाहिये—‘जिस मार्ग से मैं भिक्षु के लिये गाँव में प्रविष्ट हुआ, जिस प्रदेश में पिंड क लिये घूमा, और जिस मार्ग से पिंड (ले) गाँव से बाहर हुआ। क्या, वहाँ चक्षुर्विज्ञेय रूपों में मेरे मन का छन्द=राग, द्वेष, मोह या प्रतिघ (=प्रतिहिंसा) हैं या नहीं!’ यदि, सारिपुत्र! भिक्षु प्रत्यवेक्षण (=परीक्षण) करते ऐसा जाने—‘जिस मार्ग से मैं ॰ प्रविष्ट हुआ, ॰ बाहर हुआ; वहाँ चक्षुर्विज्ञेय रूपों में मेरे चित्त का ॰ राग ॰ प्रतिघ है’ तो सारिपुत्र! उस भिक्षु को उन्हीं पापों=अकुशल धर्मों के प्रहाण (=नाश) के लिये उद्योग करना चाहिये। यदि, सारिपुत्र! भिक्षु प्रत्यवेक्षण करते ऐसा जाने—‘॰ चक्षुर्विज्ञेय रूपों में मेरे चित्त का ॰ राग ॰ प्रतिघ नहं है’। तो सारिपुत्र! उस भिक्षु को उसी प्रीति=प्रामोद्य के साथ, रात-दिन कुशल-धर्मो (=अच्छे कर्मो) का परिशीलन करते, विहार करना चाहये।
“और फिर, सारिपुत्र! भिक्षु को यह सोचना चाहिये—‘जिस मार्ग से ॰ गाँव से बाहर हुआ? क्या वहाँ श्रोत्र-विज्ञेय शब्दों में ॰। ॰ घ्राण-विज्ञेय गन्धों में ॰। ॰ जिह्वा-विज्ञेय रसों में ॰। ॰ काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्यों में ॰। ॰ मनो-विज्ञेय धर्मों में ॰ रात-दिन कुशल-धर्मों का परिशीलन करते विहार करना चाहिये।
“और फिर, सारिपुत्र! भिक्षु को यह सोचना चाहिये—‘मेरे पाँच काम-गुण (=विष्ज्ञय भोग) प्रहीण हो गये हैं न?’ यदि, सारिपुत्र! भिक्षु प्रत्यवेक्षण करते ऐसा जाने—‘मेरे पाँच काम-गुण प्रहीण (=नष्ट) नहीं हुयें तो, सारिपुत्र! उस भिक्षु को पाँच काम-गुणों के प्रहाण के लिये उद्योग करना चाहिये। यदि सारिपुत्र! भिक्षु प्रत्यवेक्षण करते ऐसा जाने—‘मेरे पाँच काम-गुण प्रहीण हो गये’। तो, सारिपुत्र! उस भिक्षु को उसी प्रीति=प्रामोद्य के साथ रात-दिन कुशल-धर्मों का परिशीलन करते, विहार करना चाहिये।
“और फिर, सारिपुत्र! भिक्षु को यह सोचना चाहिये—‘मेरे पाँच नीवरण प्रहीण हो गये हैं न?’ ॰।
“॰—‘मैंने पाँच उपादान-स्कन्धों को परिज्ञात (=ज्ञात) कर लिया न? ॰।
“॰—‘मैंने चार स्मृति-प्रस्थानों की भावना की है न? ॰।
“॰—‘मैंने चार सम्यक्-प्रधानों की भावना की है न? ॰।
“॰—‘मैंने चार ऋषि-पादों की भावना की है न? ॰।
“॰—‘मैंने पाँच इन्द्रियों की भावना की है न? ॰।
“॰—‘मैंने पाँच बलों की भावना की है न? ॰।
“॰—‘मैंने सात बोध्यंगो की भावना की है न? ॰।
“॰—‘मैंने आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना की है न? ॰।
“॰—‘मैंने शमथ (=समाधि) और विपश्यना (=प्रज्ञा) की भावना की है न? ॰।
“॰—‘मैंने विद्या और विमुक्ति का साक्षात्कार किया है न? ॰।
“सारिपुत्र! जो कोई श्रमण-ब्राह्मणों ने अतीत काल में पिंडपात-परिशुद्धि (=भिक्षान्न की शुद्धि) की; उस सभी ने इसी प्रकार प्रत्यवेक्षण (=परीक्षण) कर करके पिंडपात को परिशोधित किया। सारिपुत्र! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण भविष्यकाल में पिंडपात-परिशुद्धि करेंगे; वह सभी इसी प्रकार ॰। जो कोई श्रमण या ब्राह्मा इस समय पिंडपात-परिशुद्धि करते हैं, वह सभी इसी प्रकार पिंडपात को परिशोधित करते हैं। इसलिये, सारिपुत्र! प्रत्यवेक्षण कर करके पिंडपात को परिशोधित करूँगा’—ऐसे सारिपुत्र! सीखना चाहिये।”
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् सारिपुत्र ने भगवान् के भाषण का अभिनंदन किया।
Tentang terjemahan ini
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Semoga semua makhluk berbahagia