Ουποσάθα

← Μέσες ομιλίες

ΜΝ 138

Uddesavibhaṅga sutta: उद्देस-विभंग-सुत्तन्त

Uddesavibhaṅgasutta

Vibhaṅgavagga

Μεταφράσεις

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओं!”

“भदन्त!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ! उद्देस-विभंग (=उद्देस-विभंग=व्याख्येय विषयों के नामों के विभाग) को तुम्हें उपदेशता हूँ; उसे सुनों अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।”

“अच्छा, भन्ते!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दियां

भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ! भिक्षु को वैसे वैसे उपपरीक्षण कहना चाहिये; जैसे जैसे उपपरीक्षण करने से उसका विज्ञान (=चित्त) बाहर विक्षिप्त=विसृष्ट न हो, और भीतर (=अध्यात्म) भी अ-संस्थित होने के कारण परित्रसित न हो। भिक्षुओ! विज्ञान के बाहर विक्षिप्त=विसृष्ट न होने से, और अपने भीतर अ-संस्थित होने तथा उपादान (=ग्रहण), न करने के कारण परित्रसित न होने से, उसके लिये, आगे जन्म-जरा मरण (रूपी) दुःख का हेतु नहीं रह जाता है।”

भगवान् ने यह कहा; यह कहकर सुगत आसन से उठकर विहार में चले गये। तब भगवान् के चले जाने के थोडे ही समय बाद उन भिक्षुओं को यह हुआ—”॰ आवुस कात्यायन! ॰ भगवान् यह संक्षेप से उद्देश कहकर ॰ विहार में चले गये—‘वैसे वैसे उपपरीक्षण करना चाहिये ॰ दुःख का हेतु नहीं रह जाता।’ तब हमको यह हुआ—॰ विभाग करे आयुष्मान् महाकात्यायन।”

“जैसे, आवुसों!॰”

“अच्छा आवुस”—कह उन भिक्षुओं ने आयुष्मान् महाकात्यायन को उत्तर दिया।

आयुष्मान् महाकात्यायन ने यह कहा—“आवुसों! जो भगवान् यह संक्षेप से उद्देश कहकर ॰ विहार में चले गये—‘वैसे वैसे उपपरीक्षण करना चाहिये ॰ दुःख का हेतु (=समुदय) नहीं रह जाता। आवुसो! विस्तार से अविभाजित भगवान् के इस संक्षिप्त भाषण का अर्थ मैं इस प्रकार विस्तार से जानता हूँ। आवुसो! कैसे विज्ञान को बाहर विक्षिप्त=विसृष्ट कहा जाता है?—यहाँ, आवुसो! चक्षु से रूप देखकर भिक्षु का विज्ञान (=चित्त) रूप के निमित्त (=लिंग, रंग आदि) का अनुस्मरण करने वाला होता है। रूप के निमित्त के स्वाद में ग्रथित, ॰ बद्ध, ॰ संयोजन से(=बंधन से) संयोजित विज्ञान ‘बाहर विक्षिप्त=विसृष्ट कहा जाता है। श्रोत्र से शब्द सुनकर ॰। घ्राण से गंध सूँघकर ॰। जिह्वा से रस चखकर ॰। काय से स्प्रष्टव्य छूकर ॰। मन से धर्म जानकर ॰।—इस प्रकार, आवुसों! विज्ञान को बाहर विक्षिप्त=विसृष्ट कहा जाता है।

“आवुसो! कैसे विज्ञान को बाहर अ-विक्षिप्त=अ-विसृष्ट कहा जाता है?—वहाँ, आवुसो! चक्षु से रूप देखकर भिक्षु का विज्ञान रूप के निमित्त का अनुस्मरण करने वाला नहीं होता। रूप-निमित्त के स्वाद में अग्रथित ॰, ॰ अ-बद्ध, ॰ संयोजन से अ-संयोजित विज्ञान ‘बाहर’ अ-विक्षिप्त=अ-विसृष्ट कहा जाता है। श्रोत्र ॰। घ्राण ॰। जिह्वा ॰। काय ॰। मन से धर्म जानकर ॰ अनुसरण करने वाला नहीं होता ॰, ॰ असंयोजित विज्ञान ‘बाहर- अ-विक्षिप्त=अ-विसृष्ट कहा जाता है।—इस प्रकार, आवुसो! विज्ञान को बाहर अ-विक्षिप्त=अ-विसृष्ट कहा जाता है।

“आवुसों! कैसे (विज्ञान) ‘अपने भीतर (=अध्यात्म) सस्थित’ कहा जाता है? यहाँ, आवुसो! भिक्षु काम से विरहित ॰ प्रथम ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। (उस समय) उसका विज्ञान विवेकज प्रीत-सुख को अनुस्मरण करने वाला, विवेकज प्रीत-सुख के आस्वाद से ग्रथित, ॰ बद्ध, ॰-संयोजन से संयोजित चित्त ‘अपने भीतर (=अध्यात्म) संस्थित (स्थित)’ कहा जाता है। और फिर आवुसो! भिक्षु वितर्क और विचार के शांत होने पर ॰ द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। (उस समय) उसका विज्ञान समाधि-ज प्रीत-सुख को अनुस्मरण करने वाला, ॰, ॰-संयोजन से संयोजित चित्त ‘अपने भीतर संस्थित’ कहा जाता है। और फिर, आवुसो! भिक्षु प्रीति से विरक्त हो, ॰ तृतीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। (उस समय) उसका विज्ञान उपेक्षा का अनुस्मरण करने वाला, उपेक्षा-सुख के आस्वाद से ग्रथित, ॰, ॰ संयोजन से संयोजित चित्त ‘अपने भीतर संस्थित’ कहा जाता है। और फिर, आवुसो! भिक्षु सुख और दुःख के परित्याग से ॰ चतुर्थ-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। (उस समय) उसका विज्ञान अदुःख-असुख का अनुस्मरण करने वाला, अदुःख असुख के आस्वाद से ग्रथित, ॰, ॰-संयोजन से संयोजित चित्त ‘अपने भीतर संस्थित’ कहा जाता है। इस प्रकार आवुसो! (विज्ञान) ‘अपने भीतर संस्थित’ कहा जाता है।

“आवुसो! कैसे (विज्ञान को) ‘अपने भीतर अ-संस्थित’ कहा जाता हैं?—यहाँ, आवुसो! भिक्षु ॰ प्रथम-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है; (किन्तु) उसका विज्ञान विवेकज प्रीत-सुख को न अनुस्मरण करने वाला, ॰, ॰-संयोजन से संयोजित नहीं होता। (ऐसा) चित्त ‘अपने भीतर अ-संस्थित’ कहा जाता है। और फिर ॰ द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। (किन्तु) उसका विज्ञान समाधि-ज प्रीत-सुख को न अनुस्मरण करने वाला, ॰, ॰-संयोजन से संयोजित नहीं होता। (ऐसा) चित्त ‘अपने भीतर अ-संस्थित’ कहा जाता है। और फिर ॰, ॰ तृतीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। (किन्तु) उसका विज्ञान उपेक्षा का न अनुस्मरण करने वाला, ॰, ॰-संयोजन से संयोजित नहीं होता । ॰। और फिर ॰, ॰ चतुर्थ-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। (किन्तु) ॰ अदुःख-असुख का न अनुस्मरण करने वाला, ॰, ॰-संयोजन से संयोजित नहीं होता। (ऐसा) चित्त ‘अपने भीतर अ-संस्थित’ कहा जाता है। इस प्रकार, आवुसो! (विज्ञान) ‘अपने भीतर अ-संस्थित’—कहा जाता हे।

“आवुसो! कैसे ‘उपादान (=रागयुक्त ग्रहण) न करने से परित्रास नहीं होता’?—यहाँ आवुसो! आर्यों के दर्शन से वंचित ॰ अश्रुतवान् (=अज्ञ) पृथग्जन (=अनाडी) रूप केा आत्मा के तौर पर मानता है, या आत्मा को रूपवान्, आत्मा में रूप को, या रूप में आत्मा को (मानता है), उसका (माना) वह रूप विकृत होता है=अन्यथा होता है। उसके रूप के विपरिणाम (=विकार)=अन्यथा भाव से, विज्ञान भी परिवर्तित होता है। (फिर) उसे रूप के विपरिणाम=परिवर्तन से उत्पन्न परित्रास धर्म की उत्पत्ति चित्त को पकड कर ठहरते है। चित्त को पकडने से (विज्ञान) त्रासयुक्त, विघात (=प्रतिहिंसा) युक्त, अपेक्षावान् होता है। अनुपादान (=अस्वीकार) परित्रास को प्राप्त होता है। वेदना को ॰। संज्ञा को ॰। संस्कार को ॰। विज्ञान को ॰ परित्रास को प्राप्त होता है।—इस प्रकार, आवुसो! अनुपादान करने से परित्रास होता है।

“कैसे, आवुसो! अनुपादान (अ-परिग्रह) करने से परित्रास को नहीं प्राप्त होता?—यहाँ, आवुसो! आर्यों के दर्शन को प्राप्त ॰ बहुश्रुत आर्य श्रावक, रूप को आत्मा के तौर पर, नहीं मानता, या आत्मा को रूपवान्, आत्मा में रूप को, या रूप में आत्मा को नहीं मानता। उसका वह रूप विपरिणत (=विकृत) होता है=अन्यथा भाव को प्राप्त होता है। उस रूप के विपरिणाम=परिवर्तन से उत्पन्न परित्रास धर्म की उत्पत्ति से चित्त के परिपादान (=पकडने) से (विज्ञान) न त्रासयुक्त, विघातयुक्त, अपेक्षावान् (होता है), अनुपादान से परित्रास को नहीं प्राप्त होता। वेदना को ॰ संज्ञा को ॰। संस्कार ॰। विज्ञान को ॰ परित्रास नहीं प्राप्त होता।—इस प्रकार, आवुसों! अनुपादान करने से परित्रास नहीं होता।

“आवुसो! जो भगवान् यह संक्षेप से उद्देश कर ॰ विहार में चले गये—‘वैसे वैसे उपपरीक्षण करना चाहिये ॰ दुःख का हेतु नहीं रह जाता। आवुसों! विस्तार से अविभाजित भगवान् के इस संक्षिप्त भाषण का अर्थ मैं इस प्रकार विस्तार से जानता हूँ। इच्छा हो, तो तुम आयुष्मानों! भगवान् के पास भी जा कर इस अर्थ को पूछो ॰ भिक्षुओं ने भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! भगवान् जो यह हमें ॰ विस्तार से विभाग किये बिना ही आसन से उठ कर विहार में चले गये—‘वैसे वैसे उप परीक्षण करना चाहिये ॰’ ॰ हमनें आयुष्मान् महाकात्यायन से इस अर्थ को पूछा ॰ इन व्यंजनों से अर्थ को विभाजित किया ॰ इसे धारण करना।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

Για τη μετάφραση

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Είθε όλα τα όντα να είναι ευτυχισμένα