MN 101
Devadaha sutta: देवदह-सुत्तन्त
Devadahasutta
Devadahavagga
Translations
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् शाक्य (देश) में, शाक्यों के निगम देवदह में विहार करते थे।
वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया —
“भिक्षुओ !” — “भदन्त!” ।”
भगवान् ने कहा — “भिक्षुओं! कोई कोई श्रमण ब्राह्मण इस वाद=इस दृष्टिवाले हैं — “जो कुछ भी यह पुरूष=पुद्गल सुख, दुःख, या अदुःख, असुख अनुभव करता है, वह सब पहिले किये के कारण। इस प्रकार पुराने कर्मों का तपस्या द्वारा अन्त करने से, नये कर्मों के न करने से, भविष्य में विपाक-रहित (=अन्-अवस्त्रव) (होता है)। विपाक-रहित होने से कर्म-क्षय, कर्म क्षय से दुःख-क्षय, दुःख-क्षय से, वेदनाक्षय, वेदना-क्षय से, सभी दुःख जीर्ण हो जाते हैं।
“भिक्षुओ! वह निगंठ मेरे ऐसा पूछने पर “हाँ” कहते हैं। उनको मैं यह कहता हूँ — “आवुसो निगंठो! क्या तुम जानते हो — हम पहिले थे ही, हम नहीं न थे?”— “नहीं आवुस!” “क्या तुम आवुसो निगंठो! जानते हो — हमनें पूर्व में पाप-कर्म किया ही है, नहीं नहीं किया है?”— “नहीं आवुस! “क्या तुम आवुसो निगंठो! जानते हो — ऐसा ऐसा पाप-कर्म किया है?” — “नहीं आवुस! “क्या ॰ जानते हो — इतना दुःख नाश हो गया, इतना दुःख नाश करना हैं, इतना दुःख नाश हो जाने पर, सब दुःख नाश हो जायेगा?” — “नहीं आवुस! ” “क्या ॰ जानते हो — इसी जन्म में अकुशल (=बुरे) धर्मों का प्रहाण (= विनाश) और कुशल-धर्मों का लाभ (होना है) ?” — नहीं आवुस !” “इस प्रकार आवुसो निगंठो ! तुम नहीं जानते — हम पहले थे , या नहीं ॰ इसी जन्म में अकुशल-धर्मों का प्रहाण होना है, और कुशल-धर्मों का लाभ। ऐसा होने पर आयुष्मान् निगंठो का यह कथन युक्त नहीं — जो कुछ भी यह पुरूष =पुद्गल॰ अनुभव करता है॰। यदि आवुसो निगंठो ! तुम जानते होते — “हम पहिले थे ही॰ ।” ऐसा होने पर आयुष्मान् निगंठों का यह कथन युक्त होता — “जो कुछ भी यह पुरूष ॰ । आवुसो निगंठो ! जैसे ( कोई ) पुरूष विषसे उपलिस गाढ़े शल्य (=शर के फन) से बिद्ध हो। वह शल्य के कारण दुःखद, कटु, तीव्र वेदना अनुभव करता हो। उसके मित्र=अमात्य, जाति-बिरादरी उसे शल्य-चिकित्सक के पास ले जाये।
वह शल्य-चिकित्सक शस्त्र से उसके घ्रण (=घाव) के मुख को काटे। वह शस्त्र से घ्रण-मुख के काटने से भी दुःखद, कटु, तीव्र वेदना को अनुभव करे। शल्य-चिकित्सक खोजने की शलाका से शल्य को खोजे। वह ॰ शलाका द्वारा शल्य के खोजने के कारण भी दुःखद ॰ वेदना अनुभव करे। वह शल्य चिकित्सक उसके शल्य को निकाले, वह शल्य के निकालने के कारण भी वेदना अनुभव करे। शल्य चिकित्सक उसके घ्रण-मुख पर दवाई रखे, ॰। वह दूसरे समय घाव के पुर जाने से निरोग, सुखी “स्वयंवशी, इच्छानुसार फिरनेवाला, हो जाये। उसको यह हो — “मैं पहिले ॰ शल्य से बिद्ध था ॰ दवाई रखने के कारण भी दुःखद् ॰ वेदना अनुभव करता था। सो मैं अब ॰ निरोग, सुखी ॰ हूँ।” ऐसे ही आवुसो निगंठो ! यदि तुम जानते हो-“हम पहिले थे ही, नहीं नहीं थे” ॰ । ऐसा होने पर आयुष्मान् निगंठो का यह कथन युक्त होता-“जो कुछ भी ॰”। चूँकि आवुसो निगंठो! तुम नहीं जानते-“हम पहिले थे ॰”, इसलिये आयुष्मान् निगंठो का यह कथन युक्त नहीं-जो कुछ भी ॰”।
“ऐसा कहने पर भिक्षुओ ! उन निगंठों ने मुझे कहा—” आवुस! निगंठ नातपुत्त सर्वज्ञ=सर्वदर्शी, अखिल ज्ञान=दर्शन को जानते हैं। चलते, खडे, सोते, जागते, सदा निरंतर (उन्हें) ज्ञान दर्शन उपस्थित रहता है, वह ऐसा कहते हैं—“आवुसो निगंठो! जो तुम्हारा पहिले का किया हुआ कर्म है, उसे इस कडवी दुष्कर कारिका (=तपस्या) से नाश करो, और जो इस वक्त यहाँ तुम काय-वचन-मन से रहित (=संवृत्त) हो, यह भविष्य के लिये पाप न करना हुआ। इस प्रकार पुराने कर्मो का तपस्या से अन्त होने से, और नये कर्मों के न करने से, भविष्य में (तुम) अन्-अवस्त्रव (होंगे)। भविष्य में अवस्त्रव न होने से, कर्म का क्षय, कर्म के क्षय से दुःख-क्षय, दुःख-क्षय से वेदना-क्षय, वेदना-क्षय से सभी दुःख नष्ट=निजीर्ण हो जायेंगे। यह हमको रूचता है=खमता है। इससे हम सन्तुष्ट हैं।”
“ऐसा कहने पर भिक्षुओं! मैंने उन निगंठों से यह कहा—आवुसो निगंठो! यह पाँच धर्म इसी जन्म में दो प्रकार से विपाकवाले हैं। कौनसे पाँच? (1) श्रद्धा, (2) रूचि, (3) अनुश्रव, (4) आकार-परिवितर्क, (5) दृष्टि-निध्यान क्षान्ति। आवुसो निगंठो! यह पाँच धर्म इसी जन्म में दो प्रकार के विपाकवाले हैं। यहाँ आयुष्मान् निगंठो के अतीत-अंश-वादी शाख्ता (=निगंठ नातपुत्त) में आपकी क्या श्रद्धा, क्या रूचि, क्या अनश्रव, क्या आकार-परिवितर्क, क्या दृष्टि-निध्यान-क्षान्ति है?” भिक्षुओ निगंठों के पास ऐसा कहकर भी मैं धर्म से कोई भी वाद-परिहार (= उत्तर ) नहीं देखता।”
“और फिर भिक्षुओ ! मैं उन निगंठों से यह कहता हूँ — तो क्या मानते हो, आवुसो निगंठों ! जिस समय तुम्हारा उपक्रम (= साधना ) तीव्र होता है, प्रधान तीव्र होता है। उस समय (उस) उपक्रम सम्बन्धी दुःखद, तीव्र, कटुक, वेदना अनुभव करते हो, जिस समय तुम्हारा उपक्रम तीव्र नहीं होता = प्रधान तीव्र नहीं होता, उस समय ॰ वेदना अनुभव नहीं करते ?” — जिस समय आवुस ! हमारा उपक्रम तीव्र होता है ॰ उस समय ॰ तीव्र ॰ वेदना अनुभव करते हैं। जिस समय ॰ उपक्रम तीव्र नहीं होता ॰ तीव्र वेदना अनुभव नहीं करते।”
“इस प्रकार आवुसो निगंठो ! जिस समय तुम्हारा उपक्रम = प्रधान तीव्र होता है, उस समय, तीव्र वेदना अनुभव करते हो, जिस समय तुम्हारा उपक्रम तीव्र नहीं होता, तीव्र वेदना अनुभव नहीं करते। ऐसा होने पर आयुष्मान् निगंठो का यह कथन युक्त नहीं जो कुछ भी यह पुरूष = पुद्गल ॰ । यदि आवुसो निगंठो ! जिस समय तुम्हारा उपक्रम तीव्र ॰ होता है, उस समय दुःखद ॰ वेदना रहती ही है। जिस समय तुम्हारा तीव्र ॰ नहीं होता, उस समय दुःखद ॰ वेदना नहीं रहती, ऐसा होने पर ॰ यह कथन युक्त नहीं — जो कुछ भी ॰ ।
“चूँकि आवुसो ! जिस समय तुम्हारा उपक्रम तीव्र होता है, उस समय दुःखद वेदना अनुभव करते हो, जिस समय उपक्रम तीव्र नहीं होता, तीव्र वेदना अनुभव नहीं करते, तो तुम स्वयं ही उपक्रम संबन्धी दुःखद वेदना अनुभव करते, अविद्या से, अज्ञान से, मोह से उलटा समझ रहे हो — “जो कुछ भी ॰”। भिक्षुओ ! निगंठों के पास ऐसा कहकर भी मैंने धर्म से कोई भी वाद-परिहार (उनकी ओर से) नहीं देखा।
“और फिर भिक्षुओं ! मैं उन निगंठों से ऐसा कहता हूँ — “तो क्या मानते हो आवुसो निगंठो ! जो यह इसी जन्म में वेदनीय ( भोगा जाने वाला) कर्म है, वह उपक्रम से या प्रधान से संपदाय ( =दूसरे जन्म में) वेदनीय किया जा सकता है ?” — “नहीं, आवुस !” और जो यह जन्मान्तर (= संपराय )- वेदनीय कर्म है, वह उपक्रम से इस जन्म में वेदनीय किया जा सकता है ?”— “नहीं आवुस ! “तो क्या मानते हो आवुसो ! निगंठो ! जो यह सुख वेदनीय ( सुख भोग कराने वाला) कर्म है, क्या वह उपक्रम से या प्रधान से दुःख वेदनीय किया जा सकता है ?— “नहीं आवुस ! “तो क्या मानते हो आवुसो ! निगंठो ! जो यह परिपक्व अवस्था (बुढापा) में वेदनीय कर्म है, क्या यह उपक्रम से अपरिपक्व वेदनीय किया जा सकता है ?” — नहीं आवुस ! जो यह अपरिपक्व (= शैशव, जवानी)-वेदनीय कर्म है, क्या वह परिपक्व वेदनीय किया जा सकता है ?” — “नहीं आवुस ! “तो मानते हो आवुसो निगंठो ! जो यह वेदनीय (=भोगने वाला) कर्म है, क्या वह उपक्रम से अ-वेदनीय किया जा सकता है ?” — नहीं आवुस ! ॰ अवेदनीय कर्म ॰ वेदनीय किया जा सकता है ?” — नहीं ॰। इस प्रकार आवुसो निगंठो ! जो यह इसी जन्म में वेदनीस कर्म है ॰। ॰ अवेदनीय कर्म है, वह भी वेदनीय नहीं किया जा सकता। ऐसा होने पर आयुष्मान् निगंठों का उपक्रम निष्फल हो जाता है, प्रधान निष्फल हो जाता है।
“भिक्षुओं ! निगंठ लोग इस वाद ( के सामने ) वाले हैं। ऐसे वाद वाले निगंठों के वाद = अनुवाद धर्मानुसार दस स्थानों में निंदनीय (= अयुक्त) होते हैं। यदि भिक्षुओं ! प्राणी पहिले किये (कर्मों) के कारण सुख-दुःख भोगते हैं, तो भिक्षुओं ! निगंठ लोग अवश्य पहिले बुरे काम करने वाले थे, जो इस वक्त इस प्रकार दुःखद, तीव्र, कटु वेदना में भोग रहे हैं। यदि भिक्षुओं ! प्राणी ईश्वर के बनाने के कारण ( =ईश्वर-निर्माण-हेतु) सुख-दुःख भोगते हैं, तो अवश्य भिक्षुओ ! निगंठ लोग पापी ( = बुरे ) ईश्वर द्वारा बनाये गये हैं, जो कि इस वक्त ॰ दुःखद वेदनायें भोग रहे हैं। यदि भिक्षुओं ! प्राणी संगति ( = भावी ) के कारण सुख-दुःख भोगते हैं, तो अवश्य भिक्षुओं ! निगंठ लोग पाप ( = बुरी ) संगति ( = भावी ) वाले थे, जो इस वक्त ॰ । यदि भिक्षुओं ! प्राणी अभिजाति के कारण ॰ । यदि ॰ इसी जन्म के उपक्रम के कारण सुख-दुःख भोगते हैं, तो अवश्य भिक्षुओं ! निगंठों का इस जन्म का उपक्रम बुरा ( = पाप ) है, जो कि इस वक्त ॰ दुःखद ॰ वेदनायें भोग रहे हैं।
“यदि भिक्षुओं ! प्राणी पूर्व किये (कर्मों) के कारण सुख-दुःख भोग रहे हैं, तो निगंठ गर्हणीय हैं। यदि ईश्वर के निर्माण के कारण ॰। भवितव्यता ( = संगति ) के कारण ॰। अभिजाति के कारण ॰। इसी जन्म के उपक्रम के कारण सुख-दुःख भोगते हैं, तो निगंठ गर्हणीय हैं। भिक्षुओ ! निगंठ ऐसा मत ( = वाद ) रखते हैं। ऐसे वाद वाले निगंठो के वाद = अनुवाद धर्मानुसार दस स्थानों में निन्दनीय होते हैं। इस प्रकार भिक्षुओं ! (उनका) उपक्रम निष्फल होता है, प्रधान निष्फल होता है।
“भिक्षुओं ! पाँच उपक्रम सफल हैं। — भिक्षुओं ! (1) भिक्षु दुःख से अन्-अभिभूत ( = अ-पीड़ित ) शरीर को दुःख से अभिभूत नहीं करता। (2) धार्मिक सुख का परित्याग नहीं करता। (3) उस सुख में अधिक मूर्छित नहीं हो जाता। (4) वह ऐसा जानता है — इस दुःख कारण के संस्कार के अभ्यास करने वाले को, संस्कार के अभ्यास से, विराग होता है, (5) इस दुःख निदान की उपेक्षा करने वाले को उपेक्षा की भावना करने से, विराग होता है। जिस दुःख निदान में संस्कार के अभ्यास करने से संस्कार के अभ्यास से विराग होता है, यह उस संस्कार को अभ्यास करता है। जिस दुःख निदान की उपेक्षा करने से, उपेक्षा की भावना करने से विराग होता है, उस उपेक्षा की भावना करता है। उस दुःख निदान के “संस्कार के अभ्यास से विराग होता है, इस प्रकार भी इसका पद दुःख जीर्ण होता है। उस दुःख निदान की उपेक्षा की भावना करने वाले को विराग होता है, इस प्रकार भी इसका वह दुःख जीर्ण होता है।
“भिक्षुओ ! जैसे पुरूष (किसी) स्त्री में अनुरक्त हो, प्रतिबद्ध चित्त, तीव्र-रागी = तीव्र-अपेक्षी हो। यह उस स्त्री को दूसरे पुरूष के साथ खडी, बात करती, जग्घन करती = हँसती देखे। तो क्या मानते हो, भिक्षुओ ! उस स्त्री को दूसरे पुरूष के साथ ॰ हँसती देख, क्या उस पुरूष को शोक = परिदेय, दुःख = दौर्मनस्य = उपायास उत्पन्न नहीं होंगें ?”
“हाँ, भन्ते ?”
“सो किसलिये ?”
“यह पुरूष भन्ते ! उस स्त्री से वीत-राग है, इसलिए उस स्त्री को हँसते देख , उस पुरूष को शोक उत्पन्न नहीं होते।”
“ऐसे ही भिक्षुओ ! भिक्षु दुःख से अन्-अभिभूत शरीर को, दुःख से अभिभूत नहीं करता ॰ इस प्रकार भी इसका वह दुःख जीर्ण होता है। इस प्रकार भिक्षुओं ! उपक्रम सफल होता है, प्रधान सफल होता है।
“और फिर भिक्षुओं ! भिक्षु ऐसा सोचता है — सुख-पूर्वक विहार करते भी मेरे अ-कुशल धर्म बढ़ते हैं, (लेकिन) अपने को दुःख में लगाते अ-कुशल धर्म क्षीण होते हैं, कुशल धर्म बढते हैं, क्यों न मैं दुःख में अपने को लगाऊँ। इस प्रकार वह अपने को दुःख में लगाता है। दुःख में अपने को लगाते हुए उसके अकुशल धर्म क्षीण होते हैं, कुशल धर्म बढ़ते हैं। वह उसके बाद दुःख में अपने को नहीं लगाता। सो किसलिये ? — भिक्षुओ ! वह भिक्षु जिसके लिये दुःख में अपने को लगाता था, वह उसका मतलब पूरा हो गया, इसलिए दूसरे समय दुःख में अपने को नहीं लगाता। जैसे भिक्षुओं ! इषुकार ( बाण बनाने वाला लोहार) दो अंगारों (= अलात) पर तेजन ( = बाण-फल) को तपाता है, सीधा करता है। जब भिक्षुओं ! इषुकार का तेजन दो अंगारों पर आतापित = परितापित (हो चुका) होता है, सीधा (हो गया) होता है। तो फिर दूसरी बार वह इषुकार तेजन को दो अंगारो ंपर आतापित परितापित नहीं करता, (नहीं) सीधा करता। सो किसलिये ? — भिक्षुओं जिस मतलब से इषुकार आतापित परितापित कर रहा था। वह उसका मतलब पूरा हो गया। इसलिए दूसरी बार ॰ । ऐसे ही भिक्षुओ ! भिक्षु ऐसा सोचता है — सुख-पूर्वक विहार करते मेरे अकुशल धर्म बढते हैं, कुशल-धर्म क्षीण होते हैं ॰ इसलिये दूसरे समय दुःख में अपने को नहीं लगाता। इस प्रकार भी भिक्षुओं ! उपक्रम सफल होता हैं, प्रधान सफल होता है।
और फिर भिक्षुओं ! यहाँ लोक में तथागत अर्हत्, सम्यक्-संबुद्ध विद्या-आचरण-युक्त सुगत ॰ उत्पन्न होते हैं। ॰ धर्म-उपदेश करते हैं।घर छोड बेघर हो प्रव्रजित होता है। ॰ वह इस आर्यशील स्कंध से संयुक्त हो, अपने में निर्दोष सुख अनुभव करता है। ॰ वह इस आर्य इन्द्रिय-संवर से युक्त होता है। ॰ वह इस आर्यशील स्कंध से युक्त हो, इस आर्य इन्द्रिय संवर से ॰ इस आर्य स्मृति-संप्रजन्य से युक्त हो, इस आर्य-इन्द्रिय-संवर से ॰, इस आर्य-स्मृति-सप्रजन्य से युक्त हो, एकान्त-वास-स्थान, वृक्ष के नीचे, पर्वत, कंदरा, गिरिगुहा, श्मशान, वन-प्रस्थ, मैदान, पयाल का ढेर, सेवन करता है। वह भोजन के बाद …आसन मार शरीर को सीधा रख, स्मृति को संमुख उपस्थित कर, बैठता है। वह लोक में लोम ( = अभिध्या) को छोड, अभिध्या-रहित चित्त से विहरता है, अभिध्या से चित्त से परिशुद्ध करता है। व्यापाद = प्रद्वेष ( = द्वेष ) को छोड, अ-ध्यापन्न चित्त हो, सब प्राणियों का हित = अनुकम्पक हो विहरता है ॰ स्त्यान-मृद्ध छोड ॰ औद्धत्य-कौकृत्य छोड ॰ विचिकित्सा छोड ॰। वह इन पाँच चित्त के नीवरणों को छोड ॰ प्रथम ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। उसका भिक्षुओ ! उपक्रम सफल होता है ॰ ।
“और फिर भिक्षुओ ! ॰ द्वितीय ध्यान को प्राप्त हो ॰ । ॰ उपक्रम सफल होता है ॰ ।
“और फिर ॰ । ॰ तृतीय ध्यान को प्राप्त हो ॰ । इस प्रकार भी ॰ ।
“और फिर ॰ । ॰ चतुर्थ ध्यान को प्राप्त हो ॰ । इस प्रकार भी ॰ ।
“वह इस प्रकार समाहित-चित्त ॰ अनेक प्रकार के पूर्व-निवासों को अनुस्मरण करता है। इस प्रकार भी ॰ ।
“वह इस प्रकार समाहित-चित्त ॰ दिव्य-चक्षु से प्राणियों को च्युत होते, उत्पन्न होते ॰ जानता है। इस प्रकार भी ॰ ।
“वह इस प्रकार समाहित-चित्त ॰ जन्म खतम हो गया ॰ जानता है। इस प्रकार भी ॰ ।
“भिक्षुओ ! तथागत ऐसे वाद ( के मानने ) वाले हैं। ऐसे वाद वाले तथागत की धर्मानुसार ( = न्यायानुसार ) प्रशंसा के दस स्थान होते हैं — (1) यदि भिक्षुओ ! प्राणी पूर्व किये कर्मों के कारण सुख-दुःख भोगते हैं, तो अवश्य भिक्षुओ ! तथागत पहिले के पुण्य करने वाले रहे हैं, जो कि इस समय आस्त्रव ( = मल )-विहीन सुख-वेदना को अनुभव करते हैं। (2) यदि भिक्षुओं ! ईश्वर-निर्माण के कारण ॰, तो अवश्य भिक्षुओं ! तथागत अच्छे ईश्वर से निर्मित हैं, जो कि इस समय ॰ । (3) ॰ भवितव्यता के कारण ॰, तथागत उत्तम भवितव्यता वाले हैं ॰ । (4) ॰ अभिजाति के कारण ॰, तथागत उत्तम अभिजातिवाले ॰ । (5) इसी जन्म के उपक्रम के कारण ॰, ॰ तथागत इस जन्म के सुन्दर उपक्रम वाले ॰ । (6) यदि भिक्षुओ ! प्राणी पूर्वकृत (कर्मी) के कारण सुख-दुःख अनुभव करते हैं, तो तथागत प्रशंसनीय हैं, यदि पूर्वकृत (कर्मों) के कारण सुख-दुःख नहीं अनुभव करते, तो (भी) तथागत प्रशंसनीय हैं। (7) यदि भिक्षुओ ! प्राणी ईश्वर-निर्माण के कारण ॰, ॰ ईश्वर निर्माण के कारण नहीं ॰। (9) ॰ अभिजाति के कारण नहीं ॰, ॰ । (10) ॰ इस जन्म के उपक्रम के कारण ॰, इस जन्म के उपक्रम के कारण नहीं ॰ । भिक्षुओ ! तथागत इस वाद ( के मानने ) वाले हैं। ॰ ।”
भगवान् ने यह कहा; संतुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।
About this translation
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
May all beings be happy