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MN 102

Pañcattaya sutta: पंचत्तय-सुत्तन्त

Pañcattayasutta

Devadahavagga

Translations

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया — “भिक्षुओं !”

“भदन्त !” — (कह) उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया।

अपरान्त-दृष्टि

भगवान ने यह कहा — “भिक्षुओ ! कोई कोई श्रमण-ब्राह्मण अपरान्त-कल्पिक ( = मरने के बाद की अवस्था में ) मत ( रखने वाले ) = अपरान्तानुदृष्टि होते हैं। वह अपरान्त ( = मरने के बाद ) को लेकर अनेक प्रकार के मत प्रतिपादन ( =अभियुक्ति ) के पद कहते हैं — (1) मरने के बाद आत्मा संज्ञी ( = बाहोश ), निरोग ( = नित्य ) होता है- यह कोई कोई कहते हैं। (2) मरने के बाद आत्मा अ-संज्ञी ( = अ-चेतन), निरोग ( = नित्त्य ) होता है — यह कोई कोई कहते हैं। (3) न संज्ञी-न असंज्ञी, निरोग होता है। (4) या विद्यमान ही सबके उच्छेद = विनाश = विभव को मानते हैं। (5) या इसी शरीर ( = इष्ट-धर्म) में निर्वाण को कोई कोई बतलाते हैं। यह पाँच होकर तीन होते हैं, तीन होकर पाँच होते हैं। पंच-त्तय ( = पंच-त्रय = पाँच तीन ) का नाम कथन ( = उद्देश्य ) है।

(1) “यहाँ भिक्षुओ ! जो श्रमण-ब्राह्मण मरने के बाद संज्ञी, अरोग आत्मा को बतलाते हैं, वह आप श्रमण ब्राह्मण , या तो (1) मरणानंत्तर (उस) संज्ञी, अरोग आत्मा को रूपी (साकार) बतलाते हैं। या (2) आत्मा को अरूपी बतलाते हैं। या (3) आत्मा को रूपी-अरूपी बतलाते हैं। या (4) आत्मा को न-रूपी- नारूपी बतलाते हैं। या (5) आत्मा को एकत्त्व संज्ञी बतलाते हैं। या (6) आत्मा को नानात्त्व-संज्ञी, या (7) परीत्त-संज्ञी, या (8) अप्रमाण-संज्ञी, या इससे विरत कोई कोई के लिये विज्ञान-

कृत्स्न को अप्रमाण (अतिविशाल), आर्निज्य (विशाल) कहते हैं। भिक्षुओं ! इन्हें तथागत अच्छी तरह जानते हैं।

“भिक्षुओ ! जो आप श्रमण-ब्राह्मण (1) आत्मा को रूपी (साकार) बतलाते हैं। (2) अप्रमाण-संज्ञी बतलाते हैं। किन्तु रूप-संज्ञा, या अरूप-संज्ञा, या एकत्त्व-संज्ञा या नानारूप-संज्ञा- इन संज्ञाओं में जो (संज्ञा), परिशुद्ध, परम=अग्र=अनुपम कही जाती है, (वह) कुछ-नहीं ( नत्यि-किंचि) — इस आकिंचन्य ( नहीं कुछ-पन)-आयतन (लोक) है, ( ऐसा इस प्राणिलोक को ) कोई कोई अप्रमाण, आर्निज्य बतलाते हैं। सो यह संस्कृत ( कृत, बनावटी) हैं, स्थूल है, और र्संस्कारों ( कृतो, बने हुओं का ) निरोध = (विनाश) होता है — भिक्षुओं ! यह जानकर उससे निस्सरण-दर्शी ( = निकास का रास्ता जानने वाले) तथागत, उससे विरत हैं।

(2) “वहाँ, भिक्षुओ ! जो श्रमण-ब्राह्मण मरने के बाद, आत्मा को नित्य और अचेतन मानते हैं। यह आप श्रमण-ब्राह्मण , या तो (1) मरने के बाद (उस) नित्य और अचेतन आत्मा को रूपी (साकार) मानते हैं, या (2) अ-रूपी या (3) रूपी-अरूपी या (4) नरूपी-नारूपी । यहाँ भिक्षुओं ! जो श्रमण-ब्राह्मण आत्मा को संज्ञी (चेतन) मानने वाले हैं, उन्हें यह (अ-संज्ञीवादी) निन्दते हैं, सो किस हेतु ?- संज्ञा (होश) रोग (समान) हैं, संज्ञा मंद्र (फोडा) है, संज्ञा शल्य (समान) है। अ-संज्ञा ही शान्त है, प्रणीत (उत्तम) है। भिक्षुओ ! तथागत इन (वादों) को जानते हैं।

“भिक्षुओं ! जो आप श्रमण-ब्राह्मण मरने के बाद आत्मा को नित्य और अचेतन बतलाते हैं। रूपी-अरूपी, नरूपी-नारूपी बतलाते हैं। भिक्षुओं ! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण ऐसा कहे- मैं रूप् से भिन्न, वेदना, संज्ञा, संस्कारों से भिन्न में विज्ञान के आवागमन , जन्म-मरण, वृद्धि =विरूढि=ब-पुरूष को मानूँगा- इसके लिए स्थान (कारण) नहीं है। सो यह र्संस्कृत है, संस्कारों का निरोध होता है। — भिक्षुओं ! यह जानकर उससे निस्सरण दर्शी तथागत उससे विरत है।

(3) “वहाँ, भिक्षुओ ! जो आप श्रमण-ब्राह्मण मरने के बाद आत्मा का नित्त्य और नचेतन-नाचेतन (नसंज्ञी-नासंज्ञी) मानते हैं, वह आप श्रमण-ब्राह्मण , या तो (1) मरने के बाद (उस) नित्त्य न-चेतन,ना-चेतन आत्मा को रूपी मानते हैं, या (2) अ-रूपी या (3) रूपी-अरूपी या (4) नरूपी-नारूपी। वहाँ भिक्षुओं ! जो श्रमण-ब्राह्मण आत्मा को संज्ञी (चेतन) मानते हैं, उन्हें यह निन्दते हैं, और जो असंज्ञी मानते हैं, उन्हें भी यह निन्दते हैं। सो किस हेतु ? — संज्ञा रोग है, गंड है, शल्य है, और अ-संज्ञा संमोह (मूढता) है, यह जो नैवसंज्ञा-नासंज्ञा (न-चेतन, ना-चेतन) है, यही शान्त है, यही प्रणीत है। भिक्षुओ ! तथागत इन (वादों) को जानते हैं।

“भिक्षुओं ! जो आप श्रमण-ब्राह्मण (1) मरने के बाद आत्मा को नित्य और नचेतन-नाचेतन मानते हैं। (4) नरूपी-नारूपी मानते हैं। भिक्षुओं ! जो कोई श्रमण-ब्राह्मण दृष्ट, श्रुत, स्मृत, विज्ञेय इस आयतन (नचेतन-नाचेतन, नैव-संज्ञा-नासंज्ञा वाले लोक) के संस्कार (क्रिया) मात्र से प्राप्ति मानते हैं, तो भिक्षुओं ! इस आयतन की प्राप्ति का यह व्यसन (क्षय) कहा जाता है। भिक्षुओ ! यह आयतन संस्कार-समापत्ति (की जाने वाली समाधि) से प्राप्य कहा जाता है। भिक्षुओ ! यह आयतन संस्कार-अवशेष (संस्कार से बची)-समापत्ति से प्राप्य कहा जाता है। सो यह संस्कृत है। तथागत उससे विरत हैं।

(4) “वहाँ भिक्षुओ ! जो आप श्रमण-ब्राह्मण विद्यमान् ही सत्त्व का उच्छेद = विनाश = विमन को मानते हैं। वह, आत्मा को नित्य और चेतन मानने वाले श्रमण-ब्राह्मणों को को निन्दते हैं, आत्मा को नित्य और अचेतन मानने वाले श्रमण ब्राह्मणों को निन्दते हैं, आत्मा को नित्य और नचेतन-नाचेतन मानने वाले श्रमण-ब्राह्मणों को निन्दते हैं। सो किस हेतु ? यह सारे आप श्रमण-ब्राह्मण ऊध्र्वसर ( आगे की लोक-यात्रा को अनुसरण करने वाले) हैं, लोम (आसक्ति) की ही बात करते हैं, मरकर ऐसा होऊँगा, मरकर ऐसा होऊँगा। जैसा कि बनिये को बनीजी को जाते समय ऐसा हो- इससे मुझे इतना लाभ होगा, इससे यह लूँगा, इसी प्रकार यह आप श्रमण ब्राह्मण बनिया जैसे जान पडते हैं। “भिक्षुओ ! तथागत इस (वाद) को जानते हैं।

“भिक्षुओं ! जो आप श्रमण ब्राह्मण विद्यमान ही सत्त्व ( = चेतन-संतति ) का उच्छेद ॰ मानते हैं, वह सत्काय ( = नित्य आत्म मानने ) के भय से सत्काय के प्रति घृणा से ( ऐसा मानते हुए भी ) सत्काय के ही पीछे लगे हुये हैं, सत्काय के पीछे ही चक्कर काट रहे हैं। जैसे कि खंभे या खूँटे में डंडे से बंधा कुत्ता उसी खंभे या खूँटेका चक्कर काटता है, वैसे ही वह सत्काय के भय से ॰ सत्काय के पीछे ही चक्कर काट रहे हैं। सो यह संस्कृत है ॰ तथागत उससे विरत हैं।

“भिक्षुओ ! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण अपरान्त-कल्पिक = अपरान्तानुदृष्टि ( = मरने के बाद की कल्पना करने वाले ) अनेक प्रकार के स्वमत प्रतिपादक वचन को कहते हैं, वह सब इन्हीं पाँच (पंच) आयतनों (= खानों) के बारे में कहते हैं, या इनमें से किसी एक के बारे में।

पूर्वान्त-दृष्टि

“भिक्षुओ ! कोई कोई श्रमण ब्राह्मण पूर्वान्त-कल्पिक = पूर्वान्तानुदृष्टि ( = संसार के आदि के विषय में कल्पना करने वाले ) अनेक प्रकार के जो स्वमत प्रतिपादक वचन कहते हैं। (1) लोक और आत्मा शाश्वत ( अनादि ) हैं, यही सच है, और सब झूठ है — ऐसा कोई कोई कहते हैं। (2) लोक और आत्मा अ-शाश्वत (आदि) हैं, यही सच है, और सब झूठ है। ऐसा कोई कोई श्रमण-ब्राह्मण कहते हैं। (3) लोक और आत्मा साश्वत भी अशाश्वत भी है ॰ (4) न-शाश्वत- न-अशाश्वत ॰ । (5) अन्तवान् ॰। (6) अनन्त ॰। (7) ॰ अन्तवान्-अनन्त ॰। (8) ॰ न-अन्तवान्-न-अनन्त ॰। (9) एकत्त्व-संज्ञी ॰। (10) नानात्त्व-संज्ञी ॰। (11) परीत्त-संज्ञी ॰। (12) अप्रमाण-संज्ञी ॰। (13) एकान्तसुखी ॰। (14) एकान्त-दुःखी ॰। (15) सुखी-दुखी ॰। (16) लोक आत्मा असुखी-अदुःखी हैं, यही सच है, और सब झूठ, ऐसा कोई-कोई श्रमण ब्राह्मण न हैं।

“वहाँ, भिक्षुओ ! जो श्रमण-ब्राह्मण इस वाद = दृष्टि वाले हैं — (1) लोक और आत्मा शाश्वत हैं, यही सच है, और सब झूठ, उनको श्रद्धा,रूचि, अनुश्रव ( श्रुति ) पोथी-पत्रा, आकार-परिवितर्क और दृष्टि-निध्यान-क्षान्ति परे, खर्च अपने भीतर ही परिशुद्ध = पर्यंवदात ज्ञान होगा, यह सम्भव नहीं। भिक्षुओं ! स्वयं अपने भीतर परिशुद्ध = पर्यंवदात ज्ञान न होने पर, जो कुछ ज्ञान मात्र वह श्रमण-ब्राह्मण बतलाते हैं, वह भी उन ॰ का उपादान (आग्रह, दुराग्रह) ही कहा जाता है। सो यह संस्कृत है ॰ तथागत उससे विरत है। ॰ वहाँ भिक्षुओं ! जो श्रमण-ब्राह्मण इस वाद=दृष्टिवाले हैं- (2) लोक और आत्मा अशाश्वत हैं ॰। ॰ (16) लोक और आत्मा असुखी-अदुःखी हैं, यही सच है, और सब झूठ, उनको श्रद्धा ॰ दृष्टि’-निध्यान्त-शान्ति से परे, स्वयं अपने भीतर ही परिशुद्ध ॰ ज्ञान होगा, यह सम्भव नहीं। ॰ । सो यह संस्कृत है ॰ तथागत उससे विरत हैं।

पूर्वांन्तापरान्त-भिन्न दृष्टियाँ

(17) “यहाँ, भिक्षुओं ! कोई कोई श्रमण-ब्राह्मण पूर्वान्त वाली दृष्टि को भी छोड़, अपरान्त वाली दृष्टि को भी छोड़, काम-संयोजनों ( विषय-बंधनों ) को न रख, प्रविवेका (एकान्त चिंतन की), प्रीति (संख) को प्राप्त कर विहरता हैं — यही शांत है, यही प्रणीत हैं, जो कि इस प्रविवेका प्रीति को प्राप्त कर विहर रहा हूँ ।” इसे तथागत जानते हैं- यह श्रमण ॰ प्रीति को प्राप्त कर विहरता है। (जब) उसकी यह प्रविवेका प्रीति विरूद्ध होती है, तो दौर्मनस्य (चित्त-खेद) उत्पन्न होता है। दौर्मनस्य के विरूद्ध होने पर प्रविवेका प्रीति उत्पन्न होती है। जैसे, भिक्षुओ ! जिसे छाया छोडती है, इसे आतप (धूप) पकडता है, जिसे धूप छोडती है, उसे छाया पकडती है। ऐसे ही भिक्षुओ ! प्रविवेका प्रीति के विरूद्ध होने पर दौर्मनस्य उत्पन्न होता है, दौर्मनस्य के विरूद्ध होने पर प्रविवेका प्रीति उत्पन्न होती है। सो इसे तथागत जानते हैं — यह आप श्रमण या ब्राह्मण पूर्वान्तवाली दृष्टि को भी छोड, ॰ दौर्मनस्य के विरूद्ध होने पर प्रविवेका प्रीति उत्पन्न होती है। सो यह संस्कृत है ॰ तथागत उससे विरत हैं।

(18) “और यहाँ भिक्षुओं ! कोई कोई श्रमण या ब्राह्मण पूर्वान्तवाली दृष्टि को भी छोड, अपरान्तवाली दृष्टि को भी छोड, काम-संयोजनों (विषय-बन्धनों) को बिल्कुल अधिष्ठान न कर प्रविवेका प्रीति को (भी) अतिक्रमण कर निरामिष ( निर्विषय ) सुख को प्राप्त कर विहरता है — “यह शान्त है, यह प्रणीत (उत्तम) है, जो कि यह निरामिष सुख को प्राप्त कर विहर रहा हूँ, सो इसे तथागत जानते हैं ॰ । (जय) उसका यह निरामिष सुख विरूद्ध होता है, तो निरामिष सुख के विरूद्ध होने पर प्रविवेका प्रीति उत्पन्न होती है, और प्रविवेका प्रीति के विरूद्ध होने पर निरामिष सुख उत्पन्न होता है। जैसे भिक्षुओ ! जिसे छाया छोडती है, उसे आतप उसे धूप पकडती है, ( = फरति, पंजाबी फडना ) ॰ । और प्रविवेका प्रीति के विरूद्ध होने पर निरामिष सुख उत्पन्न होता है। “सो यह संस्कृत है ॰ तथागत उससे विरत हैं।

“यहाँ भिक्षुओ ! कोई कोई श्रमण या ब्राह्मण पूर्वान्तवाली दृष्टि को छोड, अपरान्तवाली छोड ॰ निरामिष सुख को भी अतिक्रमण कर अदुःख-असुख (सुख-दुःख दोनों रहित ) वेदना को प्राप्त कर विहरता है। यह शान्त है, यह प्रणीत है, जो कि यह अदुःख-असुख वेदना को को प्राप्त कर विहर रहा हूँ। सो इसे तथागत जानते हैं ॰। (जब) उसकी अदुःख-असुखा वेदना विरूद्ध होती है, तो अदुःख-असुख वेदना के विरूद्ध होने पर निरामिष सुख उत्पन्न होता है। और निरामिष सुख के विरूद्ध होने पर, अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होती है। जैसे भिक्षुओ ! जिसे छाया छोडती है, उसे धूप पकडती है ॰ । और निरामिष सुख के विरूद्ध होने पर अदुःख-असुखा वेदना उत्पन्न होती है। “सो यह संस्कृत है ॰ तथागत उससे विरत हैं।

“यहाँ भिक्षुओ ! ॰ अदुःख-असुखा वेदना को भी अतिक्रमण कर, मैं शान्त हूँ, मैं निवृत्त (निर्वाण प्राप्त) हूँ, मैं अनुपादान (आग्रह-रहित) हूँ”-देखता है। सो इसे तथागत जानते हैं — यह आप श्रमण या ब्राह्मण” ॰ अनुपादान हूँ” — देखते हैं। जरूर यह आयुष्मान् निर्वाण के अनुकूल (सप्पाय) प्रतिपद् (मार्ग) को ही मानते हैं, किन्तु यह आप श्रमण या ब्राह्मण पूर्वान्त-दृष्टि का भी उपादान करते हैं, अपरान्त दृष्टि ॰, काम संयोजन ॰, प्रविवेका प्रीति ॰, निरामिष सुख ॰, अदुःख-असुखा वेदना ॰, और जो यह आयुष्मान् — “मैं शान्त हूँ ॰ मैं अनुपादान हूँ” देखते हैं, यह भी आप श्रमण-ब्राह्मण का उपादान (किसी मत में आग्रह) ही कहा जाता है। “सो यह संस्कृत है ॰ तथागत उससे विरत हैं।”

“भिक्षुओं ! यह तथागत ने अनुपम श्रेष्ठ शान्ति पद का साक्षात्कार किया (अभिसंबुद्ध) है, जो कि इन छओं स्पर्श-आयतनों ( चक्षु,श्रोत्र, घ्राण, जिव्हा, काय और मन के विषयों ) के समुदय (उत्पत्ति), अस्तगमन (नाश), आस्वाद, आदिनव (दुष्परिणाम) और निस्सरण (निकास के रास्ते) को यथार्थ से जान कर, उपादान (आग्रह या ग्रहण ) न कर विमोक्ष (मोक्ष, मुक्ति) है। सो यह भिक्षुओ ! तथागत ने अनुपम ॰ शान्ति-पद का साक्षात्कार किया, ॰ उपादान न कर विमोक्ष है।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित किया।

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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

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