MN 104
Sāmagāma sutta: सामगाम-सुत्तन्त
Sāmagāmasutta
Devadahavagga
Bản dịch
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् शाक्य (देश) में, सामगाम में विहार करते थे।
उस समय निगंठ नात-पुत्त (जैन तीर्थंकर महावीर) अभी अभी पावा में मरे थे। उनके मरने पर निगंठ (जैन-साधु) लोग दो भाग हो, मंडन (कलह-विवाद) करते, एक दूसरे को मुखरूपी शक्ति से छेदते विहर रहे थे।- तू इस धर्म-विनय (धर्म) को नहीं जानता, मैं इस धर्म-विनय को जानता हॅू। “तू क्या इस धर्म-विनय को जानेगा, तू मिथ्यारूढ़ है, मैं सत्यारूढ़ हॅूं। मेरा (कथन अर्थ-) सहित है, तेरा अ-सहित है। तूने पूर्व बोलने (की बात) को पीछे बोला, पीछे बोलने (की बात) को पहिले बोला। तेरा (वाद) बिना-विचार का उलटा है। तूने वाद रोया तू निग्रह-स्थान में आ गया। जा वाद से छूटने के लिए फिरता फिर। यदि सकता है तो समेट।” नातपुत्तीय निगंठों में मानो युद्ध (वध) ही हो रहा था।
निगंठ के श्रावक (शिष्य) जो गृही श्वेत वस्त्रधारी, (थे)वह भी नात-पुत्रीय निगंठों में (वैसे ही) निर्विण्ण (विरक्त) प्रतिवाण-रूप थे, जैसे कि (नात-पुत्त) के दुर्आख्यात (ठीक से न कहे गये), दुष्प्रवेदित (ठीक से न साक्षात्कार किये गये), अनैर्वाणिक (पार न लगाने वाले), अन्-उपशम्-सवंर्तनिक (न-शांति-गामी), असम्यक्-संबुद्ध-प्रवेदित ( किसी बुद्ध से न जाने गये), प्रतिष्ठा (नींव)-रहित, भिन्न-स्तूप, आश्रय-रहित धर्म-विनय में (थे)।
तब चुन्द-समणुद्देस पावामें वर्षावास कर, जहाँ सामगाम था, जहाँ आयुष्मान् आनन्द थे, वहाँ गया। जाकर आयुष्मान् आनन्द को अभिवादन कर एक और बैठ गया। एक ओर बैठे चुन्द श्रमणोद्देश ने आयुष्मान् आनन्द से कहा —
“भन्ते । निगठ नातपुत्त अभी-अभी पावा में मरे हैं। उसके मरने पर, नात-पुत्तीय निंगठों में मानो युद्ध ही हो रहा है। आश्रय-रहित धर्म-विनय में (थे)।”
ऐसा कहने पर आयुष्मान् आनन्द ने चुन्द श्रमणोद्देश से कहा —
“आवुस चुन्द । भगवान् के दर्शन के लिये यह बात भेंट-रूप हैं। आओ आयुस चुन्द।
जहाँ भगवान् हैं, वहाँ चलें। चलकर यह बात भगवान को कहें।” —“अच्छा भन्ते। ” …
तब आयुष्मान् आनन्द और चुन्द श्रमणोद्देश जहाँ भगवान थे, वहाँ गये, जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् को कहा —
“भन्ते। यह चुन्द समणुद्देश ऐसा कह रहे हैं — भन्ते । निगंठ नातपुत्त अभी अभी पावा में मरे हैं।” तब भन्ते।मुझे ऐसा होता है, भगवान् के बाद भी (कहीं) संघ में ऐसा ही विवाद मत उत्पन्न हो। वह विवाद बहुत जनों के अहित के लिये, बहुत जनों के असुख के लिये, बहुत जनों के अनर्थ के लिये, देव मनुष्यों के अहित और दुःख के लिये (होगा)।”
“तो क्या मानते हो आनन्द। मैंने साक्षात्कार कर जिन धर्मों का उपदेश किया , जैसे कि — (1) चार स्मृति प्रस्थान, (2) चार सम्यक् प्रधान, (3) चार ऋद्धिपाद्, (4) पाँच इन्द्रियाँ (5) पाँच बल, (6) सात बोध्यंग, (7) आर्यं आष्टांगिक मार्ग। आनन्द । क्या इन धर्मों में दो भिक्षुओं का भी अनेक मत (दीखता) है?”
“भन्ते ! भगवान् ने जो यह धर्म साक्षात्कार कर उपदेश किये हैं, जैसे कि — (1) चार स्मृति-प्रस्थान ॰। इन धर्मों में भन्ते ! मैं दो भिक्षुओं का भी अनेक मत नहीं देखता। लेकिन भन्ते ! जो पुद्गल भगवान् के आश्रय से विहरते हैं, वह भगवान के न रहने के बाद, संघ में आजीव (जीविका) के विषयों में प्रतिमोक्ष (भिक्षु नियम) के विषय में विवाद पैदा कर सकते हैं, वह विवाद बहुत जनों के अहित के लिये, बहुत जनों के अ-सुख के लिये, बहुत जनों के अनर्थ = अहित के लिये, देव-मनुष्यों के दुःख के लिये होगा।”
“आनन्द ! जो यह आजीव के विषय में या प्रतिमोक्ष के विषय में विवाद है, वह अल्प-मात्रक (छोटा) है। मार्ग या प्रतिपद् के विषय में यदि संघ में विवाद “उत्पन्न हो, वह विवाद अहित के लिये। आनन्द ! यह छः विवाद के मूल हैं। कौनसे छः ?आनन्द ! यहाँ भिक्षु (1) क्रोधी, पाखंडी (उपनाही) होता है। जो भिक्षु आनन्द। क्रोधी उपनाही होता है, वह शास्ता (गुरू) में गौरव-रहित, आश्रय-रहित हो विहरता है, धर्म में भी, संघ में भी, शिक्षा (भिक्षु-नियम) में त्रुटि करने वाला होता है। जो भिक्षु आनन्द ! शास्ता में, गौरव-रहित, शिक्षा में त्रुटि करने वाला होता है।, वही संघ में विवाद पैदा करता है। वह विवाद बहुत जनों के अहित के लिये होता है। इसलिए आनन्द ! इस प्रकार के विवाद-मूल को यदि तुम अपने में या दूसरे में देखना , तो आनन्द ! तुम उस पानी विवाद-मूल के विनाश के लिये प्रयत्न करना। यदि। यदि, देखना तो आनन्द ! तुम उस पापी विवाद-मूल को, भविष्य में न होने देने के लिये उपाय करना, इस प्रकार इस पापी विवाद-मूल को, भविष्य में न होने देने के लिये उपाय करना, इस प्रकार इस पापी विवाद-मूल को, भविष्य में न होने देने के लिए उपाय करना, इस प्रकार इस पापी विवाद-मूल की भविष्य में अनुत्पत्ति होगी। (2) और फिर आनन्द ! भिक्षु, सर्पी, पलासी होता है, जो भिक्षु आनन्द ! तुम इस पापी विवाद मूल के विनाश के लिये प्रयत्न करना, इस पापी विवाद-मूल की भविष्य में अनुत्पत्ति के लिये उपाय करना, इस प्रकार इस पापी (दुष्ट) विवाद-मूल का प्रहाण (विनाश) होता है। इस प्रकार, इस पापी विाद मूल की भविष्य में अनुत्पत्ति होती है। आनन्द ! यह छः विवाद-मूल हैं।
आनन्द! यह चार अधिकरण हैं। कौनसे चार ? (1) विवाद-अधिकरण, (2) अनुवाद-अधिकरण (3) आपत्ति-अधिकरण, (4) कृत्य-अधिकरण।
“आनन्द ! यह सात अधिकरण-शमथ हैं, जिन्हें तब तब (समय समय पर) उत्पन्न हुये अधिकरणों (झगडो) के शमथ = उपशम (शांति) के लिये देना चाहिये- (1) संमुख-विनय देना चाहिये, (2) स्मृति-विनय, (3) अ-मूढ-विनय। (4) प्रतिज्ञात-करण, (5) यद्भूयसिक, (6) तत्यापीयसिक, (7) तिणवत्थारक।”
(1) “आनन्द ! संमुख विनय कैसे होता है ? “आनन्द ! भिक्षु विवाद करते हैं, धर्म है या अधर्म, विनय है या अविनय। आनन्द ! उन सभी भिक्षुओं को एक जगह एकत्रित होना चाहिये। एकत्रित हो धर्म (रूपी) रस्सी का (ज्ञान से) परीक्षण करना चाहिये, जैसे वह शांत हो, वैसे उस अधिकरण (झगड़े) को शांत करना चाहिये। इस प्रकार आनन्द ! संमुख विनय होता है, इस प्रकार संमुख-विनय से भी किन्हीं किन्ही अधिकरणों का शमन होता है।
(2) “कैसे आनन्द ! स्मृति-विनय होता है ? यहाँ आनन्द ! भिक्षु भिक्षु पर पाराजिक या पाराजिक समान (सामन्तक) आपत्ति (दोष) का आरोप करते हैं — स्मरण करो आवुस ! तुम पाराजिक या पाराजिक समान, ऐसी बडी (गुरूक) आपत्ति से आपन्न हुये, वह ऐसा उत्तर देता है — आवुस ! मुझे याद (स्मृति) नहीं कि मैं ऐसी गुरूक-आपत्ति से आपन्न हुये, वह ऐसा उत्तर देता है- आवुस ! मुझे याद (स्मृति) नहीं कि मैं ऐसी गुरूक-आपत्ति से आपन्न हूँ। उस भिक्षुओं आनन्द ! स्मृति-विनय देना चाहिये। इस प्रकार आनन्द ! स्मृति विनय होता है। इस स्मृति विनय से भी किन्हीं झगडों का निपटारा होता है।
(3) “आनन्द ! अमूढ-विनय कैसे होता है? यहाँ आनन्द ! भिक्षु-भिक्षु पर गुरूक-आपत्ति का आरोप करता है। वह ऐसा उत्तर देता है- आवुस ! मुझे स्मरण नहीं, कि मैं आपत्ति से आपन्न हूँ। तब वह छोडते हुये को लपेटता है — तो आयुष्मान्! अच्छी तरह बूझो, क्या तुम स्मरण करते हो, कि तुम ऐसी-ऐसी गुरूक आपत्ति से आपन्न हुये ?” वह ऐसा उत्तर देवे- मैं आवुस ! पागल हो गया था, मति-भ्रम ( हो गया था,) उन्मत्त हो मैंने बहुत सा श्रमण-विरूद्ध आचरण किया, भाषण किया, मुझे वह स्मरण नहीं होता। मूढ़ (बेहोश) हो, मैंने वह किया। उस भिक्षुको आनन्द ! अमूढ-विनय देना चाहिये। इस अमूढ-विनय से भी किन्हीं झगडों का निबटारा होता है।
(4) “आनन्द ! प्रतिज्ञान-करण कैसे होता है ? आनन्द ! भिक्षु आरोप करने पर या आरोप न करने पर भी आपत्ति (दोष) को स्मरण करता है, खोलता है, स्पष्ट करता है एस भिक्षु को (अपने से) वृद्धत्तर भिक्षु के पास जाकर, चीवर को एक (बाये) कंधे पर करके, पाद-वंदना कर उकडूँ बैठ हाथ जोड, ऐसा कहना चाहिये- “भन्ते ! मैं इस नाम की आपत्ति से आपन्न हुआ हूँ, उसकी मैं प्रतिदेशना (निवेदन)करता हूँ। वह ( दूसरा भिक्षु) ऐसा कहे- “देखते हो (उस दोष को) ? “देखता हूँ”। आगे से (इन्द्रिय) रक्षा करना। — रक्षा करूँगा। इस प्रकार आनन्द! प्रतिज्ञात-करण (स्वीकार) होता है। ॰ ।
(5) “आनन्द ! यद्भूयसिक कैसे होता है ?- आनन्द ! यदि वह भिक्षु उन अधिकरण को उस आवास (मठ) में शांत न कर सके। तो आनन्द । उन सभी भिक्षुओं को जिस आवास में अधिक भिक्षु हैं, उसमें जाना चाहिये। वहाँ सबको एक जगह एकत्रित होना चाहिये। एकत्रित हो धर्म-नेत्री ( धर्म रूपी रस्सी ) का समनुमार्जन (परीक्षण) करना चाहिये। धर्म-नेत्री का समनुमार्जन कर ॰।
(6) “आनन्द ! तत्यापीयसिका (तस्स पापीयसिका ) कैसे होती है? यहाँ आनन्द ! भिक्षु भिक्षुको ॰ ऐसी गुरूक-आपत्ति आरोप करते हैं — आयुष्मान् स्मरण करो ॰ तुम ऐसी गुरूक-आपत्ति आपन्न हुये ?” वह ऐसा उत्तर देता है — आवुस ! मुझे स्मरण नहीं, कि मैं ॰ ऐसी गुरूक-आपत्ति आपन्न हुआ। उसको छोडते हुये को वह लपेटता है- आयुष्मान् अच्छी तरह बूझो- क्या तुम्हें स्मरण है, कि तुम ॰ ऐसी गुरूक आपत्ति से आपन्न हुये ?” वह ऐसा उत्तर देवे — “आवुस ! मैं स्मरण नहीं करता कि मैं, ॰ ऐसी गुरूक आपत्ति से आपन्न हुये ?” वह ऐसा उत्तर देवे- “आवुस! मैं स्मरण नहीं करता कि मैं ॰ ऐसी गुरूक आपत्ति आपन्न हुआ। स्मरण करता हॅूं। आवुस! कि मैं इस प्रकार की छोटी (अल्पमात्रक) आपत्ति आपन्न हुआ। खोलते हुये उसको वह फिर लपेटता है- “आयुष्मान् अच्छी तरह बूझो ? वह ऐसा उत्तर दे- आवुस! मैं इस प्रकार की (अमुख) छोटी आपत्ति से आपन्न हुआ, बिना पूछे ही स्वीकार करता हूँ। तो क्या मैं, ऐसी गुरूक आपत्ति आपन्न हो पूछने पर न स्वीकार करूँगा ?” वह ऐसा कहता है- आवुस ! तुम इस छोटी आपत्ति को भी बिना पूछे नहीं स्वीकार करते, तो क्या तुम, ऐसी गुरूक आपत्ति आपन्न हो पूछने पर स्वीकार करोगे ? तो आयुष्मान् अच्छी तरह बूझो। वह यदि बोले- आवुस ! स्मरण करता हॅूं, मैं ऐसी गुरूक आपत्ति आपन्न हुआ हॅू। दव (सहसा) से रव (प्रमाद) से मैंने यह कहा- “मैं स्मरण नहीं करता, कि मैं ॰ ऐसी। इस प्रकार आनन्द ! तस्सपापीयसिका (उसकी और भी कडी आपत्ति) होती है। ऐसी भी यहाँ किन्हीं किन्हीं अधिकरणों का निपटारा होता है।
(7) “आनन्द ! तिण-पत्थारक कैसे होता है। आनन्द ! यहाँ मंडन (कलह) विवाद से युक्त हो विहरते ( समय ), भिक्षु बहुत से विरूद्ध आचरण, भाषण, किये होते हैं। उन सभी भिक्षुओं को एकराय हो एकत्रित होना चाहिये। एकत्र हो एक पक्षवालों में से चतुर भिक्षु को आसन से उठकर चीवर को एक कंधे पर कर हाथ जोड संघ को ज्ञापित करना चाहिये —
“मन्ते ! संघ सुने, मंडन (कलह) विवाद से युक्त हो विहरते (समय) हमने बहुत से श्रमण-विरूद्ध आचरण किये हैं, यदि संघ उचित समझे, तो जो इन आयुष्मानों का दोष है, और जो मेरा दोष है, इन आयुष्मानों के लिये भी और अपने लिये भी, मैं तिणवत्थारक ( घास से ढाँकना जैसा) से बयान करूँ, (लेकिन) स्थूल वद्य (बडा दोष) गृही-प्रतिसयुक्त (गृहस्थ संबंधी) छोड कर । तब (दूसरे) पक्षवालों में से चतुर भिक्षु को आसन से उठकर॰।॰। इस प्रकार आनन्द ! तिणवत्थारक (तृण से ढाँकने जैसा) होता है।
“आनन्द ! यह छः धर्म साराणीय प्रिय-करण, गुरू-करण हैं, संग्रह, अ-विवाद, सामग्री (एकता) एकीभाव के लिये हैं। कौनसे छः ? (1) आनन्द ! भिक्षु का समझ-चारियों से , गुप्त भी प्रकट भी, मैत्रीभाव-युक्त-कायिक कर्म हो, यह भी धर्म साराणीय ॰। (2) और फिर आनन्द ! मैत्रीभाव-युक्त वाचिक कर्म। (3) मैत्रीभाव युक्त मानसकर्म ॰। (4) और फिर आनन्द ! जो कुछ भिक्षु को धार्मिक लाभ, धर्म से लब्ध होते हैं, अन्त में पात्र चुपड़ने मात्र भी, वैसे लाभों को बिना बाँटे उपभोग न करने वाला हो, शीलवान् स-ब्रह्मचारियों के साथ सह-भोगीहो, यह भी धर्म ॰ । (5) और फिर आनन्द ! जो वह शील (आचार) कि अखंड (अछिद्र), अशयल, अकश्यप, सेवनीय, पण्डितों से प्रशंसित अ-निंदित, समाधि सहायकहै, वैसे शीलों में शील-श्रमण-भावयुक्त हो, गुप्त भी और प्रकट भी सब्रह्मचारियों के साथ विहार करता हो; यह भी धर्म। आनन्द ! यह छः धर्म साराणीय है।
भगवान ने यह कहा; संतुष्ट हो आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Nguyện cho tất cả chúng sinh được an vui