Uposatha

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MN 132

Ānandabhaddekaratta sutta: आनन्द-भद्देकरत्त-सुत्तन्त

Ānandabhaddekarattasutta

Vibhaṅgavagga

Bản dịch

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

उस समय आयुष्मान् आनन्द, उपस्थान-शाला में भिक्षुओं को धार्मिक कथा द्वारा संदर्शित (=सुझाना)=समादषित, समुत्तेजित=संप्रहर्षित करते थे। भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग को कहते थे। तब भगवान् सायंकाल, ध्यान से उठकर जहाँ उपस्थान-शाला थी, वहाँ गये। जाकर बिछे आसन पर बैठे। बैठकर भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—

“भिक्षुओ! किसने (आज) उपस्थान-शाला में भिक्षुओं को धार्मिक कथा द्वारा ॰ समुत्तेजित किया। भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग को कहा?”

“भन्ते! आयुष्मान् आनन्द ने उपस्थान-शाला में ॰।”

तब भगवान् ने आयुष्मान् आनंद को संबोधित किया—

“कैसे, आनंद! तूने भिक्षुओं को ॰ समुत्तेजित ॰ किया; भद्देकरत्त के उद्देश्य और विभंग को कहा—

भन्ते! इस प्रकार मैंने भिक्षुओं को ॰ उद्देश और विभंग को कहा—

‘अतीत का अनुगमन न करें ॰1

शान्त, मुनि (जन) भद्देकरत्त कहते हैं।

‘कैसे आवुसो! अतीत का अनुगमन करता है ॰ भिक्षुओ! प्रत्युत्पन्न धर्मो में नहीं आसक्त होता।

“अतीत का अनुगमन न करे ॰2

शान्त, मुनि (जन) भद्देकरत्त भद्रैक रक्त कहते है।

“इस प्रकार, भन्ते! मैंने भिक्षुओं को ॰ समुत्तेजित ॰ किया। भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग को कहा।”

“साधु, साधु, आनंद! ठीक ही तूने, आनन्द! भिक्षुओं को ॰ भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग को कहा।—

‘अतीत का अनुगमन न करें ॰2

शान्त, मुनि (जन) भद्देकरत्त कहते हैं।

॰ प्रत्युत्पन्न धर्मों में नहीं आसक्त होता। ‘अतीत का अनुगमन ॰।”

भगवान् ने यह कहा, संतुष्ट हो आयुष्मान् आनंद ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

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