Uposatha

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MN 143

Anāthapiṇḍikovāda sutta: अनाथपिंडिकोवाद-सुत्तन्त

Anāthapiṇḍikovādasutta

Saḷāyatanavagga

Bản dịch

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

उस समय अनाथपिंडिक गृहपति बहुत अधिक रूग्ण, दुःखित, बीमार था। तब अनाथपिंडिक गृहपति ने एक आदमी से कहा—“हे पुरूष! जहाँ भगवान् है, वहाँ जाओ; जाकर मेरे वचन से भगवान् के चरणों में शिर से वन्दना करो; और यह भी कहो—‘भन्ते! अनाथपिंडिक गृहपति ॰ बीमार है; वह भगवान् के चरणों में शिर से वन्दना करता है’। (फिर) जहाँ आयुष्मान् सारिपुत्र हैं, वहाँ जाओं; जाकर मेरे वचन से आयुष्मान् सारिपुत्र के चरणो में शिर से वन्दना करो, और यह भी कहों—‘भन्ते! अनाथपिंडिक गृहपति ॰ बीमार है; वह आयुष्मान् सारिपुत्र के चरणों में शिर से वन्दना करता है; और यह भी कहों—‘अच्छा हो भन्ते! आयुष्मान् सारिपुत्र जहाँ अनाथपिंडिक गृहपति का घर है, कृपा कर वहाँ चलें’।—

“अच्छा, भन्ते!”—(कह) उस पुरूष ने अनाथपिंडिक गृहपति से कह, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् को अभिवादित कर एक बैठ गया। एक ओर बैठे, उस पुरूष ने भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! अनाथपिंडिक गृहपति ॰ बीमार हैं; ॰ वंदना करता है।’

(फिर) जहाँ आयुष्मान् सारिपुत्र थे, वहाँ गया। जाकर आयुष्मान् सारिपुत्र को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे, उस पुरूष ने आयुष्मान् सारिपुत्र से यह कहा—

‘भन्ते! अनाथ-पिंडिक गृहपति ॰ बीमार है; ॰ वन्दना करता है। और यह भी कहता है—‘अच्छा हो, भन्ते! ॰ कृपा कर वहाँ चले।’

आयुष्मान् सारिपुत्र ने मौन से स्वीकार किया।

तब आयुष्मान् सारिपुत्र पहिनकर, पात्र-चीवर ले, आयुष्मान् आनंद को अनुगामी श्रमण बना, जहाँ अनाथ-पिंडिक का घर था, वहाँ गये। जाकर बिछे आसन पर बैठे। बैठकर आयुष्मान् सारिपुत्र ने अनाथ-पिंडिक गृहपति से यह कहा—

“गृहपति! ठीक तो है? (काल)यापन तो हो रहा है? दुःखा वेदना हट तो रही है, लौट तो नहीं रही है? (व्याधि का) हटना तो मालूम हो रहा है; लौटना तो नहीं मालूम हो रहा है?”

“भन्ते सारिपुत्र! मुझे ठीक नहीं है; ॰ अत्यधिक दाह हो रहा है। भन्ते सारिपुत्र! मुझे ठीक नहीं हैं ॰।”

“तो गृहपति! अभ्यास करों (=शिक्षितव्य)—‘चक्षु का उपादान न करूँगा, और मेरा विज्ञान (=चित्त) चक्षु में निश्रित (=आश्रित, आसक्त) न होगा’। ऐसा गृहपति! अन्यास करों तो ॰ श्रोत्र ॰। ॰ घ्राण ॰। ॰ जिह्वा ॰। ॰ मन ॰। ॰ रूप ॰। ॰ शब्द ॰। ॰ गंध ॰। ॰ रस ॰। ॰ स्प्रष्टव्य ॰। ॰ धर्म ॰। ॰ चक्षुर्विज्ञान ॰। ॰ श्रोत्र-विज्ञान ॰। ॰ घ्राण-विज्ञान ॰। ॰ जिह्वा-विज्ञान ॰। ॰ काय-विज्ञान ॰। ॰ मनो-विज्ञान ॰। ॰ चक्षु-संस्पर्श ॰। ॰ श्रोत्र-संस्पर्श ॰। ॰ घ्राण-संस्पर्श .॰। ॰ श्रोत्र-संस्पर्शजा वेदना ॰। ॰ घा्रण‘संस्पर्शज वेदना ॰। ॰ जिह्वा-संस्पर्शजा वेदना ॰। ॰ काय-संस्पर्शजा वेदना ॰। ॰ मनःसंस्पर्शजा वेदना ॰। ॰ पृथिवी-धातु ॰। ॰ आप-धातु ॰। ॰ तेज-धातु ॰। ॰ वायु-धातु ॰। ॰ आकाशधातु ॰। ॰ विज्ञान-धातु ॰। ॰ रूप ॰। ॰ वेदना ॰। ॰ संज्ञा ॰। ॰ संस्कार ॰। ॰ विज्ञान ॰। ॰ आकाशानन्त्यायतन ॰। ॰ विज्ञानान्त्यातन ॰। ॰ आकिचन्यायतन ॰। ॰ नैव संज्ञा-नासंज्ञायतन ॰। ॰ इस लोक ॰। तो ऐसा, गृहपति! अभ्यास करों—‘परलोक का उपादान न करूँगा, और मेरा विज्ञान परलोक में निश्रित न होगा’—ऐसे गृहपति तुम अभ्यास करों। तो ऐसा, गृहपति! अभ्यास करो, कि जो कुछ भी तुम्हारा दृष्ट, श्रुत, स्मृत, विज्ञान, प्राप्त, पर्येषित (=खोज किया), अनुपर्येषित, मन द्वारा अनुचरित हैं; उसका भी उपादान न करूँगा; मेरा विज्ञान उसमें निश्रित न होगा—ऐसे गृहपति तुम अभ्यास करो।”

ऐसा कहने पर अनाथपिंडिक गृहपति रो पडा, आँसू गिराने लगा। तब आयुष्मान् आनंद ने अनाथपिंडिक गृहपति से यह कहा—

“गृहपति! क्या घबरा रहे हो, दिल छोटा कर रहे हो?”

“भन्ते आनंद! मै घबरा नहीं रहा हूँ, दिल छोटा नहीं कर रहा हूँ; बल्कि भन्ते! मैंने दीर्घकाल से शास्ता की उपासना (=सत्संग) की और मनोभावनीय (=भावना में तत्पर) भिक्षु भी; किन्तु मैंने ऐसी धार्मिक कथा पहिले नहीं सुनने को पाई।”

“गृहपति! श्वेत वस्त्रधारी गृहस्थों को ऐसी धार्मिक कथा नहीं समझ में आती; प्रब्रजित को, गृहपति! ऐसी धार्मिक कथा समझ में आती है।”

“तो, भन्ते सारिपुत्र! ॰ गृहस्थों को भी ऐसी धार्मिक कथा समझने को मिले। भन्ते! अल्प मतलवाले भी कुलपुत्र हैं; धर्म के न श्रवण से वह परिहीन (=वंचित) हांेगे। (वह) धर्म के जानने वाले होंगे।”

तब आयुष्मान् सारिपुत्र और आयुष्मान् आनंद, अनाथपिंडिक गृहपति को इस अववाद (=उपदेश) से उपदेश कर, आसन से उठकर चले गये। आयुष्मान् सारिपुत्र और आयुष्मान् आनंद के चले जाने के थोडे ही समय बाद अनाथपिंडिक गृहपति ने काल किया। (और) तुषित-काय (=तुषित देव-लोक) मे ंवह उत्पन्न हुआ।

तब प्रकाश युक्त रात्रि को ॰ प्रकाशमान वर्णवाला अनाथपिंडिक देवपुत्र, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर खडा हो गया। एक ओर खडे अनाथपिंडिक देवपुत्र ने भगवान् से गाथाओं में कहा—

“ऋषि-संघ से सेवित।
धर्मराज का वास रह चुका यह जेतवन मुझे प्रीति दायक है।।(1)।।

कर्म, विद्या, धर्म, शील और उत्तम जीवन;

इनसे मनुष्य शुद्ध होते है, गौत्र और धन से नहीं।।(2)।।

इसलिये पंडित पुरूष अपने हित को देखते,

योनिशः धर्म का चयन करे, ऐसे (वह) वहाँ शुद्ध होता है।।(3)।।

प्रज्ञा, शील और उपशम में सारिपुत्र सा देवपुत्र,

पारंगत, जो भिक्षु (हो वह) भी इतना ही महान् होगा।”

तब भगवान् ने उस रात के बीत जाने पर भिक्षुओं को संबोधित किया-”

“भिक्षुओ! आज रात को ॰ एक देवपुत्र, जहाँ मैं थ, वहाँ आया। आकर मुझे अभिवादन कर एक ओर खडा हो गया। एक ओर खडे उस देवपुत्र ने मुझे गाथाओं में कहा—

‘ऋषिसंघ से सेवित ॰ इतना ही महान् होगा’।

“उस देवपुत्र ने, भिक्षुओं! यह कहा। ‘शास्ता सहमत है’—(सोच) मुझे अभिवादन कर ॰ वहीं अन्तर्धान हो गया।”

ऐसा कहने पर आयुष्मान् आनंद ने भगवान् से यह कहा—

“वह, भन्ते! जरूर अनाथपिंडिक देवपुत्र होगा। भन्ते! अनाथपिंडिक गृहपति आयुष्मान् सारिपुत्र में अभिप्रसन्न (=अतिश्रद्धावान्) था।

“साधु, साधु, आनंद! जितना कुछ आनंद! तर्क से पाया जा सकता है, वह तूने पा लिया है। आनंद! वह देवपुत्र अनाथपिंडिक था।’

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् आनंद ने भगवान् के भाषण का अभिनंदन किया।

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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

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