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中部 140

Dhātuvibhaṅga sutta: धातुविभंग-सुत्त

Dhātuvibhaṅgasutta

Vibhaṅgavagga

译本

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् मगध(जनपद) में चारिका करते, जहां राजगृह है, वहां पहुंचे । (और) जहां भार्गव कुंभकार था, वहां गये । जाकर भार्गव कुंभकार से यह बोले —

“यदि भार्गव! तुम्हें भारी न हो, तो एक रात (इस) घर में विहार(=वास) करूं ।”

“भंते! भारी नहीं है, किंतु यहां पहले से आकर ठहरा एक प्रव्रजित है, यदि वह अनुमति दे, तो भन्ते! सुखपूर्वक विहार कीजिए ।”

उस समय पुक्कुसाति नामक कुलपुत्र भगवान् के नाम पर घर से बेघर(=अनागारिक) हो प्रव्रजित हुआ था । वह उस कुंभकार-निवेशन में पहले ही से ठहरा हुआ था । तब भगवान् जहां आयुष्मान पुक्कुसाति थे, वहां गए, जाकर आयुष्मान् पुक्कुसाति से यह बोले —

“यदि भिक्खु! तुम्हें भारी(=गुरु) न हो तो, मैं एक रात (इस) घर में विहार करूं ।”

“आवुस! कुंभकार निवेश खुला है, आयुष्मान् सुखपूर्वक विहार करें ।”

तब भगवान् कुंभकार-निवेश में प्रवेश कर, एक ओर तृण का आसन बिछा, आसन मार, काया को सीधा कर स्मृति को सन्मुख उपस्थित रख बैठे । तब भगवान् ने बहुत रात बैठे-बैठे बिता दी । आयुष्मान पुक्कुसाति ने भी बहुत रात बैठे-बैठे बिता दी । तब भगवान् को यह (महसूस) हुआ — ‘इस कुलपुत्र की चाल-ढाल बहुत अच्छी है; क्यों ना मैं इससे पूछूं ।’ तब भगवान् ने आयुष्मान् पुक्कुसाति से यह कहा —

“भिक्खु! किसके नाम पर तू प्रव्रजित हुआ है? कौन तुम्हारा शास्ता (=गुरु) है? किसके धर्म को तू मानता है?”

“आवुस! शाक्यकुल से प्रव्रजित शाक्यपुत्र श्रमण गोतम हैं । उन भगवान् गोतम का ऐसा मंगल कीर्तिशब्द फैला हुआ है — … उन भगवान् के धर्म को मैं मानता हूं ।”

“भिक्खु! वह भगवान अर्हत सम्यक् सम्बुद्ध इस समय कहां विहरते हैं?”

“आवुस! उत्तर के देशों में सावत्थि नामक नगर है । वहां भगवान् अर्हत-सम्यक् संबुद्ध इस वक्त विहरते हैं ।”

“भिक्खु! क्या तुने उन भगवान् को पहले (कभी) देखा है? देखकर पहचान सकता है?”

“आवुस! नहीं मैंने उन भगवान् को पहले नहीं देखा है। देखकर मैं पहचान नहीं सकता।

तब भगवान् को यह हुआ—‘मेरे ही नाम पर यह कुल-पुत्र प्रव्रजित हुआ है; क्यों न मैं इसे धम्मोपदेश करूँ।

तब भगवान् ने आयुष्मान् पुक्कुसाति को संबोधित किया—

“भिक्खु! तुझे धर्म उपदेशता हूँ, उसे सुन, अच्छी तरह मन में कर, कहता हूँ।”

“अच्छा, आवुस!”—(कह) आयुष्मान् पुक्कुसाति ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“भिक्खु! यह पुरूष (1) छः धातुओं, (2) छः स्पर्शायतनों, (3) अठारह मनापविचार, (4) चार अधिष्ठानों वाला हैं, (5) जहाँ स्थित (इसके) मान और उत्सद नहीं प्रवृत्त होते। मान और उत्सद के न प्रवृत्त होने पर—(वह) शान्त मुनि कहा जाता है। (6) प्रज्ञा से प्रमाद न करे, सत्य की रक्षा करे, त्याग को बढ़ावे, उपशम (=शांति का) ही अभ्यास करें—यह धातु-विभंग का उद्देश है।

(1) “भिक्खु! यह जो कहा—यह पुरूष छः धातुओं वाला है’—सो किसलिये कहा?—भिक्खु! यह छः धातु है?—पृथिवी-धातु, आप ॰, तेज ॰, वायु ॰, आकाश ॰, विज्ञान-धातु। यह जो कहा—‘यह पुरूष छः धातुओं वाला है’—सो इसीलिये कहा।

(2) “भिक्खु! यह जो कहा—‘यह पुरूष छः स्पर्शायतन हैं—सो किसलिये कहा?—चक्षु-सस्पर्शायतन, श्रोत्र ॰, घ्राण ॰, जिह्वा ॰, काय ॰, मन: संस्पर्शायतन। ॰।

(3) “भिक्खु! यह जो कहा—‘यह पुरूष अठारह मनोपविचारों वाला है’—सो किसलिये कहा?—चक्षु से रूप को देखकर रूप को सौमनस्य स्थानीय उपविचारता है ॰ और छः उपेक्षा के उपविचार हैं। ॰।

(4) “भिक्खु! यह जो कहा—‘यह पुरूष चतुरधिष्ठान है’—सो किसलिये कहा?—प्रज्ञाअधिष्ठान, सत्य ॰, त्याग ॰, उपशम-अधिष्ठान । ॰।

(6) ”॰—‘प्रज्ञा से प्रमाद न करे ॰ उपशम (=शांति) का ही वह अभ्यास करें’—सो किसलिये कहा?—कैसे भिक्खुओ! भिक्खु प्रज्ञा से प्रमाद नहीं करता?—भिक्खुओ! यह छः धातुये हैं—पृथ्वी धातु, ॰, विज्ञान-धातु। क्या है भिक्खु पृथ्वी धातु?—पृथ्वी धातु (दो प्रकार की) हैं — अध्यात्मिक और बाह्य। क्या है, भिक्खु! आध्यात्मिक पृथ्वी धातु? शरीर के भीतर (=अध्यात्म), प्रति शरीर में (=प्रत्यात्म) कर्कश खर्खरा लिये हुये है; जैसे कि केश, लोम ॰ पेट के भीतर का मल; और जो कुछ और भी प्रति शरीर में कर्कश ॰ लिये हुये है। भिक्खु! यह कही जाती है, आध्यात्मिक पृथ्वी धातु। जो आध्यात्मिक पृथिवी धातु है, और जो बाह्य पृथिवी धातु है; यह (दोनों) पृथिवी धातु ही है। ‘वह न मेरा हैं’ ‘न यह मैं हूँ’, और ‘न वह मेरा आत्मा है’। इस प्रकार इसे यथार्थ से भली प्रकार प्रज्ञा से देखना चाहिये। ऐसे इसे यथार्थतः अच्छी प्रकार देखने से पृथिवी धातु से निर्वेद (=उदासीनता) को प्राप्त होता है; पृथिवी धातु से चित्त को विरक्त करता है। क्या है, भिक्खु ! आपोधातु?—(दो प्रकार की हैं) आध्यात्मिक और बाह्य! क्या हैं, भिक्खु! आध्यात्मिक आप-धातु? जो कुछ अध्यात्म में=प्रति शरीर में आप (=जल) या आप संबंधी लिया गया है; जैसे कि पित्त, श्लेष्म (=कफ), पीब, खून, स्वेद, मेद, अश्रु, वसा, खेल (=खखार) कान-नाक का मल, मूत्र; और जो और भी अध्यात्म में ॰ आप या आप-संबंधी लिया गया है। यह भिक्खुओ! आध्यात्मिक आप धातु कही जाती है। जो आध्यात्मिक आप-धातु है ॰ और जो बाह्य आप-धातु है; यह (दोनों) आप-धातु ही है। ‘वह न मेरा है’, ॰। ऐसे इसे यथार्थतः अच्छी प्रकार देखने से आप-धातु से निर्वेद को प्राप्त होता है; आप-धातु से चित्त को विरक्त करता है। क्या है, भिक्खु! तेज-धातु?—(दो प्रकार की) आध्यात्मिक और बाह्य। क्या है भिक्खु आध्यत्मिक तेज-धातु?—जो कुछ अध्यात्म में=प्रति शरीर में तेज या तेज संबंधी (वस्तु) ली गई है; जैसे कि—जिससे (शरीर से) ताप=दाह होता, जीर्ण होता है; जिससे कि अशित=खाया पिया अच्छी तरह पचता है; और भी ॰ आप संबंधी लिया गया है। यह भिक्खु! आध्यात्मिक तेज धातु कही जाती है। जो आध्यात्मिक तेज-धातु है, और जो बाह्य तेज-धातु है; यह (दोनों) तेज-धातु ही है। ‘वह न मेरा है’ ॰। ॰ तेज धातु से चित्त को विरक्त करता है। क्या है, भिक्खु! वायु-धातु?—॰। ॰—जो अध्यात्म में=प्रति शरीर में वायु या वायु-संबंधी (वस्तु) ली गई है; जैसे कि—ऊध्र्वगामी वायु, अधोगामी वायु, पेट में रहने वाले वायु, अंग अंग में रहने वाले वायु, आश्वास-प्रश्वास; और जो और भी ॰ वायु-संबंधी लिया गया है। यह भिक्खु! आध्यात्मिक वायु-धातु है। ॰ यह (दोनों) वायु धातु ही है। ‘वह न मेरा है’ ॰। ॰ वायु धातु से चित्त को विरक्त करता है। क्या है, भिक्खु! आकाश-धातु?—॰। ॰—जो अध्यात्म में=प्रति शरीर में आकाश या आकाश सम्बन्धी है। जैसे कि—कर्ण-छिद्र, नासिका-छिद्र, मुख-द्वार जिससे कि…खाया पिया निगला जाता है, जहाँ…खाया पिया ठहरता है; जहाँ से जिससे कि…खाया पिया अधोमार्ग से निकलता है। और जो और भी ॰ आकाश सम्बन्धी है। ॰। ॰ यह (दोनों) आकाशधातु ही है। ‘वह न मेरा हैं’ ॰। ॰ आकाश धातु से चित्त को विरक्त करता है। तब फिर परिशुद्ध=पर्यवदात विज्ञान-धातु ही शेष रहता है। उस विज्ञान से जानता है? ‘सुख हैं’—जानता है; ‘दुःख है’—जानता है; ‘अदुःख-असुख है’—जानता है। भिक्खु! सुख-वेदनीय है (=जिससे सुखात्मक अनुभव मिले) स्पर्श (=विषय-इन्द्रिय संयोग) के कारण (=प्रतीत्य) सुखा वेदना उत्पन्न होती है। वह सुखा वेदना को अनुभव करते ‘सुखा वेदना को अनुभव कर रहा हूँ’—जानता है। ‘उसी सुख-वेदनीय स्पर्श के निरोध (=लुप्त) हो जाने से, उससे उत्पन्न अनुभव (=वेदयित)—सुखवेदनीय स्पर्श के द्वारा उत्पन्न सुखा वेदना—वह निरूद्ध होती है=वह उदपशांत होती है’—जानता है। भिक्खु! दुःख-वेदनीय स्पर्श के कारण दुःखा वेदना उत्पन्न होती है। ॰ वह उपशांत होती है—जानता है। भिक्खु! अदुःख-असुख-वेदनीय स्पर्श के कारण अदुःख-असुखा वेदना उत्पन्न होती है। ॰ वह उपशांत होती है’—जानता है।

“जैसे, भिक्खु! दो काष्ठों के संघर्षण से रगड़ से उष्मा (=गर्मी) पैदा होती है, आग प्रकट होती है। उन्हीं दोनों काष्ठों के अलग होने से, विक्षेप होने से जो उससे उत्पन्न उष्मा है, वह निरूद्ध=उपशांत होती है; ऐसे ही भिक्खु! सुख-वेदनीय स्पर्श के कारण सुखा वेदना उत्पन्न होती है। ॰ उपशांत होती है’—जानता है। दुःख वेदनीय स्पर्श के कारण दुःखा वेदना उत्पन्न होती है। ॰ उपशांत होती है’—जानता है अदु‘ख-असुख वेदनीय स्पर्श के कारण अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होती है। ॰ उपशांत होती है’—जानता है। तब फिर परिशुद्ध=पर्यवदात, मृदु, कर्मण्य, प्रभास्वर उपेक्षा ही बाकी रहती है। जैसे, भिक्खु! चतुर सोनार या सोनार का शार्गिद (=अन्तेवासी) उल्का (=अंगीठी) बाँधें, उल्का को बाँध कर उल्कामुख (=अंगीठी) को लीपे (=जोडे)। उल्कामुख को लीपकर संडसी (=संडास) से सोने को पकड कर उल्का मुख में डाले। उसे समय समय पर धौंके, समय समय पर पानी से छींटा दे, समय समय पर (चुपचाप) छोड रक्खे। (तब) वह सोना, मृदु, कर्मण्य (=काम के लायक), प्रभास्वर, शुद्ध, निर्मल, निहत (=धुला), कषाययुक्त होता है। तब जिस जिस आभूषण…को चाहे—चाहे पट्टिका, चाहे कुंडल, चाहे ग्रैवेयक (=कंठा), चाहे सुवर्णमाला—उसी चीज (=अर्थ) अनुभव कर सकता है। ऐसे ही भिक्खु! तब फिर ॰ उपेक्षा ही बाकी रहती है। वह इस प्रकार जानता है—‘ऐसी परिशुद्ध=पर्यवदात, इस उपेक्षा से मैं आकाशानन्त्यायतन को प्राप्त हो विहरूँ, उसके धर्मानुसार चित्त को भावित (=अभ्यस्त) करूँ; इस प्रकार मेरी यह उपेक्षा उस (आकाशानन्त्यायतन) में आश्रित हो, उसे उपादान बना चिर=दीर्घकाल तक ठहरेगी। यदि मैं ऐसी परिशुद्ध=पर्यवदान इस उपेक्षा से चिज्ञानानन्त्यायतन को प्राप्त हो विहरूँ, ॰ दीर्घकाल तक ठहरेगी। यदि मैं ऐसी परिशुद्ध=पर्यवदात इस उपेक्षा से आकिचन्यायतन को प्राप्त हो विहरूँ, ॰ दीर्घकाल तक ठहरेगी। ॰ नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन को प्राप्त हो विहरूँ, ॰ दीर्घकाल तक ठहरेगी। वह ऐसा जानता है—यदि ऐसा परिशुद्ध=पर्यवदात इस उपेक्षा से आकाशानन्त्यायतन को प्राप्त हो विहरूँ, उसके धर्मानुसार चित्त को भावित करूँ; (तो) भी यह संस्कृत (कृत) है। ॰ विज्ञानानन्त्यायतन ॰। ॰ आकिंचन्यायतन ॰। ॰ नैवसंज्ञानासंज्ञायतन को प्राप्त हो विहरूँ, उसके धर्मानुसार चित्त को भावित करूँ; (तो) भी यह संस्कृत हैं’।—(यह सोच) वह न उसके भव (=उत्पत्ति) या विभव (=विनाश) के लिये न अभिसंस्कार (=बनाना) करता है, न अभिसंचेतन (=ख्याल) करता है। वह भव ॰ अभिसंचेतन न करते लोक में किसी (वस्तु) का उपादान (=संग्रह) नहीं करता; उपादान न करने से त्रास को नहीं प्राप्त होता। परित्रास न पाते वह इसी शरीर (=प्रत्यात्म) निर्वाण को प्राप्त होता है। जन्म (=आवागमन) खतम हो गया ॰ इसे जानता है। वह यदि सुखा वेदना को अनुभव करता है, (तो भी) ‘वह अनित्य है’—जानता है। ‘अन्-अध्यवसित (=अ-निश्चित) हैं’—जानता है। ‘अन्-अभिनंदित है’—जानता है। यदि दुःख वेदना को अनुभव करता है ॰। यदि अ-दुःख-असुखा वेदना को अनुभव करता है। वह यदि सुखा वेदना को वेदन (=अनुभव) करता हैं, तो वि-संयुक्त (=वियुक्त) हो उसे नहीं वेदन करता। यदि दुःखा वेदना को ॰। यदि अदुःखा-असुखा वेदना को ॰। वह काया पर्यन् की वेदना को वेदन करते हुये—‘काय-पर्यन्त वेदना को वेदन करता हूँ’—जानता है। जीवित (=जीवन)-पर्यन्त वेदना को वेदन करते हुये—॰। ‘काया छोड मरने के बाद जीवन खतम होने (=पर्यादान) के पश्चात् यहीं सारे अनुभव (=वेदयित), अन्-अभिनंदित हो ठंडे जो जायेंगे’—जानता है। जैसे, भिक्खुओ! तेल और बत्ती के सहारे तेल-प्रदीप जलता है। उसकी तेल और बत्ती के खतम होने पर और दूसरें के न मिलने पर (=अनुपादानात्) निहाराह हो बुझ जाता है। (=निव्वायति) निर्वाण को प्राप्त होता है, इसी प्रकार, भिक्खु! काय-पर्यन्त की वेदना को वेदन करते हुये—॰ ठंडे हो जायेंगे—जानता है। इसलिये इस प्रकार ऐसे (गुणों से) युक्त भिक्खु, इस परम प्रज्ञा-अधिष्ठान से संयुक्त होता है। भिक्खु! यही परम आर्य प्रज्ञा है, जो कि यह सारे दुःखों के क्षय का ज्ञान? उसकी वह विमुक्ति (=मुक्ति) सत्य में स्थित, अ-कोष्य (=चल) होती है। भिक्खु! वह मृषा (=असत्य) है, जो कि नाश-मान (=मोषधर्मा) हैं, जो मोषधर्मा नहीं है, वह निर्वाण है। इसलिये ऐसे (=गुणों से) युक्त भिक्खु इस परम-सत्य अधिष्ठान से युक्त होता है। भिक्खु! यही परम आर्य-सत्य है, जो कि यह अ-मोषधर्म निर्वाण है।

“पहिले अ-जान होते समय उसने ही उपधियाँ (=स्कंध, काय, क्लेश, कर्म) ग्रहण की=समादिन्न होती हैं; (अब) वह उसकी प्रभिन्न=उच्छिन्न-मूल, कटे शिर वाले ताड जैसी, अभव प्राप्त, भविष्यमें उत्पन्न होने के अयोग्य होती है। इसलिये ऐसे (गुणों से) युक्त भिक्खु इस परम त्याग-अधिष्ठान से संयुक्त होता है। भिक्खु! यही परम आर्य-त्याग है, जो कि सारी उपधियों का परित्याग।

“॰ अजान होते समय उसे अभिध्या (=लोम) छन्द, राग होता है; (अब) वह ॰ उच्छिन्न मूल ॰ होते है। ॰ अजान होते समय, उसे आघात व्यापाद संप्र-द्वेष होते हैं; ॰। ॰ अजान होते समय अविद्या, सम्मोह होता है; ॰ । इसलिये ऐसे (गुणों से) युक्त भिक्खु इस परम उपशम-अधिष्ठान से युक्त होता है। भिक्खु ! यही परम आर्य उपशम है, जो कि यह राग, द्वेष और मोह का उपशम (=शमन, शांत होना)।

“यह जो कहा—‘प्रज्ञा से प्रमाद न करे, सत्य की रक्षा कर, त्याग को बढावे, उपशम का ही अभ्यास करें’—वह इसीलिये कहा।

(5) “यह जो कहा—‘जहाँ स्थित (इसके) मान और उत्सव नहीं प्रवृत्त होते। मान और उत्सव के न प्रवृत्त होन पर—(वह) शान्त मुनि कहा जाता है’—सो किसलिये कहा? भिक्खु! ‘मैं हूँ’—यह मान (=मन्यता) है। ‘यह मैं हूँ’—यह मान है। ‘हूँगा’—यह मान है। ‘नहीं होऊँगा’—यह मान है। ‘अ-रूपी होऊँगा’—॰। ‘संज्ञी-होऊँगा’—॰। ‘अ-संज्ञी होऊँगा’—॰। ‘नैवसंज्ञी-नासंज्ञी होऊँगा’—॰। भिक्खु! मान (=मान्यता) रोग है, ॰ गंड (=फोडा) है, मान शल्य है। भिक्खु! सारे मानो का अतिक्रमण कर शान्त मुनि कहा जाता है। भिक्खु! शान्त मुनि जन्म-जरा-मरण को नहीं प्राप्त होता, न कुपित होता है, न स्पृहा करता है। वही उसके पास नहीं हैं, जिस जन्मता से न जन्मा क्या जरा को प्राप्त होगा? न जरा को प्राप्त क्या कोपेगा? न कुषित कुआ क्या स्पृहा करेगा। यह जो कहा—‘जहाँ स्थित ॰’—सो इसलिये कहा।

“भिक्खु! मेरे संक्षेप से कहे इन छः धातुओं को धारण कर।”

तब आयुष्मानृ पुक्कुसाति—‘अहों, शास्ता मुझे मिल गये, सुगत ॰’ सम्यक्-संबुद्ध मुझे मिल गये’—(सोच); आसन से उठ उत्तरासंग (=उपरने) को एक (बायें) कंधे पर कर, भगवान् के पैरों में शिर से पड़कर भगवान् से यह बोले—

“भन्ते! बाल=मूढ=अकुशल की तरह (मेरे) अपराध को क्षमा करें; जो कि मैंने भगवान् को ‘आवुस’ कह कर पुकारा। भन्ते! उस मेरे अपराध को, आगे संयम करने के लिये भगवान् बीते के तौर पर स्वीकार करें।”-

“भिक्खु! जो तूने बाल ॰ की तरह अपराध किया। जो कि तूने मुझे ‘आवुस’ कह कर पुकारा। चूँकि, भिक्खु! तू अत्यय (=अपराध) को अत्यय के तौर पर देखकर धर्मानुसार प्रतीकार करता है; (इसलिये) उसे हम स्वीकार करते है। भिक्खु! आर्य-विनय (=सत्पुरूषों की रीति) में यह बुद्धि (=लाभ) ही हैं, जो कि अपराध को अपराध के तौर पर देखकर धर्मानुसार प्रतीकार करता है, भविष्य में संवर (=संयम) रखता है।”

“मिले भन्ते! मुझे भगवान् के पास से उपसंपदा।”

“भिक्खु! क्या तेरे पास पात्र-चीवर पूरे है?”

“भन्ते! मेरे पास पात्र-चीवर पूरे नहीं है।”

“भिक्खु! तथागत अ-परिपुर्ण पात्र-चीवर वाले को उपसंपादित (=भिक्खु की दीक्षा से दीक्षित) नहीं करते।”

तब आयुष्मान् पुक्कुसाति भगवान् के भाषण को अभिनंदित=अनुमोदित कर, आसन से उठ कर, भगवान् को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर, पात्र-चीवर की खोज में चल पडे। तब पात्र-चीवर की खोज में फिरते आयुष्मान् पुक्कुसाति को एक पागल गाय ने मार डाला। तब बहुत से भिक्खु जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे उन भिक्खुओं ने भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! जो वह पुक्कुसाति नामक कुल-पुत्र; जिसे कि भगवान् ने संक्षेप से उपदेश किया; वह काल कर गया। उसकी क्या गति होगी=क्या अभिसंपराय (=परलोक) होगी?”

“भिक्खुओ! पुक्कुसाति कुलपुत्र पण्डित, सत्यवादी धर्मानुसार (चलनेवाला) या, उसने मुझे धर्म से कोई पीड़ा नहीं दी। भिक्खुओ! पुक्कुसाति कुलपुत्र पाँचों अधर-भागीय-संयोजनो के क्षय से औपपातिक (=अयोनिज देव) हो वहाँ (देवलोक में) निर्वाण पाने वाला हैं, उस लोक से न लौटने वाला है।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्खुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

关于本译本

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

愿一切众生安乐