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МН 111

Anupada sutta: अनुपद् सुत्तन्त

Anupadasutta

Anupadavagga

Пераклады

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथ-पिंडी के आराम जेतवन में विहार करते थे।

वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया — “भिक्षुओ!”

“भदन्त !”-(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।भगवान ने यह कहा- भिक्षुओं ! सारिपुत्त पंडित है, महाप्रज्ञ, नाना-प्रज्ञ, भास्वर-प्रज्ञ,यवन (क्षिप्रगति)-प्रज्ञ निष्क (शु़द्ध) प्रज्ञ निर्वेधिक (तह तक पहूँचने की)प्रज्ञ है। भिक्षुओं ! सारिपुत्त आध मास तक अनुपद धम्म-विसेस (अनुपद-धर्म-विशेष) की विपश्यना को विपश्यन (दिल की आँख से देखना) करता है।

“भिक्षुओं ! सारिपुत्त की यह अनुपद-धर्म-विशेष की विपश्यना है- भिक्षुओं ! सारिपुत्त कामों से विरहित , प्रथम ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। प्रथम ध्यान में जो धर्म है (जैसे) वितर्क विचार प्रीति (हर्ष का सारे शरीर और चित्त पर प्रमाद) सुख चित्त की एकाग्रता स्पर्श (इन्द्रिय-विषय का संपर्क) वेदना (स्पर्श के बाद विषय के संबंध का जो सुख, दुख आदि रूप में अनुभव ) संज्ञा (संजानना, समझना) चेतना (चिन्तन) चित्त (मन) छन्द (राग), अधिमोक्ष (झुकाव), वीर्य (उद्योग) स्मृति उपेक्षा, अनधिकार (मन में करना) वह धर्म इसके व्यवस्थित होते हैं, वह धर्म इसको विदित हो उत्पन्न होते हैं, विदित हो स्थित होते हैं, विहित ही अस्त होते हैं। वह ऐसा जानता है- इस प्रकार पहिले न हुये धर्म उत्पन्न होते हैं। वह ऐसा जानता है। इस प्रकार पहिले न हुये धर्म उत्पन्न होते हैं होकर प्रवेदित (अनुभवगम्य) होते हैं। वह उन धर्मों में अन् उपाय अन-आसक्त-अप्रतिबद्ध-विप्रमुक्त-विसंयुक्त अबद्ध चित्त से विहरताहै। वह जानता है।- इससे आगे भी निस्सरण (न निकलने का मार्ग) है, उसके अभ्यास बढाने से यह उसको (निश्रय) होता है।

“और फिर भिक्षुओं ! सारिपुत्त, वितर्क और विचार के शांत होने पर द्वितीय ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। द्वितीय ध्यान में जो धर्म है, जैसे आध्यात्मिक संप्रसाद (विषयों में चित्त का अलेप होता है) प्रीति, सुख, मनसिकार वह धर्म उसके व्यवस्थित होते हैं।

प्रीति से विरक्त हो तृतीय ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। तृतीय ध्यान में जो धर्म है, (जैसे) उपेक्षा, सुख, स्मृति, संप्रजन्य, चित्त एकाग्रता, मनसिकार, वह धर्म उसके व्यवस्थित होते हैं।

“सुख और दुख के परित्याग से चतुर्थ ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। चतुर्थ ध्यान में जो धर्म है, (जैसे) उपेक्षा, अदुःख-असुखा वेदना पश्यीवेदना-संज्ञा, चेतना, चित्त, छन्द, अधिमोक्ष, वीर्य, स्मृति,उपेक्षा,मनसिका- यह धर्म उसके व्यवस्थित होते हैं।

“रूप — संज्ञा को सर्वथा छोडने से प्रतिहिंसा की संज्ञा (ख्यालो) के सर्वथा अस्त हो जाने से नानापन की संज्ञा को मनमें न करने से आकाश अनन्त है। इस आकाश आनन्त्य आयतन को प्राप्त हो विहरता हूँ। आकाशानन्त्यायतन में जो धर्म है, (जैसे) आकाशान्न्त्यायतनकी संज्ञा , चित्तैकाग्रता, स्पर्श, मनसिका- यह धर्म उसके व्यवस्थित होते है।

“आकाशानन्त्यतनको सर्वथा अतिक्रमण कर विज्ञान अनन्त है- इस विज्ञान —आनन्त्य-आयतन को प्राप्त हो विहरता है। विज्ञानानत्यायतन में जो धर्म है, जैसे विज्ञानान्त्ययतन-संज्ञा, चित्तैकाग्रता, स्पर्श, मनसिकार — यह धर्म उसके व्यवस्थित होते हैं।

“विज्ञानानन्त्यायतन को सर्वथा अतिक्रमण कर — कुछ नहीं (=‘नहीं किंचित्’) — इस आकिंचन्य (=न कुछ भी पना) आयतन को प्राप्त हो विहरता है। आकियन्यायतन में जो धर्म है, (जैसे) आकिचन्यायतन-संज्ञा, चित्तेकाग्र्रता, स्पर्श ॰ मनसिकार — यह धर्म उसके व्यवस्थित होत है ॰।

“आकिचन्यायतन को सर्वथा अतिक्रमण कर नैवसंज्ञा-नासंज्ञा-आयतन को प्राप्त हो विहरता है। वह उस समापति (समाधि) से स्मृति (होश) के साथ उठता है। उठकर जो धर्म व्यतीत-निरूद्ध विपरिणत हो गये हैं उन धर्मों को देखता है। इस प्रकार से मुझे यह धर्म (चित्त प्रवाह का) एक रूप) पहले न हुये धर्म उत्पन्न होते हैं, होकर प्रतिवेदित होते हैं।

“और फिर भिक्षुओं सहित सारिपुत्त नैवसंज्ञानासंज्ञायतन को सर्वथा अतिक्रमण कर संज्ञावेदित निरोध (जिस समाधि में संज्ञा और वेदना का अभाव होता है।) ॰ प्रज्ञा से देखकर उसके आस्रव (=चित्तमल) क्षीण होते है। वह उस समापत्ति से स्मृति के साथ उठता है, ॰ उठ कर जो धर्म व्यतीत=निरूद्ध=विपरिणत हो गयें, उन धर्मो को देखता है—‘इस प्रकार मुझे यह धर्म पहिले न हुये उत्पन्न होते है, होकर प्रतिवेदित (=अनुभव-गम्य) होते है ॰ वह जानता है—(इससे) आगे निस्सरण नहीं है, और उसके (अभ्यास को) बढाने से ‘नहीं है’—यह उसको (निश्चय) होता है।

“भिक्षुओं! जिसकेा ठीक से कहते हुये कहना होता है—‘आर्य-शील में वशित्व-प्राप्त (=अधिकार-प्राप्त) हें, पारभि-प्राप्त (=पारंगत) है। आर्य-समाधि में ॰, आर्य-प्रज्ञा में, आर्य-विमुक्ति में वशित्व प्राप्त, पारभि प्राप्त है; तो ठीक कहते हुये, उसे सारिपुत्त के लिये ही कहना होगा—आर्य-शील में वशित्व-प्राप्त ॰।

“भिक्षुओं! जिसको ठीक से कहते हुये कहना होता है—(यह) मुख से उत्पन्न्, धर्म से उत्पन्न, धर्म-निर्मित, धर्म-दायाद (=धर्म का वारिस), न-आमिष-दायाद (=धन का दायद नहीं) भगवान् का औरस (=ह्रदय या मन से उत्पन्न) पुत्र है; तो ठीक से कहते हुये सारिपुत्त के लिये ही कहना होगा—मुख से उत्पन्न ॰।

“भिक्षुओं! तथागत के चलाये (=प्रवर्तित) अनुत्तर (=अद्वितीय=अनुपम) धर्मचक्र (=धर्म के चक्का=धर्म) को सारिपुत्त ठीक से अनु-प्रवर्तित कर रहा है।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

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