МН 114
Sevitabbāsevitabba sutta: सेवितब्ब-नसेवितब्ब-सुत्तन्त
Sevitabbāsevitabbasutta
Anupadavagga
Пераклады
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथ-पिंडिक के आराम जेवतन में विहार करते थे।
वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओ!”
“भदन्त!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् यह कहा—“भिक्षुओं! तुम्हें सेवितब्ब-असेवितब्ब (=सेवन-योग्य, न सेवन योग्य) धर्म-पर्याय (=धर्मोपदेश) उपदेशता हूँ; उसे सुनो, अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।”
“अच्छा, भन्ते!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—”(1) भिक्षुओ! मैं काय-समाचार (=कायिक कर्म) को दो प्रकार का कहता हूँ, सेवनीय, अ-सेवनीय; वह काय-समाचार अन्योन्य हैं। (2) ॰ वाक्-समाचार (=वाचिक कर्म) ॰। (3) भिक्षुओं! मैं मनः समाचार (=मानसिक कर्म) को दो प्रकार का कहता हूँ—सेवनीय, असेवनीय। वह मन-समाचार अन्योन्य है। (4) भिक्षुओं! मैं चित्त-उत्पाद (=चित्त या विचारों की उत्पत्ति) को दो प्रकार का कहता हूँ—सेवनीय, अ-सेवनीय। वह चित्त-उत्पाद अन्योन्य है। (5) ॰ संज्ञा-लाभ को ॰। (6) दृष्टि-लाभ को ॰। (7) ॰ आत्मभाव (=शरीर) लाभ को ॰।”
ऐसा कहने पर आयुष्मान् सारिपुत्त ने भगवान् से यह कहा—“भन्ते! भगवान् के इस संक्षिप्, विस्तार से अ-विभाजित भाषण का मैं इस प्रकार विस्तार से अर्थ जानता हूँ ॰।”—(1) ‘भिक्षुओं! मै। काय समाचार को दो प्रकार का कहता हूँ ॰।’ यह जो भगवान् ने कहा, किस हेतु से कहा?—भन्ते! जिस प्रकार के कायिक कर्म के सेवन करने से बुराइयाँ (=अकुशल धर्म) बढती हैं, भलाइयाँ (=कुशल धर्म) क्षीण होती है; इस प्रकार का कायिक कर्म अ-सेवनीय है। और भन्ते! जिस प्रकार के कायिक कर्म के सेवन करने से बुराइयाँ क्षीण होती हैं, भलाइयाँ बढती है; इस प्रकार का कायिक कर्म सेवनीय है। भन्ते! किस प्रकार के कायिक कर्म के सेवन करने से बुराइयाँ बढती हैं ॰?—यहाँ, भन्ते! (1) कोई (पुरूष) हिंसक, क्रूर, लोहितपाणि (=खून से रँगे हाथ वाला), मारकाट में रत, सारे प्राणियों के प्रति निर्दयी होता है। (2) अदिन्नादायी (=चोर) ॰। (3) कामों मे व्यभिचारी ॰ अन्त में माला मात्र भी जिन पर डाल दी गई है। भन्ते! इस प्रकार के कायिक कर्म के सेवन करने से बुराइयाँ बढती है, भलाइयाँ क्षीण होती है। भन्ते किस प्रकार के कायिक कर्म के सेवन करने से बुराइयाँ क्षीण होती हैं ॰?—यहाँ भन्ते! (1)
कोई (पुरूष) प्राणातिपात (=हिंसा) छोड प्राणातिपात से विरत होता है ॰। (2) ॰ अदिन्नादान (=चोरी) से विरत होता है ॰। (3) ॰ काम-मिथ्याचार से विरत होता है ॰। भन्ते! इस प्रकार के कायिक कर्म के सेवन करने से बुराइयाँ क्षीण होती है ॰। ‘भिक्षुओ! मैं काय-समाचार दो प्रकार का कहता हूँ ॰’—यह जो भगवान् ने कहा; इसी हेतु से कहा।
(2) “भिक्षुओं! मैं वाक्-समाचार दो प्रकार का कहता हूँ’—यह जो भगवान् ने कहा, किस हेतु से कहा?—भन्ते! जिस प्रकार के वाचिक कर्म के सेवन करने से बुराइयाँ बढती हैं ॰ इस प्रकार का वाचिक कर्म अ-सेवनीय है। ॰ सेवन करने से भलाइयाँ बढती है, इस प्रकार का वाचिक कर्म सेवनीय है। ॰ किस प्रकार के वाचिक कर्म के सेवन करने से बुराइयाँ बढती है?—॰ (1) कोई (पुरूष) मिथ्यावदी होता है, सभा में ॰। (2) चुगुलखोर ॰। ॰ (3) ॰ कटुभाषी ॰। (4) ॰ प्रलापी ॰ निस्सार वाणी का बोलने वाला होता है। भन्ते! इस प्रकार ॰ भलाइयाँ क्षीण होती है। ॰ किस प्रकार के वाचिक कर्म से बुराइयाँ क्षीण होती हैं ॰?—॰ कोई (पुरूष) (1) ॰ मृषावाद से विरत होता है। सभा में ॰। (2) ॰ पिशुन-वचन (=चुगली) से विरत ॰। (3) ॰ परूषवचन से विरत ॰। (4) प्रलाप से विरत ॰ सारवाली वाणी का बोलने वाला होता है। इस प्रकार के वाचिक कर्म के सेवन से बुराइयाँ क्षीण होती है। ॰ भगवान् ने कहा, इसी हेतु से कहा।
(3) “भिक्षुओं! मैं मनःसमाचार दो प्रकार का कहता हूँ ॰’—यह जो भगवान् ने कहा, किस हेतु से कहा?—॰ जिस प्रकार के मानसिक कर्म के सेवन करने से बुराइयाँ बढती हैं, ॰ अ-सेवनीय है। ॰ सेवन करने से भलाइयाँ बढती हैं, ॰ सेवनीय ॰। ॰ किस प्रकार के मानसिक कर्म के सेवन करने से बुराइयाँ बढती है?—॰ कोई (पुरूष) (1) ॰ अभिध्यालु (=लोभी) होता हैं ॰। ॰ (2) ॰ व्यापन्न-चित्त (=द्वेषी) ॰। (3) मिथ्यादृष्टि ॰ ऐसे श्रमण-ब्राह्मण नहीं, ॰ जो ॰ स्वयं जान कर ॰ जतलायंेगे। भन्ते! इस प्रकार ॰ भलाइयाँ क्षीण होती है। ॰ किस प्रकार के मानसिक कर्म के सेवन करने से बुराइयाँ क्षीण होती है ॰?—कोई (पुरूष) (1) अभिध्या-रहित (=निर्लोभी) होता है ॰। (2) ॰ अध्यापन्न-चित्त ॰। (3) ॰ सम्यग्-दृष्टि ॰। ॰ इस प्रकार के मानसिक कर्म के सेवन करने से बुराइयाँ क्षीण होती है। ॰ भगवान् ने कहा, इसी हेतु से कहा।
(4) “भिक्षुओं? मैं चित्त-उत्पादकों को दो प्रकार का कहता हूँ ॰’—यह जो भगवान् ने कहा, किस हेतु से कहा?—॰ जिस प्रकार के चित्त-उत्पादक के सेवन से बुराइयाँ बढती हैं, ॰ अ-सेवनीय है। ॰ सेवन से भलाइयाँ बढती हैं, ॰ सेवनीय ॰। ॰ किस प्रकार के ॰ सेवन से बुराइयाँ बढती है ॰?—यहाँ भन्ते! (1) कोई (पुरूष) अभिध्यालु (=लोभी) होता है, (वह) अभिध्या (=लोभ) युक्त चित्त से विहरता है। (2) व्यापाद-युक्त चित्त ॰। ॰ (3) ॰ विहिंसा-युक्त चित्त से विहरता है। इस प्रकार के चित्त-उत्पाद के सेवन से बराइयाँ बढती है ॰। ॰ किस प्रकार के चित्त-उत्पाद के सेवन से बुराइयाँ क्षीण होती है ॰?—॰ कोई (पुरूष) (1) अन्-अभिध्यालु होता है ॰। (वह) अभिध्या-रहित चित्त् से विहरता है। (2) व्यापाद-रहित चित्त से ॰। (3) ॰ विहिंसा-रहित चित्त से ॰। ॰ इस प्रकार के चित्त-उत्पाद के सेवन से बुराइयाँ क्षीण होती है ॰। ॰ भगवान् ने कहा, इसी हेतु से कहा।
(5) “भिक्षुओ! मैं संज्ञा-लाभ को दो प्रकार का कहता हूँ ॰’—यह जो भगवान् ने कहा, किस हेतु से कहा?—॰। ॰। ॰ किस प्रकार के संज्ञा-लाभ से बुराइयाँ बढती हैं॰?—(1) ॰ कोई (पुरूष) अभिध्यालु होता है, (वह) अभिध्या (=लोभ) युक्त संज्ञा से विहरता है। (2) ॰ व्यापाद-युक्त संज्ञा से ॰। (3) ॰ विहिंसा-युक्त संज्ञा से ॰। इस प्रकार ॰ बुराइयाँ बढती है ॰। ॰ किस प्रकार के संज्ञा-लाभ से बुराइयाँ क्षीण होती हैं ॰?—(1) ॰ अभिध्या-रहित संज्ञा से विहरता है। (2) ॰ व्यापाद-रहित संज्ञा से ॰। (3) विहिंसा-रहित संज्ञा से ॰। ॰ इस प्रकार के संज्ञा-लाभ के सेवन से बुराइयाँ क्षीण होती हैं ॰। ॰ भगवान् ने कहा, इसी हेतु से कहा।
(6) “भिक्षुओ! मैं दृष्टि (=धारणा) लाभ को दो प्रकार का कहता हूँ ॰’—यह जो भगवान् ने कहा, किस हेतु से कहा?—॰। ॰। ॰ किस प्रकार के दृष्टि-लाभ से बुराइयाँ बढती है ॰?—॰ यहाँ कोई (पुरूष) इस दृष्टिवाला होता है—‘दान कुछ नहीं ॰ स्वयं जान कर ॰ जतलायेंगे। इस प्रकार के दृष्टि लाभ से बुराइयाँ बढती हैं ॰। ॰ किस प्रकार के दृष्टि लाभ से बुराइयाँ क्षीण होती हैं ॰?—यहाँ कोई (पुरूष) इस दृष्टिवाला होता है—‘यज्ञ है ॰ ऐसे श्रमण ब्राह्मण हैं, ॰ जतलायेंगे। इस प्रकार के दृष्टि-लाभ से बुराइयाँ क्षीण होती है ॰। ॰ भगवान् ने कहा, इसी हेतु से कहा।
(7) “भिक्षुओं! मैं आत्म-भाव (=शरीर) लाभ को दो प्रकार का कहता हूँ ॰’—यह जो भगवान् ने कहा, किस हेतु से कहा?—॰। ॰। ॰ किस प्रकार के आत्मभाव-लाभ से बुराइयाँ बढती है ॰?—व्यापाद (=द्वेष) युक्त आत्मभाव-लाभ के निर्माण करने से, पूर्णता प्राप्त करने के लिये बुराइयाँ बढती हैं, भलाइयाँ क्षीण होती हैं व्यापादरहित आत्मभाव-लाभ के निर्माण करने से, पूर्णता प्राप्त करने के लिये, बुराइयाँ क्षीण होती हैं, भलाइयाँ बढती हैं। ॰ भगवान् ने कहा, इसी हेतु से कहा।
“भन्ते! भगवान् के इस संक्षिप्त ॰ भाषण का मैं इस प्रकार विस्तार से अर्थ जानता हूँ।’-’
“साधु, साधु, सारिपुत्त! तुम, सारिपुत्त! मेरे इस संक्षिप्त भाषण का ठीक ही इस प्रकार विस्तार से अर्थ जानते हो।…
“सारिपुत्त! (1) मैं चक्षुर्विज्ञेय (=चक्षुद्वारा ज्ञेय) रूपों को दो प्रकार का कहता हूँ—सेवनीय, अ-सेवनीय। (2) श्रोत्रविज्ञेय शब्द को ॰। (3) घ्राण-विज्ञेय गंध को ॰। (4) जिह्वाविज्ञेय रस को ॰। (5) काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य को ॰। (6) मनो-विज्ञेय धर्म को ॰।”
ऐसा कहने पर आयुष्मान् सारिपुत्त ने भगवान् से यह कहा—“भन्ते! भगवान् के इस संक्षिप्त ॰ भाषण का मैं इस प्रकार विस्तार से अर्थ जानता हूँ—
(1) “सारिपुत्त! मैं चक्षुर्विज्ञेय रूपों को दो प्रकार का कहता हू॰द्द—‘सेवनीय, अ-सेवनीय’—यह जो भगवान् ने कहा, किस हेतु से कहा?—भन्ते! जिस प्रकार के चक्षुर्विज्ञेय रूपों के सेवन करने से बुराइयाँ बढती हैं, भलाइयाँ क्षीण होती हैं, इस प्रकार के चक्षुर्विज्ञेय रूप अ-सेवनीय है। और, भन्ते! जिस प्रकार के चक्षुर्विज्ञेय रूपों के सेवन करने से बुराइयाँ क्षीण होती हैं, भलाइयाँ बढती है, इस प्रकार के चक्षुर्विज्ञेय रूप सेवनीय है ॰। ॰ श्रोत्र-विज्ञेय शब्द .॰। ॰ घ्राण-विेज्ञय गंध ॰। ॰ जिह्वाविज्ञेय रस ॰। ॰ काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य ॰। ॰ मनोविज्ञेय धर्म ॰ इस प्रकार के मनोविज्ञेय धर्म सेवनीय है। ॰। भन्ते! भगवान् के इस संक्षिप्त भाषण का मैं इस प्रकार विस्तार से अर्थ जानता हूँ।”
“साधु, साधु, सारिपुत्त! तुम ॰ ठीक ही इस प्रकार विस्तार से अर्थ जानते हो।…
“सारिपुत्त! मैं चीवर को दो प्रकार का कहता हूँ—सेवितव्य, अ-सेवितव्य। ॰ पिंडपात (=भिक्षा) ॰। ॰ शयन-आसन ॰। ॰ ग्राम ॰। ॰ निगम ॰। ॰ नगर ॰। ॰ जनपद (=देश) ॰। ॰ पुद्गल (=व्यक्ति) ॰।”
ऐसा कहने पर आयुष्मान् सरिपुत्र ने भगवान् से यह कहा—”॰ मैं, इस प्रकार विस्ता से अर्थ जानता हूँ—‘सारिपुत्त! मैं चीवर को दो प्रकार का कहता हूँ—॰’—यह जो भगवान् ने कहा, किस हेतु से कहा?—भन्ते! जिस प्रकार के चीवर के सेवन करने से बुराइयाँ बढती है, भलाइयाँ क्षीण होती हैं; उस प्रकार का चीवर अ-सेवनीय है। जिस प्रकार के चीवर के सेवन करने से बुराइयाँ क्षीण होती हैं, भलाइयाँ बढती हैं, उस प्रकार चीवर सेवनीय है। ॰ पिंडपात ॰। ॰ शयन-आसन ॰। ॰ ग्राम ॰। ॰ निगम ॰। ॰ नगर ॰ इस प्रकार का नगर सेवनीय है। ॰। भन्ते! ॰ मैं इस प्रकार विस्तार से अर्थ जानता हूँ।”
“साधु, साधु, सारिपुत्त! तुम ॰ ठीक ही इस प्रकार विस्तार से अर्थ जानते हो।…
“सारिपुत्त! इस मेरे संक्षिप्त भाषण का इस प्रकार विस्तार से अर्थ यदि सारे क्षत्रिय जानें, तो यह सारे क्षत्रियेां को दीर्घकाल तक हित-सुख के लिये हो। ॰ सारे ब्राह्मण ॰। ॰ सारे वैश्य ॰। ॰ सारे शूद्र ॰। ॰ इस मेरे संक्षिप्त भाषण का इस प्रकार विस्तार से अर्थ यदि देव-मार (=प्रजापति) ब्रह्मा सहित सारा लोक, देव-मानुष-श्रमण-ब्राह्मणसहित प्रजा (=जनता) जाने, तो यह…(उसके) लिये दीर्घकाल तक हित-सुख के लिये हो।”
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् सारिपुत्त ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Няхай усе істоты будуць шчаслівыя