МН 82
Raṭṭhapāla sutta: रट्ठपाल-सुत्तन्त
Raṭṭhapālasutta
Rājavagga
Пераклады
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् कुरू (देश) में महाभिक्षु-संघ के साथ चारिका करते, जहाँ थुल्लकोट्ठित नामक कुरूओं का निगम (=कस्बा) था, वहाँ पहूँचे।
थुल्लकोट्ठित (=स्थूलकोष्ठित) वासी ब्राह्मण गृहपतियों ने सुना—शाक्यपुत्र ॰ श्रमण गौतम थुल्लकोट्ठित में प्राप्त हुये है ॰। ॰ इस प्रकारके अर्हतों का दर्शन अच्छा होता है। तब थुल्लकोट्ठित के ब्राह्मण-गृहपति जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। जाकर कोई कोई अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। ॰ कोई कोई चुपचाप एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे थुल्लकोट्ठित-वासी ब्राह्मण गृहपतियों को भगवान् ने धार्मिक कथा से संदर्शित, प्रेरित, समुत्तेजित, संप्रशंसित किया।
उस समय उसी थुल्लकोट्ठित के अग्र-कुलिक का पुत्र राष्ट्र-पाल उस परिषद् में बैठा था। तब राष्ट्र-पाल को ऐसा हुआ जैसे भगवान् धर्म उपदेशकर कर रहे हैं, यह अत्यन्त परिशुद्ध संखसा धुला ब्रह्मचर्य-पालन गृह में वास करते सुकर नहीं है। क्यों न मैं केश-श्मश्रु मुंडाकर, काषाय वस्त्र पहिनकर, घर से बेघर हो प्रब्रजित हो जाऊँ। तब थुल्लकोट्ठित-वासी ब्राह्मण-गृहपति भगवान् से धार्मिक कथा द्वारा ॰ समुत्तेजित, सप्रशंसित हो, भगवान् के भाषण को अभिनंदन, अनुमोदन कर, आसन से उठ, भगवान् को अभिवादनर, प्रदक्षिणाकर, चले गये। तब राष्ट्र-पाल कुलपुत्र ॰ ब्राह्मणों के चले-जाने के थोडी ही देर बाद जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया, जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे राष्ट्रपाल कुल-पुत्र ने भगवान् से कहा—
“भन्ते! जैसे जैसे मैं भगवान् के उपदेश किये धर्म को समझता हूँ, यह ॰ शंख-लिखित ब्रह्मचर्य-पालन में गृह मे वास करते सुकर नहीं है। भन्ते! मैं भगवान् के पास प्रब्रज्या पाऊँ, उपसंपदा पाऊँ।”
“राष्ट्र-पाल! क्या तूने मातापिता से घर से बेघर हो प्रब्रज्या के लिये आज्ञा पाई है?”
“भन्ते! ॰ आज्ञा नहीं पाई।”
“राष्ट्रपाल! माता-पिता से बिना आज्ञा जाये को तथागत प्रब्रजित नहीं करते।”
“भन्ते! सो मैं वैसा करूँगा, जिसमें माता-पिता मुझे ॰ प्रब्रज्या के लिये आज्ञा दें।”
“तब राष्ट्रपाल कुल-पुत्र आसन से उठक्रा, भगवान् को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर जहाँ माता-पिता थें, वहाँ गया। जाकर माता-पिता से कहा—
“अम्मा! तात! जैसे जैसे मैं भगवान् के उपदेश किये धर्म को समझता हूँ, यह ॰ शंखलिखित (=छिले शंख की तरह निर्मल श्वेत) ब्रह्मचर्य-पालन, गृह मैं वास करते सुकर नहीं है। मैं ॰ प्रब्रजित होना चाहता हूँ। घर से बेघर हो प्रब्रजित होने के लिये मुझे आज्ञा दो।”
ऐसा कहने पर राष्ट्रपाल कुल-पुत्र के माता-पिता ने राष्ट्र-पाल ॰ से कहा—
“तात राष्ट्रपाल! तुम हमारे प्रिय=मनाप, सुख में बढे, सुख में पले एक पुत्र हो। तात राष्ट्रपाल! तुम दुःख कुछ भी नहीं जानते। आओ तात राष्ट्रपला! खाओ, पियो, विचरों। खाते-पीते-विचरते, कामों का पिरभोग करते, पुण्य करते, रमण करों। हम तुम्हे ॰ प्रब्रज्या के लिये आज्ञा न देंगे। मरने पर भी हम तुमसे बे-चाह नह होंगे, तो फिर कैसे हम तुम्हे जीते जी ॰ प्रब्रजित होने की आज्ञा देंगे।”
दूसरी बार भी ॰। तीसरी बार भी ॰।
तब राष्ट्रपाल कुलपुत्र माता-पिता के पास प्रब्रज्या (की आज्ञा)को न पा, वहीं नंगी धरती पर पड गया।—‘यहीं मेरा मरण होगा, या प्रब्रज्या’। तब ॰ माता-पिता ने राष्ट्रपाल ॰ से कहा—
“तात राष्ट्रपला! तुम हमारे प्रिय ॰ एक पुत्र हों ॰।”
ऐसा कहने पर राष्ट्रपाल कुल-पुत्र चुप रहा।
॰ दूसरी बार भी ॰। ॰। ॰ तीसरी बार भी राष्ट्र-पाल कुल-पुत्र चुप रहा।
तब राष्ट्रपाल ॰ के माता-पिता जहाँ राष्ट्रपाल कुल-पुत्र के मित्र थे, वहाँ गये। जाकर…कहा—
“तातों! यह राष्ट्रपाल कुल-पुत्र नंगी धरती पर पडा हैं—‘यही मरण होगा या प्रब्रज्या’। आओ तातो! जहाँ राष्ट्रपाल है, वहाँ जाओ। जाकर राष्ट्रपाल ॰ को कहो—सौम्य राष्ट्रपाल! तुम माता-पिता के प्रिय ॰ एक पुत्र हों ॰।”
तब राष्ट्रपाल ॰ के मित्र राष्ट्रपाल ॰ के माता-पिता (की बात) को सुनकर, जहाँ राष्ट्रपाल ॰ था, वहाँ गये; जाकर ॰ कहा—
“सौम्य राष्ट्रपाल! तुम माता-पिता के प्रिय ॰ एक पुत्र हो ॰।”
ऐसा कहने पर राष्ट्रपाल ॰ चुप रहा। दूसरी बार भी ॰। तीसरी बार भी ॰। ॰।
तब राष्ट्रपाल ॰ के मित्रों (=सहायक) ने ॰ राष्ट्रपाल ॰ के माता-पिता से कहा—
“अम्मा! तात! यह राष्ट्रपाल ॰ वहीं नंगी धरती पर पडा है—‘यही मेरा मरण होगा, या प्रब्रज्या।’ यदि तुम राष्ट्रपाल ॰ को ॰ अनुज्ञा न दोगो, तो वहीं उसका मरण होगा, यदि तुम ॰ आज्ञा दोगे, प्रब्रजित हुये भी उसे देखोगे; यदि राष्ट्रपाल ॰ प्रब्रज्या में मन न लगा सका, तो, उसकी और दूसरी क्या गति होगी? यहीं लौट आयेगा। (अतः) राष्ट्रपाल ॰ को प्रब्रज्या की अनुज्ञा दो।”
“तातो! हम राष्ट्रपाल ॰ की ॰ प्रब्रजया अनुज्ञा (=स्वीकृति) देते हैं; लेकिन प्रब्रजित हो, माता-पिता को दर्शन देना होगा।”
तब राष्ट्रपाल कुल-पुत्र के सहायक ॰, जाकर राष्ट्रपाल ॰ से बोले—
“सौम्य राष्ट्रपाल! तू माता-पिता का प्रिय ॰ एक पुत्र है ॰। माता-पिता से ॰ प्रब्रज्या के लिये तू अनुज्ञात है। लेकिन प्रब्रजित हो माता-पिता को दर्शन देना होगा।”
तब राष्ट्रपाल ॰ उठकर, बल ग्रहणकर जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर ॰ एक और बैठे हुये ॰ भगवान् से कहा—
“भन्ते! मैं माता-पिता से ॰ प्रब्रज्या के लिये अनुज्ञात हूँ। मुझे भगवान् प्रब्र्रजित करें।”
राष्ट्रपाल ॰ ने भगवान् के पास प्रब्रज्या और उपसम्पदा प्राप्त की। तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल के उपसंपन्न (=भिक्खु होना) होने के थोड़े ही दिन के बाद, आधा मास उपसंपन्न होने पर, भगवान् स्थूलकोष्ठित में यथेच्छ विहार कर जिघर सावत्थि (श्रावस्ती) थी, उधर चारिका के लिये चल पड़े। क्रमशः चारिका करते जहां सावत्थि थी, वहाँ पहुँचे। वहां भगवान् सावत्थि में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार करते थे। तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल आत्म-संयमी हो विहरते जल्दी ही, जिस के लिए घर से बेघर हो प्रव्रजित होते हैं, उस सर्वोत्त्म को इसी जन्म में स्वयं अभिज्ञान कर, साक्षात्कार कर, प्राप्त कर विहरने लगे। ‘जाति (=जन्म) क्षीण हो गई, ब्रह्मचर्य-पालन हो चुका, करना था सो कर लिया, और यहां करने को नहीं है’ जान लिया | आयुष्मान् राष्ट्रपाल अर्हतों में एक हुए।
तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल जहां भगवान् थे, जाकर, भगवान् को अभिवादन कर एक और बैठे भगवान से बोले —
“भंते! यदि भगवान अनुज्ञा दें, तो मैं माता-पिता को दर्शन देना चाहता हूं|”
तब भगवान ने मन से राष्ट्रपाल के मन के विचार को जाना। जब भगवान ने जान लिया, राष्ट्रपाल कुल-पुत्र (भिक्खु) शिक्षा को छोड़, गृहस्थ बनने के अयोग्य है, तब भगवान ने आयुष्मान् राष्ट्रपाल से कहा —
“राष्ट्रपाल! जिसका इस वक्त समय समझ, (वैसा कर)।”
तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल आसन से उठकर भगवान को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर, शयनासन संभाल(= जिम्में लगा), पात्र-चीवर ले, जिधर स्थूलकोष्ठित था, उधर तारिका के लिए चल पड़े। क्रमशः चारिका करते जहां स्थूलकोष्ठित था वहां पहुंचे। वहां आयुष्मान् राष्ट्रपाल स्थूलकोष्ठित में राजा कौरव्य के मिगाचीर(नामक उद्यान) मैं विहार करते थे।
तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल पूर्वाह्न-समय पहन कर, पात्र-चीवर ले, स्थूलकोष्ठित, में पिंड के लिए प्रविष्ट हुए। स्थूलकोष्ठित में बिना ठहरे पिंडचार करते, जहां अपने पिता का घर था, वहां पहुंचे। उस समय आयुष्मान् राष्ट्रपाल का पिता बिचली द्वार शाला में बाल बनवा रहा था। पिता ने दूर से ही आयुष्मान् राष्ट्रपाल को आते देखा। देखकर कहा — ‘इन मुंड को श्रमणकों ने मेरे प्रिय=मनाप इकलौते पुत्र को प्रवृजित कर लिया।’ तब आयुष्मान राष्ट्रपाल ने अपने पिता के घर में न दान पाया, न प्रत्याख्यान(=इनकार), बलकी फटकार ही पाई। उस समय आयुष्मान् राष्ट्रपाल को ज्ञाति-दासी कुल्माष(= दाल) फेंकना चाहती थी। तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल ने उस ज्ञाति-दासी(=जाति वालों की दासी) से कहा —
“भगिनी! यदि बासी कुल्माष को फेंकना चाहती है, तो यहां मेरे पात्र में डाल दे।”
तब ज्ञातिदासी ने उस बासी दाल को आयुष्मान् राष्ट्रपाल के पात्र में डालते समय, हाथों, पैरों, और स्वर को पहचान लिया। तब ज्ञाति-दासी जहां आयुष्मान राष्ट्रपाल की माता थी, वहां गई; जाकर आयुष्मान् राष्ट्रपाल की माता से बोली—
“अरे! अय्या!! जानती हो, पुत्र राष्ट्रपाल आए हैं?”
“जो! यदि सच बोलती है, तो अ-दासी होगी।”
तब आयुष्मान राष्ट्रपाल की माता जहां आयुष्मान राष्ट्रपाल का पिता था, वहां जाकर बोली —
“अरे! गृहपति!! जानते हो, राष्ट्रपाल कुलपुत्र आया है?”
उस समय आयुष्मान् राष्ट्रपाल उस बासी कुल्माष को किसी भीत के सहारे (बैठकर) खा रहे थे। आयुष्मान् राष्ट्रपाल का पिता जहाँ आयुष्मान् राष्ट्रपाल थे, वहाँ गया, जाकर आयुष्मान् राष्ट्रपाल से बोला—
“तात राष्ट्रपाल! बासी दाल खाते हो। तो तात राष्ट्रपाल! घर चलना चाहिये।”
“गृहपति! घर छोड बेघर हुये हम प्रब्रजितो का घर कहाँ? गृहपति! हम बेघर के हैं। तुम्हारे घर गया था, वहाँ न दान पाया, न प्रत्याख्यान, बल्कि फटकार ही पाई।”
“आओ, तात राष्ट्रपाल! घर चलें ।”
“बस गृहपति! आज मैं भोजन कर चुका।”
“तो तात राष्ट्रपाल! कल का भोजन स्वीकार करो।”
आयुष्मान् राष्ट्रपाल ने मौन से स्वीकार किया।
तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल का पिता, आयुष्मान राष्ट्रपाल की स्वीकृति को जानकर, जहाँ अपना घर था, वहाँ…जाकर, हिरण्य (=अशर्फी), सुवर्ण की बड़ी राशि करवा, चटाई से ढँकवाकर, आयुष्मान् राष्ट्रपाल की स्त्रियों को आमंत्रित किया—
“आओ बहुओ! जिस अलंकार से अलंकृत हो पहिले राष्ट्रपाल कुल-पुत्र को तुम प्रिय=मनाप होती थी, उन अलंकारों से अलंकृत होओ” तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल के पिता ने उस रात के बीत जाने पर, अपने घर में उत्तम खाद्य भोज्य तैयार कर, आयुष्मान् राष्ट्रपाल को काल सूचित किया—‘काल है तात राष्ट्रपाल! भोजन तैयार है’। तब आयुष्मान् राष्ट्रपला पूर्वाह्न समय पहिन कर, पात्र चीवर ले जहाँ उनके पिता का घर था, वहाँ गये। जाकर बिछे आसन पर बैठे। तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल का पिता हिरण्य, सुवर्ण की राशि को खोल कर आयुष्मान् राष्ट्रपाल से बोला—
“तात राष्ट्रपाल! यह तेरी माता का (=मातृक) धन है, पिता का, पितामह का अलग है। तात राष्ट्रपाल! भोग भी भोग सकते हो, पूण्य भी कर सकते हो। आओ तुम तात राष्ट्रपाल! (भिक्खु-) शिक्षा (=दीक्षा) को छोड़ गृहस्थ बन, भोगों को भोगो, और पुण्यों को करो।”
“यदि गृहपति! तू मेरी बात करे, तो इस हिरण्य, सुवर्ण-पुज को गाड़ियों पर रखवा, ढुलवाकर गंगा नदी की बीच धार में डाल दे। सो किसलिये? गृहपति! इसके कारण तुझे शोक=परिदेव, दुख=दौर्मनस्य=उपायास न उत्पन्न होंगें।”
तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल की प्रत्येक भार्यायें पैर पकड़ आयुष्मान् राष्ट्रपाल से बोलीं—
“आर्यपुत्र! कैसी वह अप्सरायें हैं, जिनके लिये तुम ब्रह्मचय्र्य पालन कर रहे हो?”
“बहिनों! हम अप्सराओं के लिये ब्रह्मचर्य नहीं पालन कर रहे है।”
भगिनी (=बहिन) कहकर हमें आर्य-पुत्र राष्ट्रपाल पुकारते हैं (सोच), वह वहीं मूर्छित हो गिर पडीं। तब आयुष्मान् राष्ट्र-पाल ने पिता से कहा—
“गृहपति! यदि भोजन देना है, तो दे। हमें कष्ट मत दे।”
“भोजन करो तात राष्ट्रपाल! भोजन तैयार है।”
तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल के पिता ने उत्तम खाद्य भोजन से अपने हाथ आयुष्मान् राष्ट्रपाल को सतर्पित-संप्रवारित किया। तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल ने भोजनकर, पात्र से हाथ हटा, खड़े खड़े यह गाथायें कहीं—
“देखो (इस) विचित्र वने बिंव (=आकार) को, (जो) व्रणपूर्ण, सज्जित।
आतर, बहु-संकल्प (है); जिसकी स्थिति स्थिर (=ध्रुव) नहीं है।
देखो विचित्र वने रूप को, (जो) मणि और कुंडल क साथ।
हड्डी चमडे से बँधा, वस्त्र के साथ शोभता है।
महावर लगे पैर, चूर्णक (=पौडर) पोता मूँह।
बालक (=मूर्ख) को मोहने में समर्थ है, पार-गवेषी को नहीं।
बल पडे केश, अंजन-अंजित नेत्र।
बालक को मोहने में समर्थ हैं, पारगवेषी को नहीं।
नई विचित्र अंजन-नाली की भाँति अलंकृत (यह) सडा शरीर।
बालक को ॰।
व्याधान ने जाल फैलाया, (किन्तु) मृग जाल में नहीं आया।
चारा को खाकर व्याधों के रोते (छोड) जा रहा हूँ।”
तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल खडे खडे इन गाथाओं को कहकर, जहाँ कौरव्य का मिगाचीर (उद्यान) था, वहाँ गये। जाकर एक वृक्ष के नीचे दिन के विहार के लिये बैठे।
तब राजा कौरव्य भिगव (नामक माली) को संबोधित किया—
“सौम्य मिगव (=मृगयु)! मिगाचीर को साफ करों, उद्यान-भूमि=सुभूमि देखने के लिये जाऊँगा।”
मिगव ने राजा कौरव्य को “अच्छा देव!” कह कर, मिगाचीर को साफ करते, एक वृक्ष के नीचे दिन के विहार के लिये बैठे आयुष्मान् राष्ट्रपाल को देखा। देखकर जहाँ राजा कौरव्य था, वहाँ गया; जाकर कौरव्य से बोला—
“देव! मिगाचीर साफ है, और वहाँ इसी थुल्लकोट्ठित् क अग्रकुलिक का राष्ट्रपाल नामक कुल-पुत्र, जिसकी कि आप हमेशा तारीफ करते रहते हैं, एक वृक्ष के नीचे दिन के विहार के लिये बैठा है।”
“तो सौमय मिगव! आज अब उद्यान-भूमि जाने दो, आज उन्हीं आप राष्ट्रपाल की उपासना (=सत्संग) करेंगे।”
तब राजा कौरव्य, जो कुछ खाद्य भोज्य तय्यार था, सबको ‘छोड दो!’ कह, अच्छे अच्छे यान जुतवा, (एक) अच्छे यान पर चढ, अच्छे अच्छे यानों के साथ बडे राजसी ठाट से आयुष्मान् राष्ट्रपाल के दर्शन के लिये, थुल्लकोट्ठित से निकला। जितनी यान की भूमि थी, उतना यान से जा, (फिर) यान से उतर पैदल ही छोटी मंडली के साथ जहाँ आयुष्मान् राष्ट्रपाल थे, वहाँ गया, जाकर आयुष्मान् राष्ट्रपाल के साथ…संमोदन किया…(और) एक ओर खडा हो गयां एक ओर खडे हुये राजा कौरव्य ने आयुष्मान् राष्ट्रपाल से कहा—
“आप राष्ट्रपाल यहाँ गलीचे (=हत्थत्थर) पर बैठें।”
“नहीं महाराज! तुम बैठो, मैं अपने आसन पर बैठा हूँ।”
राजा कौरव्य बिछे आसन पर बैठ गया। बैठकर राजा कौरव्य ने आयुष्मान् राष्ट्रपाल से कहा—“हे राष्ट्रपाल! यह चार हानियाँ (=पारिजुंञ) हैं, जिन हानियों से युक्त कोई कोई पुरूष केश-श्मश्रु मुँडवा, काषाय वस्त्र पहिन, घर से बेघर हो प्रब्रजित होते हैं। कौन से चार? जरा-हानि, व्याधि-हानि, भोग-हानि, ज्ञाति-हानि। कौन है हे राष्ट्रपाल! जराहानि? (1) हे राष्ट्रपाल! कोई (पुरूष) जीर्ण=वृद्ध=महल्लक=अंगगत=वयःप्राप्त होता है। वह ऐसा सोचता है, मैं इस समय जीर्ण=वृद्ध ॰ हूँ, अब मेरे लिये अप्राप्त भोगों का प्राप्त करना या प्राप्त भोगों को भोगना सुकर नहीं है। क्यों न मै केश-श्मश्रु मुँडाकर काषाय वस्त्र पहिन ॰ प्रब्रजित हो जाऊँ। वह उस जरा-हानि से युक्त हो ॰ प्रब्रजित होता है। हे राष्ट्रपाल! यह जराहानि कही जाती है। लेकिन आप राष्ट्रपाल! तरूण, बहुत काल केशों वाले, सुन्दर यौवन से युक्त, प्रथम वयस के हैं। सो आप राष्ट्रपाल को जरा-हानि नहीं है। आप राष्ट्रपाल क्या जानकर, देखकर, सुनकर, घर से बेघर हो प्रब्रजित हुये? (2) हे राष्ट्रपाल! व्याधि-हानि क्या है? हे राष्ट्रपाल! कोई (पुरूष) रोगी, दुःखी, सख्त बीमार होता है, वह ऐसा सोचता है—‘मैं अब रोगी, दुःखी, सख्त बीमार हूँ, अब मेरे लिये अप्राप्त भोगों का प्राप्त ॰। यह व्याधिहानि कही जाती ळै। लेकिन आप राष्ट्रपाल इस समय, व्याधि-रहित, आतंक-रहित, न-अति-शीत, न-अति-उष्ण, सम-विपाकवाली पाचनशकित (=ग्रहणी) से युक्त हैं, सो आप राष्ट्रपाल को व्याधि-हानि नहीं है ॰? (3) हे राष्ट्रपाल! भोग-हानि क्या है? हे राष्ट्रपाल! कोई (पुरूष) आढ्य, महाधनी, महाभोग-वान् होता है, उसके वह भोग क्रमशः क्षय हो जाते है। वह ऐसा सोचता है—मैं पहिले आढ्य ॰ था, सो मेरे वह भोग क्रमशः क्षय हो गये; अब मेरे लिये अ-प्राप्त भोगों का प्राप्त करना ॰। आप राष्ट्रपाल तो इसी थुल्लुकोट्ठित में अग्रकुलिक के पुत्र है। सो आप राष्ट्रपाल को भोग-हानि नहीं है ॰? (4) हे राष्ट्रपाल! ज्ञाति-हानि क्या है? हे राष्ट्रपाल! किसी (पुरूष) के बहुत से मित्र, अमात्य, ज्ञाति (=जाति), सालोहित (=रक्तसंबंधी) होते हैं, उसके वह जाति वाले क्रमशः क्षय को प्राप्त होते हैं। वह ऐसा सोचता है—पहिले मेरे बहुत से मित्र-अमात्य, जाति-बिरादरी थी, वह मेरी जाति वाले क्रमशः क्षय हो गये; अब मेरे लिये अप्राप्त भोगों का प्राप्त करना ॰। लेकिन आप राष्ट्रपाल के तो इसी थुल्लुकोट्ठित में बहुत से मित्र-अमात्य, जाति-बिरादरी है। सो आप राष्ट्रपाल को ज्ञाति-हानि नहीं है। आप राष्ट्रपाल क्या जानकर, देखकर, सुनकर घर से बेघर हो प्रबजित हुये? हे राष्ट्रपाल! यह चार हानियाँ हैं, जिन हानियों से युक्त कोई कोई (पुरूष) केश-श्मश्रु मुँडा, काषाय-वस्त्र पहिन, घर से बेघर हो प्रब्रजित होते हैं, वह आप राष्ट्रपाल को नहीं हैं। आप राष्ट्रपाल क्या जानकर, देखकर, सुनकर घर से बेघर हो प्रब्रजित हुये?”
“महाराज! उन भगवान्, जाननहार, देखनहार, अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध ने चार धर्म-उद्देश कहे हैं, जिनको जानकर, देखकर, सुनकर मैं घर से बेघर हो प्रब्रजित हुआ। कौन से चार? (1) (यह) लोक (=संसार) अधु्रव (है), उपनीत हो रहा है, यह उस भगवान् ॰ ने प्रथम धर्म-उद्देश कहा है, जिसको देखकर ॰ प्रब्रजित हुआ। (2) लोक त्राण-रहित, आश्वासन-रहित है ॰। (3) लोक अपना नहीं है, सब छोडकर जाना है ॰। (4) लोक कमतीवाला तृष्णा का दास है ॰। यह महाराज! उन भगवान् ॰ ने चार धर्म-उद्देश कहे हैं, जिनको जानकर ॰ मैं ॰ प्रब्रजित हुआ।”
“उपनीत हो रहा (=ले जाया जा रहा) है, ‘लोक अधु्रव है’ आप राष्ट्रपाल के इस कथन का अर्थ कैसे जानना चाहिये?”
“तो क्या मानते हो, महाराज! ये तुम (कभी) बीस-वर्ष के, पच्चीस-वर्ष के? (जब तुम) संग्राम मंे हाथी की सवारी में होशियार, घोडे की सवारी में होशियार, रथ की सवारी में होशियारा, धनुष में होशियार, तलवार में होशियार, उरू से बलिष्ट, बाहु से बलिष्ट थे?”
“बल्कि हे राष्ट्रपाल! मानों एक समय ऋद्धिमान् हो मैं अपने बल के समान (किसी का) देखता ही न था।”
“तो क्या मानते हो महाराज! आज भी संग्राम मंे तुम वैसे ही ॰ उरू-बली, बाहु-बली, सामथ्र्य-युत हो?”
“नहीं हे राष्ट्रपाल! इस वक्त मैं जीर्ण-वृद्ध ॰ हूँ, अस्सी-वर्ष की मेरी उम्र है। बल्कि एक
समय हे राष्ट्रपाल! मैं ‘यहाँ तक पैर (=पाद) रक्खूँ’ (विचार) दूसरें (समय) चैथाई ही (दूर तक) रख सकता हूँ।”
“महाराज! उन भगवान् ॰ ने इसी को सोचकर कहा—‘उपनीत हो रहा है, लोक अधु्रव है’, जिनको जानकर ॰ मैं ॰ प्रब्रजित हुआ।”
“आश्चर्य! हे राष्ट्रपाल!! अद्भूत! हे राष्ट्रपाल! जो यह उन भगवान् ॰ का सुभाषित—‘उपनीत हो रहा है ॰ (=ले जाया जा रहा है), लोक अध्रुव है’ हे राष्ट्रपाल! इस राज-कुल में हस्ति-काय (काय=समुदाय) भी हैं, अश्व-काय भी है, रथ-काय भी, पदाति-काय भी, जो हमारी आपत्तियों में युद्ध के लिये है। ‘लोक त्राण-रहित, आश्वासन-रहित है’ यह (जो) आप राष्ट्रपाल ने कहा? हे राष्ट्रपाल! इस कथन का अर्थ कैसे जानना चाहिये?”
“तो क्या मानते हो महाराज! है तुम्हें कोई आनुशायिक (=साथ रहनेवाली) बीमारी?”
“हे राष्ट्रपाल! मुझे आनुशाकिय वायुरोग है। बल्कि एक बार तो मित्र-अमात्य जाति-बिरादरी घेरकर खडी थी,—‘अब राजा कौरव्य मरेगा’। ‘अब राजा कौरव्य मरेगा’।
“तो क्या मानते हो महाराज! क्या तुमने मित्र-अमात्यों, जाति-बिरादरी को पाया—‘आवें आप मेरे मित्र-अमात्य ॰, सभी सत्व (=प्राणी), इस पीडा को बाँट लें, जिसमें मैं हल्की पीडा पाऊँ’, या तुमने ही उस वेदना को सहा?”
“राष्ट्रपाल! उन मित्र अमात्यों ॰ मैंने नहीं पाया ॰, बल्कि मैं ही उस वेदना को सहता था।”
“महाराज! इसी को सोचकर भगवान् ॰ ने ॰।”
“आश्चर्य! हे राष्ट्रपाल! अद्भूत! हे राष्ट्रपाल! ॰ हे राष्ट्रपाल! इस राजकुल में बहुत सा हिरण्य (=अशर्फी) सुवर्ण भूमि और आकाश में है। ‘लोक अपना नहीं (=अस्वक) है, सब छोडकर जाना है’ यह आप राष्ट्रपाल ने कहा। हे राष्ट्रपाल! इस कथन का अर्थ कैसे जानना चाहिये?”
“तो क्या मानते हो महाराज! जैसे तुम आज कल पाँच काम गुणों से युक्त=समंगीभूत विचरते हो, बाद (जन्मान्तर) में भी तुम (उन्हें) पाओगे—‘ऐसे ही मैं पाँच काम-गुणों से युक्त ॰ विचरूँ, या दूसरे इस भोग को पायेंगे; और तुम अपने कर्मानुसार जाओगे?”
“राष्ट्रपाल! जैसे मैं इस वक्त पाँच काम-गुणों से युक्त ॰ विचरता हूँ, बाद (=जन्मान्तर) में भी ऐसे ही मैं इन काम-गुणों से युक्त ॰ विचरने न पाऊँगा। बल्कि दूसरे इस भोग को लेंगे, मैं अपने कर्मानुसार जाऊँगा।”
“महाराज इसी को सोचकर उन भगवानृ ॰ ने ॰।”
“आश्चर्य! हे राष्ट्रपाल!! अद्भूत! हे राष्ट्रपाल!! ॰। ‘लोक कमतीवाला तृष्णा का दास हैं’ यह आप राष्ट्रपाल ने जो कहा! हे राष्ट्रपाल! इस कथन का कैसे अर्थ समझना चाहिये?”
“तो क्या मानते हो महाराज! समृद्ध कुरू (देश) का स्वामित्व कर रहे हो?”
“हाँ, हे राष्ट्रपाल! समृद्ध कुरू का स्वामित्व कर रहा हूँ।’
“तो क्या मानते हो महाराज! तुम्हारा एक श्रद्धेय विश्वास-पात्र पुरूष पूर्व दिशा से आवे, वह तुम्हारे पास आकर ऐसा बोले—हे महाराज! जानते हो, मैं पूर्व-दिशा से आ रहा हूँ। वहाँ मैंने बहुत समृद्ध=स्फीत, बहुत जनों वाला, मनुष्यों से आकीर्ण जनपद (=देश) देखा। वहाँ
बहुत हस्तकाय, अश्वकाय, रथकाय, पत्ति (=पैदल) काय हैं। वहाँ बहुत दाँत, मृगचर्म हैं। वहाँ बहुत सा कृत्रिम-अकृत्रिम हिरण्य, सुवर्ण है। बहुत सी स्त्रियाँ प्राप्त होती है। वह इतनी ही सेना से जीता जा सकता है; जीतिये महाराज!’ तो क्या करोगे?”
“हे राष्ट्रपाल! उसे भी जीतकर मैं स्वामित्व करूँगा।”
“तो क्या मानते हो महाराज! ॰ विश्वासपात्र पुरूष पश्चिम-दिशा से आवे ॰।” ॰।
“॰ उत्तर दिशा से ॰।” ॰। “दक्षिण दिशा से ॰।” ॰।
“महाराज! इसी को सोचकर उन भगवान् ॰ ने ॰ ॰।”
आश्चर्य! राष्ट्रपाल!! अद्भूत! हे राष्ट्रपाल!!”
आयुष्मान् राष्ट्रपाल ने यह कहा। यह कहकर फिर यह भी कहा—
“लोक में धनवान् मनुष्यों को देखता हूँ, (जो) वित्त पाकर मोह से दान नहीं करते। लोभी हो धन का संचय करते हैं, और भी अधिक कामों (=भोगों) की चाह करते हैं।।1।।
“राजा बलपूर्वक पृथ्वी को जीत, सागर-पर्यन्त महीपर शासन करते। समुद्र के इस पार से तृप्त न हो, समुद्र के उस पार को भी चाहता है।।2।।
“राजा ही की भाँति दूसरे बहुत से पुरूष भी तृष्णा-रहित न हो मरण पाते हैं। कमतीवाले होकर ही शरीर को छोडते हैं, लोक में (किसी की) कामों से तृप्ति नहीं हैं।।3।।
“जाति वाल बिखेरकर क्रन्दन करती है, और कहती है ‘हाय हमारा मर गया’ वस्त्र से ढाँककर उसे जे जाकर, चिता पर रखकर फिर जला देते हैं।।4।।
“वह शूल स कूँचा जाता, भोगों को छोड एक वस्त्र के साथ जलाया जाता है। मरने वाले के ज्ञाति-मित्र=सहाय रक्षक नहीं होते।।5।।
“दायाद उसके धन को हरते है, प्राणी तो जहाँ कर्म हैं (वहाँ) जाता है। मरते हुये के पीछे, पुत्र, दारा, धन, और राज्य नहीं जाता।।6।।
“धन द्वारा लम्बी आयु नहीं पा सकता है, और न वित्त द्वारा जरा को नाशकर सकता है। धीरों ने इस जीवन को स्वल्प, अ-शाश्वत, भंगुर कहा है।।7।।
“धनी और दरिद्र (काम)-स्पर्शो को छूते हैं, बाल और धीर (=पंडित) भी वैसे ही हैं बाल (=मूर्ख) मूर्खता से विचलित हो पडता है, किन्तु धरी स्पर्श-स्प्रष्ट हो नहीं विचलित होता।।8।।
“इसलिये धन से प्रज्ञा ही श्रेष्ठ है, जिससे कि (तत्व) निश्चय को प्राप्त होता है। मुक्त न होने से वह मोहवश आवागमन में (पडे) पाप कर्मों को करते हैं।।9।।
“(वह) लगातार संसार (=भवसागर) में पडकर गर्भ और परलोक को पाता है। अल्प-प्रज्ञावान् उस पर विश्वास कर गर्भ और परलोक को पाता रहता है।।10।।
“सेंध के ऊपर पकडा गया पापी चोर, जैसे अपने काम से मारा जाता है। इसी प्रकार पापी जनता मरकर दूसरे लोक में अपने काम से मारी जाती है।।11।।
“विचित्र मधुर मनोरम काम (=भोग) नाना रूप से चित्त को मथते हैं। इसलिये काम भोगों के दुष्परिणाम को देखकर हे राजन्! मैं प्रब्रजित हुआ हूँ।।12।।
“वृक्ष फल की भाँति तरूण और वृद्ध मनुष्य शरीर छोडकर गिरते है। ऐसे भी देखकर प्रब्रजित हुआ; (क्योंकि) न गिरनेवाला भिक्षुपन (=श्रामण्य) ही श्रेष्ठ है।।13।।
Пра гэты пераклад
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Няхай усе істоты будуць шчаслівыя