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MN 109

Mahāpuṇṇama sutta: महा-पुण्णम-सुत्तन्त

Mahāpuṇṇamasutta

Devadahavagga

Překlady

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में मृगारमाता के प्रासाद पूर्वाराम में विहार करते थे।

उस समय भगवान् उस दिन के उपोसथ की पंचदशी=पूर्णमा की रात को भिक्षुसंघ से घिरे खुली जगह में बैठे थे। तब एक भिक्षु आसन से उठ उत्तरासंग को एक कंधे पर रख,
भगवान् की ओर हाथ जोडे भगवान् से यह बोला—

“भन्ते! भगवान् से कुछ बात पूछूँ, यदि भगवान् प्रश्न के उत्तर देने की आज्ञा करते है?”

“तो, भिक्षु! अपने आसन पर बैठकर, जो चाहता है, पूछ।”

तब वह भिक्षु अपने आसन पर बैठकर भगवान् से यह बोला—

“भन्ते! यह हैं न पाँच उपादान-स्कंध; जैस कि—(1) रूप-उपादान-स्कंध, (2) वेदना ॰, (3) संज्ञा ॰, (4) संस्कार ॰, (5) विज्ञान ॰?”

“(हाँ,) भिक्षु! यह पाँच उपादान स्कंध हैं; जैसे कि—(1) रूप, (5) विज्ञान ॰।”

“साधु, भन्ते!” (कह) उस भिक्षु ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित=अनुमोदित कर, भगवान् से आगे का प्रश्न पूछा—

“भन्ते! यह पाँच उपादान-स्कंध किंमूलक (=क्या जड वाले) हैं?”

“भिक्षु! यह पाँच उपादान-स्कंध छन्द (=राग) मूलक हैं।”

“भन्ते! उपादन और पाँच उपादान-स्कंध एक ही हैं, या पाँच उपदान-स्कंधों से अलग उपादान हैं?”

“भिक्षु! उपादान और उपादान-स्कंध एक नहीं हैं; और न पाँच उपादान-स्कंधो से अलग उपादान है। भिक्षु! पाँच उपादान-स्कंधों में जो छन्द=राग हैं, वही वहाँ उपादान है।”

“क्या, भन्ते! पाँच उपादान-स्कंधो में छन्द=राग का वैमत्य (=वेमत्तता=भिन्नमत होना) हो सकती है?”

भगवान् ने कहा—हो सकती है, भिक्षु! यहाँ…किसी (पुरूष) को ऐसा होता है—भविष्यकाल में मैं इस रूप वाला होऊँ। ॰ इस वेदना वाला ॰। ॰ इस संज्ञा वाला ॰। ॰ इस संस्कार वाला ॰। ॰ इस विज्ञान वाला होऊँ। भिक्षु! इस प्रकार पाँच उपादान-स्कंधों में छन्द=राग की वेमत्तता हो सकती है।”

“भन्ते! कितने तक का…स्कंध नाम है?”

“भिक्षु! जो कोई भूत-भविष्य-वर्तमान का, शरीर के भीतर (=अध्यात्मिक) या बाहर का, स्थूल या सूक्षम, हीन या प्रणीत (=उत्तम) दूरस्थ या समीपस्थ रूप (=पृथिवी+जल+तेज+वायु) है, यह रूप-स्कंध है। जो कोई ॰ वेदना ॰। ॰ संज्ञा ॰। ॰ संस्कार ॰। जो कोई भूत-भविष्य-वर्तमान का, (=शरीर के) भीतर या बाहर का, स्थूल या सूक्ष्म, हीन या प्रणीत, दूरस्थ या समीपस्थ विज्ञान है, या विज्ञान-स्कंध है। भिक्षु! इतने का नाम स्कंध है।”

“भन्ते! रूप-स्कंध के प्रज्ञापन (=जतलाने) में क्या हेतु=प्रत्यय है?=वेदना-स्कंध ॰? ॰ संज्ञा-स्कंध ॰? संस्कार स्कंध ॰। विज्ञान स्कंध के प्रज्ञापन में क्या हेतु=प्रत्यय है?”

“भिक्षु! चार महाभूत (=पृथिवी, जल, तेज, वायु) हेतु है, रूप के प्रज्ञान में, चार महाभूतों के कारण (=प्रत्यय) रूप-स्कंध का प्रज्ञापन होता है। स्पर्श (=इन्द्रिय-विषय का संयोग) हेतु=प्रत्यय है, वेदना-स्कंध के प्रज्ञापन होता है। स्पर्श हेतु ॰ हैं, संज्ञा स्कंध ॰। ॰ सस्कार प्रज्ञापन के लिये। भिक्षु! नाम-रूप हेतु=प्रत्यय हैं, विज्ञान-स्कंध के प्रज्ञापन के लिये।”

“भन्ते! सत्काय-दृष्टि (=नित्य आत्मा की धारणा) होती है?”

“भिक्षु! आर्यों के दर्शन से वंचित ॰ अज्ञ, अनाडी (जन) रूप को आत्मा के तौर पर, या आत्मा को रूपवान्, अथवा रूप में आत्मा को, या आत्मा में रूप को समझता है। वेदना को ॰। संज्ञा को ॰। संस्कार को ॰। विज्ञान को आत्मा के तौर पर, या आत्मा को विज्ञानवान्, अथवा विज्ञान में आत्मा को, या आत्मा में विज्ञान को समझता है। भिक्षु! इस प्रकार सत्काय-दृष्टि होती है।”

“भन्ते! किस प्रकार सत्काय-दृष्टि नहीं होती?”

“भिक्षु! आर्यों के दर्शन को प्राप्त ॰ बहुश्रुत आर्य श्रावक न रूप को आत्मा के तौर पर, न आत्मा को रूपवान्, न रूप को आत्मा को, न आत्मा में रूप को समझता है। ॰ वेदना ॰। ॰ संज्ञा ॰। ॰ संस्कार ॰। ॰ विज्ञान ॰। भिक्षु! इस प्रकार सत्काय-दृष्टि नहीं होती।”

“भन्ते! रूप का क्या आस्वाद (=स्वाद) हैं, क्या आदिनव (=दुष्परिणाम) हैं, क्या निस्सरण (=निकास का रास्ता) है? वेदना ॰? संज्ञा ॰? संस्कार ॰? विज्ञान ॰?”

“भिक्षु! जो रूप को लेकर सुख=सौमनस्य उत्पन्न होता है, वह रूप का आस्वाद है। जो कि रूप अ-नित्य, दुःख, विपरिणाम-धर्मा (=विकारी, परिवर्तनशील) हैं, यह रूप का दुष्परिणाम है। जो रूप में छन्द=राग का हटाना, छन्द=राग का प्रहाण है, यह रूप का निस्सरण है। भिक्षु! जो वेदना को ले कर ॰। ॰ संज्ञा को लेकर ॰। ॰ संस्कारों को ले कर ॰। ॰ विज्ञान को ले कर ॰।”

“भन्ते! कैसे जानते-समझते इस स-विज्ञानक (=चेतना-युक्त) काया में, या बाहरी (दुनिया में) सभी निमित्तों (=लिंग आकार आदि) में अहंकार-ममकार को अभिमान और अनुशय (=संस्कार) नहीं होते?”

“भिक्षु! जो कोई भूत-भविष्य-वर्तमान का, शरीर के भीतर का बाहर का, स्थूल या सूक्ष्म, हीन या प्रणीत, दूरस्थ या समीपस्थ रूप है;(वह) सब रूप—‘न यह मेरा है’, ‘न यह मैं हूँ’, और ‘न यह मेरा आत्मा है’—इस प्रकार इसे ठीक से यथार्थ-प्रज्ञा से देखता है। जो कोई ॰ वेदना ॰। ॰ संज्ञा ॰। ॰ संस्कार ॰। ॰ विज्ञान ॰। भिक्षु! इस प्रकार जानते-समझते ॰ अहंकार-ममकार के अभिमान और अनुशय नहीं होते।”

तब एक भिक्षु के मन में ऐसा वितर्क उत्पन्न हुआ—‘इस प्रकार, भो! रूप अनात्मा (=आत्मा नहीं) है, वेदना अनात्मा, संज्ञा अनात्मा, संस्कार अनात्मा, विज्ञान अनात्मा (=अनत्ता) है। अनात्मा के लिये कर्म किस आत्मा में संयुक्त होंगे?’

तब भगवान् ने उस भिक्षु के चित्त के वितर्क को अपने मन से जानकर भिक्षुओं को संबोधित किया—

“भिक्षुओं! इसकी संभावना (=स्थान) है, कि कोई अविद्याग्रस्त, अविद्वान् मोघ-पुरूष (फजूल का आदमी) तृष्णापरवश-चित्त से शास्ता (=गुरू) के शासन (=उपदेश) को अतिक्रमण करना चाहे-‘इस प्रकार भो, रूप अनात्मा है ॰ अनात्मा के किये कर्म किस आत्मा में संयुक्त होगे?’ भिक्षुओ! कारण के साथ मैंने तहाँ तहाँ उन उन धर्मो में तुम्हें प्राप्त कराया है। तो क्या मानते हो, भिक्षुओं! रूप नित्य हैं या अ-नित्य?”

“अनित्य है, भन्ते!”

“जो अनित्य है, वह दुःख (रूप) है, या सुख (रूप)?”

“दुःख है भन्ते!”

“जो अनित्य, दुःख, विपरिणाम-धर्मा (=परिवर्तनशील) है; क्या उसको ऐसा समझना ठीक है—‘यह (=अनित्य वस्तु) मेरा है’, ‘यह मैं हूँ’, ‘यह मेरा आत्मा है’?”

“नहीं, भन्ते!”

“तो क्या मानते हो, भिक्षुओ! वेदना नित्य है या अनित्य?

“॰ संज्ञा। ॰ संस्कार ॰।”

तो क्या माने हो, भिक्षुओं! विज्ञान नित्य है, या अनित्य?”

“अनित्य है, भन्ते!”

“जो अनित्य है, वह दुःख है, या सुख?”

“दुःख है, भन्ते!”

“जो, अनित्य, दुःख, विपरिणाम-धर्मा है; क्या उसको ऐसा समझना ठीक है—‘यह मेरा हैं’, ‘यह मैं हूँ’, ‘यह मेरा आत्मा है?”

“नहीं, भन्ते!”

“इसलिये भिक्षुओं! जो कोई भूत-भविष्य-वर्तमान का ॰ रूप है; (वह) सब रूप—‘न यह मेरा है’ ॰ सब विज्ञान—‘न यह मेरा है’ ॰। इस प्रकार इसे ठीक से, यथार्थ प्रज्ञा द्वारा समझना चाहिये।

“भिक्षुओं! इस प्रकार समझते बहुश्रुत आर्यश्रावक रूप से निर्वद (=उदासी) को प्राप्त होता है, वेदना से ॰, संज्ञा से ॰,। संस्कार से ॰। विज्ञान से ॰। निर्वेद को प्राप्त हो विरक्त होता है, विराग के कारण विमुक्त होता है। विमुक्त होने पर ‘मैं विमुक्त हूँ’—यह ज्ञान होता है, (जन्म) (=आवागमन) क्षीण हो गय, ब्रह्मचर्यवास (पूरा) हो चुका, करना था सो किया जा चुका, और कुछ यहाँ करने को (शेष) नहीं है—जानता है।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित किया।

उस उपदेश के कहे जाते समय साठ भिक्षुओं को चित्त आश्रवों (=चित्तमलो) से उपादान रहित हो छूट (=विमुक्त हो) गया।

O tomto překladu

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Ať jsou všechny bytosti šťastné