MN 116
Isigili sutta: इसिगिलि-सुत्तन्त
Isigilisutta
Anupadavagga
Překlady
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् राजगृह में ऋषिगिरि (=इसिगिलि) पर्वत पर विहार करते थे।
तब भगवान् ने भिक्षुओं को सम्बोधित किया—“भिक्षुओ!”
“भदन्त!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—“देखते हो, भिक्षुओ! तुम इस वैभार पर्वत को?”
“हाँ, भन्ते!”
“भिक्षुओं! इस वैभार पर्वत की (पहिले) दूसरी ही संज्ञा थी, दूसरही ही प्रज्ञप्ति (=नाम) थी।”
“देखते हो, भिक्षुओ! तुम इस पांडव-पर्वत को?”
“हाँ, भन्ते!”
“भिक्षुओं! इस पांडव पर्वत की (पहिले) दूसरी ही संज्ञा थी ॰।”
“देखते हो, भिक्षुओं! तुम इस वैपुल्य-पर्वत को?”
“हाँ, भन्ते!”
“भिक्षुओं! इस वैपुलय पर्वत की (पहिले) दूसरी ही संज्ञा थी ॰।”
“देखते हो, भिक्षुओ! तुम इस गृध्रकूट पर्वत को?”
“हाँ, भन्ते!”
“भिक्षुओ! इस गृध्रकूट पर्वत की (पहिले) दूसरी ही संज्ञा थी ॰।”
“देखते हो, भिक्षुओ! तुम इस ऋषिगिलि पर्वत को?”
“हाँ, भन्ते!”
“भिक्षुओं! इस ऋषि-गिलि-पर्वत की (पहिले) दूसरी ही संज्ञा थी ॰। भिक्षुओ! पूर्वकाल में इस ऋषिगिलि पर्वत में पाँच सौ प्रत्येकबुद्ध चिर-निवासी थे। वह इस पर्वत में प्रवेश करते दिखाई देते थे, प्रविष्ट हो जाने पर कहीं दिखाई पडते थे। यह देख मनुष्य कहते यह पर्वत इन ऋषियों को गिलता (=निगलता) है;(इस प्रकार) ‘ऋषि-गिलि’ (=ऋषियों को निगलने वाला) ‘ऋषि-गिलि’ यही संज्ञा हो गई। भिक्षुओ! (उन) प्रत्येकबुद्धो के नाम तुम्हें बतलाता हूँ। भिक्षुओं! प्रत्येकबुद्धों के नाम तुम्हे कीर्तित करता हूँ। भिक्षुओ! प्रत्येकबुद्धों के नाम तुम्हे देखता (=बतलाता) हूँ; उसे सुनों, अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।”
“अच्छा भन्ते!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान ने यह कहा—
“भिक्षुओ! अरिष्ट (=अरिट्ठ) नामक प्रत्येकबुद्ध इस ऋषिगिलि पर्वत के चिर-निवासी थे। ॰ अप-अरिष्ट (=उपरिट्ठ) ॰। ॰ तगर-सिखी (=नगर-शिखी) ॰। ॰ यसस्सी (=यशस्वी) ॰। ॰ सुदर्शन (=सुदस्सन) ॰। ॰ प्रियदर्शी (=पियदस्सी) ॰। ॰ गंधार ॰। ॰ पिंडोल ॰। ॰ उप-ऋषीभ (=उपासभ) ॰। ॰ नीथ ॰। ॰ तत ॰। ॰ श्रुतवान् (=सुतवा) ॰। ॰ भावितात्मा (=भावितत्त) ॰।
“जो प्राणियों के सार, दुःख-रहित, आशा-रहित, प्रत्येक-बोधि को प्राप्त हये।
उन ध्यानी नरोत्तमों का नाम कहता हूँ, सुनो।
अरिष्ट, उपारिष्ठ, तगर-शिखी।
यशस्वी, सुदर्शन, प्रियदर्शी, (यह) सु-सं-बुद्ध।
गंधार, पिंडोल, और उपर्षभ।
नीथ, तत, श्रुतवान् भवितात्मा।
शुन्भ, शुभ, मतुल, और अष्टम।
अष्ट सुमेध, अनिघ, सुदाठ।
(यह) प्रत्येकबुद्ध भव-बंधन-मुक्त (हुये)
महानुभाव भिगु, भिग, दो जाली, मुनि के अष्टक
तब कौसल्य, फिर सुबाह बुद्ध
उपनेमिष, नेमिष उपशान्त चित्त।
तब श्रद्ध और पंडित विरज,
काल, उपकाल, विजत, और जित्
अंग, बंग, और गुप्तिजित्।
पश्यी ने दुःख की जड उपाधि (=लोभ) को छोड दिया।
अपराजित ने मार-सेना को जीता।
शास्ता, प्रवक्ता, और सभंग, लोमहर्ष,
अच्चांगमाय, असित, अनास्रव।
मनोमय, मानच्छित्, और बन्धुमान्।
तब विमुक्त, विमल और केतुमान्।
केतुम्पराग, और आर्य मातंग।
तब अच्युत अच्युतांग, व्यामांग।
सुमंगल, दर्विल, सुप्रतिष्ठित।
असेय्य, क्षेम्याभिरत, और सोरत।
दुरन्वय, संघ, और उज्जय भी।
दूसरे मुनि सेय्य, अनोमनिक्कम।
आनन्द, नन्द, उपनन्द (यह) बारह।
अंतिम शरीरधारी भारद्वाज।
बोधि, महानाम और उत्तर भी।
कोसी, शिखा, सुन्दर, भारद्वाज।
तिष्य, उपतिष्य, भव-बन्धन-च्छेदक।
उपशिखी, और तृष्णाछेदक शिखरी।
वीतराग मंगल बुद्ध हुये,
दुःखमूल जालिनी (=तृष्णा) को छेद ऋषभ ने।
उपनीत शांत-पद को प्राप्त हुये।
उपोसथ सुन्दर और सत्य नाम वाले।
जेत, जयन्त, पद्म, और उत्पल।
पद्मोत्तर, रक्षित और पर्वत।
मानसाध्य, वीतराग शोभित।
और सु-वि-मुक्त चत्ति कृष्ण बुद्ध।
यह और दूसरे महानुभाव।
भवबंधन-मुक्त प्रत्येक बुद्ध।
उन सभी सर्व संसर्गत्यागी।
असंख्या, निर्वाण-प्राप्त महर्षियों को वन्दो।”
O tomto překladu
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Ať jsou všechny bytosti šťastné