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MN 127

Anuruddha sutta: अनुरूद्ध-सुत्तन्त

Anuruddhasutta

Suññatavagga

Překlady

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथ-पिंडिक के आराम जेवतन में विहार करते थे।

तब पंचकांग स्थपित ने एक पुरूष से कहा—

“आओ, हे पुरूष! तुम जहाँ आयुष्मन अनुरूद्ध हैं, वहाँ जाओ। जाकर मेरे वचन से आयुष्मान् आनन्द के चरणों में शिर से वन्दना करो—‘भन्ते! पंचकांग स्थपित आयुष्मान् अनुरूद्ध के चरणों में शिर से वन्दना करता है’। और यह भी कहना—भन्ते! आयुष्मान् अनुरूद्ध अपने लेकर चारका, कल के लिये पंचकांग स्थपित का भोजन स्वीकार करे; और भन्ते! आयुष्मान् अनुरूद्ध जल्दी ही आये। पंचकांग स्थपति राजकीय कार्य से बहुकृत्य=बहुकरणीय है।”

“अच्छा, भन्ते!”—(कह) वह पुरूष पंचकांग स्थपित को उत्तर दे; जहाँ आयुष्मान् आनंद थे, वहाँ गया; जाकर आयुष्मान् अनुरूद्ध को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया, एक ओर बैठे, उस पुरूष ने आयुष्मान् आनन्द से यह कहा—भन्ते! पंचकांग स्थपति आयुष्मान् के चरणों में ॰ बहुकरणीय है।”

आयुष्मान् अनुरूद्ध ने मौन से स्वीकार किया।

तब आयुष्मान् अनरूद्ध उस रात के बीतने पर पूर्वाह्न के समय पहिनकर पात्र-चीवर ले, जहाँ पंचकांग स्थपति का घर था, वहाँ गये। जाकर बिछे आसन पर बैठे। तब पंचकांग स्थपति ने आयुष्मान् अनुरूद्ध को उत्तर खाद्य-भोज्य से अपने हाथ से सन्तर्पित=सम्प्रवारित किया। तब आयुष्मान् अनुरूद्ध के भोजनकर पात्र से हाथ खींच लेने पर, पंचकांग स्थपति एक नीचा आसन लेकर एक ओर बैठ गया।

एक ओर बैठे पंचकांग स्थपति ने आयुष्मान् अनुरूद्ध से यह कहा—

“भन्ते! मेरे पास स्थविर भिक्षुओें ने आकर यह कहा—‘गृहपति! अ-प्रमाण (=विशाल) चेतोविमुक्ति की भावना करनी चाहिये’। किन्ही किन्हीं स्थविरों ने यह कहा—‘गृहपति! महाद्गत (=महती) चेतोविमुक्ति की भावना करना चाहिये’। भन्ते! जो यह अ-प्रमाणा चेतोविमुक्ति है; और जो यह महद्गता चेतोविमुक्ति है; क्या भन्ते! यह दो धर्म (=बातें) भिन्न अर्थवाले और भिन्न-व्यंजन (=नाम) वाले हैं; या एक अर्थवालें, सिर्फ व्यंजन ही नाना है?”

“तो गृहपति! तू ही कह, यहाँ तेरा (कहना) अ-पर्णक (=द्विविधा-रहित) होगा।”

“भन्ते मुझे ऐसा होता है—जो यह अ-प्रमाणा चेतोविमुक्ति है, और जो यह महद्गता चेतोविमुक्ति है; यह धर्म एक अर्थवाले है, सिर्फ व्यंजन ही नाना है।”

“गृहपति! जो यह अप्रमाणा चेतोविमुक्ति है, और जो यह महद्गता चेतोविमुक्ति है; यह धर्म नाना-अर्थ वाले हैं, और नाना व्यंजन वाले भी। गृहपति! इसे इस बात से भी जानना चाहिये; कि कैसे यह धर्म नानार्थ है, और नाना व्यंजन भी। गृहपति! क्या है, अप्रमाणा चेतोविमुक्ति?—यहाँ गृहपति! भिक्षु मैत्रीभावयुक्त चित्त से ॰ सारे लोक को पूर्ण कर विहरता है। करूणाभावपूर्ण चित्त से ॰। मुदिताभावयुक्त चित्त से ॰। उपेक्षाभावयुक्त चित्त से ॰। गृहपति! यह कही जाती है, अप्रमाणा-चेतोविमुक्ति। क्या है, गृहपति! महाद्गता चेतोविमुक्ति?—यहाँ गृहपति! भिक्षु एक वृक्ष-छाया के बराबर महाद्गत (=बढे) को व्याप्त कर=अधिमुक्त कर विहरता है। गृहपति! यह कही जाती है, महद्गता चेतोविमुक्ति। और यहाँ गृहपति! भिक्षु दो या तीन वृक्ष छाया के बराबर महद्गत को व्याप्त ॰ कर विहरता है। गृहपति! यह कही जाती है, महद्गता चेतोविमुक्ति। ॰ एक ग्राम-क्षेत्र ॰ महद्गत को ॰। ॰ दो या तीन ग्राम-क्षेत्र ॰ महद्गत को ॰। ॰ एक महाराज्य ॰ महद्गत को ॰। ॰ दो या तीन महाराज्य ॰ महद्गत को ॰। ॰ महा समुद्रपर्यन्त एक महापृथिवी के बाराबर महद्गत को ॰। ॰ महा समुद्र पर्यन्त दो या तीन महापृथिवी ॰। गृहपति! यह कही जाती है, महद्गता चेतोविमुक्ति। गृहपति! इस बात से भी जानना चाहिये; कि यह धर्म नानार्थ है, और नाना व्यंजन भी।

“गृहपति! चह चार भाव-उपपत्तियाँ (=लोक में उत्पत्तियाँ) हैं। कौनसी चार?—(1) यहाँ गृहपति! कोई (पुरूष) परीत्ताभ को व्याप्त कर=अधिमुक्त कर विहरता है; वह काया छोड करने के बाद परीत्ताभ देवताओं की स-हव्यता (=समानता) में उत्पन्न होता है। (2) ॰ अप्रमाणाभ को व्याप्त कर ॰ विहरता है; वह ॰ मरने के बाद अप्रमाणाभ देवताओं की स-हव्यता में उत्पन्न होता है। (3) ॰ संक्लिष्टाभ देवताओं की स-हव्यता में उत्पन्न होता है। ॰ (4) परिशुद्धाभ देवताओं की स-हव्यता में उत्पन्न होता है। गृहपति! यह चार भव-उत्पत्तियाँ है। गृहपति! ऐसा समय होता है, जब वह देवता एक जगह पर जमा होते है। इकट्ठा होने पर उनके वर्णों का नानापन नहीं जान पडता, न आभा (=प्रकाश) का नानापन (=फर्क) ही। गृहपति! ऐसा समय होता है, जब वह देवता बाहर जाते हैं; बाहर जाते हुये उन देवताओं के वर्ण का नानापन जान पडता है, और आभा का नानापन भी। जैसे, गृहपति! कोई पुरूष बहुत से तेल के दीपकों को एक घर में प्रविष्ट करे; तो एक घर में प्रविष्ट उनकी अर्ची (=लौ) का नानापन तो मालूम होता है, किन्तु आभा का नानापन नहीं मालूम होता। ऐसे ही, गृहपति! वह समय होता है, जब वह देवता एक जगह पर जमा होते हैं ॰। जैसे गृहपति! (कोई) पुरूष उन अनेक तेल दीपों को उस घर से बाहर करे; तो बहर किये जाते उन तैलदीपों की अर्ची का नानापन भी जान पडता है, और आमा का नानापन भी (जान पडता है)। ऐसे ही, गृहपति! ॰ बाहर जाते हैं ॰।

“गृहपति! उन देवताओं को ऐसा नहीं होता—‘यह हम लोगों का (रूप) नित्य, ध्रुव या शाश्वत है; बल्कि जहाँ जहाँ वह देवता अभिनिवेश (=चाह) करते है, वहाँ वहाँ ही, वह देवता अभिरमण करते हैं’। जैसे, गृहपति! बहँगी (=काज) टोकरी (=पिटक) में ले जाई जाती मक्खियों को ऐसा नहीं होता—यह हमारा नित्य, ध्रुव या शाश्वत हैं, बल्कि जहाँ जहाँ वह मक्ख्यिाँ जाती हैं, वहीं वहीं वह अभिरमण करती है। इसी प्रकार, गृहपति! उन देवताओं को ऐसा नहीं ॰।”

ऐसा कहने पर आयुष्मान् सभ्य कात्यायन (=सभिय काच्चायन) ने आयुष्मान् अनुरूद्ध से यह कहा—

“साधु, भन्ते अनुरूद्ध! यहाँ मुझे कुछ आगे (की बात) को पूछना है—‘भन्ते! जो वह आभा देवता है, क्या सभी परीत्त-आम (=अल्प-प्रकाश) हैं, या कोई कोई देवता अप्रमाण-आभ भी हैं?”

“उस अंग से, आवुस कात्यायन! कोई कोई देवता परीत्ताभ हैं, कोई कोई देवता अ-प्रमाणाभ हैं।”

“भन्ते अनुरूद्ध! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है जिससे कि, एक देव-निकाय (=देव समुदाय, देव योनि) में उत्पन्न होने पर भी उन देवताओं में कोई कोई देवता परीत्ताभ है, और कोई कोई देवता अ-प्रमाणाभ है?”

“तो, आवुस कात्यायन! तुम्हें ही यहाँ पूछता हूँ; जैसा तुम्हे ठीक जँचे, वैसा उत्तर दो, तो क्या मानते हो, आवुस कात्यायन! जो यह भिक्षु एक वृक्ष मूल (=वृक्ष-काया) के बराबर महद्गत (=बडे स्थान) को व्याप्त कर=अधिमुक्त कर विहरता है; और जो वह भिक्षु दो या तीन वृक्ष मूल के बराबर महद्गत को व्याप्त कर=अधिमुक्त कर विहरता है; इन दोनों ही चित्त की भावनाओं में कौन चित्त-भावना महद्गततरा (=विशालतर) है?”

“जो यह, भन्ते! भिक्षु दो या तीन वृक्ष मूलों के बराबर ॰।”

“तो क्या मानते हो, आवुस कात्यान! जो यह ॰ दो या तीन वृक्ष मूलों ॰; और जो वह भिक्षु एक ग्राम-क्षेत्र के बराबर महद्गत ॰।”

“॰ जो यह, ॰ ग्राम-क्षेत्र के बराबर महद्गत ॰।”

“॰ ग्राम-क्षेत्र के बराबर महद्गत ॰; और जो ॰ दो या तीन ग्राम-क्षेत्र ॰?”

“जो यह, ॰ दो या तीन ग्राम-क्षेत्र ॰।”

“॰ दो या तीन ग्राम-क्षेत्र ॰; और जो ॰ एक महाराज्य ॰?”

“जो यह, ॰ एक महाराज्य ॰।”

“॰ एक महाराज्य ॰; और जो ॰ दो या तीन महाराज्य ॰?”

“जो यह, ॰ दो या तीन महाराज्य ॰।”

“॰ दो या तीन महाराज्य ॰; और जो ॰ महासमुद्र पर्यन्त एक महापृथिवी ॰?”

“जो यह, ॰ महासमुद्र पर्यन्त एक महापृथिवी ॰।

“॰ महासमुद्र पर्यन्त एक महापृथिवी ॰; और जो ॰ महासमुद्र पर्यन्त दो या तीन महापृथिवी ॰?”

“जो यह, ॰ महासमुद्र पर्यन्त दो या तीन महापृथिवी ॰।”

“आवुस कात्यायन! यह हेतु है=यह प्रत्यय है, जिससे एक देव-निकाय में उत्पन्न होने पर भी, उन देवताओं में कोई कोई परीत्ताभ हैं, और कोई कोई देवता अ-प्रमाणाभा है।”

“साधु, भन्ते अनुरूद्ध! यहाँ, मुझे कुछ आगे (की बात) को पूछना है—‘भन्ते! जो यह आभा देवता है, क्या सभी उनमें क्ल्ष्टि (=मल-युक्त)-आभ हैं, या कोई कोई परिशुद्धाभ भी हैं?”

“उस अंग से, आवुस कात्यायन! कोई कोई देवता क्लिष्टाभ हैं। कोई कोई देवता हैं परिशुद्धाभ।”

“भन्ते अनुरूद्ध! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे कि देव-निकाय में उत्पन्न होने पर भी उन देवताओं में कोई कोई देवता क्लिष्टाभ हैं, कोई परिशुद्धाभ हैं?”

“तो आवुस कात्यायन! उपमा (=दृष्टांत) तुम्हें कहता हूँ; उपमा से भी कोई कोई विज्ञ पुरूष भाषण का अर्थ समझ जाते है। जैसे, आवुस कात्यायन! जलते तेल-प्रदीप में तेल भी अ-परिशुद्ध (=अशुद्ध, मलिन) हो, बत्ती भी अ-परिशुद्ध हो। वह तेल की अपरिशुद्धता से, बत्ती की भी अपरिशुद्धता से अंधला-धुँधला सा जलता हो; ऐसे ही आवुस कात्यायन! कोई भिक्षु संक्लिष्ट (=मलिन)-आभा को व्याप्त कर=अधिमुक्त कर विहरता है। उसका कायिक दौस्थुल्य (=व्यतिक्रम) भी अच्छी तरह शान्त (=सुप्रती प्रश्रब्ध) नहीं हुआ रहता, स्त्यान-मृद्ध (=आलस्य) भी अच्छी तरह नष्ट नहीं हुआ रहता; औद्धत्य-कौकृत्य (=उद्धतपना, हिचकिचाहट) भी अच्छी तरह हटाया नहीं गया रहता। वह कायिक दौस्थुल्य के अच्छी तरह शान्त न होने से, स्त्यान-मृद्ध के अच्छी तरह नष्ट न होने से, औद्धत्य-कौकृत्य के अच्छी तरह न हटाये गये होने से, अंधला-धुँधला सा ध्यान करता है। वह काया छोड मरने के बाद संक्लिष्टाभ देवताओं की स-हव्यता में उत्पन्न होता है।

“जैसे, आवुस कात्यायन! जलते तेल-प्रदीप में तेल भी परिशुद्ध हो, बत्ती भी परिशुद्ध हो, वह तेल की परिशुद्धता से, बत्ती की भी परिशुद्धता से अँधला-धुँधला न जलता हो; ऐसे ही, आवुस कात्यान! यहाँ कोई भिक्षु परिशुद्धाभ को व्याप्त कर=अधिमुक्त कर विहरता है। उसका कायिक दौस्थुल्य भी अच्छी तरह शांत हुआ रहता है, स्त्यान-मृद्ध भी अच्छी तरह नष्ट हुआ रहता है; औद्धत्य-कौकृत्य भी अच्छी तरह हटाया गया रहता है। वह ॰ औद्धत्य-कौकृत्य के अच्छी तरह हटाये गये होने से अँधला-धुँधला नहीं ध्यान रहता। वह काया छोड करने के बाद परिशुद्धाभ देवताओं की सहव्यता में उत्पन्न होता है। आवुसा कात्यायन! यह हेतु=प्रत्यय है ॰।”

ऐसा कहने पर आयुष्मान् सभ्य कात्यायन ने आयुष्मान् अनुरूद्ध से यह कहा—

“साधु, भन्ते अनुरूद्ध! भन्ते! आयुष्मान् अनुरूद्ध ने यह नहीं कहा—‘ऐसा मैंने सुना’ या ‘ऐसा होना चाहिये’; बल्कि आयुष्मान् अनुरूद्ध यह कहते हैं—‘ऐसे वह देवता’, ‘इस प्रकार के वह देवता’, (यह सोचकर) भन्ते! ऐसा होता है—जरूर पहले आयुष्मान् अनुरूद्ध उन देवताओं के साथ रहे हे, संलाप किये हैं, साक्षात्कार किये हैं।”

“जरूर, आवुस कात्यायन! जानकर मैंने वह बात कही और बल्कि मैं तुमसे कहता हूँ—पहले आवुस कात्यायन! दीर्घ काल तक मैं देवताओं के साथ रहा हूँ, संलाप किये हूँ, साक्षात्कार किये हूँ।”

ऐसा कहने पर आयुष्मान् सभ्य कात्यायन ने पंचकांग गृहपति से यह कहा—

“गृहपति! लाभ है तुम्हे, सुलाभ मिला तुम्हे; जो कि तुम अपनी संशय को मिटा सके, और मुझे भी यह धर्म-पर्याय (=धर्मोपदेश) सुनने को मिला।”

O tomto překladu

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Ať jsou všechny bytosti šťastné