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MN 98

Vāseṭṭha sutta: वासेट्ठ-सुत्तन्त

Vāseṭṭhasutta

Brāhmaṇavagga

Překlady

ऐसा मैने सुना —

एक समय भगवान् इच्छानंगल में इच्छानंगल के वनखण्ड में विहार करते थे।

उस समय बहुत से अभिज्ञात अभिज्ञात (=प्रतिष्ठित) ब्राह्मण महाशाल (=महाधनी) जैसे कि—चकि ब्राह्मण, तारूक्ख (=तारूक्ष) ब्राह्मण, जानुस्सोणि ब्राह्मण, तोदेप्य ब्राह्मण, तथा दूसरे अभिज्ञात अभिज्ञात ब्राह्मण महाशाल, इच्छानंगल में वास करते थे।

तब वासिष्ठ और भारद्वाज दो माणवों (=छात्रों) की, जंघाविहार के लिये टहलते घूमते वक्त यह बात बच में चल पडी—“ब्राह्मण कैसे होता है भो?”।

वाशिष्ट माणव ने यह कहा—“जब (आदमी) शीलवान् और व्रत-संपन्न होता है, इतने से, भो! ब्राह्मण होता है।”

भारद्वाज माणव वाशिष्ट मावण को नहीं समझा सका, वाशिष्ट माणव भारद्वाज माणवकों नहीं समझा सका।

तब वाशिष्ट माणव ने भारद्वाज माणव को संबोधित किया—

“यह शाक्यकुल से प्रब्रजित शाक्यपुत्र श्रमण गौतम इच्छानंगल के वनखंड में विहार करते है। उन आप गौतम का ऐसा कल्याण कीर्तिशब्द उठा हुआ है—‘वह भगवान् ॰ बुद्ध भगवान् हैं’। चलो, भो भारद्वाज! जहाँ श्रमण गौतम हैं, वहाँ चले। चलकर श्रमण गौतम से इस बात को पूछें; जैसा श्रमण गौतम बतलायेंगे, वैसा धारण करेंगे।”

“अच्छा, भो!”—(कह) भारद्वाज माणव ने वाशिष्ट माणव को उत्तर दिया—

तब वाशिष्ट और भारद्वाज माणव जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये; जाकर भगवान् के साथ…सम्मोदन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे वाशिष्ट माणव ने भगवान् से गाथाओं मे कहा—

“भो! हम अनुज्ञात-प्रतिज्ञात त्रैविद्य हैं।

मैं पौष्करसातिका और यह तारूक्ष के माणवक हैं।
त्रैविद्यों का जो आख्यान है, उसमें हम केवली है।।

पद, व्याकरण (और) जल्प में हम (अपने) आचार्य के समान है।

गौतम! ऐसे हम (दोनों) का जाति-वाद के विषय में विवाद है।।

भारद्वाज कहता है—‘जाति से ब्राह्मण होता है’।

चक्षुमन्! मैं कर्म से कहता हूँ, ऐसा (आप) जानें।

हम दोनों एक दूसरे को समझा नहीं सकते।

(तब) संबुद्ध करके विश्रुत भगवान् के पास आये है।।

अक्षय चंद्रमा को जैसे लोग जाकर हाथ जोड,

वन्दना करके नमस्कार करते है, ऐसे ही लोक में गौतम को (भी)।।

लोक के चक्षु (जैसे) उत्पन्न (आप) गौतम से हम पूछते हैं—

‘जन्म से ब्राह्मण होता है, या कर्म से’?

हम अजानों को बतावें, जिसमें हम ब्राह्मण को जानें।।

(भगवान् — “वाशिष्ट!) —

सो तुम्हे मैं क्रमशः यथार्थतः कहता हूँ।

प्राणियों की जातियों में एक दूसरे से जाति का भेद है।।

तृण और वृक्ष में भी; जानते हो (इसके लिये) वह प्रतिज्ञा नहीं करते,

जाति का लिंग है; उनमें जातियाँ एक दूसरे से (भिन्न) हैं।।

फिर कीट, पतंग से चींटी तक,

जाति कालिंग है; उनमें ॰।।

छोटे बडे चैपायों में भी तुम जानते हो,

जाति का लिंग है; उनमें ॰।।

लम्बी पीठ वाले पादोदर साँप को भी जानते हो,

जाति का लिंग ॰।।

फिर जलचर पानी मछलियों को भी जानते हो,

जाति का लिंग है ॰।।

फिर आकाशचारी पत्रयान पक्षियों को भी जानते हो,

जाति का लिंग ॰।।

जैसा इन जातियों में जाति का अलग अलग लिंग है।

इस प्रकार का जाति-लिंग मनुष्यों में अलग अलग नहीं है।।

न केशों में, न शिर में, न कान में, न आँख में।

न मुख में, न नासिका में, न ओठ और भौं में।

न ग्रीवा में, न कंधे में, न पीठ में, न पेट में।।

न श्रोणी में, न उर में, न गोप्यस्थान में, न मैथुन में।

न हाथ में, न पैर में, न अंगुली और नख में।।

न जंघा में, न उरू में, न वर्ण या स्वर में।

जैसा कि अन्य जातियों में हैं, (वैसा) जाति का कोई (पृथक्) लिंग नहीं।।

मनुष्यों के शरीर शरीर में यह (भेदक लिंग) नहीं मिलता।

मनुष्यों में भेद (सिर्फ) संज्ञा में है।।

मनुष्यों में जो गोरक्षा से जीविका करता है।

वाशिष्ट! ऐसे को कृषक जानो, ब्राह्मण नहीं।।

मनुष्यों में जो किसी शिल्प से जीविका करता है।

वाशिष्ट! ऐसे को शिल्पी जानो, ब्राह्मण नहीं।।

मनुष्यों में जो व्यापार से जीविका करता है।

वाशिष्ट! ऐसे को बनिया जानों, ब्राह्मण नहीं।।

मनुष्यों में जो पर-प्रेषण से जीविका करता है।

वाशिष्ट! ऐसे को प्रेष्यक जानों, ब्राह्मण नहीं।।

मनुष्यों में जो अदत्तादान से जीता है।

वाशिष्ट! ऐसे को चोर जानो, ब्राह्मण नहीं।।

मनुष्यों में जो इषु-अस्त्र से जीता है।

वाशिष्ट! ऐसे को योधाजीवी जानों, ब्राह्मण नहीं।।

मनुष्यों में जो पुरोहिती जीता है।

वाशिष्ट! ऐसे को याजक जानों, ब्राह्मण नहीं।।

मनुष्यों में जो ग्राम राष्ट्र का उपभोग करता है।

वाशिष्ट! ऐसे को राजा जानों, ब्राह्मण नहीं।।

माता और योनि से उत्पन्न होने कारण मैं ब्राह्मण नहीं कहता।

वह ‘भो-वादी है, (तो) संग्रही है!

मैं ब्राह्मण उसे कहता हूँ, जो अपरिग्रही न लेने वाला है।।

जो सारे संयोजनों (=बंधनों) को काटकर, भय नहीं खाता।

जो संग और आसक्ति से विरत है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

नन्दी (=क्रोध), वरत्रा (=तृष्णा रूपी रस्सी) सन्दान (=62 प्रकार के मतवाद रूपी पगहे), और हनुक्रम (=मुँह पर बाँधने के जाबे) को काट एवं परिघ (=जूए) को फेंक जो बुद्ध (=ज्ञानी) हुआ, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जो बिना दूषित (चित्त) किये गाली, वध और बन्धन को सहन करता है, क्षमा बल ही जिसके बल (=सेना) का सेनापति हैं, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जो क्रोधी, व्रती, शीलवान्, बहुश्रुत, संयमी (=दान्त) और अन्तिम शरीरवाला है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

कमल के पत्ते पर जल, और आरे के नोक पर सरसो की भाँति जो भोगों में लिप्त नहीं होता, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जो यहीं (=इसी जन्म में) अपने दुःखों के विनाश को जान लेता है, जिसने अपने बोझ को उतार फेंका और जो आसक्ति रहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जो गम्भीर प्रज्ञावाला, मेधावी, मार्ग-अमार्ग का ज्ञाता, उत्तम पदार्थ (=सत्य) को पाये है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

घर वाले (=गृहस्थ) और बेघरवाले दोनों ही में लिप्त नहीं होता, जो बिना ठिकाने के घूमता तथा बेचाह है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

चर-अचर (सभी) प्राणियों में प्रहारित हो, जो न मारता है, न मारने की प्रेरणा करता है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जो विरोधियों के बीच विरोध-रहित रहता हैं, जो दंडधारियों के बीच (दण्ड) रहित हैं, संग्राहियों में जो संग्रह रहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

आरे के ऊपर सरसों की भाँति, जिसके (चित्त से) राग, द्वेष, मान, डाह, फेंक दिये गये हैं, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

(जो इस प्रकार की) अकर्कश, आदरयुत (तथा) सच्ची वाणी को बोले; कि जिससे कुछ भी पीड़ा न होवे, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

(चीज) चाहे दीर्घ हो या हस्व, मोटी हो या पतली, शुभ हो या अशुभ, जो संसार में (किसी भी) बिना दी चीज को नहीं लेता, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

इस लोक और परलोक के विषय में जिसकी आशायें (=चाह) नहीं रह गई हैं, जो आज्ञारहित और आसक्तिरहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जिसके आलय (=तृष्णा) नहीं है, जो भली प्रकार जानकर अकथ (पद) का कहने वाला है, जिसने गाढे अमृत को पा लिया,; उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जिसने यहाँ पुण्य और पाप दोनों की आसक्ति को छोड दिया, जो शोकरहित, निर्मल, (और) शुद्ध हैं, उसे मै ब्राह्मण कहता हूँ।।

जो चन्द्रमा की भाँति विमल, शुद्ध, स्वच्छ=अनाबिल है, (तथा जिसकी) सभी जन्मों की तृष्णा नष्ट हो गई है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जिसने इस दुर्गम संसार, (=जन्म-मरण) के चक्कर में डालने वाले मोह (रूपी) उलटे मार्ग को त्याग दिया, जो (संसार से) पारंगत, ध्यनी तथा तीर्ण (=तर गया) है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जो यहाँ भोगों को छोड, बेघर हो प्रब्रजित (=संन्यासी) हो गया है, जिसके भोग और जन्म नष्ट हो गये, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जो यहाँ तृष्णा को छोड, बेघर बन प्रब्रजित है, जिसकी तृष्णा और (पुनर्)जन्म नष्ट हो गये, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

मानुष (भोगो के) लाभों को छोड, दिव्य (भोगो के) लाभ को भी (जिसने) त्याग दिया, सारे ही लाभों में जो आसक्त नहीं है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

रति और अरति (घ्रणा) छोड, शीतल-स्वभाव (तथा) क्लेशरहित है, (जो ऐसा) सर्वलोकविजयी, वीर है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जो प्राणियों की च्युति (=मृत्यु) और उत्पत्ति को भली प्रकार जानता है, (जो) आसक्ति-रहित सुगत (=सुंदर गति को प्राप्त) और बुद्ध (=ज्ञानी) हैं, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जिसकी गति (=पहुँच) को देवता, गंधर्व, और मनुष्य नहीं जानते, क्षीणास्रव (=रागादि-रहित) और अर्हत् है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जिसके पूर्व और पश्चात् और मध्य में कुछ नहीं है, जो परिग्रह-रहित=आदान-रहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

(जो) ऋषभ (=श्रेष्ठ), प्रवर, वीर, महर्षि, विजेता, अकम्प्य, स्नातक और बुद्ध है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ।।

जो पूर्व जन्म को जानता है, स्वर्ग और कुगति को देखता है।

और जिसका (पुनर्)जन्म क्षीण हो गया; जो अभिज्ञा-परायण मुनि है।

सारे कृत्य जिसके समाप्त हो गये हैं, उसे मैं ब्राह्मा कहता हूँ।।

लोक में संज्ञाये हे, (यह) कल्पित नाम-गोत्र हैं।

वहाँ वहाँ कल्पित (करके) लोक-व्यवहार से चला आया है।।

अज्ञो की धारणा में चिर काल से (यह) घुसा हुआ है।

जानने वाले नहीं कहते—‘ब्राह्मण जन्म से होता है’।।

जन्म से न ब्राह्मण होता है, न जन्म से अ-ब्राह्मण।

कर्म से ब्राह्मण होता है, (और) कर्म से अ-ब्राह्मण।।

कर्म से कृषक होता है (और) कर्म से शिल्पी।

कर्म से बनिया होता है (और) कर्म से प्रेष्यक।।

कर्म से चोर होता है, (और) योधा जीव भी कर्म से।

कमै से याजक होता है, (और) राजा भी कर्म से।।

प्रतीत्य समुत्पाद दर्शी (और) कर्म-विपाक-कोविद,

पंडित (जन) इस प्रकार कर्म को यथार्थ से जानते हैं।।

लोक कर्म से चल रहा है, प्रजा कर्म से चल रही है।

चलते हुय रथ के (चक्के की) आणी की भाँति प्राणी कर्म से बँधें हैं।।

तप, ब्रह्मचर्य, संयम और दम, इनसे ब्राह्मण होता है, यही उत्तम ब्राह्मण है।।

तीन विद्याओं से युक्त, शान्त (और) पुनर्जन्म-रहित, वाशिष्ट! ऐसो को (तुम) विज्ञो के ब्रह्मा (और) शक्र जानो।।”

ऐसा कहने पर वाशिष्ट और भारद्वाज माणवकों ने भगवान् से यह कहा—

“आश्चर्य! भो गौतम! आश्चर्य!! भो गौतम! जैसे औंधे को सीधा कर दे ॰ यह हम भगवान् गौतम की शरण जाते हैं, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आप गौतम आज से हमें अंजलिबद्ध शरणागत उपासक स्वीकार करें।”

O tomto překladu

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Ať jsou všechny bytosti šťastné