Uposatha

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MN 123

Acchariyaabbhuta sutta: अच्छरिय-धम्म-सुत्तन्त

Acchariyaabbhutasutta

Suññatavagga

Übersetzungen

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में, अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

तब भिक्षा से निवृत हो भोजनोपरान्त उपस्थान शाला में एकत्र बैठे, बहुत से भिक्षुओं की आपस में यह बात उठी—

“आश्चर्य है आवुसो! अद्भुत है!! आवुसो! तथागत की महाऋद्धिमत्ता=महानुभावता को; जो कि तथागत, छिन्न-प्रपंच=छिन्न-वर्त=पर्यादित्तवट्ट, सर्व दुःख-निवृत्त निर्वाण प्राप्त अतीत काल के बुद्धो को स्मरण करते हैं, जानते हैं—वह भगवान् अर्हत् इस जाति के थे—यह भी। इस नाम ॰। इस गौत्र ॰। ॰ शील ॰। ॰ धर्म ॰। ॰ प्रज्ञा ॰। ॰ विहार ॰। ॰ विमुक्ति ॰।”

ऐसा कहने पर आयुष्मान् आनन्द ने उन भिक्षुओं से यह कहा—

“आवुसों! तथागत आश्चर्य हैं, और आश्चर्य (कर) धर्मो से युक्त है। तथागत अद्भुत हैं, और अद्भुत धर्मो से युक्त है।”

यह उस समय उन भिक्षुओं की आपस में कथा हो रही थी। तब भगवान् सायंकाल ध्यान से उठकर जहाँ उपस्थान-शाला थी, वहाँ गये। जाकर बिछे आसन पर बैठे। बैठ कर भगवान् ने भिक्षुओं को सम्बोधित किया—

“भिक्षुआं! इस समय क्या बात लेकर तुम बैठे थे, तुम्हारी आपस में क्या बात हो रही थी?”

“भन्ते! भोजनोपरान्त…यहाँ उपस्थान-शाला में बैठे हम लोगों की आपस में यह बात शुरू हुई—‘आश्चर्य है! आवुसो! ॰। ॰ विमुक्ति ॰।’ ऐसा कहने पर, भन्ते! आयुष्मान् आनन्द ने हमें यह कहा—‘आवुसों! तथागत ॰ अद्भुत धर्मो से युक्त है।’ भन्ते! हमारी आपस में यह बात हो रही थी, कि भगवान् आ गये।”

तब भगवान् ने आयुष्मान् आनन्द को सम्बोधित किया—

“तो, आनन्द! तू और भी प्रसन्नता पूर्वक तथागत के आश्चर्य अद्भुत धर्मो को जान।”

“भन्ते! भगवान् के मुख से मैंने इसे सुना, भगवान् के मुख से मैंने इसे ग्रहण किया” आनन्द! बोधिसत्व स्मृति-सम्प्रजन्य-युक्त तुषित लोक मे उत्पन्न होते हैं’। जो कि भन्ते! बोधिसत्व स्मृति-सम्प्रजन्य-युक्त-तुषित लोक में उत्पन्न होते हैं—इसे भी मैं भन्ते! भगवान् का आश्चर्य अद्भुत धर्म समझता हूँ। भन्ते! भगवान् के मुख से मैंने सुना ॰—आनन्द! बोधिसत्व स्मृति-सम्प्रजन्य-युक्त (हो) तुषित लोक में ठहरे—इसे भी ॰। ॰—आनन्द! बोधिसत्व सारी आयु भर तुषित लोक में स्मृति-सम्प्रजन्य-युक्त रहें’—॰। ॰—‘आनन्द! बोधिसत्व तुषित लोक से च्युत हो माता के गर्भ में स्मृति-सम्प्रजन्य युक्त प्रविष्ट हुये’—॰। ॰—‘आनन्द! जिस समय बोधिसत्व तुषित लोक से च्युत हो माता के गर्भ में प्रविष्ट होते है; तो देव-मार ब्रह्मा सहित (सारे) लोक में श्रमण-ब्राह्मण-देव-मनुष्य सहित (सारी) प्रजा में; देवताओं के तेज को भी मात करने वला, अप्रमाण, उदार (=महान्) प्रकाश लोक में प्रकट होताहै; जो वह घने अंधकार से पूर्ण तमसावृत दूसरे लोक हैं; जहाँ पर कि इतने तेजस्वी=इतने महानुभाव यह सूर्य-चंद्र भी प्रकाश नहीं पहुँचा सकते; वहाँ पर भी ॰ उदार प्रकाश प्रकट होता है। उस लोक में जो प्राणी उत्पन्न हैं, वह भी उस प्रकाश से एक दूसरे को पहिचानते है—‘और भी…प्राणी यहाँ उत्पन्न है’। और यह दस-साहस्री लोक-धातु कंपित=प्रकंपित,=संप्र-वेषित होती है। ॰ उदार प्रकाश प्रकट होता है। जो कि, भन्ते! ॰। ॰—‘आनन्द! जब बोधिसत्व माता के गर्भ में रहता है, तो चार देव पुत्र आकर चारों दिशाओं में रक्षा करते हैं—(जिसमें कि) बोधिसत्व या बोधिसत्व-माता का कोई मनुष्य या अ-मनुष्य हानि न पहुँचा सके’। जो कि, भन्ते! ॰। ॰—‘आनन्द! जब बोधिसत्व माता के गर्भ में रहता है, तो बोधिसत्व-माता स्वभावतः शीलवती होती है—वह हिंसा-चोरी-व्यभिचार-झूठ-सुरापान आदि से विरत होती है’। जो कि भन्ते! ॰। ॰—आनंद! जब बोधिसत्व माता के गर्भ में रहता है, तो बोधिसत्व माता का चित्त भोग की इच्छा से किसी पुरूष में नहीं जाता। किसी राग युक्त पुरूष से बोधिसत्व-माता अतिक्रमणीय नहीं होती। जो कि, भन्ते! ॰। ॰—आनंद! जब बोधिसत्व-माता के गर्भ में रहता है, तो बोधिसत्व-माता पाँच कामगुणों (=भोगों) को पाने वाली होती है। वह पाँच कामगुणेां से समर्पित=युक्त हो परिचारित होती है’। जो कि, भन्ते! ॰। ॰-”‘आनन्द! जब बोधिसत्व-माता के गर्भ में रहता है, तो बोधिसत्व-माता का कोई रोग नहीं होता, बोधिसत्व-माता सुखी अ-क्लान्त-काया होती है। जो कि, भन्ते ॰। ॰ और बोधिसत्व-माता…आड में गर्भ के भीतर रहते बोधिसत्व को इन्द्रिय अंग-प्रत्यंग सहित देखती है; जैसे आनन्द! शुभ्र, उत्तम जाति की, अठकोणी पालिश की हुई वैदूर्यमणि (=हीरा) हो; उसके भीतर नीला, पीला, लाल, श्वेत, या नारंगी (=पांडु) रंग का सूत पिरोया हो। उसे हाथ में लेकर आँखवाला पुरूष देखे—यह ॰ वैदूर्यमणि हैं, इसके भीतर नीला ॰ सूत पिरोया है। इसी प्रकार, आनंद! बोधिसत्व-माता आड में ॰’। जो कि, भन्ते! ॰। ॰—‘आनंद! बोधिसत्व को जन्मे सप्ताह होने पर, बोधिसत्व-माता मृत्यु को प्राप्त हो, तुषित-लोक में उत्पन्न होती है’। जो कि, भन्ते! ॰। ॰—आनन्द! जैसे अन्य स्त्रियाँ नौ या दस मास गभ्र को कुक्षि में रख, प्रसन करती है, इस प्रकार बोधिसत्व-माता प्रसव नहीं करती। बोधिसत्व-माता (पूरे) दस मास ही बोधिसत्व को कुक्षि में धारणकर प्रसव करती है’। जो कि, भन्ते! ॰। ॰—‘आनन्द! जैसे अन्य स्त्रियाँ बैठी या लेटी प्रसन करती है, इस प्रकार बोधिसत्व-माता प्रसव नहीं करती। बोधिसत्वमाता खडे रह बोधिसत्व को जनती है। जो कि, भन्ते! ॰। ॰—‘आनंद! जब बोधिसत्व माता की कुक्षि से निकलता है; पहिले उसे देवता ग्रहण करते हैं, पीछे मनुष्य’। जो कि, भन्ते! ॰। ॰—‘आनंद! जब बोधिसत्व-माता की कुक्षि से निकलता है, तो बोधिसत्व अभी पृथिवी को ‘नही’ प्राप्त होता, कि चार देवपुत्र उसे ग्रहण कर माता के सामने रख देते हैं—‘देवि! प्रसन्न होओ; महाप्रतापी (=महेसक्ख) पुत्र तुम्हे उत्पन्न हुआ’। जो कि, भन्ते! ॰। ॰—‘आनन्द! जब बोधिसत्व-माता की कुक्षि से निकलता है, तो उद्द-श्लेष्म-रूधिर-पीब आदि किसी अ-शुचि (पदार्थ) से अलिप्त हो शुद्ध=विशद ही (उत्पन्न होता है); जैसे आनंद! मणि-रत्न काशी के वस्त्र में रक्खा हो, न उसे काशिक वस्त्र लिप्त करता है, न वह काशिक वस्त्र को लिप्त करता है। सो किस हेतु?-”दोनों के शुद्ध होने से। ऐसे ही, आनंद! जब बोधिसत्व ॰’। जो कि, भन्ते! ॰। ॰—‘आनंद! जब बोधिसत्व माता की कुक्षि से निकलता है, तो आकाश से एक शीतल दूसरी गर्म — दो जल धारायें प्रकट होती हैं; जिनसे कि बोधिसत्व और बोधिसत्व-माता का उदककृत्य (=स्नान, प्रक्षालन आदि) किया जाता है। जो कि, भन्ते! ॰। ॰—‘आनंद! सद्यः उत्पन्न बोधिसत्व पैर को समथर रख, पृथिवी पर खडा हो, उत्तराभिमुख सात कदम चलता है; श्वेत-छत्र-धारित हो सारी दिशाओं का विलोकन करता है। और आर्षभी (महती) वाणी को बोलता है—मैं लोक में अग्र हूँ, ॰ ज्येष्ठ हूँ, ॰ श्रेष्ठ हूँ, यह अन्तिम जन्म है, अब पुनर्भव (=आवागमन) नहीं, जो कि, भन्ते! ॰। ॰—‘आनंद! जब बोधिसत्व-माता की कुक्षि से निकलता है; तो देव-मार-ब्रह्मा सहित (सारे) ॰ प्रकाश लोक में प्रकट होता है ॰ दश-साहस्री-लोकधातु कंपित ॰ होती हैं।…। जो कि भन्ते ! ॰।”

“तो आनन्द! इस भी तथागत का आश्चर्य=अद्भुत धर्म धारणकर — यहाँ तथागत को वेदनायें (=अनुभव) विदित हो उत्पन्न होती हैं, ॰ स्थित होती है। ॰ अस्त होती हैं, ॰ संज्ञाये ॰। ॰ वितर्क ॰ इसे भी तू आनंद तथागत ॰ धारण कर।”

“जो कि, भन्ते! भगवान् को वेदनायें ॰, ॰ संज्ञाये ॰, ॰ वितर्क विदिन हो उत्पन्न होते हैं, ॰ स्थित होते हैं, ॰ अस्त होते हैं,—इसे भी भन्ते! मैं भगवान् का आश्चर्य=अद्भुत धर्म धारण करता हूँ।”

आयुष्मान् आनंद ने यह कहा, शास्ता उससे सहमत हुये; और उन भिक्षुओं ने सन्तुष्ट हो आयुष्मान् आनंद के भाषण का अभिनन्दन किया।

Über diese Übersetzung

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Mögen alle Wesen glücklich sein