ΜΝ 129
Bālapaṇḍita sutta: बाल-पंडित-सुत्तन्त
Bālapaṇḍitasutta
Suññatavagga
Μεταφράσεις
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।
वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओं!”
“भदन्त!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओं! यह तीन बाल (=अज्ञ) के लक्षण, =निमित्त, पदान हैं। कौन से तीन?—यहाँ, भिक्षुओ! (1) बाल दुश्चिंत्य (=चिन्ता न करने लायक) की चिंता करने वाला होता है, (2) दुर्वचन का बोलने वाला होता है, (3) दुष्कृत कर्म को करने वाला होता है। यदि, भिक्षुओ! बाल दुश्चिंता-चिन्ती, दुर्वचन-भाषी, दुष्कृत कर्मकारी न होवे; तो पंडित उसे न समझें-‘यह आप बाल, अ-सत्पुरूष हैं’। चूँकि भिक्षुओ! बाल दुश्चित्य-चिन्ती ॰ होता है; इसलिये पंडित इसे जानते हैं—‘यह आप बाल, अ-सत्पुरूष हैं’।
“भिक्षुओ! वह बाल (=मूर्ख) इसी जन्म में तीन प्रकार के दुःख=दौर्मनस्य को अनुभव करता है।—(1) भिक्षुओ! यदि बाल सभा में बैठा रहता है, रथ्या (=सडक) में ॰, था चैरस्ते (=श्रृंगाटक) में बैठा रहता है; वहाँ लोक उसे संबंध की, उसके अनुरूप बात चलाते हैं यदि भिक्षुओं! (वह) बाल हिंसक, चोर व्यभिचारी, झूठा, शराबी (=सुरा-मैरेय-मद्य-प्रमाद स्थायी) होता है;—वहाँ बाल को ऐसा होता है। लोग उस संबंध की, उसके अनुरूप जो बात चलाते हैं, वह धर्म (=दुर्गुण) मुझमें हैं ही, मैं उन धर्माे में फँसा हूँ’। भिक्षुओ! बाल इसी जन्म में इस प्रथम दुःख, दौर्मनस्य को अनुभव करता है।
“(2) और फिर भिक्षुओ! बाल देखता है—राजा (लोग) चोर, आग लगाने वाले को पकड कर अनेक प्रकार के दंड (=कम्मकरणा) देते हैं—चाबुक से भी पिटवाते हैं ॰ तलवार से शीश कटवाते हैं। भिक्षुओं बाल इसी जन्म में इस द्वितीय दुःख दौर्मनस्य को अनुभव करता है।
“(3) और फिर भिक्षुओ! बाल पीठ पर आसीन, मंच पर बैठे (=आसीन) या धरती पर बैठे, जो इसने पहिले पाप-कर्म किये हैं—काया के दुश्चरित, वाणी के दुश्चरित, मन के दुश्चरित — वह उस समय उससे लटकते (=अवलम्बित होते) हैं, अधि-अवलम्बि=अभि-प्रलंबित होते है। जैसे, भिक्षुओ! पर्वत के महाकूटों की छाया सायंकाल, पृथिवी पर अबलंवती, अध्यबलंवती, अभिप्रलबती है; ऐसे ही भिक्षुओ! बाल पीठ पर ॰। वहाँ भिक्षुओं बाल को ऐसा होता है—‘हाय, मैंने कल्याण, कुशल, हिरूत्ताण (=सलज्ज कर्म) नहीं किया। मैंने पाप-रूद्र (कर्म), किल्विष किया है। जो कुछ गति है, कल्याण-कुशल-हिरूत्ताण न किये की, पाप-रूद्र-किल्विष किये की; उस गति को मैं प्राप्त होऊँगा’—वह यह शोक करता है, कलपता हैं, क्रंदन करता है, छाती पीटकर रोता है, मूच्र्छित होता है। भिक्षुओं! बाल इसी जन्म में इस तृतीय दुःख-दौर्मनस्य को अनुभव करता है।
“भिक्षुओं! वह बाल काया और वचन से दुश्चरित (=पाप) करके, काया छोड मरने के बाद अपाय=दुर्गति, विनिपात, नर्क मेें उत्पन्न होता है। जिसके लिये कि भिक्षुओ! ठीक से कहने पर कहे—सर्वांशतः अनिष्ट, सर्वांशतःअ-कान्त, सर्वांशतः अ-मनाप (=अ-प्रिय) है; तो वह ठीक से कहने पर नर्क को ही कहना चाहिये…। नर्क में जितना दुःख है, भिक्षुओ! उसकी उपमा देनी भी सुकर नहीं है।”
ऐसा कहने पर एक भिक्षु ने भगवान् से यह कहा—
“भन्ते! उपमा दी जा सकती है?
भगवान् ने कहा—“दी जा सकती है, भिक्षु! जैसे, भिक्षु! चोर, आग लगाने वाले को पकडकर राजा को दिखलावें—‘देव! यह चोर, आग लगाने वाला हैं, इसे देव! जो चाहे वह दंड प्रदान करें।’ उसको राजा यह कहे—‘जाओ, भो! इस पुरूष को पूर्वाह्न-समय एक सौ शक्ति (=कोडे) मारों।’ तब उसे पूर्वाह्न समय एकस सौ शक्ति मारें। राजा मध्याह्न के समय पूछे—‘कहो, वह पुरूष कैसे है?’। ‘वैसे ही, देव! जी रहा है।’ तब उसको राजा यह कहे—‘जाओ, भो! उसे मध्याह्न समय एक सौ शक्ति मारों।’ ॰। ॰—‘जाओ, भो! उसे सायंकाल एक सौ शक्ति मारो’। तब उसे सायंकाल भी एक सौ शक्ति मारें। तो क्या मानते हो, भिक्षुओ! क्या वह पुरूष तीन सौ शक्तियों से मारा जाकर, उसके कारण दुःख-दौर्मनस्य अनुभव करेगा?”
“भन्ते! एक शक्ति से भी मारे जाने पर वह पुरूष, उसके कारण दुःख-दौर्मनस्य अनुभव करेगा; तीन सौ शक्तियों की तो बात ही क्या करनी?”
तब भगवान् ने हाथ के बराबर एक छोटे पत्थर को हाथ में ले भिक्षुओं को संबोधित किया—“तो क्या मानते हो, भिक्षुओ! कौन अधिक बडा है, यह जो हाथ के बराबर का छोटा पत्थर मैंने हाथ में लिया है; या हिमवान् (=हिमालय) पर्वतराज?”
“भन्ते! भगवान् ने जो यह हाथ के बराबर का छोटा पत्थर (?ढेला) हाथ में लिया है, यह अति छोटा है; हिमवान् पर्वतराज के मुकाबिले में इसकी गिनती भी नहीं हो सकती, कला-भाग को भी (यह) नहीं पा सकता, निम्न (श्रेणी) के पास भी नहीं पहुँच सकता।”
“ऐसे ही, भिक्षुओ! जो वह पुरूष तीन सौ शक्ति मारे जाने पर, उसके कारण दुःख=दौर्मनस्य अनुभव करेगा; नर्क के दुःख के मुकाबिले में उसकी गिनती भी नहीं हो सकती ॰।
“भिक्षुओ! निरयपाल (=नरकपाल) उसका पंच-विध-बंधन नामक दंड देते हैं—गर्म लोहे की कील को हाथ में ठोंकते हैं; गर्म लोहे की कील दूसरे हाथ में ठोंकते हैं। ॰ पैर में ठोंकते हैं, ॰ दूसरे पैर में ठोंकते हैं ॰ छाती के बीच में ठोंकते हैं। वह वहाँ दुःखा, तीव्रा, खरी, कटुका वेदना अनुभव करता है; किन्तु तब तक नहंी मरता, जब तक की उसके पाप कर्म का अन्त नहीं हो जाता।
“तब, भिक्षुओं! निरयपाल उसे बैठाकर कुल्हाडे से काटते हैं। वह वहाँ दुःखा ॰।
“॰ उसे ऊपर पैर और नीचे शिर रखकर वसूले से काटते हैं। वह वहाँ दुःखा ॰।
“॰ उसे रथ में जोतकर आदीप्त, सं-प्रज्वलित, दहकती भूमि में ले जाते हैं, ले आते है। वह वहाँ दुःखा ॰।
“उसे आदीप्त=सं-प्रज्वलित, दहकते अंगार के बडे पर्वत पर चढाते हैं, उतारते हैं। वह वहाँ दुःखा ॰।
“॰ उसे ऊपर पैर नीचे शिर पकड कर आदीप्त ॰ तप्त लोह-कुम्भी में डालते हैं; वह वहाँ पेणुद्देहकं (=गाज फेंकता) पकता है। वह वहाँ पेणुद्देहकं पकता हुआ एक बार ऊपर आता है, एक बार नीचे जाता है, एक बार तिर्छे जाता है। वह वहाँ ॰।
“तब, भिक्षुओ! निरयपाल उसे पुनः पुनः महानिरंय (=महानरक) में डालते हैं। भिक्षुओ! वह महानिरय (ऐसा) हैं—
“चार कोनों वाला, चार द्वारों वाला,
और खंड खंड में नाप कर बँटा हुआ।
लोहे के प्राकार से परिवेष्ठित,
और लोहा से प्रतिकुंजित (=गठित)।
उसकी लोह (=अयः)-मयी भूमि,
तेज से युक्त जलती हुई,
चारों ओर एक सो योजन (विस्तृत)
(आग से) व्याप्त हो सर्वदा स्थित रहती है।’
“भिक्षुओ! नाना प्रकार से यदि मैं निरय (=नर्क) की कथा कहता रहूँ, तो भी उसके दुःख का पूरा वर्णन करना सुकर नहीं है।
“भिक्षुओ! तिर्यग् (=पशु-)योन में तृणभक्षी प्राणी हैं। वह हरे तृणों को भी सुखे तृणों को भी दाँत से चाटकर खाते है। कौन है, भिक्षुओं! तृणभक्षी तिर्यग्-योनि के प्राणी? — हाथी, घोड़ा, गाय, गधा, बकरी, मृग; और जो कोई और भी तृणभक्षी तिर्यग्योनि के प्राणी। सो वह बाल, भिक्षुओं! पहिले रस-भक्षी, यहाँ पाप कर्मो को करके, काया छोड मरने के बाद उन तृणभक्षी प्राणियों की सहव्यता (=योनि) में उत्पन्न होता है।
“भिक्षुओ! तिर्यग्योंनि में गूभ (=विष्टा)-भक्षी प्राणी हैं। वह दूर से ही गूभ गंध को सूँघकर धावते हैं—‘यहाँ खायेंगे’, ‘यहाँ खायेंगे’; जैसे कि ब्राह्मण आहुति-गन्ध से धावते हैं—‘यहाँ खायेंगे’, ‘यहाँ खायेंगे’।…। भिक्षुओं! कौन हैं, गूथ-भक्षी तिर्यग्योनि के प्राणी?—कुक्कुट, शूकर, कुत्ता, स्यार; और जो कोई और भी .॰। सो वह बाल, भिक्षुओ! पहिले रसभक्षी ॰ उन गूथ-भक्षी प्राणियों की सहव्यता में उत्पन्न होता है।
“॰ तिर्यग्योंनि में प्राणी हैं, जो अंधकार में जन्मते है, अंधकार में बूढें होते हैं, और अंधकार ही में मरते है, ॰ कीट, पतंग, गंड (=फोडे) से उत्पन्न ॰। ॰।
“॰ तिर्यग्योंनि में प्राणी हैं, जो जल में जन्मते, बूढे होते, मरते है। ॰ मत्स्य, कच्छप, शिशुमार (=मगर) ॰। ॰।
“॰ तिर्यग्योनि में प्राणी हैं, जो अशुचि (=गन्द) में जन्मते, बुढे होते, मरते है। ॰ जो वह प्राणी सडी मछली, सडे मृत शरीर, या सडे अन्न (कुल्माष), चन्दनिका (=गडहा) या ओलिगल्ल (=गढही) में जन्मते हैं ॰। ॰।
“भिक्षुओं! नाना प्रकार से भी यदि मैं निर्यग्योन की कथा कहता रहूँ तो भी उसके दुःख का पूरा वर्णन करना सुकर नहीं है। जैसे, भिक्षुओ! कोई पुरूष एक छिग्गल के जोडे को महासमुद्र में फेंक दे। उसे पुरवा हवा पच्छिम की ओर बहावे, पछवाँ हवा पूर्व की ओर ॰। उत्तरहिया हवा दक्षिण की ओर ॰, दखिनहिया हवा उत्तर की ओर बहावे। वहाँ एक काना कछुवा हो, (जो कि) सौ सौ वर्ष बाद एक बार उतराता हो। तो क्या मानते हो, भिक्षुओ! क्या वह काना कछुवा इस एक छिग्गल-जोडे में अपनी गर्दन को घुसायेगा?”
“नहीं, भन्ते! शायद कभी किसी समय दीर्घकाल के बाद।”
“भिक्षुओ! वह काल शीघ्र ही होगा जब कि वह काना कछुवा उस ॰ में अपनी गर्दन को घुसायेगा, (लेकिन) भिक्षुओ! एक बार पतित हुये बाल के लियें (फिर) मनुष्यत्व की प्राप्ति को मैं (उससे) दुर्लभतर कहता हूँ। सो किस हेतु?—भिक्षुओ! यहाँ (तिर्यग्योनि में) धर्मचर्या (=धर्माचरण)=समचर्या, कुशल-क्रिया (=पुण्यकर्म), पुण्यक्रिया (संभव) है। यहाँ भिक्षुओ! एक दूसरे के खाने वाले दुर्बलों को खाने वाले रहते है। वह बाल…कदाचित कभी, दीर्घकाल के बाद मनुष्यत्व को प्राप्त होता; (तो वह) जो कि वह नीचकुल है।—चांडालकुल, निषादकुल, बसोर (=वेणुकार)कुल, रथकारकुल, या पुक्कसकुल — ऐसे दरिद्र, अल्प-अन्न-पान-भोजन, कृच्छ-वृत्ति कुलों में जन्मता है। जहाँ मुश्किल से उसे खाना-कपडा (=घास-आच्छादन) मिलता है। (और वहाँ भी) वह दुर्वर्ण (=कुरूप), दुर्दर्शन, घुसी गर्दनवाला, बहुरोगी, काना, लूला, कुबडा, पक्षाघात वाला, होता है। अन्न-पान-वस्त्र-यान-माला-गन्ध-विलेपनों का, शय्या-निवासस्थान (=आवसथ)-प्रदीपों का लाभी नहीं होता। वह काया वचन और मन से दुश्चरित (=दुष्कर्म) करता है। वह काय-वचन-मन से दुश्चरित करके, काया छोड मरने के बाद अपाय, दुर्गति, विनिपात, नरक में उत्पन्न होता है। जैसे, भिक्षुओं! जुआरी पहिले ही दाव (=कलिग्रह) में पुत्र को हार जाये, फिर स्त्री, को भी, फिर सारी सम्पत्ति को, और फिर बन्धन में चला जाये। भिक्षुओ! यह कलिग्रह (=दाव) स्वल्पमात्र हैं; जो कि वह जुआरी पहिले ही दाव में ॰। उससे कहीं बडा कलिग्रह यह है, जो कि यह बाल काय-वचन-मन से दुश्चरित करके ॰।
“भिक्षुओें! यह केवल परिपूर्ण बालभूमि है।
“भिक्षुओ! यह तीन पंडित के लक्षण=निमित्त, पदान है। कौन से तीन?—यहाँ भिक्षुओ! पंडित (1) सुचिंतित-चिन्ती होता है, (2) सुभाषित-भाषी होता है, और (3) सुकृत कर्मकारी होता है। ॰। भिक्षुओं! वह पंडित काय-वचन-मन से सुचरित करके, काया छोड मरने के बाद सुगति स्वर्ग लोक में उत्पन्न होता है। जिसके लिये कि भिक्षुओ! ठीक से कहने पर कहे—सर्वांशतः इष्ट, सर्वांशतः कान्त, सर्वांशतः मनाप हैं; तो यह ठीक से कहने पर स्वर्ग को ही कहना चाहिये…। स्वर्ग मे जितना सुख हैं भिक्षुओ! उसकी उपमा देना भी सुकर नहीं है।”
ऐसा कहने पर एक भिक्षु ने भगवान् से यह कहा—
“भन्ते! उपमा दी जा सकती है।”
भगवान् ने कहा—“दी जा सकती है। भिक्षु! जैसे चक्रवर्ती राजा सात रत्नों और चार ऋद्धियों से युक्त हो, उनके कारण सुख और सौमनस्य को प्राप्त हो। किन सात रत्नों से?
(1) “यहाँ भिक्षुओ! पूर्णिमा के उपोसथ के दिन शिर से नहाये उपोसथ-व्रती हो महल के ऊपर स्थित मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजा के लिये, नेमि-नाभि-युक्त सर्वांग-परिपूर्ण सहस्र-अरों वाला दिव्य-चक्र-रत्न प्रकट होता है। उसको देखकर ॰ क्षत्रिय राजा को यह होता हैं—मैंने यह सुना हैं, ‘जिस ॰ क्षत्रिय राजा के लिये ॰ चक्ररत्न प्रकट होता है; वह चक्रवर्ती राजा होता है’। क्या मैं चक्रवर्ती राजा हूँ? तब भिक्षुओ! ॰ क्षत्रिय राजा बांये हाथर में सोने की झारी (=भृंगार) ले, दाहिने हाथ से चक्र-रत्न पर छींटता हैं—‘चलें आप चक्ररत्न विजय करें आप चक्ररत्न’। तब भिक्षुओं! चक्ररत्न पूर्व दिशा को चलता है। चक्रवर्ती राजा भी चतुरंगिनी सेना के साथ अनुगमन करता है।…जिस प्रदेश में चक्ररत्न स्थित होता है; वहीं चक्रवर्ती राजा भी चतुरगिनी सेना के साथ वास करता है। भिक्षुओ! पूर्व दिशा के जो प्रतिराजा (=अधीन राजा) हैं, वह चक्रवर्ती राजा के पास आकर कहते हैं’—‘आइये, महाराज! स्वागत है आपका, महाराज! (यह सब कुछ आपका) अपना हैं, अनुशासन कीजिये, महाराज!’ चक्रवर्ती राजा यक कहता हैं—‘प्राण नहीं मारना चाहिये, चोरी नहीं करनी चाहिये, व्यभिचार नहीं करना चाहिये, झूठ नहीं बोलना चाहिये, शराब नहीं पीनी चाहिये; जैसे (आज तक राज्य को) भोगे, वैसे ही भोगो।’ भिक्षुओ! (तब) जितने पूर्व दिशा में प्रतिराजा थे, सभी चक्रवर्ती राजा के अनुगामी हो गये। तब, भिक्षुओ! चक्ररत्न पूर्वीय-समुद्र को पारकर…, दक्षिण दिशा में चलता है। ॰। ॰ दक्षिण-समुद्र को पार कर…पश्चिम दिशा में चलता है। ॰। ॰ पश्चिम समुद्र को पार कर उत्तर दिशा में चलता है। चक्रवर्ती राजा भी चतुरंगिनी सेना के साथ अनुगमन करता है। ॰ (तब) जितने उत्तर दिशा में प्रतिराजा थे, सभी चक्रवर्ती राजा के अनुगामी हो गये। तब भिक्षुओ! चक्ररत्न समुद्र पर्यन्त पृथिवी को जीतकर, राजधानी में लौट चक्रवर्ती राजा के अन्तःपुर (=भीतरी दुर्ग) के द्वार पर, ॰ अन्तःपुर-द्वार की शोभा बढाते है, अक्ष (=धुरे) में लगा जैसा स्थित होता है। भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा को इस प्रकार का चक्ररत्न प्रकट होता है।
(2) “और फिर, भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा का, सत्वप्रतिष्ठ (=बहादुर), ऋद्धिमान्, आकाश-गामी, उपोसथ नागराज नामक सर्वश्वेत हस्तिरत्न उत्पन्न होता है। उसको देखकर चक्रवर्ती राजा का चित्त प्रसन्न होता है—‘भो! (यह) हस्ति-यान (=॰ सवारी) बढिया (=भद्रक) हैं, यदि शिक्षा ग्रहण कर लेता!” तब भिक्षुओ! वह हस्तिरत्न, अच्छी जाति का हाथी जैसे दीर्घकाल से शिक्षित हो, वैसे शिक्षा को ग्रहण कर लेता है। उस भूतकाल में भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा ने उसी हस्तिरत्न की परीक्षा के लिये पूर्वाह्न समय मंे आरूढ हो समुद्र पर्यन्त पृथिवी का अनुसंयान (=निरीक्षण) कर अपनी राजधानी में लौटकर प्रातराश (=नाश्ता) किया। भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा को इस प्रकार का हस्तिरत्न प्रकट होता है।
(3) “और फिर, भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा को (जो कि) सर्वश्वेत, काक-शीर्ष, मुंज-केश, ऋद्धिमान्, आकाशगामी, अश्वराज वलाहक नामक अश्वरत्न प्रकट होता है। ॰ लौटकर प्रातराश किया। भिक्षुओ! ॰ इस प्रकार का अश्वरत्न प्रकट होता है।
(4) “और फिर, भिक्षुओं! चक्रवर्ती राजा को मणिरत्न प्रकट होता है। वह होता है, वैदूर्यमणि (=हीरा), शुभ्र, अच्छी जाति की, अठकोणी, सुपरिकर्मकृत (=पालिश की) होती है। भिक्षुओ! उस मणिरत्न का प्रकाश चारों ओर योजन भर तक भर जाता है। पहिले समय, भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा ने इस मणिरत्न की परीक्षा के लिये, चतुरंगिनी सेना को तय्यार कर, मणि को ध्वजा के ऊपर लगा रात के घोर अंधकार में यात्रा की। भिक्षुओ! जो चारों ओर गाँव थे; (वहाँ के लोग) दिन समझ, मणि के प्रकाश में काम करने लगे। भिक्षुओ! ॰ इस प्रकार का मणिरत्न प्रकट होता है।
(5) “और फिर भिक्षुओ! ॰ स्त्रीरत्न प्रकट हो ता है। (वह स्त्री) अभिरूपा=दर्शनीया=प्रासादिका, परम वर्ण-पुष्कलता से युक्त, नातिदीर्घा, नातिहस्वा, नातिकृशा, नातिस्थूला (=न बहुत मोटी), न-बहुत काली, न-बहुत सफेद, मनुष्यवर्ण को पारकर तथा दिव्यवर्ण से कुछ घटकर होती है।…उस स्त्रीरत्न के काया का स्पर्श होता है, तूल के फाहे, या कपास के फाहे जैसा।…उस स्त्रीरत्न का गात्र शीतकाल में उष्ण और उष्णकाल में शीत होता है। उस ॰ के काया से चंदन की गंध आती है, मुख से कमल की गंध आती है।…वह स्त्री रत्न चक्रवर्ती राजा की पूर्वात्थायिनी (=पहिले जागने वाली), पश्चान्निपातिनी (=पिछे सोने वाली), ‘क्या-करना हैं’—सुनाने वाली, प्रिय-चारिणी, प्रियवादिनी होती है। वह…स्त्रीरत्न में से भी चक्रवर्ती राजा की अतिचारिणी नहीं होती, काया से तो क्या। भिक्षुओ! ॰ इस प्रकार का स्त्रीरत्न ॰।
(6) “और फिर, भिक्षुओं! ॰ गृहपति (=वैश्य)-रत्न प्रकट होता है। (पूर्व) कर्म के विपाक से उसे दिव्यचक्षु उत्पन्न होती है; जिससे मालिक-बेमालिक वाले (जमीन के गडे) खजानों को वह देखता है। वह चक्रवर्ती राजा के पास आकर यह कहता है—‘देव! आप बेफिक्र रहिये; आपके धनवाले कार्य को मैं करूँगा’। भिक्षुओ! पहिले समय में चक्रवर्ती राजा उस गृहपति-रत्न की परीक्षा के लिये, नाव में चढ़ गंगा नदी की मँझधार में जा गृहपति रत्न से वह बोला—‘गृहपति! मुझे सोने-अशर्फी (=हिरण्य-सुवर्ण) की जरूरत है’। ‘तो महाराज! इस वा उस तीर पर चले।’ ‘गृहपति! यहीं मुझे हिरण्य-सुवर्ण की जरूरत है।’ तब भिक्षुओ! गृहपतिरत्न दोनों हाथों से पानी को छूकर हिरण्य-सुवर्ण से भरे घडे निकालकर चक्रवर्ती राजा को दे यह बोला—‘इतना ही बस, महाराज! इतना ही पर्याप्त महाराज! पुज गया (=पुजित) महाराज! इतने से।’ चक्रवर्ती राजा ने कहा—‘इतना ही बस, गृहपति! ॰ पुज गया गृहपति! इतने से’। भिक्षुओं! इस प्रकार का गृहपति-रत्न ॰।
(7) “और फिर, भिक्षुओ! ॰ परिणायक-रत्न प्रकट होता है; (जो कि होता है) पंडित=व्यक्त, मेधावी। चक्रवर्ती राजा के पाने की चीज को प्राप्त कराने में, हटाने की चीज को दूर कराने में, रख छोडने लायक चीज को रख छोडने में समर्थ होता है। वह चक्रवर्ती राजा के पास आकर यह बोलता है—‘देव! आप बेफिक्र रहिये, मैं अनुशासन (=शासन) करूँगा।’ भिक्षुओं! ॰ इस प्रकार का परिणायक-रत्न प्रकट होता है।
“भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा इन सात रत्नों से युक्त होता है।
“किन चार ऋद्धियों से (युक्त होता है)?—(1) भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा अभिरूप=दर्शनीय=प्रासादिक, अन्य मनुष्यों से अत्यंत परमवर्ण-पुष्कलता (=परम सौंदर्य) से युक्त — चक्रवर्ती राजा इस प्रथम ऋद्धि से युक्त होता है।
(2) “और फिर, भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा अन्य मनुष्यों से अत्यंत अधिक दीर्घायु चिरस्थितिक होता है। ॰ इस द्वितीय ऋद्धि से युक्त होता है।
(3) “और फिर, भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा नीरोग=निरातंक होता है; अन्य मनुष्यों की अपेक्षा अत्यधिक समपाचन वाली, न-अति-शीत, न-अति-उष्ण पाचनशक्ति (=ग्रहणी) से युक्त होता हैं ॰ इस तृतीय ऋद्धि से युक्त होता है।
(4) “और फिर भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा ब्राह्मण गृहपतियों को प्रिय होता है, जैसे कि भिक्षुओ! पिता पुत्रों को प्रिय=मनाप होता है। इसी प्रकार ॰। ॰ राजा को ब्राह्मण गृहपति प्रिय होते हैं; जैसे कि पुत्र पिता के प्रिय=मनाप होते है।…। पहिले समय में, भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा चतुरगिनी सेना के साथ उद्यान भूमि में जा रहा था। तब भिक्षुओ! ब्राह्मण गृहपति ॰ राजा के पास आकर बोले—‘देव! धीरे धीरे जाइये, जिसमें कि हम अधिक देर तक (आपको) देख सकें।’ (तब) भिक्षुओं! ॰ राजा ने भी सारथी से कहा—‘सारथी! धीरे धीरे ले चलो, जिसमें कि ब्राह्मण गृहपति मुझे देर तक देख सकें। भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा इस चतुर्थ ऋद्धि से युक्त होता है।
“भिक्षुओ! चक्रवर्ती राजा इन चार ऋद्धियों से युक्त होता है।
“तो क्या मानते हो, भिक्षुओ! क्या चक्रवर्ती राजा इन सात रत्नों…, इन चार ऋद्धियों से युक्त होने के कारण सुख सौमनस्य अनुभव करेगा?”
“भन्ते! ॰ एक एक रत्न से युक्त होने के कारण भी सुख-सौमनस्य अनुभव करेगा; सातों रत्नों और चारों ऋद्धियों की तो बात ही क्या कहनी?”
तब भगवानल् ने हाथ भर के एक छोटे पत्थर को हाथ में ले भिक्षुओं को संबोधित किया—
“तो क्या मानते हो, भिक्षुओ! ॰ या हिमवान् पर्वतराज?”
“भन्ते! ॰ कला भाग को भी (यह) नहीं पहूँच सकता ॰।”
ऐसे ही भिक्षुओं! चक्रवर्ती राजा (अपने) सात रत्नों और चार ऋद्धियों से युक्त होने के कारण जो सुख सौमनस्य अनुभव करता है; दिव्य-सुख के मुकाबिले में उसकी गिनती भी नहीं हो सकती ॰।
“(तब) वह पंडित भिक्षुओ! कदाचित, कभी दीर्घ काल के बाद जब मनुष्य योनि में आता है; तो जो वह आढ्य, महाधनी, महाभोग, बहुत सोने चाँदी बहुत-वित्त-उपकरण वाले, बहुत धन धान्यवाले ऊँचे कुल हैं—क्षत्रिय महाशालकुल। ब्राह्मण ॰, या गृहपति (=वैश्य)-महाशालकुल, वैसे कुलों में उत्पन्न होता है। और वह अभिरूप=दर्शनीय प्रासादिक ॰ होता है। अन्न-पान वस्त्र-यान का ॰ लाभी होता है। ॰
“जैसे, भिक्षुओ! जुआरी पहिले ही दाव में महान् भोग-स्कंध (=धनराशि) को पा जाये। भिक्षुओ! यह कलिग्रह (=दाव, पाशा) स्वल्प-मात्र हैं;…; उससे कहीं बडा कलिग्रह यह है, जो कि वह पंडित काय-वचन-मन से सुचरित (=सुकर्म) करके, काया छोड़ मरने के बाद सुगति स्वर्ग-लोक में उत्पन्न होता है।
“भिक्षुओं! यह केवल परिपूर्ण पंडित-भूमि है।”
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Είθε όλα τα όντα να είναι ευτυχισμένα