ΜΝ 130
Devadūta sutta: देवदूत-सुत्तन्त
Devadūtasutta
Suññatavagga
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ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।
वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओं!”
“भदन्त!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—
“जैसे, भिक्षुओ! (आमने-सामने) जुडे दो घर हों; उनके बीच में खडा आँ वाला पुरूष मनुष्यांे को घर में प्रवेश करते भी, निकलते भी, टहलते थी, विचरते भी, देखे। इसी प्रकार भिक्षुओ! मैं अमानुष विशुद्ध दिव्य-चक्षु सें ॰ नरक में उत्पन्न हुये हैं। उसे भिक्षुओ! निरयपाल (=नरकपाल) अनेक बाहों से पकडकलर दिखलाते ह। तब यमराज प्रथम देवदूत के बारे में समनुयोग=सम्-अनुप्रहण समनुभाषण (=भाषण) करते हैं—‘हे पुरूष! मनुष्यों में क्या तूने प्रथम देवदूत को प्रकट हुआ नहीं देखा?’—‘नही देखा, भन्ते!’ तब उसे भिक्षुओ! यमराज यह कहते हैं—‘हे पुरूष! क्या मनुष्यों से तूने उतान (ही) सो सकने वाले, अपने मल-मूत्रमें लिपटे सोये, अबोध छोटे बच्चें को नहीं देखा?” वह ऐसा बोलता हैं—‘देखा, भन्ते!’ तब भिक्षुओ! उसे यमराज यह कहते हैं—‘हे पुरूष! जानकर, वृद्ध होते हुये तुझे तब क्या यह नहीं हुआ — मैं भी जातिधर्मा (=जन्म ने के स्वभाव वाला) हूँ’ जन्मने से परें नहीं हूँ। हन्त! मैं काय-वचन-मन से कल्याण (=अच्छा) कर्म करूँ?’ वह ऐसा बोलता हैं—‘नहीं कर सका भन्ते! मैंने प्रमाद (=भूल) किया भन्ते!’ तब, भिक्षुओं! उसे यमराज कहते हैं—‘हे पुरूष! प्रमादी होकर तूने काय-वचन-मन से कल्याण कर्म नहीं किया; तो हे पुरूष! तूने वैसा किया, वैसा प्रमाद किया। सो वह कर्म न माता ने किया, न पिता ने किया, न भाई ने ॰। न भगिनी ने ॰, न मित्र-अमात्यों ने ॰, न जात-बिरादरी वालो ने ॰, न श्रमण-ब्राह्मणों ने, न देवताओं ने किया; तूने ही इस पाप कर्म को किया; तू ही उसके विपाक को भोगेगा।’
“तब, भिक्षुओ! यमराज उसे प्रथम देवदूत के बारे में ॰ भाषण करके द्वितीय देवदूत के बारे में ॰ भाषण करते हैं—‘हे पुरूष! मनुष्यों में तूने द्वितीय देवदूत को प्रकट हुआ नहीं देखा?’—नहीं देखा, भन्ते!” तब उसे भिक्षुओं! यम्श्रज्ञज् यह कहते हैं—‘हे पुरूष! क्या तूने मनुष्यों में नहीं देखा,—टेढे होगये, दंड लेकर चलते, काँपते हुये चलते, आतुर, गत-यौवन, टूटे दाँत, सफेद बाल, इधर उधर हिलते-डुलते शिरवाले, झुर्री पडे, काले दाग (=तिलक) दगे शरीर वाले, टोटे (=गोपानसी) से वक्र जीर्ण स्त्री या पुरूष को? ॰ वह ऐसा बोलता है—‘देखा, भन्ते!’ तब उसे, भिक्षुओ! यमराज यह कहते हैं—‘हे पुरूष! तब जानकार वृद्ध होते हुये, तुझे क्या यह नहीं हुआ — मैं भी जरा-धर्मा (=बूढा होने वाला हूँ) जरा से परे का नहीं हूँ।’ हन्त! ॰ तू ही उसके विपाक को भोगेगा।’
“तब, भिक्षुओं! यमराज उसे ॰ तृतीय देवदूत के बारे में ॰ भाषण करते हैं—‘हे पुरूष! मनुष्यों में तूने तृतीय देवदूत को प्रकट हुआ नहीं देखा?’—‘नहीं देखा, भन्ते!’ तब उसे भिक्षुओं! यमराज यह कहते हैं—‘हे पुरूष! क्या तूने मनुष्यों में नहीं देखा—अपने मल-मूत्र में लिपटे सोये, दूसरो द्वारा उठाये जाते, दूसरो द्वारा सेवा किये जाते, बहुत ही बीमार दुःस्त्री या पुरूष को?‘॰। ‘हे पुरूष! तब जानकर वृद्ध होते हूये तुझे क्या यह नहीं हुआ — मैं भी व्याधि-धर्मा हूँ, व्याधि से परे नहीं हूँ? हन्त! ॰ तू ही उसके विपाक को भोगेगा।
“॰ चतुर्थ देवदूत के बारे में ॰ भाषण करते हैं—॰।—‘हे पुरूष! क्या तूने मनुष्यों में नही देखा—राजा लोग चोर, आग लगाने वाले को पकडकर नाना प्रकार के दंड (=कर्म कारणा) देते हैं—चाबुक से भी मरवाते हैं ॰ तलवार से शीश कटवाते हैं?’ ॰। ॰ तुझे क्या यह नहीं हुआ — जो पाप कर्म करते हैं, वह इसी जन्म में इस प्रकार से नाना दंडो को भोगते हैं? हन्त! ॰ तू ही उसके विपाक को भोगेगा।
“॰ पंचम देवदूत के बारे में ॰ भाषण करते हैं—॰‘हे पुरूष! क्या तूने मनुष्यों में नही देखा फूले नीला पडे या पीब भरे हो गये एक दिन दो दिन तीन दिन के मुर्दे को?’ ॰। ॰ तुझे क्या यह नहीं हुआ — मैं भी मरण-धर्मा हूँ, मरण से परे नहीं हूँ हन्त! ॰ तू ही उसके विपाक को भोगेगा।
“तब, भिक्षुओ! यमराज उस (पुरूष) से पंचम देवदूत के बारे में ॰ भाषणकर चुप हो गये। तब…उसे ले जाकर निरयपाल, पंच-विध-बंधन नामक दंड (=कर्मकारण) करते हैं—॰ (आग से) व्याप्त हो सर्वदा स्थित रहती है। भिक्षुओ! उस महानिरय (=महानरक) के पूर्व दीवार से उठी लौ (=अर्चि) पच्छिम की दीवा से टकराती है। पच्छिम दीवार से उठी लौ पूर्व की दीवार से टकराती है। उत्तरी दीवार से उठी लौ दक्खिन की दीवार से टकराती है; दक्खिन की दीवार से उठी लौ उत्तर की दीवार से टकराती है। नीचे से उठी लौ ऊपर को टकराती है, ऊपर से उठी लौ नीचे को टकराती है। वह वहाँ दुःखा, तीब्रा, खरा, कटुका, वेदना अनुभव करता है, किन्तु तब तक नहीं मरता, जब तक कि उसके पाप कर्म का अन्त नहीं हो जाता।
“भिक्षुओ! ऐसा समय होता है, जब कदाचित् कभी दीर्घकाल के बाद उ महानिरय का पूर्वद्वार खूलता है, वह (प्राणी) उस ओर शीघ वेग से दौडता है। शीघ्र से दौडते वक्त उसकी छवि (=ऊपरी चमडा) भी दग्ध होती है, चर्म भी ॰, मांस भी ॰, स्नायु भी ॰, अस्थि भी धुआँ देती है। ऐसे ही वह (वहाँ) रहता है। जब भिक्षुओ! उसे वहाँ प्राप्त हुये बहुत (काल) हो जाता है; तब वह द्वार बंद हो जाता है। वह वहाँ दुःखा ॰।
“भिक्षुओ! ऐसा समय होता है ॰ पश्चिमद्वार ॰। ॰ उत्तरद्वार ॰। ॰ दक्षिणद्वार ॰।
“भिक्षुओं ऐसा समय होता है, जब (अन्त में) कदाचित ॰ उस महानिरयक का पूर्वद्वार खुलता है, वह उस ओर शीघ्र वेग से दौडता है। ॰ अस्थि भी धुआँ देती है। ऐसे ही वह (वहाँ) रहता है। (तब) वह उस द्वार से निकलता है। भिक्षुओ! उस महाद्वार के बाद, लगे हुये महान् गूथ-निरय (=विष्टा का नरक) है। वह वहाँ गिरता है। भिक्षुओ! उस गूथनिरय में सूची मुख (=सुई जैसे तेज नोक के मुँह वाले) प्राणी (उसकी) छवि छेदते है, छवि को छेदकर चर्म को छेदते है, ॰ मांस को॰
॰ स्नायु को ॰, ॰ अस्थि को ॰, ॰ अस्थिमज्जा को ॰। वह वहाँ दुःखा ॰।
“भिक्षुओं! उस गूथ-निरय के पास लगा हुआ कुक्कुल-निरह है; वह वहाँ गिरता है। वह वहाँ दुःखा ॰।
“भिक्षुओं! उस कुक्कुल-निरय के पास लगा हुआ, योजन भर ऊँचा महान् सिब्बलि-वन हे। वहाँ आदीप्त=ज्वलित आग हो गये दस अंगुल लम्बे काँटे है, उन पर (उसे) चढाते उतारते हैं। वह वहाँ दुःखा ॰।
“भिक्षुओं! उस सिब्बलि-वन के पास लगा हुआ, महान् असिपत्र-वन है। वह वहाँ प्रविष्ट होता है। हवा से प्रेरित पत्ते गिरकर हाथ को भी काटते हैं, पैर को भी ॰, हाथ-पैर को भी ॰, कान को भी ॰, नाक को भी ॰, कान-नाक को भी ॰। वहा वहाँ दुःखा ॰।
“भिक्षुओं! उस असिपत्रवन के पास लगी हुई क्षारोदन नदी (=खारे जल की नदी) है। वह उसमें गिरता है। वहाँ वह धार की ओर (=अनुसोतं) भी बहता, उलटी धार भी बहता है। वह वहाँ दुःखा, तीव्रा, खरा, कटुका, वेदना अनुभव करता है; किन्तु तब तक नहीं मरता, जब तक कि उसके पाप कर्म का अन्त नहीं हो जाता।
“तब भिक्षुओं! उसे निरय-पाल निकाल कर स्थल पर रख यह कहते हैं—‘हे पुरूष! तू क्या चाहता है?’ वह यह कहता है—‘भन्ते! मैं भूखा हूँ’। तब उसे, भिक्षुओ! निरयपाल आदीप्त ॰ तप्त लोहे के छड (=शंकु) से मुँह को फाडकर, आदीप्त=प्रज्वलित=सज्योतिर्भूत आदीप्त ॰, तप्त लोहूकूट को मुँह में डालते हे। वह उसके औठ को भी दहता है, कंठ को भी ॰, उर को भी ॰, आँत को भी ॰, अंतडी (=अंतगुण) को भी लते हुये अधोभाग से निकल जाता है। वह वहाँ दुःखा ॰।
“तब उसे भिक्षुओ! निरयपाल (=यमदूत) यह कहते हैं—‘हे पुरूष! तू क्या चाहता है?’ वह यह कहता हैं—‘भन्ते! मैं प्यासा हूँ।’ तब उसे भिक्षुओ! निरयपाल आदीप्त ॰ तप्त लोहे की छड से मुँह को फाडकर, आदीप्त ॰ तपे ताँबे (=ताम्र लोह) को सींचते हैं। ॰ अँतडी को लेते हुये अधोभाग से निकल जाताहै। वह वहाँ दुःखा ॰।
“तब उसे, भिक्षुओ! निरयपाल फिर महानिरय में डालते हैं।
“भिक्षुओ! भूतपूर्व (=पूर्वकाल) में यमराज को ऐसा हुा’—‘लोक में जो पाप=अकुशल कर्म करते हैं, वह इस प्रकार की नाना यातनायें (=कर्मकारणा) पाते है। अहोवत! मैं मनुष्यत्व को प्राप्त होऊँ, और लोक में तथागत अर्हत् सम्यक्-सम्बुद्ध उत्पन्न होवे, उन भगवान् का मैं सत्संग (=पर्यूपासन) करूँ, और वह भगवान् मुझे धर्मोपदेश करें। उन भगवान् के धर्म को मैं समझूँ’। भिक्षुओ! यह मैं किसी दूसरे श्रमण ब्राह्मण से सुनकर नहीं कर रहा हूँ; बल्कि जो मुझे स्वयं ज्ञात=इष्ट=विदित है, उसी को कहता हूँ।”
भगवान् ने यह कहा, यह कह कर सुगत, शास्ता ने यह भी कहा—
“देवदूत प्रेरित होकर (जो) जो मनुष्य प्रमाद करते हैं।
वह नर नीची योनि में प्राप्त हो, दीर्घकाल तक शोक करते हैं।
जो सन्त=सत्पुरूष यहाँ पर देवदूत द्वारा,
प्रेरित हो, आर्यधर्म में कभी प्रमाद नहीं करते।
जन्म-मरण के भव (सागर) में, ओर उपादान में भय देख जन्म-मरण के क्षय से उपादान रहित हो विमुक्त होते है।
वह क्षेम को प्राप्त, सुखी, इसी जन्म में निर्वाण-प्राप्त,
सारे बैर और भय से पार, सारे दुःख को पार हो गये।”
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
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