MN 139
Araṇavibhaṅga sutta: अरणविभंग-सुत्तन्त
Araṇavibhaṅgasutta
Vibhaṅgavagga
Traducciones
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् सावत्थि (श्रावस्ती) में अनाथपिण्डिक के अाराम जेतवन में विहार करते थे । वहां भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओ!”
“भदन्त!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ! अरण-विभंग तुम्हे उपदेशता हूँ, उसे सुनों, अच्छी तरह मन में करों, कहता हूँ।”
“अच्छा, भन्ते!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—”(1) हीन (=निकृष्ट)=ग्राम्य, पृथग्जनिक (=अनाड़ियों के), अनार्य, अनर्थ-युक्त काम के सुख में अनुयुक्त (=लग्न) न होना चाहिये; और नहीं दुःख, अनार्य, अनर्थयुक्त आत्म-पीडा में अनुयुक्त होना चाहिये। (2) भिक्षुओ! इन दोनो अन्तों (=अतियों) को न ले, तथागत ने मध्यम मार्ग को खोज निकाला हैं, (जो कि) आँख देने वाला, ज्ञान करने वाला, उपशम-अभिज्ञ-संबोध-निर्वाण के लिये है। (3) उत्पादन को भी जाने, अ-प्रसादन को भी जाने। उत्पादन को जान और अ-प्रसादन को जानकर, न उत्पादन करे, न अ-प्रसादन करे; धर्म ही का उपदेश करे। (4) सुख-विनिश्चय को जाने। सुख-विनिश्चय को जानकर, अपने भीतर के सुख में अनुयुक्त होवे। (5) एकान्त में बात (=अववाद) नहीं करे। मुँह पर बहुत धीमा न बोले। (6) जल्दी बिना बोले, जल्दी जल्दी न (बोले)। (7) देशों की भाषा (=जनपद-निरूक्ति) को न घुसावें, ‘संज्ञा के पीछे न अतिधावन करें’—यह अरण-विभंग का उद्देश है।
(1) “यह जो कहा—‘॰ काम के सुख में अनुयुक्त न होना चाहिये, और नहीं ॰ आत्म-पीडा में अनुयुक्त होना चाहिये’—सो किसलिये कहा?—जो काम (=विषयभोग) के संबंध से सुखी होने वाले का सौमनस्य के साथ लग्न होता है, (वह) हीन ॰ अनर्थयुक्त है। यह धर्म (=कामसुख) दुःख; उपघात-उपायास (=हैरानी परेशानी) दाह से युक्त है, (यह) मिथ्या-प्रतिपदा (=झूठा मार्ग) है। जो काम के संबंध से सुखी होने के सौमनस्य के अनुयोग (=संपर्क) का अनुयोग न होना है, (वह है) हीन ॰ अनर्थ-युक्त। यह धर्म दुःख-उपघात-उपयास दाह से रहित हैं, सम्यक्-प्रतिपदा (=ठीक मार्ग) है। जो आत्म-पीडा में लगना है, (यह धर्म) दुःख, अनार्य, अनर्थ-युक्त है। यह धर्म दुःख-उपघात-उपायास-दाह से युक्त है; यह मिथ्या-प्रतिपदा है। जो आत्म-पीडा के उद्योग में योग न देना, दुःख-अनार्य, अनर्थ युक्त है। यह धर्म दुःख-उपघात-उपायास-दाह से रहित, सम्यक् प्रतिपदा है। यह जो कहा—‘॰ काम के सुख में अनुयुक्त नहीं होना चाहिये, और नहीं ॰ आत्मपीडा में अनुयुक्त होना चाहा’—वह इसीलिये कहा।
(2) “यह जो कहा—‘इन दोनों अन्तों को न ले, तथागत ने मध्यम मार्ग खोज निकाला है ॰’—सो किसलिये कहा?—यही (वही) आर्य-अष्टांगिक-मार्ग है; जैसे कि—सम्यक्-दृष्टि, सम्यक्-संकल्प, सम्यक्-वचन, सम्यक्-कर्मान्त, सम्यग्-आजीव, सम्यक्-व्यायाम, सम्यक्-स्मृति, (और) सम्यक्-समाधि। यह जो कहा—उन दोनों अन्तों (=अतियों) को न ले तथागत ने मध्यम-मार्ग खोज निकाला है॰’—सो इसीलिये कहा।
(3) “उत्सादन को भी जाने, अ-प्रसादन को भी जाने ॰ धर्म ही का उपदेश करें’—सो किसलिये कहा?—कैसे, भिक्षुओं! उत्सादना, और अप्रसादना होती है, किन्तु धर्मदेशना (=धर्म का उपदेश) नहीं होती?—‘जो काम के संबंध से सुखी होने वाले का सौमनस्य ॰ परिदाह से युक्त है, वह मिथ्याप्रतिपन्न है—(=झूठे मार्ग पर आरूढ) हैं’—इस प्रकार कोई कोई दूसरे को अ-प्रसादित (=नाराज) करते है। जो काम के संबंध से सुखी होने वाले के सौमनस्य के अनुयोग का अनुयोग न होना ॰ सम्यक्-प्रतिपदा है—इस प्रकार (कह) कोई कोई दूसरे को उत्सादित (=प्रसन्न) करते है। जो (पुरूष) दुःख, अनार्य, अनर्थयुक्त आत्मपीडा के व्यापार में लगे हुये हैं; वह सभी दुःख-उपघात-उपायास-परिदाह से युक्त हैं, वह मिथ्या मार्ग पर आरूढ (=मिथ्या-प्रतिपन्न) हैं’—इस प्रकार (कह) कोई कोई दूसरे को अ-प्रसादित (=नाराज) करते हैं। जो ॰ आत्मपीडा के व्यापार में लगे नहीं है, वह सभी दुःख-उपघात-उपायास-परिदाह से युक्त नहीं है, वह ठीक मार्ग पर आरूढ हैं—इस प्रकार (कह) कोई कोई दूसरे को प्रसादित (=खुश) करते है। जिस किसी का भव-संयोजन (=भवबंधन) प्रहीण (=नष्ट) नहीं हुआ, वह सभी दुःख-उपघात-उपायास-परिदाह से युक्त हैं। वह मिथ्या मार्ग पर आरूढ हैं—इस प्रकार (कह) कोई कोई दूसरें को अ-प्रसादित करते हैं। वह जिस किसी का भवसंयोजन प्रहीण हो गया है, वह सभी दुःख-उपघात-उपायास-परिदाह से रहित है। ठीक मार्ग पर आरूढ है—इस प्रकार (कह) कोई कोई दूसरे को उत्सादित (=प्रसन्न) करते हैं।—इस प्रकार भिक्षुओ! उत्सादना और अ-प्रसादना (=नाराज करना) होती है, किन्तु धर्म वेदना नहीं होती।
“कैसे भिक्षुओ! उत्सादना और अ-प्रसादना नहीं होती, (बल्कि) धर्मदेशना (होती हैं)?—जो काम के संबंध से सुखी होने वाले का सौमनस्य परिदाह से युक्त है, वह मिथ्या मार्ग पर आरूढ हे’—यह नहीं कहता। यह अनुयाग दुःख है दुःख-उपघात-उपायास-परिदाह से युक्त हैं, मिथ्या मार्ग है—इस प्रकार (कह) दूसरे को धर्म ही को उपदेशता है। जो काम के सम्बन्ध से सुखी, हीन ॰ अनर्थयुक्त सौमनस्य के अनुयोग में अनुयुक्त नहीं है, वह सभी दुःख-उपधात-उपायास-परिदाह से रहित हैं, ठीक मार्ग पर आरूढ हैं—यह नहीं करता। ‘अन्-अनुयोग अ-दुःख है। और यह धर्म उपघात-उपायास-परिदाह से रहित है, ठीक मार्ग है—इस प्रकार (कह) दूसरे को धर्म ही उपदेशता है। ‘जो दुःख, अनार्य, अनर्थयुक्त आत्म-पीडा के व्यापार में अनुयुक्त (लग्न) हैं; वह सभी दुःख-उपघात-उपायास-परिदाह से युक्त हैं, मिथ्या-मार्ग पर आरूढ हैं—यह नहीं कहता। (बल्कि) अनुयोग सदुःख है, यह धर्म उपघात-उपायास-परिदाह से युक्त है, मिथ्या मार्ग हैं—इस प्रकार दूसरे को धर्म को ही उपदेशता है। जो दुःख, अनार्य, अनर्थयुक्त आत्मपीडा के व्यापार में अनुयुक्त (=लग्न) नहीं है; वह सभी दुःख-उपघात-उपायास-परिदाह-रहित है, ठीक मार्ग पर आरूढ हैं’—यह नहीं कहता। (बल्कि कहता है)—अनुयोग न करना दुःख ॰ रहित है, ठीक मार्ग है—इस प्रकार दूसरे को धर्म ही उपदेशता है। ‘जिन किन्हीं का भव-संयोजन (=भव-बन्धन) नष्ट नहीं हुआ, वह सभी दुःख ॰—सहित हैं, मिथ्या मार्ग पर आरूढ हैं’—यह नहीं कहता। (बल्कि कहता है)—‘भव-संयोजन के नष्ट न होने पर भव (=जन्म मरण) भी नष्ट नहीं होता हैं’—इस प्रकार ॰ धर्म ही को उपदेशता है। ‘जिन किन्हीं का भव-संयोजन नष्ट हो गया, वह सभी दुःख ॰ रहित हैं, ठीक मार्ग पर आरूढ हैं’—यह नहीं कहता। (बल्कि कहता हैं)—‘भव-संयोजन के नष्ट होने पर भव भी नष्ट हो जाता हैं’—इस प्रकार ॰ धर्म ही को उपदेशता है।—इस प्रकार, भिक्षुओ! न उत्सादना होती है, न अ-प्रसादना, (बल्कि) धर्मदेशना होती है। यह जो कहा—‘उत्सादन को भी जाने ॰ धर्म ही का उपदेश करें’—सो इसीलिये कहा।
(4) “जो यह कहा—‘सुख-विनिश्चय को जाने। सुख विनिश्चय को जानकर, अपने भीतर सुख में अनुयुक्त होवे’—सो किसलिये कहा?—भिक्षुओ! यह पाँच काम-गुण हैं। कौनसे पांच?—(1) इष्ट ॰ चक्षुद्वारा विज्ञेय रूप। ॰ काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य। भिक्षुओ! यह पाँच कामगुण है। भिक्षुओ! इन पाँच कामगुणों के द्वारा जो कुद सुख, सौमनस्य उत्पन्न होता है; वह कहा जाता है काम-मुख, मीढसुख, पृथग्जनों का सुख=अनार्य-सुख। (वह) न-सेवितव्य=न भावयितव्य=न बहुलीकर्तव्य, इस सुख से भय खाना चाहिये—मैं यह कहता हूँ। यहाँ, भिक्षुओ! भिक्षु कामों से विरहित ॰ प्रथम ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। ॰ द्वितीय-ध्यान को ॰। ॰ तृतीय ध्यान को ॰। ॰ चतुर्थ ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। यह कहा जाता है, निष्कामता-सुख, प्रविवेक-सुख, उपशम-सुख, संबोधि-सुख। यह सेवितव्य=भावयितव्य, बहुली-कर्तव्य है, इस सुख से भय नहीं खाना चाहिये—मैं यह कहता हूँ। जो यह कहा—‘सुखविनिश्चय को जाने ॰’—सो इसीलिये कहा।
(5) “यह जो कहा—‘एकान्त में बात नहीं कहे, मुँह पर बहुत धीमा न बोले’—सो किसलिये कहा?—वहाँ भिक्षुओ! जिस एकान्त-वाद को अ-भूत=अ-तथ्य (=अ-सत्य), अनर्थयुक्त को प्राप्त जाने, उस एकान्तवाद को न कहे। और जिस एकान्तवाद को भूत=तथ्य (किन्तु) अनर्थ-युक्त जाने, उस ॰ को भी न कहना, भिक्षुओ! सीखे। और जिस रहोवाद (=एकांत में कहने की बात) को भूत=तथ्य, सार्थक समझे, तो उस रहोवाद के कथन के लिये कालज्ञ (=काल देख कर कहने वाला) होना चाहिये। वहाँ भिक्षुओ! जिस सम्मुख के क्षीणवाद (=धीमे बोलने की बात) को अ-भूत=अ-तथ्य, अनर्थ-युक्त समझे, तो उस ॰ को न कहे। जिस ॰ को भूत=तथ्य (किन्तु) अनर्थ-युक्त जाने, उस ॰ को भी न कहे। जिस ॰ को भूत=तथ्य (और) सार्थक जाने, उस ॰ के कथन के लिये कालज्ञ होना चाहिये। यह जो कहा—‘एकान्त में न कहें, मुँह पर बहुत धीमा न बोले’—सो इसीलिये कहा।
(6) “जो यह कहा—‘जल्दी बिना बोले, जल्दी जल्दी न बोले’—सो किसलिये कहा?—वहाँ, भिक्षुओं! जल्दी बोलने वाले के शरीर को भी कष्ट होता है, चित्त भी पीडित होता है, स्वर भी विकृत होता है, कण्ठ भी आतुर होता हैं, अ-विस्पष्ट (=साफ नहीं) भी होता है, जल्दी बोलने वाले की बात (दूसरों को) अ-विज्ञेय होती है। वहाँ, भिक्षुओ! जल्दी जल्दी न बोलने वाले के शरीर को भी कष्ट नहीं होता, चित्त भी पीडित नहीं होता, स्वर भी विकृत नहीं होता, कण्ठ भी आतुर नहीं होता, विस्पष्ट भी होता हैं, जल्दी जल्दी न बोलने वाले की बात (दूसरों को) विज्ञेय (=सुगम) होती है। जो यह कहा — ‘जल्दी बिना बोले ॰ ’ — सो इसीलिये कहा।
(7) “जो यह कहा — देशों की भाषा का आग्रह न कर, न संज्ञाओं के पीछे धावन करे — सो किसलिए कहा? — कैसे भिक्षुओ! देहाती भाषा से अभिनिवेश (आग्रह) होता है? और संज्ञा से अतिसार (बहुत धावन)? यहां भिक्षुओ वही (वस्तु) किन्हीं-किन्हीं जनपदों में पाती भी पुकारी जाती (संज्ञा) है, पत्त ॰ वित्त भी ॰ शराव भी ॰, धारोप भी ॰, पोण भी ॰, पिसीलव भी ॰। इस प्रकार जैसे-जैसे उन-उन जनपदों में पुकारते हैं, वैसे-वैसे दृढ़ता से ग्रहण कर, जिद (=अभिनिवेश) के साथ व्यवहार करता है — ‘यही सत्य है, और सब मिथ्या’। इस प्रकार भिक्खुओ! जनपद-भाषा में अभिनिवेश (जिद्) होती है, और संज्ञा से अतिसार नहीं होता? — यहां, भिक्खुओ! वही (वस्तु) किन्हीं जनपद में पाती पुकारी जाती है, ॰ पिसीलव भी ॰। इस प्रकार जैसे-जैसे इसे उन उन जनपदों में पुकारते हैं, ‘वह आयुष्मान् इसके बारे में (वह शब्द) व्यवहृत करते हैं’ — यह (सोच) वैसे ही वैसे व्यवहार करता है, (किंतु) आग्रह बिना। इस प्रकार, भिक्खुओ! देशों की भाषाओं का आग्रह नहीं होता, और न संज्ञाओं के पीछे धावन होता है। जो यह कहा — ‘देशों की भाषा का आग्रह न करे, न संज्ञाओं के पीछे अतिधावन करे’, — सो इसलिए कहा।
‘वहां भिक्खुओ! जो काम सम्बन्ध से सुखी के हीन … अनर्थयुक्त सौमनस्य का अनुयोग(=सम्बन्ध) है, वह स-दुख है। यह धर्म अपघात-उपायास-परिदाह-युक्त है, (वह) मिथ्या मार्ग है। इसलिए यह धर्म स-रण है। वहां, भिक्खुओ! जो…हीन… अनर्थ युक्त सौमनस्य के अनुयोग में अनुयोग(=सम्बन्ध) न करता है, वह दुख-रहित है; यह धर्म उपघात-उपायस-परिदाह-रहित है, ठीक मार्ग है। इसलिए यह धर्म अ-रण(=दुख रहित) है। वहां, भिक्खुओ! जो दुख, अनार्य, अनर्थ युक्त, स्व-पीड़ा है, वह दुख सहित; यह धर्म उपघात-उपायस-परिदाह-युक्त है, मिथ्या मार्ग है। इसलिए स-रण है। वहां, भिक्खुओ! जो दुख… अनर्थ युक्त स्व-पीड़ा के अनुयोग में अनुयोग न करना है, वह दुख-रहित है, … ठीक मार्ग है। इसलिए यह धर्म अ-रण है।
“वहां, भिक्खुओ! जिस आंख देने वाले…मध्यम मार्ग(=मज्झिमा पटिपदा) को तथागत ने खोज निकाला, यह धर्म दुख रहित है, अपघात-उपायास-परिदाह-सहित है, ठीक मार्ग है। इसलिए यह धर्म अ-रण है।”
“वहां, भिक्खुओ! जो यह उत्सादन(=खुश करना) अ-प्रसादन(=नाराज करना), और धर्म देशना है, यह धर्म दुख-सहित है,…मिथ्या मार्ग है। इसलिए यह धर्म स-रण।”
“वहां, भिक्खुओ! जो यह उत्सादन बिना, अ-प्रसादन बिना धर्म देशना है; यह धर्म दुख-रहित है, … ठीक मार्ग है। इसलिए… अ-रण है।”
“वहां, भिक्खुओ! जो यह काम-सुख, मृद्ध-सुख, पृथग्जन का सुख-अनार्य का सुख है; यह धर्म दुख-सहित है,… झूठा मार्ग है। …स-रण है।”
“…जो निष्कामता-सुख…संबोधि-सुख है। यह धर्म अ-दुख है,… ठीक मार्ग…अ-रण है।
“…जो रहोवाद अ-भूत=अ-तथ्य, अनर्थ युक्त है, यह धर्म सुख-सहित है, …मिथ्या मार्ग है। …स-रण है।
“…जो रहोवाद भूत, तथ्य, अनर्थ युक्त है। यह धर्म दुख सहित है,…मिथ्या मार्ग है। …स-रण है।
“जो रहोवाद भूत=तथ्य, सार्थक है यह धर्म दुख-रहित, ठीक मार्ग है। …अ-रण है।
“जो सम्मुख में क्षीण-वाद अभूत=अ-तथ्य, अनर्थ युक्त है।…दुख सहितहै,…मिथ्यामार्ग है। स-रण है।
“॰ जो सम्मुख में क्षीण-वाद भूत=तथ्य, अनर्थयुक्त है। ॰ दुःख-सहित है, ॰ मिथ्या मार्ग है। ॰ स- रण है।
“॰ जो सम्मुख में क्षीण-वाद भूत=तथ्य और सार्थक है। ॰ दुःख-रहित है, सच्चामार्ग है। ॰ अ-रण है।
“॰ जो यह जल्दी करने वाले का बोलना है! ॰ दुःख-सहित हैं, ॰ मिथ्यामार्ग है। ॰ स-रण है।
“॰ जो यह जल्दी न करने वाले का बोलना है। ॰ दुःख-रहित है, ॰ ठीक मार्ग है।॰ अ-रण है।
“॰ जो यह, जनपद भाषा में अभिनिवेश (=दुराग्रह), और संज्ञा में अतिसार (=धावना) है। ॰ दुःख-सहित है। ॰ मिथ्यामार्ग है। ॰ है।
“॰ जो यह जनपद-भाषा में अभिनिवेश (नहीं) और संज्ञा में अतिसार नहीं है। ॰ दुःख-रहित है, ॰ ठीक मार्ग है। ॰ अ-रण है।
“इसलिये, भिक्षुओ! स-रण और अ-रण धर्मों को जानो। स-रण धर्म को जानकर, अ-रण धर्म को जानकर, ‘हम अ-रण (=दुःख-रहित) प्रतिपदा (=मार्ग) पर आरूढ होंगे’—इस प्रकार तुम्हें सीखना चाहिये।
“भिक्षुओ! सुभूति कुल-पुत्र अ-रण प्रतिपदा पर आरूढ हो।’
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।
Sobre esta traducción
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Que todos los seres sean felices