MN 150
Nagaravindeyya sutta: नगर-विंदेय्य-सुत्तन्त
Nagaravindeyyasutta
Saḷāyatanavagga
Traducciones
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् महान् भिक्षुसंघ के साथ, कोसल (देश) में चारिका करते, जहाँ नगर-विंदेय्य नामक कौसलों का ब्राह्मण-ग्राम था, वहाँ पहुँचे।
नगर विंदेय्य के रहने वाले ब्राह्मण गृहपतियों ने सुना—शाक्यकुल से प्रब्रजित शाक्यपुत्र श्रमण गौतम महान् भिक्षु संक्ष के साथ चारिका करते नगर विंदेय्य आ पहुँचे है। उन भगवान् गौतम का ऐसा मंगल-कीर्ति शब्द उठा हुआ है—वह भगवान् अर्हत् हैं ॰ ऐसे अर्हतों का दर्शन अच्छा होता है।
तब नगर विंदेय्य-निवासी ब्राह्मण गृहस्थ जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये; ॰ चुपचाप एक ओर बैठ गये।
एक ओर बैठे नगर विंदेय्य-निवासी ब्राह्मण-गृहपयिों से भगवान् ने यह कहा—
“यदि, गृहपतियों! तुम्हे अन्य मतवाले (=अन्य तीर्थिक) परिब्राजक यह पूछें—‘गृहपतियों! कैसे श्रमण ब्राह्मणों का सत्कार=गुरूकार, मानन=पूजन नहीं करना चाहिये?’ ऐसा पूछने पर, गृहपतियों! तुम उन अन्यतीर्थिक परिब्राजकों को यह कहना—‘जो श्रमण-ब्राह्मण चक्षु (द्वारा) विज्ञेय रूपों में अ-वीत-राग, अ-वीत-द्वेष, अ-वीत-मोह, भीतर जिनका चित्त शांत नहीं हुआ है, जो काय-वचन-मन से सम-विषय (=बुरा-भला) आचरण करते हैं। ऐसे श्रमण-ब्राह्मणों का सत्कार ॰ नहीं करना चाहिये। सो किस हेतु?—हम भी चक्षुर्विज्ञेय रूपों में अ-वीत-राग ॰ हममें भी काय-वचन-मन से सम-विषम आचरण करते हैं। उन्हें हम आगे धर्माचरण करते नहीं देखते हैं, इसलिये उन श्रमण ब्राह्मणों का सत्कार ॰ नहीं करना चाहिये’।
“जो श्रमण-ब्राह्मण श्रोत्र-विज्ञेय शब्दों में अ-वीतराग ॰। ॰ घ्राण-विज्ञेय गंधों ॰। ॰ जिह्वा-विज्ञेय रसों में ॰। ॰ काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्यों में ॰। ॰ मनो-विज्ञेय धर्मों में, अ-वीतराग ॰। ॰ सत्कार ॰ नहीं करना चाहिये।
“यदि, गृहपतियों! अन्यतीर्थिक परिब्राजक यह पूछे—‘गृहपतियो! कैसे श्रमण-ब्राह्मणों का सत्कार ॰ करना चाहिये?’—ऐसा पूछने पर गृहपतियो! तुम उन ॰ को यह कहना—‘जो श्रमण-ब्राह्मण चक्षुविज्ञेय रूपों मे वीत-राग, वीत-द्वेष, वीत-मोह हैं; भीतर जिनका चित्त शांत हैं; जो काय-वचन-मन से समचर्या (=धर्माचरण) करते हैं, ऐसे श्रमण-ब्राह्मणों का सत्कार ॰ करना चाहिये। सो किस हेतु?—हम चक्षुर्विज्ञेय रूपों में अ-वीतराग ॰, उन्हें हम आगे यह धर्मा-चरण करते देखते है। इसलिये उन आप श्रमण-ब्राह्मणों का सत्कार ॰ करना चाहिये’।
‘जो श्रमण ब्राह्मण श्रोत विज्ञेय शब्दों में वीतराग ॰। ॰ घ्राण-विज्ञेय गंधों में ॰। ॰ जिह्वा-विज्ञेय रसों में ॰। ॰ काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्यों में ॰। ॰ मनोविज्ञेय धर्मो में वीतराग ॰। ॰ सत्कार ॰ करना चाहिये।…
“यदि गृहपतियों! अन्यतीर्थिक परिब्राजक यह पूछें—‘गृहपतियों! (उन) आयुष्मानों के क्या आकार है, क्या अन्वय हैं; जिससे कि तुम आयुष्मान् ऐसा कह रहे हो? (कैसे) जरूर ही वह आयुष्मान् वीतराग हैं या राग हटाने में लग्न हैं, वीतद्वेष हैं, या द्वेष हटाने में लग्न हैं; वीत-मोह हैं, या मोह हटाने में तत्पर हैं’ ऐसा पूछने पर, गृहपतियों! तुम उन ॰ को यह कहना—‘क्योंकि वह आयुष्मान् अरण्य=वनप्रस्थ में एकान्त शयन-आसन का सेवन करते है। वहाँ वैसे चक्षु-र्विज्ञेय रूप तो नहीं, जिन्हें देख देख वह अभिरमण करें। वहाँ वैसे श्रोवविज्ञेय शब्द तो नहीं हैं, जिन्हें श्रमण कर कर वह अभिरमण करें। ॰ घ्राण-विज्ञेय गंध ॰; जिन्हें सूँघ सूँघ कर ॰। ॰ जिह्वा-विज्ञेय रस ॰; जिन्हें चख चख कर ॰। ॰ काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य ॰, जिन्हें छू छू कर ॰। आवुसों! यह आकार हैं=यह अन्वय हैं; जिससे हम यह कहते हैं—जरूर ही वह आयुष्मान् वीत-राम ॰ या मोह हटाने में तत्पर है। ऐसा पूछने पर गृहपतियें! तुम उन अन्यतीर्थिक परिब्राज को ऐसा कहना।”
ऐसा कहने पर नगर-विंदेय्य-निवासी ब्राह्मण गृहपतियों ने भगवान् से यह कहा—
“आश्चर्य! भो गौतम! आश्चर्य!! भो गौतम! जैसे औंधे को सीधा कर दे ॰ यह हम भगवान् गौतम की शरण जाते हैं, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आज से आप गौतम हमें अंजलिबद्ध शरणागत उपासक धारण करें।
Sobre esta traducción
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Que todos los seres sean felices