MN 84
Madhura sutta: माधुरिय-सुत्तन्त
Madhurasutta
Rājavagga
Traducciones
ऐसा मैंने सुना —
एक समय आयुष्मान् महाकात्यायन मधुरा (मथुरा) में गुन्दवन में विहार करते थे। माथुर (मथुरा के) राजा अवन्तिपुत्र ने सुना, कि श्रमण कात्यायन मथुरा में गुन्दवन में विहार कर रहे है। उन आप कात्यायन का ऐसा कल्याण कीर्तिशब्द (=यश) उठा हुआ है—“वह (श्रमण कात्यायन) पंडित=व्यक्त, मेधावी, बहुश्रुत, चित्तकथी कल्याण-प्रतिभावान बुद्ध हैं और अर्हत् हैं। ऐसे अर्हतों का दर्शन अच्छा होता ।”
तब माथुर राजा अवन्तिपुत्र उत्तमोत्तम यानों को जुतवाकर ॰ आयुष्मान् महाकात्यायन के दर्शनार्थ मथुरा से निकला। जितना यान का रास्ता था, उतना यान से जा, (फिर) यान से उतर पैदल ही, जहाँ आयुष्मान् महाकात्यायन थे, वहाँ…जाकर आयुष्मानृ महाकात्यायन के साथ…सम्मोदन कर एक ओर बैठा। एक ओर बैठे ॰ राजा अवन्तिपुत्र ने आयुष्मान् महाकात्यायन से यह कहा—
“भो कात्यायन! ब्राह्मण कहते हैं—ब्राह्मण ही श्रेष्ठवर्ण हैं, और वर्ण हीन (=नीच) हैं; ब्राह्मण ही शुक्लवण्र है, और वर्ण कृष्ण हैं; ब्राह्मण ही शुद्ध होते है, अब्राह्मण नहीं ॰ ब्रह्मा के दायाद हैं।”
(1) “तो क्या मानते हो, महाराज! यदि क्षत्रिय (अपने) धन-धान्य-चाँदी-सोना से (करना) चाहे, तो उसका पूर्व-उत्थायी-पश्चात्-निपाती (=मालिक से पहले उठने वाला, मालिक के सो जाने के बाद सोने वाला नौकर), क्या-काम है—पूछने वाला, मनापचारी (=मन के अनुकूल करने वाला), प्रियवादी क्षत्रिय भी होना न? ब्राह्मण भी ॰? वैश्य भी ॰? शूद्र भी ॰?”
“हे कात्यायन! यदि क्षत्रिय ॰ चाहे, तो क्षत्रिय भी उसका प्रियवादी होगा; ब्राह्मण ॰; वैश्य भी ॰; शुद्र भी ॰।”
“तो क्या मानते हो, महाराज! ब्राह्मण यदि (अपने) धन ॰ से करना चाहे, तो ब्राह्मण भी उसका ॰ प्रियवादी होगा न? वैश्य भी ॰? शूद्र भी ॰? क्षत्रिय भी ॰?”
“हे कात्यायन! यदि ब्राह्मण ॰ चाहे, तो ब्राह्मण भी उसका ॰ प्रियवादी होगा; वैश्य भी ॰; शूद्र भी ॰; क्षत्रिय भी ॰।”
“॰ महाराज! वैश्य यदि ॰ चाहे ॰?”
“हे कात्यायन! यदि वैश्य ॰ चाहे, तो वैश्य भी उसका ॰ प्रियवादी होगा; शूद्र भी ॰; क्षत्रिय भी ॰; ब्राह्मण भी ॰।”
“॰ महाराज! शुद्र यदि (अपने) धन ॰ से (करना) चाहे ॰?”
“हे कात्यायन! यदि शुद्र ॰ चाहे, तो शुद्र भी उसका ॰ प्रियवादी होगा; क्षत्रिय भी ॰; ब्राह्मण भी ॰; वैश्य भी ॰।”
“तो क्या मानते हो महाराज! ऐसा होने पर चारो वर्ण सम-सम (=बराबर) होते हैं या नहीं? यहाँ तुम्हें कैसा होता है?”
“जरूर हे कात्यायन! ऐसा होने पर चारों वर्ण सम-सम होते हैं, यहाँ कोई भेद मैं नहीं देखता।”
“इस प्रकार से भी महाराज! तुम्हें समझना चाहिये, कि लोक में यह हल्ला (=घोष) ही भर है—‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठवर्ण है ॰ ब्रह्मा के दायाद हैं।”
(2) “तो क्या मानते हो, महाराज! यहाँ क्षत्रिय प्राणि-हिंसक, चोर, दुराचारी ॰ मिथ्यादृष्टि हो; (तो क्या) काया छोड मरने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न होगा या नहीं? यहाँ तुम्हें कैसा होता है?”
“हे कात्यायन! क्षत्रिय भी यदि प्राणिहिंसक ॰ हो; तो वह ॰ नरक में उत्पन्न होगा; ऐसा मुझे होता है; अर्हतों से भी मैंने यह सुना है।”
“साधु, साधु (ठीक), महाराज! ठीक ही तुम्हे महाराज! ऐसा हो रहा है; और तुमने ठीक इसे अर्हतों से सुना है।”
“तो क्या मानते हो महाराज! यहाँ ब्राह्मण प्राणि-हिंसक ॰। ॰ वैश्य प्राणि-हिंसक ॰ ॰ शूद्र प्राणि-हिंसक ॰; तो; तो वह ॰ नकर में उत्पन्न होगा या नहीं? यहाँ तुम्हें कैसा होता है?”
“हे कात्यायन! शूद्र भी ॰ यदि प्राणि-हिंसक ॰ हो; तो वह ॰ नरक में उत्पन्न होगा; ऐसा मुझे होता है; अर्हतों से भी मैने यह सुना है।”
“साधु, साधु, महाराज! ठीक ही महाराज! तुम्हे ऐसा हो रहा है, और तुमने ठीक इसे अर्हतों से सुना है।
“तो क्या मानते हो, महाराज! ऐसा होने पर यह चारों वर्ण सम-सम होते हैं या नहीं? यहाँ तुम्हें कैसा होता है?”
“जरूर, हे कात्यायन! ऐसा होने पर यह चारो वर्ण सम-सम होते हैं; यहाँ कोई भेद मैं नहीं देखता।”
“इस प्रकार भी महाराज! तुम्हे समझना चाहिये, कि लोक में यह हल्ला ही भर है—‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है ॰ ब्रह्मा के दायद है।’
(3) “तो क्या मानते हो महाराज! यहाँ कोई क्षत्रिय प्राणातिपात से विरत हो, काम मिथ्याचार (=दुराचार) से विरत हो, मृषावाद ॰, चुगली ॰, कटु वचन, बकवाद से विरत हो, अलोभी अ-द्वेषी, सम्यग्-दृष्टि (=सच्ची धारणावाला) हो; तो शरीर को छोड मरने के बाद (वह) सुगति, स्वर्गलोक में उत्पन्न होगा या नहीं? यहाँ तुम्हे कैसा होता है?
“हे कात्यायन! क्षत्रिय भी यदि प्राणातिपात से विरत हो, ॰ सम्यग्-दृष्टि हो; तो ॰ स्वर्गलोक मे उत्पन्न होगा। ऐसा मुझे होता है। अर्हतों से भी मैंने यह सुना है।”
“साधु, साधु महाराज! ॰ तुमने ठीक ही इसे अर्हतों से सुना है।
“तो क्या मानते हो महाराज! यहाँ कोई ब्राह्मण ॰। ॰ यहाँ कोई वैश्य ॰। ॰ यहाँ कोई शूद्र प्राणातिपात से विरत हो ॰ सम्यग्-दृष्टि हो; तो ॰ स्वर्गलो में उत्पन्न होगा या नहीं?॰
“॰ उत्पन्न होगा॰।”
“साधु, साधु, महाराज! ॰।”
“॰ महाराज! ऐसा होने पर यह चारों वर्ण सम-सम होते हैं या नहीं ?॰?”
“जरूर, भो कात्यायन!॰।”
“इस प्रकार भी महाराज! तुम्हें समझना चाहियें, कि लोक में यह हल्ला ही भर है—‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है ॰ ब्रह्मा के दायाद है’।
“तो क्या मानते महाराज! कोई क्षत्रिय सेंध मारे, गाँव लूटे, चोरी करे, बटमारी करे, परस्त्रीगमन करे, उसे (राज-)पुरूष पकडकर तुझे दिखलावें—‘देव! यह तेरा चोर है, अपराधी है, इसको जो इच्छा हो वह दंड दे’; तो तू उसे क्या करेगा?”
“हे कात्यायन! मैं उसे प्राण दंड या काराबंधन या देश-निर्वास का दंड दूँगा, या जैसा कारण होगा वैसा करूँगा। सो किस हेतु?—हे कात्यायन! जो उसकी पहिले क्षत्रिय संज्ञा थी, वह अब अन्तर्धान हो गई; (अब) चोर ही उसकी संज्ञा है।’
“तो क्या मानते हो महाराज! कोई ब्राह्मण ॰। ॰ वैश्य ॰। ॰ शूद्र सेंध मारे ॰ तो तू उसे क्या करेगा?”
“हे कात्यायन! मैं उसे ॰ दंड दूँगा, ॰ (अब) चोर ही उसका नाम है।”
“तो क्या मानते हो, महाराज! ऐसा होने पर, यह चारों वर्ण सम-सम होते है या नहीं?॰?”
“जरूर; हे कात्यायन!॰।”
“इस प्रकार भी महाराज! तुम्हें समझना चाहिये, कि लोक में यह हल्ला ही भर है—‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है ॰ ब्रह्मा के दायाद है’। (4) “तो क्या मानते हो, महाराज! यहाँ कोई क्षत्रिय केश-दाढी मुँडा कर काषाय वस्त्र पहिन घर से बेघर (=अनागरिक) हो प्रब्रजित (=संन्यासी) हो; (वह) प्राणातिपात से विरत, अदत्तादान ॰, मृषावाद से विरत हो, एकाहारी, ब्रह्मचारी, शीलवान् (=सदाचारी) कल्याणधर्मा हो; तो उसके साथ तू क्या करेगा?”
“हे कात्यायन! अभिवादन, प्रत्युत्थान करेंगे, आसन देंगे, चीवर-पिंडपात (=भिक्षा) शयन-आसन-ग्लान-प्रत्यय (=पथ्य)-भैषजय (=दवा) प्रदान करेंगे, उसकी धार्मिक रक्षा=वरण=गुप्ति सम्पादित करेंगे। सो किस हेतु?—हे कात्यायन! जो उसकी पहिले क्षत्रिय संज्ञा थी, वह अब अन्तर्धान हो गई; (अब) श्रमण ही उसकी संज्ञा है।’
“॰ महाराज! कोई ब्राह्मण ॰। ॰ वैश्य ॰। ॰ शूद्र केशदाढी मुँडा कर ॰ प्रब्रजित हो; ॰ कल्याण-धर्मा (=पुण्यत्मा) हो; तो उसके साथ तू क्या करेगा?”
“हे कात्यायन! अभिवादन ॰ ‘करेंगे ॰ उसकी धार्मिक रक्षा ॰ संपादित करेंगे। सो किस हेतु?—हे कात्यायन! जो उसकी शूद्र संज्ञा थी, वह अब अन्तर्धान हो गई; अब श्रमण ही उसकी संज्ञा है।”
“तो क्या मानते हो, महाराज! ऐसा होने पर चारो वर्ण सम-सम होते हैं, या नहीं?॰?”
“जरूर, हे कात्यायन!॰।”
“इस प्रकार भी महाराज! तुम्हे समझना चाहिये, कि लोक में यह हल्ला ही भर है—‘ब्राह्मण ही श्रेष्इ वर्ण है ॰ ब्रह्मा के दायाद हैं।’ ऐसा कहने पर ॰ राजा अवंतिपुत्र ने आयुष्मान् महाकात्यायन से यह कहा—
“आश्चर्य! हे कात्यायन! आश्चर्य!! हे कात्यायन! जैसे औंधे को सीधा करे दे ॰ ऐसे ही आप कात्यायन ने अनेक प्रकार से धर्म को प्रकाशित किया; यह मैं आप कात्यायन की शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आप कात्यायन आज से मुझे अंजलिबद्ध शरणागत उपासक स्वीकार करें।”
“मत तुम, महाराज! मेरी शरण जाओ। उसी भगवान् की तुम भी शरण जाओ, जिसकी शरण मैं गया हूँ।”
“हे कात्यायन! वह भगवान् अर्हत्, सम्यक्-संबुद्ध इस समय कहाँ विहार कर रहे हैं?”
“महाराज! वह भगवान् अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध अब निर्वाण को प्राप्त हो गये।’
“हे कात्यायन! यदि उन भगवान् को दस योजन पर सुन पाते, तो हम दस योजन भी उन भगवान् ॰ के सम्बुद्ध दर्शन के लिये जाते! ॰ बीस योजन ॰। ॰ तीस योजन ॰। ॰ चालीस योजन ॰। ॰ पचास योजन ॰। ॰ सौ योजन ॰। चूँकि हे कात्यायन! वह भगवान् निर्वाण को प्राप्त हो गये, तो निर्वाण-प्राप्त भी उन भगवान् की हम शरण जाते हैं, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आज से आप कात्यायन मुझे अंजलिबद्ध शरणागत उपासक धारण करें।
Sobre esta traducción
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Que todos los seres sean felices