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MN 91

Brahmāyu sutta: ब्रह्मायु-सुत्तन्त

Brahmāyusutta

Brāhmaṇavagga

Traducciones

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् पाँच सौ भिक्षुओं के महाभिक्षु-संघ के साथ विदेह (देश) में चारिका कर रह थे।

उस समय (एक) जीर्ण=वृद्ध=महल्लक=अध्वगत=वयप्राप्त जन्म से 120 वर्षो का ब्रह्मायु नामक ब्राह्मण मिथिला (-नगर) में बसता था। (वह) पाँचवें इतिाहस और निघटुकेटुम (=कल्प), अक्षरप्रभेद (=शिक्षा-निरूक्त)-सहित तीनों वेदो का पारंगत, पद-ज्ञ, वैयाकरण, लोकायत (-शास्त्र) तथा महापुरूष लक्षण (=सामुद्रिक शास्त्र) में परिपूर्ण था। ब्रह्मायु ब्राह्मण ने सुना—शाक्यकुल से प्रब्रजित शाक्यपुत्र श्रमण गौतम पाँच सौ भिक्षुओं के महान् भिक्षु-संघ के साथ विदेह में चारिका कर रहे है। उन आप गौतम का ऐसा मंगल कीर्ति-शब्द फैला हुआ हैं—“वह भगवान् अर्हत् हैं ॰ भगवान् बुद्ध हैं। वह ब्रह्मलोक साहित ॰ ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करते हैं। ऐसे अर्हतों का दर्शन अच्छा होता है।”

उस समय ब्रह्मायु ब्राह्मण का उत्तर नामक माणवक शिष्य था, (जोकि) पाँचवें इतिहास और निघटु-केटुम-अक्षरप्रभेद-सहित तीनों वेदों का पारंगत, पदज्ञ, वैयाकरण, लोकायत(-शास्त्र) तथा महापुरूष लक्षण में परिपूर्ण था। तब ब्रह्मायु ब्राह्माण ने उत्तर माणवक को संबोधित किया—

“तात, उत्तर! यह शाक्य कुल से प्रब्रजित शाक्य-पुत्र श्रमण गौतम ॰ विदेह में चारिका कर रहे हैं। उन आप गौतम का ऐसा मंगल कीर्ति-शब्द फैला हुआ है—॰ ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करते हैं। ऐसे अर्हतों का दर्शन अच्छा होता है। आओ, तात, उत्तर! जहाँ श्रमण गौतम हैं, वहाँ जाओ। जाकर, श्रमण गौतम को जानों, कि आप गौतम का शब्द यथार्थ फैला हुआ है; या अयथार्थ? क्या आप गौतम वैसे हैं, या नहीं! तेरे द्वारा हम आप गौतम को जानेंगे।”

“कैसे भो! मैं उन गौतम को जानूँगा—कि आप गौतम का (कीर्ति-)शब्द यथार्थ फैला हुआ है, या अ-यथार्थ? क्या आप गौतम वैसे हैं या नहीं?

“तात, उत्तर! हमारे मंत्रों में बत्तीस महापुरूष-लक्षण आये हैं, जिनसे युक्त पुरूष की ये ही गतियाँ हाती हैं, और नहीं। यदि वह घर में रहता है; तो जनपदों (के राजपद पर) स्थिरता को प्राप्त, चारों छोरो (तक पृथिवी) को जीतने वला, सात रत्नों से युक्त धार्मिक धर्मराज चक्रवर्ती राजा होता है। उसके यह सात रत्न होते हैं-(1) चक्र-रत्न, (2) हस्ति-रत्न, (3) अश्व’-रत्न,

(4) मणि-रत्न, (5) स्त्री-रत्न, (6) गृहपति-रत्न, और (7) सातवाँ परिणायक-रत्न। सहस्राधिक इसके पर-सैन्य-प्रमर्दक, शूर, वीर पुत्र होते हैं। वह सागर-पर्यन्त इस पृथिवी को बिना दण्ड, बिना शस्त्र के धर्म से जीत कर शासन करता है। यदि वह घर से बेघर हो प्रब्रजित होता है; तो कपाट-खुला अर्हत्, सम्यक्-संबुद्ध होता है। तात उत्तर! तुम्हारा मंत्रों का दाता हूँ, और तुम प्रतिगृहीता हो।”

ब्रह्मायु ब्राह्मण को—‘हाँ, भो!” कह, उत्तर माणवक आसन से उठ अभिवादन कर प्रदक्षिणा कर विदेह में जिधर भगवान् थे, उधर चारिका (=यात्रा) पर चल पडा। क्रमशः चारिका करते जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान् के साथ…सम्मोदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुये उत्तर माणवक भगवान् के शरीर में बत्तीस महापुरूष-लक्षणों को ढूँढ रहा था। उत्तर माणवक ने भगवान् के शरीर में दो को छोड बत्तीस महापुरूष लक्षणों मे से अधिकांश को देख लिया। सुदीर्घ जिह्वा और कोषाच्छादित वस्ति दो के बारे में सन्देह में पडा हुआ था। तब भगवान् को यह हुआ—‘यह उत्तर माणवक मेरे शरीर में बततीस महापुरूष लक्षणों को देख रहा है। उत्तर माणवक मेरे शरीर में दो को छोड ॰ सन्देह में पडा हुआ है।”

तब भगवान् ने इस प्रकार का ऋद्धि-प्रभाव प्रकट किया, कि उततर माणवक ने भगवान् की कोषाच्छादित वस्ति को देख लिया। तब भगवान् ने जिह्वा को निकाल कर उससे दोनों कानों की जड को छू दिया, नाक के दोनों छिद्रो को छू दिया, जिह्वा से ललाट को आच्छादित कर दिया। तब उत्तर माणवक को यह हुआ—‘श्रमण गौतम बत्तीस महापुरूष लक्षणों से युक्त है। क्यों न मैं श्रमण गौतम का अनुगमन करूँ, और उसके ईर्यापथ (=चाल ढाल) को देखूँ। तब उत्तर माणवक छः मास तक अनपायिनी (=न छोडनेवाली) छाया की भाँति भगवान् के पीछे पीछे फिरता रहा। तब सात मास के बाद उत्तर माणवक विदेह (-देश) में जहाँ मिथिला हैं, वहाँ चारिका के लिये चला। क्रमशः चारिका करते जहाँ मिथिला थी, जहाँ ब्रह्मायु, ब्राह्मण था, वहाँ पहूँचा। पहूँच कर ब्रह्मायु ब्राह्मण को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे ब्रह्मायु ब्राह्मण से उत्तर माणवक ने यह कहा—

“क्या तात उत्तर! वैसा होते भगवान् गौतम का (कीर्ति) शब्द सत्य के अनुसार ही उठा हुआ है, अन्यथा तो नहीं है? क्या वह आप गौतम वैसे ही है, अन्यादृश नहीं हैं?”

“भो! वैसा होते भगवान् गौतम का (कीर्ति) शब्द सत्य के अनुसार (=यथार्थ) ही उठा हुआ है, अन्यथा नहीं। वह आप गौतम वैसे ही हैं, अन्यादृश नहीं। भो! आप गौतम बत्तीस महापुरूष-लक्षणों से युक्त है।—(1) आप गौतम सुप्रतिष्ठित-पाद (=जिसका पैर जमीन पर बराबर बैठता हो) हैं, यह भी आप महापुरूष गौतम के महापुरूष-लक्षणों में एक है। (2) आप गौतम के नीचे पैर के तलवे में सर्वाकार-परिपूर्ण नाभि-नेमि (=पुट्ठी)-युक्त सहस्र-अरों वाले, चक्र है। (3) आप गौतम आयत-पार्ण्णि (=चोड़ी घुट्ठीवाले) हैं। (4) ॰ दीर्घ-अंगुल ॰। (5) ॰ मृदु-तरूण-हस्त-पाद ॰। (6) ॰ जाल-हस्त-पाद (=अंगुलियों के बीच वत्तक के पंजे की भाँति चमडा) ॰। (7) ॰ उस्संखपाद (=गुल्फ ऊपर अवस्थित हैं, जिस पाद मे) ॰। (8) ॰ एणीजंघ (=मृग जैसा पेंडूली वाला भाग जिसका हो) ॰। (9) (सीधे) खडे बिना झुके वह आप गौतम दोनों जाँघों को अपने हाथ के तलवों से छूते है (=आजानुबाहु)॰। (10) कोषाच्छादित वस्तिगुह्य (=पुरूष-इन्द्रिय) ॰ (11) सुवर्ण-वर्ण ॰ कंचन समान त्वचावाले ॰। (12) सूक्ष्म-छवि (छवि=ऊपरी चमडा) ॰ जिससे काया पर मैल-धूल नहीं चिपटती ॰। (13) एकैकलोम, एक कए रोम कूप में उनके एक एक रोम हैं ॰। (14) . ऊध्र्वाग्र-लोमा, ॰ उनके अंजन समान नीले तथा प्रदक्षिणा (बायें से दाहिनी ओर)

से कुंडलित लोमो के सिर ऊपर को उठे है ॰। (15) ब्राह्म-ऋजु-गात्र (=लम्बे अकुटिल शरीर वाले) ॰। (16) सप्त-उत्सद (=सातों अंगों में पूर्ण आकार वाले) ॰। (17) सिंह-पूर्वार्द्ध-काय (=छाती आदि शरीर का ऊपरी भाग सिहं की भाँति जिसका हो) ॰। (18) चितान्तरांस (=दोनों कंधो का बिचला भाग जिसका चित्त=पूर्ण है) ॰। (19) न्यग्रोध-परिमंडल हैं, ॰, जितनी काया उसके अनुसार व्यायाम (=चैडाई), जिनती चैडाई उतनी काया ॰। (20) समवर्त-स्कंध (=समान परिमाण के कंधे वाले) ॰। (21) रसग्ग-सग्गी (=सुन्दर शिराओं वाले) ॰। (22) सिंह-हनु (=सिंह समान पूर्ण ठोडी वाले) ॰। (23) चव्वालीस-दन्त ॰। (24) सम-दन्त ॰। (25) अ-विवर-दन्त ॰। (26) सु-शुक्ल-दाढ (=खूब सफेद डाढवाले) ॰। (27) प्रभूत-जिह्व (=लम्बी जीभवाले) ॰। (28) ब्रह्म-स्वर, करविंक (पक्षी से) स्वर वाले ॰। (29) अभिनील-नेत्र (=अतसी पुष्प जैसी नीली आँखो वाले) ॰। (30) गौ-पक्ष्मा (=गाय जैसी पलक वाले) ॰। (31) इस आप गौतम के भोहो के बीच में श्वेत कोमल कपास सी ऊर्णा (=रोम-राजी) हैं॰। (32) उष्णीषशीर्ष (=पगडी जैसे चारों ओर समानाकार शिरवाले) हैं आप गौतम, यह भी आप महापुरूष गौतम के महापुरूष लक्षणों में हैं। भो! आप गौतम इन बत्तीस महापुरूष-लक्षणों से युक्त हैं।

’ वह भगवान् चलते वक्त पहिले दाहिना ही पैर उठाते हैं। वह न बहुत दूर से पैर उठाते है, न बहुत समीप रखते हैं! वह न अति शीघ्र चलते हैं, न अति शनैः चलते हैं। न जानु से जानु को घट्ठित करते चलते हैं; न गुल्फ (=घुट्ठी) से गुल्फ को घट्ठित (=रगडते) चलते है। चलते वक्त न वह शक्थि (=उरू) को ऊपर उठाते हैं; न शक्थि को नवाते हे, न शक्थि का सन्नामन (=घुमाना) करते हैं, न विनामन (=हिलाना) करते हैं। चलते वक्त आप गौतम का निचला शरीर ही हिलता है, काय-बल (=शरीर फेंकने) से नहीं चलते। बिना अवलोकन करते वह आप गौतम सारी काया से अवलोकन जैसे करते हैं। वह न ऊपर की ओर अवलोकन करते हैं, न नीचे की ओर अवलोकन करते हैं, न चारो ओर देखते चलते है। युगमात्र (=चार हाथ) देखते हैं, उससे आगे उनकी खुली ज्ञान-दृष्टि होती है।

“वह गृहस्थों के घर के भीतर (=अन्तरघर) काया का उन्नामन (=ऊपर उठाना) करते हैं, न अवनामन करते हैं, न काया को सन्नामन करते हैं, न विनामन करते हैं। वह न आसन से दूर न अतिसमीप (काया) को पलटते हैं। न हाथ का अवलंब लेकर आसन पर बैठते हैं, न आसन पर काया को फेंकते है। वह अन्तरघर में न हाथ की चंयलता दिखलाते हैं, न पैर की चंचलता दिखलाते है; न जानु पर जानु रखकर बैठते हैं, न गुल्फ को गुल्फ पर चढाकर ॰, न हाथ को ठुड्डी पर रखकर बैठते है। वह अन्तरघर में बैठे हुये न स्तब्ध होते हैं, न काँपते हैं, न हिलते हैं, न परित्रास (=चंचलता) को प्राप्त होते हैं वह आप गौतम बिना स्तब्धता रहित, कम्पन रहित, वे जनरहित, परित्रासरहित, रोमांच रहित, ववेवयुक्त हो अन्तरघर में बैठते हैं।

“वह पात्र में जल ग्रहण करते वक्त न पात्र को ऊपर उठाते हैं, न पात्र का अवनामन (=नवाना) करते हैं, न पात्र को सन्नामन करते हैं, न पात्र को विनामन करते है। वह ओदन (=भात) न बहुत अधिक न बहुत कम ग्रहण करते है। आप गौतम व्यजन (=तेंवन) को व्यंजन की मात्रा से ग्रहण करते हैं, ग्राम में अधिक मात्रा में व्यंजन नहीं ग्रहण करते। दो तीन बार करके आप गौतम मुख में ग्रास को चबा कर खाते है। भात का जूठन अलग होकर उनके शरीर पर नहीं गिरता। भात का जूठन मूँह में बँचे रहते वह दूसरा ग्रास (मुँह में) नहीं डालते। आप गौतम रस को प्रतिसंवेदन (=अनुभव) करते आहार ग्रहण करते हैं, किन्तु रस में राग को प्रतिसंवेदन करते नहीं। आप गौतम आठ अंगो (=बातो) से युक्त आहार ग्रहण करते हैं—न चपलता के लिये, न मद के लिये, न मंडन के लिये, न विभूषण के लिये; जितना (=आहार) इस काया की स्थिति और यापन के लिये, (भूख की) पीडा की शांति के लिये, ब्रह्मचर्य की सहायता के लिये (आवश्यक है उतना ही ग्रहण करते हैं); इस प्रकार (इस आहार की मदद से) पुरानी वेदना (=भोग) को हटायेंगे, नई वेदना को उत्पन्न न होने देंगे, मेरी (शरीर-)यात्रा भी होगी, निर्दोषता और सरल विहार भी होगा।

“वह भोजन के बाद पानी जल ग्रहण करते न पान्न का उन्नामन करते हैं, न अवनामन, सन्नामन या विनामन करते हैं। यह मात्रा से न बहुत कम न बहुत अधिक जल ग्रहण करते हैं। वह न पात्र को बुलुबुलु करते धाते हैं, न उलटते हुये पात्र को धोते हैं; न पात्र को भूमि पर फेंक कर हाथ धोते है। (उनके) हाथ धोते वक्त पात्र धुल जाते हैं, पात्र धोते वक्त हाथ धुल जाते है। वह पात्र के जल को न अति-दूर (से) छोडते हैं, न अति-समीप से, न घुमाते छोडते हैं। वह भोजन कर चुकने पर न पात्र को भूमि पर फेंकते हैं, न, अति-दूर न अति-समीप (रखते हैं)। न पात्र से बेपर्वा होते हैं, न सर्वदा उसकी रक्षा में ही तत्पर रहते हैं।

“भोजनोपरान्त वह थोडी देर चुपचाप बैठते हैं, और अनुमोदन (=भोजन संबंधी अनुमोदन) के काल को अति-क्रमण करते है। भोजनोपरान्त वह उस भोजन का अनुमोदन करते है, उसकी निंदा नहीं करते। और भक्त (=भात) नहीं चाहते। उस (भिक्षु-) परिषद् को धार्मिक-कथा द्वारा संदर्शन=समादपन=सुमुत्तेजन=संप्रशसन करते हैं। धार्मिक कथा द्वारा संदर्शन ॰ करके आसन से उठ कर चले जाते है।

“वह न अति-शीघ्र चलते हैं, न अति-शनैः चलते हैं; न छूटने की इच्छा (जैसे) चलते हैं। आप गौतम के शरीर में चीवन न अत्यन्त ऊपर रहता है, न अत्यन्त नीचे, न काया में अत्यधिक सटा, न काया से अत्यधिक निकला हुआ। आप गौतम शरीर से हवा चीवर उडाती नहीं। आप गौतम के शरीर में मल भी नहीं चिमटता।

“वह आराम के भीतर बिछे आसन पर बैठते है। बैठकर पैर पखारते हैं। आप गौतम पाद के मंडन में तत्पर हो नहीं विहरते। वह पाद पखार कर, शरीर को सीधा रख, स्मृति (=होश) को सामने रखकर बैठते है। वह न आत्म-पीडा के लिये सोचते हैं, न पर-पीडा के लिये सोचते हैं, न दोनों (आत्म-पर) पीडा के लिये सोचते है। आप गौतम आत्महित, पर-हित, उभय-हित, लोक-हित को चिन्तन करते ही आसीन रहते हे।

“वह आराम के भीतर परिषद् में धर्मोपदेश करते है। न उस परिषद् को उत्साहित (=उठाते) करते हैं, न अपसादित (=गिराते) करते हैं। बल्कि धार्मिक कथा द्वारा उस परिषद् को संदर्शित, समादपित, समुत्तेजित, संप्रशंसित करते है। आप गौतम के मुख से घोष आठ अंगो (=बातों) के सहित निकलता है—(1) प्रामाणिक, (2) विज्ञेय, (3) मंजु, (4) श्रवणीय, (5) बिन्दु (=सार युक्त), (6) अविसारि (=अ-कटु), (7) गंभीर, और (8) निर्नादी (=खनखन)। परिषद् (के परिमाण) के अनुसार स्वर से आप गौतम उपदेशते हैं, उनका घोष परिषद् से बाहर नहीं जाता, आप गौतम की धार्मिक कथा से संदर्शित ॰ (श्रोतागण) आसन से उठकर बिना (मुडकर) देखते चले जाते है, (किन्तु) भाव से छोडे नहीं (जाते)।

“भो! हमने आप गौतम को गमन करते देखा, हमने आप गौतम को खडे हुये देखा, अन्तर में प्रवेश करते देखा; अन्तर-घर (=गृहस्थ के घर) में चुपचाप बैठै देखा; भोजनोपरांत (भोजन को) अनुमोदन करते देखा। आराम को जाते देखा। आराम के भीतर चुपचाप बैठे देखा, आराम के भीतर परिषद् को धर्मोपदेश करते देखा। आप गौतम ऐसे ऐसे हैं, इससे भी अधिक है।”

ऐसा कहने पर ब्रह्मयु ब्राह्मण ने आसन से उठक्र, उत्तरासंग को एक कंधे पर कर, जिस (दिशा की) ओर भगवान् थे, उधर अंजलि जोड तीन बार उदान उदाना—‘उन भगवान् अर्हत् सम्यक् संबुद्ध को नमस्कार है, उन भगवान् अर्हत् सम्यक् संबुद्ध को नमस्कार है, उन भगवान् अर्हत् सम्यक् संबुद्ध को नमस्कार हैं। कया कभी उन आप गौतम के साथ हमारा समागम होगा! क्या कुछ कथा-संलाप होगा!!”

तब भगवान् क्रमशः विदेह में चारिका करते, जहाँ मिथिला थी, वहाँ पहूँचे। वहाँ मिथिला में भगवान् मखादेव-आम्रवन में विहार करते थे। मैथिल ब्राह्मण गृहपतियों ने सुना—‘शाक्य कुल से प्रब्रजित शाक्यपुत्र श्रमण गौतम विदेह में चारिका करते पाँ सौ के महान् भिक्षु-संघ के साथ मिथिला में प्राप्त हुये हैं; और मिथला में मखादेव-आम्रवन में विहार करते हैं। उन भगवान् गौतम का ऐसा कल्याण कीर्तिशब्द उठा हुआ हैं—वह भगवान् अर्हत् ॰ ऐसे अर्हतों का दर्शन अच्छा होता है।’

तब मैथिल ब्राह्मण गृहपति जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। जाकर कोइ्र कोई भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये ॰ कोई कोई चुपचाप हो एक ओर बैठ गये।

ब्रह्मायु ब्राह्मण ने सुना—“शाक्य कुल से प्रब्रजित शाक्य पुत्र श्रमण गौतम ॰ मिथिला में प्राप्त हुये हैं। और मिथिला में मखादेव-आम्रवन में विहार करते हैं। तब ब्रह्मायु ब्राह्मण बहुत से माणवों के साथ जहाँ मखादेव-अम्बवन था, वहाँ गया। तब ब्रह्मायु ब्राह्मण को आम्रवन के पास जाने पर यह हुआ—‘यह मेरे लिये ठीक नहीं, कि बिना पहिले सूचित किये मैं दर्शन के लिये जाऊँ।”

तब ब्रह्मायु ब्राह्मण ने एक माणव (=विद्यार्थी) से कहा—“आओ माणवक! तुम जहाँ श्रमण गौतम हैं, वहाँ जाओ। जाकर मेरे वचन से श्रमण गौतम को अल्पाबाधा (=आरोग्य) अल्पातंक; लघुत्थान (=फुर्ती) बल, प्राशु-विहार (=सुख पूर्वक विहरना) पूछना, ‘भो गौतम! ब्रह्मायु ब्राह्मण आप गौतम की अल्पाबाधा (=आरोग्य) ॰ पूछता है’। और यह भी कहना—‘ब्रह्मायु ब्राह्मण जीर्ण=वृद्ध=महल्लक=अध्वगत=वयोनुप्राप्त, जन्म से एक सौ बीस वर्ष का है। वह आप गौतम के दर्शन की इच्छा रखता है’।”

“अच्छा, भो”—(कह) वह माणवक ब्रह्मायु ब्राह्मण को उत्तर दे, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया, जाकर भगवान् के साथ…समोदन कर एक ओर…खडा हो…भगवान् से बोला—

“भो गौतम! ब्रह्मायु ब्राह्मण आप गौतम की अल्पाबाधा ॰ पूछता है। ॰ भो गौतम! ब्रह्मायु ब्राह्मण ॰ वृद्ध ॰ एक सौ बीस वर्ष का है। वह ॰ तीनों वेदों का पारंगत ॰ महापुत्ष लक्षण में परिपूर्ण है। मिथिला में जितने ब्राह्मण गृहपति बसते हैं, ब्रह्मायु ब्राह्मण, भोग, मंत्र (वेद), आयु और यश…सब तरह उनमें अग्र (=श्रेष्ठ) हैं, वह आप गौतम का दर्शन चाहता है।”

‘माणवक! ब्रह्मायु ब्राह्मण इस वक्त जिसका काल समझे (वैसा करें)।”

तब वह माणवक जहाँ ब्रह्मायु ब्राह्मण था, वहाँ गया; जाकर ब्रह्मायु ब्राह्मण से बोला—

“भो! श्रमण गौतम ने आपको अवकाश दे दिया, अब आप जिसका काल समझें।”

तब ब्रह्मायु ब्राह्मण ने जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। उस (ब्राह्मण) परिषद् ने दूर से ही ब्रह्मायु ब्राह्मण को आते देखा। देखते ही ज्ञात (=प्रसिद्ध) और यशस्वी, उसके लिये अवकाश कर दिया। तब ब्रह्मायु ब्राह्मण ने उस परिषद् से यह कहा—

“नहीं, भो! आप सब अपने आसन पर बैठें। मैं यहाँ श्रमण गौतम के समीप बैठूँगा।”

तब ब्रह्मायु ब्राह्मण जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान् के साथ…संमोदन कर एक ओर बैठा। एक ओर बैठा ब्रह्मायु ब्राह्मण, भगवान् के शरीर में महापुरूष लक्षणों को ढूँढ रहा था ॰ दो के बारे में संदेह में पडा हुआ था। तब ब्रह्मायु ब्राह्मण ने भगवान् से गाथाओं द्वारा कहा—

“जो मैंने बत्तीस महापुरूष-लक्षण सुने हैं।
उनमें से दो को आप गौतम के शरीर में नहीं देखता।

नरोत्तम! क्या आपका वस्तिगुह्य कोषाच्छादित है।

स्त्री-इन्द्रिय-समान? जीभ छोटी तो नहीं?

दीर्घजिह्वा तो हो? जैसे हम उसे जानें,

(वैसे) इसे थोडा निकाले। ऋषे! शंका दूर करें;

इस जन्म के हित के लिये और पर-जन्म में सुख के लिये।

आज्ञा पाकर जो कुछ अभीष्ट है, पूछूँगा।”

भगवान् को यह हुआ—‘यह ब्रह्मायु ब्राह्मण मेरे शरीर में बत्तीस महापुरूष-लक्षणों को देख रहा है ॰ जिह्वा से ललाट को आच्छादित कर दिया। तब भगवान् ने ब्रह्मायु ब्राह्मण से गाथाओं में कहा—

“जो तूने बत्तीस महापुरूष-लक्षण सुने है।
वह सब मेरे शरीर में है, ब्राह्मण! तुझे संदेह मत हो।

अभिज्ञेय, अभिज्ञात हो गया, भावनीय को भावित कर लिया;

प्रहातव्य को प्रहीण कर दिया, इसलिये ब्राह्मण! मैं बुद्ध हूँ।

इस जन्म के हितार्थ और जन्मान्तर के सुखार्थ;

छुट्टी है, जो कुछ अभीष्ट हो पूछो।”

ब्रह्मायु ब्राह्मण को यह हुआ—“श्रमण गौतम ने मुझे अवकाश दे दियां क्या मैं श्रमण गोत्म से इस लोक के संबंध में पूछूँ, या परलोक के संबंध में (पूछूँ)? तब ब्रह्मायु ब्राह्मण को यह हुआ—‘इस लोक की बातों में मैं चतुर हूँ, दूसरे भी मुझसे इहलौकिक बात पूछते हैं; क्यों न मैं श्रमण गौतम से साम्परायिक (=परलोक-संबंधी) बात ही को पूछूँ’। तब ब्रह्मायु ब्राह्मण ने भगवान् से गाथाओं में कहा—

“भो! कैसे ब्राह्मण होता है, कैसे वेदगू होता है?
भो! त्रैविद्य कैसे होता हैं, श्रोत्रिय क्या कहा जाता है?

भो! अर्हत् कैसे होता है, कैसे केवली होता है?

भो! मुनि कैसे होता है, बुद्ध क्या कहा जाता है?”

तब भगवान् ने ब्रह्मायु ब्राह्मण को गाथाओं में उत्तर दिया—

“जो पूर्व जन्म को जानता है, स्वर्ग-नरक को जानता है।

और (जो) जन्म के क्षय को प्राप्त, अभिज्ञा त्तपर (है, वह) मुनि है।

जो रोगो से बिलकुल मुक्त, विशुद्ध-चित्त को जानता है।

जन्म-मरण जिसका नष्ट हो गय, ब्रह्मचर्य (पूरा हो गया, वह) केवली है।

सारे धर्मो के पारगू (=पारग) तादि को बुद्ध कहा जाता है।”

ऐसा कहने पर ब्रह्मायु ब्राह्मण उत्तरासंग को एक कंधे पर कर भगवान् के चरणों में शिर रख, भगवान् के चरणों को मुख से चुमता, हाथ को भी फेरता; नाम भी सुनाता—“भो गौतम! मैं ब्रह्मायु ब्राह्मण हूँ” “भो गौतम! मैं ब्रह्मायु ब्राह्मण हूँ”

तब वह परिषद् विस्मित चकित हो गई—“आश्चर्य भो! अद्भुत भो! श्रमण की महर्द्धिकता (=दिव्यशक्ति), महानुभावताको; जो कि ब्रह्मायु ब्राह्मण जैसा ज्ञात=यशस्वी इस प्रकार की परम नम्रता कर रहा है।”

तब भगवान् ने ब्रह्मायु ब्राह्मण से यह कहा—

“अलम्, ब्राह्मण उठो, बैठो अपने आसन पर ब्राह्मण! तुम्हारा चित्त मेरे में प्रसन्न है।”

तब ब्रह्मायु ब्राह्मण उठकर अपने आसन पर बैठा।

तब भगवान् ने ब्रह्मायु ब्राह्मण के लिये अनुपूर्वि-कथा जैसे—दान-कथा, शील-कथा, स्वर्ग-कथा, काम वासनाओं के दुष्परिणाम, अपकार, दोष; निष्कामता का महात्म्य प्रकाशित किया। जब भगवान् ने ब्रह्मायु ब्राह्मण को भव्य-चित्त=मृदु‘चित्त, अनाच्छादित-चित्त, आह्लादित-चित्त, प्रसन्न-चित्त देखा; तब जो बुद्धों की उठाने वाली देशना (=उपदेश) हैं—दुःख, समुदय, निरोध और मार्ग — उसे प्रकाशित किया। जैसे कालिमा-रहित श्वेत वस्त्र अच्छी तरह रंग पकडता है; वैसे ही ब्रह्मायु ब्राह्मण को उसी आसन पर, ॰ ‘जो कुछ समुदय-धर्म (=उत्पन्न होने वाला) हैं, वह निरोध-धर्म (=नाशमान) हैं’—यह विरज=विमल धर्म-चक्षु उत्पन्न हुआ।

तब ब्रह्मायु ब्राह्मण दृष्टधर्म=प्राप्त-धर्म=विदित-धर्म पर्यवगाढ-धर्म, तीर्ण-विचिकित्स (=संशय-रहित), कथोपकथन-विरत, वैशारद्य-प्राप्त (=निपुण), शास्ता के शासन में अति श्रद्धावान हो, भगवानफ से यह बोला—

“आश्चर्य! भो गौतम! आश्चर्य!! भो गौतम!! जैसे औंधे को सीधा कर दे ॰ आज से मुझे अंजलिबद्ध शरणागत उपासक धारण करें। भिक्षु-संघ के साथ आप गौतम कल का मेरा भोजन स्वीकार करें।”

भगवान् ने मौन से स्वीकार किया।

तब ब्रह्मायु ब्राह्मण भगवान् की स्वीकृति को जान, आसन से उठ, भगवान् को अभिवादन कर, प्रदाक्षिणा कर चला गया।

तब ब्रह्मायु ब्राह्मण उस रात के बीत जाने पर, अपने घर पर उत्तम खाद्य-भोज्य तैयार कर भगवान् को काल सूचना दी-”

“समय हो गया, भो गौतम! भोजन तैयार है।”

तब भगवान् पूर्वाह्न समय पहिनकर पात्र-चीवर ले जहाँ ब्रह्मायु ब्राह्मण का घर था, वहाँ गये; जाकर भिक्षु-संघ के साथ बिछे आसन पर बैठे। तब ब्रह्मायु ब्राह्मण ने अपने हाथ से उत्तम खाद्य-भोज्य परोस कर, बुद्ध-प्रमुख भिक्षु-संघ को संतर्पित=संप्रवारित किया।

तब भगवान् उस सप्ताह के बीतने पर विदेह (देश) में चारिका के लिये चल दिये। भगवान् के चले जाने के थोडे ही समय बाद ब्रह्मायु ब्राह्मण ने काल किया।

तब बहुत से भिक्षु जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे उन भिक्षुओं ने भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! ब्रह्मायु ब्राह्मण मर गया, उसकी क्या गति=क्या अभिसम्पराय है?”

“भिक्षुओ! ब्रह्मायु ब्राह्मण पंडित था, धर्म के अनुसार चलने वाला था, धर्म के विषय में उसने मुझे पीडित नहीं किया। भिक्षुओ! ब्रह्मायु ब्राह्मण पाँच अवरभागीय-संयोजनों के क्षय से औपपातिक (=देवता) हो, वहाँ निर्वाण प्राप्त करने वाला है, उस लोक से न लौट कर आने वाला है।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनंदित किया।

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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Que todos los seres sean felices