מ״נ 119
Kāyagatāsati sutta: कायगता सति-सुत्तन्त
Kāyagatāsatisutta
Anupadavagga
תרגומים
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।
तब, भोजनोपरान्त उपस्थान-शाला में एकत्रित बैठे बहुत से भिक्षुओं की आपस में यह बात शुरू हुई—“आश्चर्य! आवुसों! अद्भूत!! आवुसो! जो उन जानने वाले, देखने वाले-भगवान् अर्हत् सम्यक-संबुद्ध ने कहा है, कि कायगतासति (=कायगत स्मृति) भावित=बहुलीकृत होने पर महाफलप्रद=महानृशंस होती है।”
उन भिक्षुओं की आपस में यह कथा (=बात) हो रही थी। तब भगवान् सायंकाल ध्यान से उठकर, जहाँ उपस्थान-शाला थी, वहाँ गये। जाकर बिछे आसन पर बैठे। बैठकर भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—
“भिक्षुओं! इस समय क्या बात ले कर तुम बैठे थे? तुम्हारी आपस में क्या बात हो रही थी?”
“भन्ते! भोजनोपरान्त यहाँ उपस्थानशाला में बैठे हम लोगों की आपस में यह बात शुरू हुई—॰ महानृशंस होती है। भन्ते! हमारी आपस में यह बात हो रही थी, कि भगवान् आ गये।”
“भिक्षुओं! किस प्रकार भावित=बहुलीकृत होने पर कायगत-स्मृति महाफलप्रद ॰ होती है?—यहाँ, भिक्षुओं! भिक्षु अरण्य ॰ कायिक संस्कारों को रोक कर ॰ श्वास छोडूँगा’—सीखता है। इस प्रकार प्रमाद-रहित, तत्पर और संयमयुकत हो विहरते उसके जो लोभपूर्ण स्वर-संकल्प थे, वह नष्ट हो जाते है। उनके नष्ट होने पर अपने भीतर ही चित्त स्थित होता है, बैठ जाता है, एकाग्र होता है=समाहित होता है। भिक्षुओं! इस प्रकार भिक्षु कायगत-स्मृति की भावना करता है।
“और फिर, भिक्षुओं! भिक्षु जाते हुए ‘जाता हूँ’ जानता है ॰ वैसे ही वैसे जानता है। इस प्रकार प्रमाद-रहि ॰ समाहित होता है। भिक्षुओ! इस प्रकार भी भिक्षु कायगत-स्मृति की भावना करता है।
“और फिर, भिक्षुओं! भिक्षु जानते हुये गमन-आगमन करता है ॰ जागता, बोलता, चुप रहता है। इस प्रकार प्रमाद-रहित ॰।
“और फिर, भिक्षुओं! भिक्षु पैर के तलवे से ऊपर ॰ यह तंडुल है। ॰ इस काया में हैं ॰। इस प्रकार प्रमाद-रहित ॰।
“और फिर, भिक्षुओं! भिक्षु इस काया को (इस की) स्थिति के अनुसार ॰ काटकर चैरस्ते पर बैठा हो। ऐसे ही भिक्षुओ! ॰ रचना के अनुसार देखता है ॰। इस प्रकार प्रमाद-रहित ॰।
“और फिर, भिक्षुओं! भिक्षु एक दिन के मरे ॰ इससे न बच सकने वाली है। इस प्रकार प्रमाद-रहित ॰।
“और फिर, भिक्षुओ! भिक्षु कौओ से खाये जाते ॰ इसी अपनी काया पर घटावे—यह भी काया ॰। इस प्रकार प्रमार-रहित ॰।
“और फिर, भिक्षुओं! भिक्षु मांस-लहू-नसों में बँधे ॰ फेंकी देखे ॰। इस प्रकार प्रमाद-रहित।
“॰ मांस-रहित लोहू लगे ॰ (अपनी) काया पर घटावे ॰। इस प्रकार प्रमाद-रहित ॰।
“॰ शंख के समान वर्णवाली सफेद हड्डी युक्त से शरीर ॰ चूर्ण हो गई हड्डियों वाले ॰। इस प्रकार प्रमाद-रहित ॰।
“और फिर, भिक्षुओं! भिक्षु-कामों से विरहित ॰ प्रथम-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। वह इसी काया को विवेक से उत्पन्न प्रीति और सुख से अभिस्यंदित=परिस्यंदित=पूर्ण करता है, व्याप्त करता है, इसके शरीर का कोई भी भाग विवेक-ज प्रीति-सुख से अ-व्याप्त नहीं रहता।
“जैसे, भिक्षुओं! चतुर नापित (=नहापक, नहलाने वाला) या नापितका अन्तेवासी काँसे की थाली में स्नानचूर्ण डालकर पानी का छींटा दे दे (उसे) भिगोवे। सो वह स्नान-पिंडी स्ने (=गीलेपन) से अनुगत, परिगत चारों ओर भीतर बाहर स्नेह से व्याप्त हो, किन्तु पघरती न हो; इसी प्रकार भिक्षुओं! भिक्षु इसी काया को विवेक से उत्पन्न प्रीति और सुख से ॰। इस प्रकार प्रमाद-रहित ॰।
“और फिर, भिक्षुओं! वितर्क और विचार के शांत होने पर ॰ द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है, वह इसी काया को समाधि से उत्पन्न प्रीति-सुख से ॰ व्याप्त करता है। उसके शरीर का कोई भी भाग समाधिज प्रीति-सुख से अ-व्याप्त नहीं रहता।
“जैसे, भिक्षुओं! पाताललोक गंभीर उदक-ह्रद (=जलकुंड) हो। उसमें न पूर्व से जल आने का मार्ग हो, न पश्चिम ॰, न दक्षिण ॰, न उत्तर ॰। दैव भी समय समय पर ठीक से जलधारा उसमें न डाले, तो भी उस उदक-ह्रद से शीतल जल की धार फूट-निकल, उसी उदक-ह्रद को शीतल जल से अभिस्यदित=परिस्यंदित, परिपूर्ण=परिस्फरित करे। उस उदक-ह्रद का कोई भी भाग शीतल-जल स अव्याप्त नहीं रहे। इसी प्रकार, भिक्षुओं! भिक्षु इसी काया को समाधिज प्रीति-सुख से ॰। इस प्रकार प्रमाद-रहित ॰।
“और फिर, भिक्षुओं! भिक्षु प्रीति से विरक्त हो ॰1 तृतीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। वह इसी काया को प्रीति-रहित सुख से ॰ व्याप्त करता है। ॰ कोई भी भाग प्रीति रहित सुख से अ-व्याप्त नहीं रहता।
“जैसे, भिक्षुओं! उत्पलिनी, पद्मिनी, पुंडरीकिनी में कोई कोई उत्पल, पद्म, या पुंडरीक उदक में उत्पन्न, उदक में वर्द्धित, उदक से बाहर न निकल भीतर डूबे ही पोषित होते है। वह जड से चोटी तक शीतल जल से ॰ व्याप्त होते है। उस उत्पल, पद्म या पुंडरीक की सारी काया का कोई भी भाग शीतल जल से अ-व्याप्त नहीं होता। इसी प्रकार, भिक्षुओं! भिक्षु इसी काया को प्रीति रहित सुख से ॰। इस प्रकार प्रमाद-रहित ॰।
“और फिर भिक्षुओ! भिक्षु सुख और दुःख के परित्याग से ॰ चतुर्थ-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। वह इसी काया को परिशुद्ध=पर्यवदात चित्त से व्याप्त कर बैठता है। कोई भी भाग परिशुद्ध ॰ चित्त से अ-व्याप्त नहीं रहता।
“जैसे, भिक्षुओ! (कोई) पुरूष श्वेत (=अवदात) वस्त्र से शिर तक ढाँक कर बैठा हो। ॰ कोई भी भाग श्वेत वस्त्र से अनाच्छादित न हो। इसी प्रकार भिक्षुओ! भिक्षु इसी काया को परिशुद्ध ॰ चित्त से व्याप्त कर बैठता है। इस प्रकार प्रमाद-रहित ॰।
“भिक्षुओ! जिसने काय-गति-स्मृति भावित=बहुलीकृत की है; उसको अन्तर्गत हैं सभी विद्या-भागीय कुशल धर्म।
“जैसे, भिक्षुओ! जिसने महासमुद्र को (अपने) चित्त से व्याप्त कर लिया हैं, उसको अन्तर्गत हैं, समुद्र को जाने वाली सभी छोटी नदियाँ। इसी प्रकार, भिक्षुओं! जिसने कायगत-स्मृति ॰। भिक्षुओं! जिसने कायगत-स्मृति को भावित=बहुलीकृत नहीं किया, उसमें मार को मौका मिलता हैं, उसमें मार को आरम्भण (=आलंब) मिल जाता है। जैसे, भिक्षुओं! (कोई) पुरूष भारी शिला-खंड को गीली मिट्टी के ढेर पर फेंके, तो क्या मानते हो, भिक्षुओ! क्या वह भारी शिला-खंड उस गीली मिट्टी के ढेर में घुस जायेगा या नहीं?”
“हाँ, भन्ते!”
‘इसी प्रकार, भिक्षुओं! जिसने कायगत-स्मृति को भावत ॰ नहीं किया ॰।
“जैसे, भिक्षुओं! सूखा काष्ठ-खंड पानी से दूर स्थल पर फेंका हो; तब अग्नि उत्पन्न करने, तेज-प्रादुर्भाव करने की इच्छा से (कोई) पुरूष उत्तरारणी लेकर आये। तो क्या मानते हों, भिक्षुओं! क्या वह पुरूष उस सूखे काष्ठ-खंड — जो कि पानी से दूर स्थल पर फेंका है — को उत्तरारणी से रगडते आग उत्पन्न कर सकेगा, तेज प्रादुर्भूत कर सकेगा?”
“हाँ, भन्ते!”
“इसी प्रकार, जिसने काय-गत-स्मृति भावित की हैं ॰।
‘जैसे, भिक्षुओं! जल का मटका (=उदक-मणिका) रिक्त=तुच्छ घडौंची पर रक्खा हो। तब (कोई) पुरूष पानी का भार लेकर आये। तो क्या मानते हो, भिक्षुओं! क्या वह पुरूष पानी को डाल सकता है?”
“हाँ, भन्ते!”
“इसी प्रकार, भिक्षुओं! जिसने ॰ नहीं भावित की ॰। भिक्षुओं! जिसने ॰ भावित ॰ की है, उसमें मार मौका नहीं पाता, आलम्बन नहीं पाता।
“जैसे, भिक्षुओं! गीला हरा काष्ठ पानी के पास स्थल पर फेंका हो, तब अग्नि उत्पन्न करने, तेज-प्रादुर्भाव करने की इच्छा से (कोई) पुरूष उत्तरारणी लेकर आये। तो क्या मानते हो, भिक्षुओं! क्या वह पुरूष उस गीले हरे काष्ठ को—जो कि पानी के पास स्थल पर फेंका हैं—उत्तरारणी से रगड कर आग उत्पन्न कर सकेगा ॰?”
“नहीं भन्ते!”
“इसी प्रकार, भिक्षुओं! जिसने काय-गत-स्मृति नहीं भावित की। ॰
“जैसे, भिक्षुओं! पानी से लबालब भरा, काकपेय (=जिसके ऊपर कौआ बैठ आसानी से पानी पी सकता है) जल का मटका घडौंची पर रक्खा हो। तब (कोई) पुरूष पानी का भार लेकर आये। तो क्या मानते हो, भिक्षुओ! क्या वह पुरूष पानी को डाल सकता है?”
“नहीं, भन्ते!”
“इसी प्रकार, भिक्षुओ! जिसने कायगत-स्मृति भावित की, उसमें भार को मौका नहीं मिलता ॰।
“भिक्षुओ! जिसने कायगत-स्मृति को भवित ॰ किया है, वह अभिज्ञा से साक्षात्कार-करणीय जिस जिस धर्म में, अभिज्ञा से साक्षात्कार करने के लिये चित्त को झुकाता है; आयतन (=स्थान) होने पर उसे साक्षात्कार कर लेता है।
“जैसे, भिक्षुओ! पानी से लबालब भरा ॰ जल का मटका घिडौंची पर रक्खा हो; उसको बलवान् पुरूष जिधर जिधर से मारे, पानी आता है। ऐसे ही ॰। इसी प्रकार भिक्षुओं! जिसने ॰ भावित ॰ किया है ॰।
“जैसे, भिक्षुओं! समतल भूमि पर बाँध बँधी, पानी से लबालब भरी, काकपेया चैकोर पुष्करिणी हो, उसकी आली (=बाँध) को बलवान् पुरूष जिधर जिधर से हटाये, उधर उधर से ही जल आये।”
“हाँ, भन्ते!”
“इसी प्रकार भिक्षुओं! ॰ भावित किया। ॰।
“जैसे, भिक्षुओं! सुभूमि (=बाग) में सडक के चैरस्ते (=चातुमहापथ) पर घोडे जुता, कोडे-टँगा आजानेय (=अच्छी जाति के घोडे का) रथ खडा हो। तब उस पर चतुर अश्व-दम्य-सारथी=युग्याचार्य (=रथवान्) चढकर, बायें हाथ में बागडोर, और दाहिने हाथ में कोडा ले जिधर चाहे उधर ले जावे, ले आवे। ऐसे ही ॰ इसी प्रकार भिक्षुओं! जिसने ॰ भावित ॰ किया है ॰।
“भिक्षुओं! जिसने कायगत स्मृति को स्मृति से आसेवित=भावित=बहुलीकृत=यानीकृत=वस्तूकृत, अनुष्ठित=परिचित=सुसमारब्ध किया है; (उसको) दस लाभ (=आनृशंस) होने चाहिये—(1) वह अ-रति-रतिसह होता है—उसके अ-रति (=उदासी) परास्त नहीं कर सकती, वह उत्पन्न अरति को दबाकर विहरता है। (2) भय-भैरव-सह होता है—भय-भैरव उसको परास्त नहीं कर सकता; वह उत्पन्न भय भैरव को दबाकर विहरता है। (3) शीत उष्ण, भूख-प्यास, दंश-मशक-वात-आतप (=॰ धूप) सरीसृपों के स्पर्श (=आघात) और दुरूक्त, दुरागत वचनों को सहन कर सकता है; उत्पन्न दुःख, तीव्र, परूष=कटु, प्रतिकूल=अ-मनाप, प्राणहर शरीरिक वेदनाओं को (सहर्ष) स्वीकार करने वाला होता है। (4) इसी जन्म में सुख-विहार-उपयोगी चारों चैतसिक ध्यानों का—कृच्छता बिना=कठिनाई बिना—पूर्णरूपेण लाभी होता है। (5) वह अनेक प्रकार की ऋद्धियों को अनुभव करता है—एक होकर बहुत होता है ॰। (6) ॰ दिव्य-श्रोत्र ॰। (7) दूसरे प्राणियों पुद्गलों के चित्त को अपने चित्त द्वारा जानता है ॰। (8) वह अनेक प्रकार के पूर्व-निवासों को स्मरण करता है ॰। (9) ॰ दिव्यचक्षु ॰। (10) आस्रवों के क्षय से अनास्रव चेतोविमुक्ति ॰। भिक्षुओं! जिसने कायगत-स्मृति को ॰।”
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।
על התרגום
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
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