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מ״נ 121

Cūḷasuññata sutta: चूल-सुञ्ञता-सुत्तन्त

Cūḷasuññatasutta

Suññatavagga

תרגומים

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में, मृगार-माता के प्रासाद पूर्वाराम में विहार करते थे।

तब आयुष्मान् आनन्द सायंकाल को प्रतिसँल्लयन (=ध्यान) से उठकर जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठे। एक ओर बैठे आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! एक समय भगवान् शाक्य (देश) में नगरक नामक शाक्यों के निगम (=कस्बें) में विहार करते थे। वहाँ मैंने, भन्ते! भगवान् के मुख से सुना, संमुख से ग्रहण किया—‘आनन्द इस समय मैं अधिकतर शून्यता-विहार से विहरता हूँ’। क्या, भन्ते! मैंने इसे ठीक से सुना, ठीक से ग्रहण किया, ठीक से मन में किया, ठीक से धारण किया?”

“हाँ, आनन्द! तूने यह ठीक से सुना ॰। आनन्द! पहिले भी, और इस समय भी मैं अधिकतर शून्या-विहार से विहरता हूँ। जैसे आनन्द! यह मृगारमाता का प्रासाद हाथी-गाय-घोडा-घोडी से शून्य है; सोना-चाँदी से शून्य है; स्त्री-पुरूष-सन्निपात (=॰ जमावडे) से शून्य है; किन्तु यह एक भिक्षु-संघ से अ-शून्य नहीं ऐसे ही आनन्द! भिक्षु ग्राम-संज्ञा (=गाँव के ख्याल) को मन में न कर, मनुष्य-संज्ञा मन मे न कर, एक अरण्य-संज्ञा को ले मन में करता है। अरण्य-संज्ञा में उसका चित्त प्रस्कंदित=प्रसन्न होता है; ठहरता है, लगता हे। वह यह जानता है—ग्राम-संज्ञा को लेकर जो दरथ (=खेद) थे, वह नहीं है; मनुष्य-संज्ञा को लेकर जो दरथ थे, वह भी नहीं है; किन्तु अकेली अरण्य-संज्ञा को लेकर यह दरथ-मात्रा ही है। वह जानता है—यह जो ग्राम-संज्ञा (=गाँव का ख्याल) है, यह संज्ञा शून्य है। वह जानता है—यह जो मनुष्य-संज्ञा है ॰। इस अकेली अरण्य-संज्ञा को ले कर अ-शून्यता तो है ही। इस प्रकार जो वहाँ नहीं होता, उससे उसे शून्य देखता है; और जो वहाँ बाकी रहता है, उस विद्यमान को ‘यह है’—जानता है। ऐसे भी आनन्द! यह यथार्थ=अ-विपर्यस्त, परिशुद्ध शून्यता में उसका प्रवेश होता है।

“और फिर, आनंद! भक्षु मनुष्य-संज्ञा को ॰, अरण्य-संज्ञा को मन में न कर, केवल पृथिवी-संज्ञा मात्र को लेकर मन में करता है। पृथिवी-संज्ञा में उसका ‘चित्त ॰ ठहरता है ॰। जैसे, आनंद! बैल का चमडा सौ काँटों से तना बलि (=शिकन) के बिना होता है; ऐसे ही आनंद! वह भिक्षु इस पृथिवी के ऊँचे तीचे तट, नदी घाट, खाँड, कंटकस्थान, पर्वत की विषमता—सभी को मन में न कर, एक मात्र पृथिवी-संज्ञा को ही लेकर मन में करता है। पृथिवी-संज्ञा में उसका चित्त ॰ ठहरता है ॰। वह ऐसा जानता है—मनुष्य-संज्ञा को लेकर जो दरथ थे, वह नहीं है। अरण्य संज्ञा को लेकर जो दरथ थे, वह नहीं है। किन्तु केवल पृथिवी-संज्ञा को लेकर दरथ तो हैं ही। वह जानता है—वह जो मनुष्य-संज्ञा हैं, वह (यहाँ) शून्य है; ॰ तो अरण्य-संज्ञा है, वह भी शून्य हैं; किन्तु इस केवल पुथिवी-संज्ञा को लेकर अ-शून्यता तो है ही। इस प्रकार जो वहाँ नहीं होता ॰। इस प्रकार भी आनंद! यथार्थ ॰ शून्यता में उसका प्रवेश होता है।

“और फिर, आनंद! भिक्षु अरण्य-संज्ञा को ॰, पृथिवी-संज्ञा को मन में न कर, केवल अन्तरहित आकाश के आयतन (=अधिकरण, स्थान) (=आकाशानन्त्यायतन) की संज्ञा (=ख्याल) को लेकर मन में करता है। आकाशानन्त्यायतन-संज्ञा में उसका चित्त ॰ ठहरता है ॰। वह ऐसा जानता है—अरण्य संज्ञा ॰, पृथिवी-संज्ञा को लेकर जो दरथ थे, वह नहीं है। किन्तु आकाशानन्त्यायतन-संज्ञा को लेकर दरथ तो हैं ही। ॰ अरण्य-संज्ञा ॰ शून्य है; ॰ पृथिवी-संज्ञा ॰ शून्य है; किन्तु इस केवल आकाशानन्त्यायतन-संज्ञा को लकर अशून्यता तो है ही। इस प्रकार वहाँ नहीं होता ॰। ऐसे भी, आनन्द! यथार्थ ॰ शून्यता में उसका प्रवेश होता है।

“और फिर, आनन्द! भिक्षु पृथिवी-संज्ञा को मन में न कर आाकशानन्त्यायन-संज्ञा को मन में न कर, अन्तरहित-विज्ञान के आयतन (=विज्ञानानन्त्यायतन) की संज्ञा को लेकर मन में करता है। ॰।

“॰ आकाशानन्त्यायतन-संज्ञा को मन में न कर, विज्ञानानन्तयायतन-संज्ञा को भी मन में न कर, केवल आकिंचन्य (=नहीं कुछ-पन) आयतन की संज्ञा को लेकर मन में करता है ॰।

“॰ विज्ञानानन्त्यायतन-संज्ञा को मन में न कर, आकिंचन्यायतन-संज्ञा को भी मन में न कर, केवल नैसंज्ञा-नासंज्ञायतन-संज्ञा को लेकर मन में करता है ॰।

“॰ आकिचन्यायतन-संज्ञा को मन में न कर, नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन-संज्ञा को भी मन में न कर, केवल अ-निमित्त (=लिंग आदि रहित) चेतःसमाधि को लेकर मन में करता है। ॰ आकिंचन्यायतन-संज्ञा को लेकर जो दरथ थे, वह नहीं हैं; नैवसंज्ञानासंज्ञायतन-संज्ञा को लेकर जो दरथ थे, वह नहीं है; किन्तु जीवन (=जीवित) के कारण इसी षड्-आयतन वाली काया को लेकर यह दरथ तो है ही। ॰ आकिंचन्यायतन-संज्ञा ॰ शून्य है; ॰ नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन-संज्ञा ॰ शून्य है; किन्तु जीवन के कारण, इसी षड्-आयतन वाली काया को लेकर अ-शून्यता तो है ही। इस प्रकार वहाँ नहीं होता ॰। ऐसे भी आनंद! ॰।

“॰ आकिंचन्यायतन-संज्ञा को मन में न कर, नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन-संज्ञा को भी मन में न कर, (जो) केवल अ-निमित्त चेतःसमाधि को लेकर मन में करता है; (सो) उसका चित्त अनिमित्त चेतः समाधि में ॰ ठहरता है ॰। वह ऐसा जानता है—चूँकि यह निमित्त चेतःसमाधि अभिसंस्कृत (=कृत) है, चिन्तन करते (यह) अभिसंस्कृत (=कृत) हुई है। जो अभिसंस्कृत (=कृत) हैं, वह अ-नित्य है, नाशमान (=निरोधधर्मा) हैं—यह जानता है। तब इस प्रकार जानते-देखते उसक चित्त काम-आस्रवों (=भोगेच्छा सम्बन्धी चित्त कालुष्योँ) से मुक्त होता है, ॰ भव-आस्रव (=जन्मान्तर की लालसा रूपी आस्रव) ॰, अविद्या-आस्रवों (=अज्ञान ॰) से भी मुक्त होता है। विमुक्त होने पर ‘विमुक्त हूँ’—ज्ञान होता है। ‘आवागमन खतम हो गया, (ब्रह्मचर्य) वास पूरा हो गया, करना था, सो कर लिया, ओर यहाँ के लिये (कुछ शेष) नहीं हैं—जानता है। वह ऐसा जानता है—‘काम-आस्रव को लेकर जो दरथ थे, वह नहीं है। भव-आस्रव ॰ अविद्या-आस्रव को लेकर जो दरथ थे, वह नहीं है; किन्तु जीवन के कारण, इसी षड्-आयतनवाली काया को लेकर दरथ तो है ही। वह जानता है—कामास्रव सम्बन्धी संज्ञा से शून्य है। ॰ भवास्रव ॰। ॰ अविद्यास्रव-सम्बन्धी संज्ञा से यह शून्य है; किन्तु, ॰ इसी षडायतन वाली काया को लेकर अशून्यता तो है ही। इस प्रकार जो वहाँ नहीं होता, उससे उसे शून्य देखता है, और जो वहाँ बाकी रहता है, उस विद्यमान को—‘यह है’—जानता है। ऐसे, आनन्द! यह यथार्थ=अ-विपर्यन्त, परिशुद्ध परम-अनुत्तर (=सर्वोत्तम) शून्यता में प्रवेश होता है।

‘आनन्द! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण अतीत काल में परमानुत्तर-शून्यता को प्राप्त कर विहरे, वह सभी इसी परमानुत्तर-शून्यता को प्राप्त कर विहरे। ॰ भविष्यकाल में ॰ विहरेंगे, वह सभी इसी परमानुत्तर-शून्यता को प्राप्त कर विहरेंगे। ॰ वर्तमानकाल में ॰ विहरते हैं, वह सभी इसी परमानुत्तर-शून्यता को प्राप्त कर विहरते है। इसलिये, आनन्द! ‘परिशुद्ध, परमानुत्तर शून्यता को प्राप्त कर विहरूँगा’—यह तुझे सीखना चाहिये।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

על התרגום

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

מי ייתן וכל היצורים יהיו מאושרים