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מ״נ 137

Saḷāyatanavibhaṅga sutta: सलायतन-विभंग-सुत्तन्त

Saḷāyatanavibhaṅgasutta

Vibhaṅgavagga

תרגומים

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

वहाँ, भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओं!”

“भदन्त!” कह उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ! तुम्हें सलायतन-विभंग (=छः आयतनों का विभाग) उपदेशता हूँ, उसे सुनो, अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।”

“अच्छा, भन्ते!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ! छः आध्यात्मिक (शरीर के भीतर के) आयतनों को जानना चाहिये, छः बाह्य आयतनों को जानना चाहिये। छः विज्ञान-कार्यो को जानना चाहिये। छः स्पर्श-कायों को जानना चाहिये। अठारह मनोपविचारों (=मन-उपविचारों) को जानना चाहिये। छत्तीस सप्तपदों को जानना चाहिये। वहाँ—‘इसके द्वारा इसे छोडो’। तीन स्मृति-प्रस्थान, जिन्हें आर्य ॰ (मुक्त, मोक्षभागी पुरूष) सेवन करते है; जिन्हें सेवन करते आर्य शास्ता, गण (=अनुयायि-समुदाय) को अनुशासन (=उपदेश) कर सकता है। वह (ऐसा शास्ता) युग्याचार्यों में अनुपम पुरूष-दम्य-सारथी (पुरूषों को विनय सिखलाने वाला चाबुक-सवार) कहा जाता है।

“यह षडायतन-विभंग का उद्देश (प्रतिपाद्य विषयों का नाम गिनना) है।

“जो यह कहा—‘छः आध्यात्मिक आयतनों (=इन्द्रियों को) जानना चाहियें’—यह किसके बारे में कहा?—(1) चक्षु-आयतन, (2) श्रोत्र-आयतन, (3) घ्राण-आयतन, (4) जिह्वा-आयतन, (5) काय-आयतन, और (6) मन-आयतन, ॰ वह इन्हीं के बारे में कहा। जो यह कहा—‘छः बाह्य आयतनों (=विषयों) को जनना चाहिये’—यह किसके बारे में कहा?—(1) रूप आयतन, (2) शब्द ॰, (3) गंध ॰, (4) रस ॰, (5) स्प्रष्टव्य ॰, और (6) धर्म-आयतन। ॰ वह इन्हीं के बारे में कहा। जो यह कहा—‘छः विज्ञान (=इन्द्रिय-विषय के योग से प्राप्त ज्ञान) कार्यो को जानना चाहिये’—यह किसके बारे में कहा?—(1) चक्षु र्विज्ञान, (2) श्रोत्र ॰, (3) घ्राण ॰, (4) जिह्वा ॰, (5) काय ॰, और (6) मनो-विज्ञान। ॰ वह इन्हीं के बारे मे कहा। जो यह कहा—‘छः स्पर्श-‘कायों को जानना चाहिये’—यह किसके बारे में कहा?—(1) चक्षुः-सस्पर्श, (2) श्रोत्र ॰, (3) घ्राण ॰, (4) जिह्वा ॰, (5) काय ॰, और (6) मनः-संस्पर्श। ॰ वह इन्हीं के बारे में कहा। जो यह कहा—‘अठारह मनोप विचारों को जानना चाहिये’—यह किसके बारे में कहा?—(1) चक्षु से रूप को देखकर रूप को सौमनस्य-स्थानीय उपविचारता (=विचारता) हैं; (2) दौर्मनस्य-स्थानीय उपविचारता है; (3) उपेक्षा स्थानीय उपविचारता है। (4-6) श्रोत्र से शब्द को सुनकर ॰। (7-9) घ्राण से गंध को सूँघ कर ॰। (10-12) जिह्वा से रस को चखकर ॰। (13-15) काया से स्प्रष्टव्य को छू कर ॰। (16-18) मन से धर्म को जानकर ॰। इस प्रकार छ’ सौमनस्य के उपविचार, छः दौर्मनस्य के उपविचार, और छः उपेक्षा के उपविचार — इन अठारह मनोपविचारों को जानना चाहिये—यह जो कहा, वह इन्हीं के बारे में कहां “जो यह कहा—‘छत्तीस सप्तपदों को जानना चाहिये’—यह किसके बारे में कहा? (1-6) गेध (लोभ) सम्बन्धी सौमनस्य, (7-12) निष्कामता संबन्धी सौमनस्य, (13-18) छः गेध-सम्बन्धी दौर्मनस्य, (19-24) छः निष्कामता सम्बन्धी-दौर्मनस्य, (25-30) छः गेध संबंधी उपेक्षा, (31-36) छः निष्कामता-संबंधी उपेक्षा।

“कौन है गेध-संबंधी सौमनस्य?— (1) इष्ट=कान्त=मनाप=मनोरम लोकामिप (=लौकिक भोग) से संबद्ध चक्षु (द्वारा) विज्ञेय रूपों के लाभ को लाभ के तौर पर समझते; या अतीत=निरूद्ध (=नष्ट), विपरिणत (=विकार-प्राप्त) (॰ रूपों के) पहिले प्राप्त लाभ को; लाभ के तौर पर स्मरण करते है। सौमनस्य उत्पन्न होता है। जो इस प्रकार का सौमनस्य है; वह गेध-संबंधी (=गेह-सित, गेध-संबंधी) सौमनस्य कहा जाता है। (2) ॰ श्रोत्र-विज्ञेय शब्दों के लाभ को ॰। (3) ॰ घ्राण-विज्ञेय गंधों के लाभ को ॰। (4) ॰ जिह्वा-विज्ञेय रसों के लाभ को ॰। (5) ॰ काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्यों के लाभ को ॰। (6) ॰ मनो-विज्ञेय धर्मो के लाभ को ॰ यह कहा जाता है गेध संबंधी (गेह-सित) सौमनस्य। यह छः गेध-संबंधी सौमनस्य हैं।

“क्या है छः निष्कामता संबंधी सौमनस्य?—(7) रूपों की अ-नित्यता, विपरिणाम, निरोध, विराग को जानकर—(जो) पूर्व (काल) के रूप थे, और इस समय हे, वह सभी रूप अ-नित्य, दुःख, विपरिणाम धर्मा (=विकृत होने वाले) हैं—इस प्रकार इसे अच्छी तरह प्रज्ञा से देखते सौमनस्य उत्पन्न होता है। जो इस प्रकार का सौमनस्य है; वह निष्कामता-संबंधी (=नेक्खम्भसित) सौमनस्य कहा जाता है। (8) शब्दो की अ-नित्यता ॰ (9) गंधों की अनित्यता ॰। (10) रसों की अनित्यता ॰। (11) स्प्रष्टव्यों की अनित्यता ॰। (12) धर्मो की अ-नित्यता ॰ यह कहा जाता है, ‘निष्कामता-संबंधी सौमनस्य।—यह छः निष्कामता-संबंधी सौमनस्य है।

“क्या है, छ’ गेध-संबंधी दौर्मनस्य?—(13) इष्ट ॰ रूपों के अलाभ को अलाभ के तौर पर समझते, या अतीत ॰ (॰ रूपों के) पहिले अलाभ को अ-लाभ के तौर पर स्मरण करते दौर्मनस्य (=खेद) उत्पन्न होता है। जो इस प्रकार का दौर्मनस्य है; यह गेध-संबंधी दौर्मनस्य कहा जात है। (14) इष्ट ॰ शब्दों के अलाभ को ॰। (15) इष्ट ॰ गंधों के अलाभ को ॰। (16) इष्ट ॰ रसों के अलाभ को ॰। (17) इष्ट ॰ स्प्रष्टव्यों के अ-लाभ को ॰। (18) इष्ट ॰ धर्मों के अ-लाभ को ॰। यह कहा जात है, गेध-संबंधी दौर्मनस्य।— यह छः गेध-संबंधी दौर्मनस्य है।

“क्या हैं, छः निष्कामता-संबंधी दौर्मनस्य?—(19) रुपों की अ-नित्यता ॰ को जानकर ॰ अच्छी तरह प्रज्ञा से देख, अनुपम विमोक्षों मैं स्पृहा उपस्थापित करता हैं—‘अहो! कब मैं उस अवस्था को (=आयतन) को प्राप्त हो विहरूँगा, जिस आयतन को प्राप्त कर आज आर्य (लोग) विहर रहे हैं’—इस प्रकार अनुपम विमोक्षों में स्पृहा उपस्थापित करते, स्पृहा के कारण दौर्मनस्य (=खेद) उत्पन्न होता है। जो इस प्रकार का दौर्मनस्य है, यह कहा जाता है, निष्कामता संबंधी दौर्मनस्य! (20) शब्दों की अनित्यता ॰। (21) गंधों की अनित्यता ॰। (22) रसों की अनित्यता ॰। (23) स्प्रष्टव्यांे की अ-नित्यता ॰। (24) धर्मो की अ-नितयता ॰। यह कहा जाता है, निष्कामता-संबंधी दौर्मनस्य।—यह छः निष्कामता-संबंधी दौर्मनस्य हैं।

“क्या हैं, छः गेध-संबद्ध उपेक्षायें?—(25) मूढ, मन्द, पृथग्जन (=अनाडी), बद्ध, (कर्म) विपाक को न जीते, दुष्परिणाम-अ-दर्शी, अज्ञ, अनाडी=बाल को चक्षु से रूप देख कर उपेक्षा उत्पन्न होती है। जो इस प्रकार की उपेक्षा है, वह रूप को (कालान्तर में) अतिक्रमण नहीं कर सकती; इसलिये यह उपेक्षा गेध-संबद्ध कही जाती है। (26) ॰ श्रोंत्र से शब्द ॰। (27) ॰ घ्राण से गंध ॰। (28) ॰ जिह्वा से रस ॰। (29) ॰ काया से स्प्रष्टव्य ॰। (30) ॰ मन से धर्म ॰ इसलिये यह उपेक्षा गेध-संबद्ध कही जाती है। यह छः गेध-संबद्ध उपेक्षायें है।

“क्या हैं, छः निष्कामता-संबद्ध उपेक्षाये?-(31) रूपों की अ-नित्यता ॰ को जान कर ॰ अच्छी तरह प्रज्ञा से देखते उपेक्षा उत्पन्न होती है। जो इस प्रकार की उपेक्षा है, वह (निष्कामता) धर्म को अतिक्रमण नहीं करती; इसलिये यह उपेक्षा निष्कामता-संबद्ध कही जाती है। (32) शब्दों की ॰। (33) गंधों की ॰। (34) रसों की ॰। (35) स्प्रष्टव्यों की ॰। (36) धर्मों की ॰। यह छः निष्कामता-संबद्ध उपेक्षायें हैं।

“यह जो कहा—‘छत्तीस सप्तपदों को जानना चाहिये’—वह इन्हीं के लिये कहा।

“यह जो कहा—‘इसके द्वारा इसे छोडो’ यह किसके बारे में कहा?—वहाँ भिक्षुओ! जो छः निष्कामता-संबंद्ध सौमनस्य हैं, उनके द्वारा, उनको लेर; जो वह छः गेध-संबंद्ध सौमनस्य हैं, उन्हें छोडो, उन्हे अतिक्रमण करो। इस प्रकार उनका प्रहाण होता है, इस प्रकार उनका अतिक्रमण होता है। वहाँ, भिक्षुओं जो छः निष्कामता-संबद्ध दौर्मनस्य हैं, उनके द्वारा, उनको लेकर; जो वह छः गेध-संबद्ध दौर्मनस्य हैं, उन्हें छोडो, उन्हें अतिक्रमण करों। ॰। वहाँ, भिक्षुओं! जो छः निष्कामता-सबंबद्ध उपेक्षायें हैं, उनके द्वारा, उनको लेकर; जो वह छः गेध-संबद्ध उपेक्षायें हैं, उन्हें छोडो, उन्हे अतिक्रमण करों। ॰। वहाँ भिक्षुओं! जो छः निष्कामता-संबद्ध सौमनस्य हैं; उनके द्वारा, उनको लेकर; जो वह छः निष्कामता-संबद्ध दौर्मनस्य हैं, उन्हंे छोडो, उन्हें अतिक्रमण करो। ॰। वहाँ, भिक्षुओ! जो छः निष्कामता-संबद्ध उपेक्षायें हैं, उनके द्वारा, उनको लेकर; जो वह छः निष्कामता-संबद्ध सौमनस्य हैं, उन्हंे छोडो, उन्हें अतिक्रमण करो। ॰। भिक्षुओ! उपेक्षा नानार्थ हे, नाना अर्थो से संबद्ध है। उपेक्षा एकार्था है। एक अर्थसे संबद्ध है। कौन है, भिक्षुओ! उपेक्षा नानार्थ, नाना अर्थो से संबद्ध?—हे भिक्षुओ! उपेक्षा रूपों में, हैं शब्दों में, है गन्धों में, है रसों में, है स्प्रष्टव्यों में। भिक्षुओ! यह उपेक्षा नानार्था है, नाना अर्थो से संबद्ध हे। कौन है, भिक्षुओ! उपेक्षा एकार्थो, एक अर्थ से संबद्ध?—हे भिक्षुओ! उपेक्षा आकाशानन्त्यायतन से सम्बद्ध; ॰ विज्ञानानन्त्यायतन ॰; ॰ आकिंचन्यायतन ॰; ॰ नैव-संज्ञा-नासंज्ञायतन से संबद्ध। भिक्षुओं! यह उपेक्षा एकार्था है, एक अर्थ से संबद्ध। यहाँ, भिक्षुओ! जो उपेक्षा एकार्था ॰ है, उसके द्वारा उसको लेकर; जो वह उपेक्षा नानार्था ॰ है, उसे छोडो, उसे अतिक्रमण करो। इस प्रकार इसका प्रहाण होता है, इस प्रकार इसका अतिक्रमण होता है। अ-तन्मयता के द्वारा, अ-तन्मयता को लेकर, भिक्षुओ! जो यह एकार्था ॰ उपेक्षा है, उसे छोडो, उसे अतिक्रमण करो। इस प्रकार इसका प्रहाण ॰ अतिक्रमण होता है। भिक्षुओ! यह जो कहा—‘इसके द्वारा इसे छोडो’—वह इसी के बारे में कहा।

“यह जो कहा—‘तीन स्मृति-प्रस्थान, जिन्हें आर्य सेवन करते हैं; जिन्हें सेवन करते आर्य शास्ता गण का अनुशासन कर सकता है’—यह किसके बारे में (किसलिये) कहा?—(1) यहाँ भिक्षुओ! अनुकम्पक, हितैषी शास्ता अनुकम्पा करके श्रावकों (=शिष्यों) को धर्म उपदेशते हैं—‘यह तुम्हारे हित के लिये है, यह तुम्हारे सुख के लिये है’। उसे श्रावक नहीं सुनना चाहते, नहीं कान देते, अन्यत्र से (हटाकर) चित्त को (उसमें) उपस्थित नहीं करते, और शास्ता के शासन (=उपदेश) को अतिक्रमण कर वर्तते हैं। वहाँ भिक्षुओ! तथागत असन्तुष्ट नहीं होते, न असन्तोष को अनुभव करते है। स्मृति-सम्प्रजन्य के साथ अनासक्त हो विहरते (=रहते) है। भिक्षुओ! यह प्रथम स्मृति-प्रस्थान कहा जाता हैं, जिसे कि आर्य सेवन करते हैं ॰ अनुशासन कर सकता है। (2) और फिर, भिक्षुओ! ॰ शास्ता ॰ उपदेशते हैं—॰। कोई कोई श्रावक उसे नहीं सुनना चाहते हैं ॰ शास्ता के शासन को अतिक्रमण कर वर्तते है। कोई काई श्रावक उसे सुनना चाहते हैं ॰ शास्ता के शासन को अतिक्रमण नहीं करते। वहाँ, भिक्षुओं! तथागत न अ-संतुष्ट होते हैं, न असन्तोष को अनुभव करते हैं; और नहीं तथागत खुश होते हैं, खुशी अनुभव करते हे। उन दोनों (सन्तोष असन्तोष) को छोडकर, तथागत उपेक्षक हो स्मृति-सम्प्रजन्य के साथ विहरते है। भिक्षुओ! यह द्वितीय स्मृति प्रस्थान कहा जाता है; जिसे कि आर्य सेवन करते हैं ॰ अनुशासन करते है। (3) और फिर, भिक्षुओ! ॰ शास्ता ॰ उपदेशते हैं—॰। श्रावक उसे सुनना चाहते है ॰ शास्ता के शासन को अतिक्रमण नहीं करते। वहाँ, तथागत संतुष्ट होते हैं, सन्तोष अनुभव करते हैं, स्मृति-सम्प्रजन्य के साथ अनासक्त हो विहरते हैं! भिक्षुओ! यह तृतीय स्मृति प्रस्थान कहा जाता है; जिसे कि आर्य सेवन करते हैं .॰ अनुशासन कर सकता है। ‘तीन स्मृति-प्रस्थान ॰’—यह जो कहा, सो इसी के लिये कहा।

“यह जो कहा—‘वह युन्याचार्यों में अनुपम पुरूष-दग्य-सारथी कहा जाता है’—यह किसके बारे में (किसलिये) कहा?—भिक्षुओ! हस्ति दम्यक (=महावत) द्वारा चलाया सीखा हाथी एक ही दिशा की ओर धावता है—पूर्व या पश्चिम, या उत्तर या दक्खिन। भिक्षुओ! अश्वदम्यक (=सवार) से चलाया सीखा अश्व एक ही दिशा को धावता है ॰। भिक्षुओं! गोदम्यक से चलाया सीखा बैल एक ही दिशा को धावता है ॰। भिक्षुओ! तथागत अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध द्वारा चलाया पुरूष-दम्य (=सीखा पुरूष) आठों दिशाओं मे धावता है—(1) रूपी रूपों को देखता है यह प्रथम दिशा है (2) भीतर (=अध्यात्म) अ-रूप-संज्ञी (=रूप का ख्याल न रखने वाला) बाहर रूपों को देखता है, वह दूसरी दिशा है। (3) शुभ (=अनुकूल) से ही अधिमुक्त (=मुक्त) होता है, यह तीसरी दिशा है। (4) रूप संज्ञा के सर्वथा छोडने से ॰ आकाशानन्त्यायतन को प्राप्त हो विहरता है; यह चैथी दिशा है। (5) ॰ विज्ञानानन्त्यायतन को ॰। (6) ॰ आकिचन्यायतन को ॰। (7) नैवसंज्ञानासंज्ञायतन को ॰। (8) नैवसंज्ञानासंज्ञायतन को सर्वथा अतिक्रमणकर संज्ञा-वेदित-निरोध को प्राप्त हो विहरता है; यह आठवीं दिशा है। भिक्षुओ! तथागत ॰ द्वारा चलाया पुरूष-दम्य आठों दिशा को धावता है। यह जो कहा—‘वह युग्याचार्यो में अनुपम पुरूषदम्य-सारथी कहा जाता है’—वह इसीलिये कहा।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

על התרגום

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

מי ייתן וכל היצורים יהיו מאושרים