מ״נ 146
Nandakovāda sutta: नन्दकोवाद-सुत्तन्त
Nandakovādasutta
Saḷāyatanavagga
תרגומים
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।
तब महाप्रजापती गौतमी पाँच सौ भिक्षुणियों के साथ, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गई; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर खडी हुई। एक ओर खडी महाप्रजापति गौतमी ने भगवान् से यह कहा—
“भन्ते! भगवान् भिक्षुणियों को उपदेश दें। भन्ते! भगवान् भिक्षुणियो को अनुशासन करें। भन्ते! भगवान् भिक्षुणियों को धार्मिक कथा करें।”
उस समय स्थवितर भिक्षु बारी बारी (=पर्याय) से भिक्षुणियों को उपदेश किया करते थे। आयुष्मान् नंदक (अपनी) बारी मे भिक्षुणियां को उपदेश देना नहीं चाहते थे।
तब भगवान् ने आयुष्मान् आनंद को संबोधित किया—
“आनंद! बारी बारी से भिक्षुणियां को उपदेश करने में, आज किसकी उपदेश करने की बारी है?”
“भन्ते! यह आयुष्मान् नन्दक बारी में भिक्षुणियों को उपदेश देना नहीं चाहते।”
तब भगवान् ने आयुष्मान् नन्दक को संबोधित किया-”
“नन्दक! भिक्षुणियों को उपदेश दे। नन्दक! भिक्षुणियों को अनुशासन कर। ब्राह्मण! तू भिक्षुणियों को धार्मिक कथा कह।”
“अच्छा, भन्ते!”—(कह) भगवान् को उत्तर दे, आयुष्मान् नन्दक पूर्वाह्न सम पहिनकर, पात्र-चीवर ले श्रावस्ती में भिक्षा के लिये प्रविष्ट हुये। श्रावस्ती में भिक्षाटन कर भोजनोपरांत भिक्षा से निवृत हो, एक भिक्षु के साथ (=आत्मद्वितीय) जहाँ राजकाराम था, वहाँ गये। उन भिक्षुणियों ने दूर से ही आयुष्मान् नन्दक को आते देखा। देखकर आसन बिछा दिया, और पैरों को (धोने के लिये) पानी भी (रख दिया)। आयुष्मान् नन्दक बिछे आसन पर बैठ गये; बैठकर पावों को पखारा, वह भिक्षुणियांँ भी आयुष्मान्, नन्दक को अभिवादन कर एक ओर बैठ गई। एक ओर बैठी उन भिक्षुणियों से आयुष्मान् नन्दक ने यह कहा-”
“भगिनियों! प्रतिपृच्छ (=पूछ पूछकर) कथा होगी, सो जो जानती है, उन्हें ‘जानती हूँ’—कहना चाहिये; जो नहीं जानती, उन्हें ‘नहीं जानती हूँ—कहना चाहिये। और जिसका कांक्षा (=संदेह) या विमति (=भ्रम) हो, (उन्हें) मुझे ही पूछना चाहिये—‘यह भन्ते! कैसे, इसका अर्थ हैं’।”
“भन्ते! आर्य नन्दक के इतने (कहने) से भी हम सन्तुष्ट, =अभिरद्धा है; जो कि आर्य (अय्य) नन्दक हमें प्रवारित (=तुष्ट) करते है।”
“तो क्या मानती हो, भगिनियो! चक्षु नित्य है या अनित्य?”
“अ-नित्य हैं, भन्ते!’
“जो (पदार्थ) अनित्य है, वह दुःख है या सुख?
“दुःख, भन्ते!”
“जो अनत्यि, दुःख, विपरिणामधम्र्मा (=परिवर्तन शील) हैं, क्या उसे—‘यह मैं हूँ’, ‘यह मेरा है’, ‘यह मेरा आत्मा है’—ऐसा समझना युक्त (=कल्प) है?”
“नहीं, भन्ते!”
“तो क्या मानती हो, भगिनियो! श्रोत्र ॰। ॰ घ्राण ॰। ॰ जिह्वा ॰। ॰ काय ॰।”
“तो क्या मानती हो, भगिनियों! मन नित्य है या अनित्य?”
“॰ ऐसा समझना युक्त हैं?”
“नहीं भन्ते!”
“सो किस हेतु?”
“भन्ते! पूर्व ही हमने इसको यथार्थ कह ठीक से प्रज्ञा द्वारा सुदेखा था—‘यह मेरे आध्यात्मिक आयतन अ-नित्य है’।”
“साधु, साधु, भगिनियों! आर्यश्रावक को इसे यथार्थतः ठीक से प्रज्ञाद्वारा देखने पर ऐसा होता है।”
“तो क्या मानती हो, भगिनियो! रूप नित्य है या अ-नित्य?”
“अनित्य हैं, भन्ते!”
“॰ शब्द ॰?” ”॰ अ-नित्य ॰!” ॰।
“॰ गन्ध ॰?” ”॰ अ-नित्य ॰!” ॰।
“॰ रस ॰?” ”॰ अ-नित्य ॰!” ॰।
“॰ स्प्रष्टव्य ॰?” ”॰ अ-नित्य ॰!” ॰।
“॰ धर्म ॰?” ”॰ अ-नित्य ॰!” ॰।
“सो किस हेतु?” “भन्ते! पूर्व ही ॰’।’
“साधु, साधु, भगिनियों! ॰।
“तो क्या मानती हो, भगिनियों! चक्षु-र्विज्ञान नित्य है या अनित्य?”
“अ-नित्य, भन्ते!” ॰।
“॰ श्रोत्र-विज्ञान ॰?” ”॰ अ-नित्य ॰!” ॰।
“॰ घ्राण-विज्ञान ॰?” ”॰ अ-नित्य ॰!” ॰।
“॰ जिह्वा-विज्ञान ॰?” ”॰ अ-नित्य ॰!” ॰।
“॰ काय-विज्ञान ॰?” ”॰ अ-नित्य ॰!” ॰।
“॰ मनो-विज्ञान ॰?” ”॰ अ-नित्य ॰!” ॰।
“सो किस हेतु?” “भन्ते! पूर्व ही ॰’।”
“साधु, साधु, भगिनियों! ॰।
“जैसे, भगिनियों! जलते तेल-प्रदीप का तेल भी अ-नित्य है=विपरिणाम-धर्मा है, बत्ती भी अ-नित्य=विपरिणाम-धर्मा है, अर्चि (=लौ) भी अ-नित्य=विपरिणाम-धर्मा है, आभा (=प्रकाश) भी ॰। भगिनयों! जो ऐसा कहे—इस जलते तेल-प्रदीप का तेल भी अ-नित्य है ॰, बत्ती भी ॰, अर्चि भी ॰, किन्तु जो इसकी आभा (=प्रकाश) है, वह नित्य=ध्रुव=शाश्वत=अ-विपरिणाम-धर्मा है। भगिनियो! वह ऐसा कहते क्या ठीक कहेगा?”
“नहीं, भन्ते!”
“सो किस हेतु?”
“भन्ते! इस जलते तेल-प्रदीप का तेल भी अनित्य है, बत्ती भी ॰, अर्चि भी ॰, तो आभा तो पहिले ही अ-नित्य=विपरिणाम-धर्मा हो गई।”
“ऐसे ही, भगिनियों! जो यह कहे—‘मेरे छः आध्यात्मिक आयतन तो अ-नित्य हैं, किन्तु छः आयतनों को लेकर (=प्रतीत्य) जो अनुभव (=प्रतिसंवेदन होता है—सुख, दुःख, या अ-दुःख-अ-सुख, वह नित्य=ध्रुव=शाश्वत=अ-विपरिणाम-धर्मा है। भगिनियों! वह ऐसा कहते क्या ठीक कहेगा?”
“नहीं, भन्ते!”
“सो, किस हेतु?”
“भन्ते! उस समय प्रत्यय (=कारण) को लेकर वह वेदना उत्पन्न होती है; उस उस प्रत्यय के निरोध से वह वह वेदना निरूद्ध होती है।”
“साधु, साधु, भगिनियों! ॰।
“जैसे, भगिनियों! (एक) खडे सारवान् महावृक्ष का मूल भी अनित्य है=विपरिणाम धर्मा है, स्कंध भी ॰, शाखा-पत्र भी ॰, छाया भी ॰। भगिनियों! जो यह कहे—इस ॰ महावृक्ष का मूल भ ॰, स्कंध भी ॰, शाखा-पत्र भी अनित्य=विपरिणाम-धर्मा हैं, किन्तु जो इसकी छाया है, वह नित्य ॰ है। भगिनियों! वह ऐसा कहते क्या ठीक कहेंगे?”
“नहीं, भन्ते!”
“सो किस हेतु?”
“भन्ते! इस ॰ महावृक्ष का मूल भी ॰, ॰ शाखा-पत्र भी अनित्य ॰ हैं; तो छाया तो पहिले ही, अ-नित्य ॰ हुई।”
“ऐसे ही भगिनियों! जो यह कहे—‘मेरे छः बाह्य आयतन तो अ-नित्य हैं, किन्तु छः बाह्य-आयतनों को लेकर जो अनुभव (=वेदना) सुख, दुःख या अ-दुःख-अ-सुख होता है, वह नित्य=ध्रुरव ॰ है। भगिनियो! वह ऐसा कहते क्या ठीक कहेगा?”
“नहीं, भन्ते!”
“सो किस हेतु”
“भन्ते! उस उस प्रत्यय को लेकर ॰ निरूद्ध होती है।”
“साधु, साधु, भगिनियों! ॰।
“जैसे, भगिनियो! चतुर गोघातक या गोघातक शागिर्द (=अन्तेवासी) गाय को मारकर, तेज गाय काटने के छुरे से गाय के भीतरी मांस और बाहरी चमडे को नुकसान पहुँचाये बिना (=अनुपहत्य) गाय को काटे—जो जो वहाँ भीतर विलिम, स्नायु (=नस), बंधन है, उसे तेज ॰ छुरे से छिंदन करे, काटे…। छिंदन कर काटकर…, बाहरी चमडे का झाड फटकार कर, उसी चमडे में उस गाय को ढाँक कर यह कहे—‘यह गाय वैसे (=पहिले की तहर) ही इस चर्म से युक्त हैं’। भगिनियों! वह ऐसा कहते क्या ठीक कहेगा?”
“नहीं, भन्ते!”
“सो किस हेतु?”
“उसे भन्ते! चतुर गोघातक ने ॰ इस चर्म से युक्त हैं, लेकिन वह गाय उस चर्म से युक्त नहीं है।”
“भगिनियों! अर्थ को समझाने के लिये मैंने यह उपमा (=दृष्टांत) कहीं। यह यहाँ अर्थ है—भीतरी मांस-काय (=॰ समुदाय) यह छः आध्यात्मिक आयतनों का नाम है। बाहरी चर्मकार यह छः बाह्य आयतनों का नाम है। भीतरी विलिम, भीतरी स्नायु भीतरी बंधन, यह भगिनियों! नन्दी=राग का नाम है। तीक्ष्ण गोविकत्र्तन (=गाय काटने का छुरा) यह आर्य प्रज्ञा का नाम है; जो यह आर्य प्रज्ञा भीतर क्लेश (=मल), भीतरी संयोजन=भीतरी बंधन को छेदन करती है, काटती हैं…।
“भगिनियो! यह सात बोध्यंग हैं, जिनकी भावना=बहुलीकरण (=अभ्यास) करने से, भिक्षु इसी जन्म में आस्रवों के क्षय से आस्रव-रहित (=अनास्रव) चेतो-विमुक्ति प्रज्ञामुक्ति को स्वयं जान कर, साक्षात्कार कर, प्राप्त कर विहरता है। कौन से सात?—यहाँ, भगिनियों! भिक्षु विवेक-निश्रित (=एकान्त चिन्तन से संबंद्ध), विराग-निश्रित, निरोध-निश्रित व्यवसर्ग (=त्याग) परिणामवाले स्मृति-संबोध्यंग की भावना करता। ॰ धर्म-विचय-संबोध्यंग ॰। ॰ वीर्य-संबोध्यंग ॰। ॰ प्रीति-संबोध्यंग ॰। ॰ प्रश्रब्धि-संबोध्यंग ॰। ॰ समाधि-संबोध्यंग ॰। ॰ उपेक्षा-संबोध्यंग ॰। ॰ भगिनियों! यह सात बोध्यंग हैं; जिनकी भावना ॰ करने से ॰ इसी जन्म में ॰ प्रज्ञा विमुक्ति को ॰ प्राप्त कर विहरता है।”
तब आयुष्मान् नन्दक ने भिक्षुणियों को इस अववाद (=उपदेश) से उपदेश कर प्रेरित किया—
“जाओ, भगिनियो! (जाने का) काल है।”
तब वह भिक्षुणियाँ आयुष्मान् नन्दक के भाषण को अभिनंदित=अनुमोदित कर, आसन से उठ, आयुष्मान् नन्दक को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर, जहाँ भगवान् थे वहाँ गई। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर खडी हो गईं। एक ओर खडी उन भिक्षुणियों से भगवान् ने यह कहा—
“जाओ, भिक्षुणियों! (यह जाने का) काल है।”
तब वह भिक्षुणियाँ भगवान् को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर, चली गई। तब उन भिक्षुणियों के चले जाने के थोडे ही समय बाद भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया-”
“जैसे, भिक्षुओ! उसी दिन चतुर्दशी (=अमावस्या) के उपोसथ के दिन बहुत लोगों को कांक्षा या विमति (=संशय) नहीं होती—‘क्यों जी, चन्द्रमा क्षीण है, या पूर्ण हैं’, क्योंकि चन्द्रमा क्षीण ही होता है। इसी प्रकार, भिक्षुओं! वह भिक्षुणियाँ नन्दक की धर्म-देशना से सन्तुष्ट हुई हैं, किन्तु परिपूर्ण-संकल्प नहीं हुई।”
तब भगवान् ने आयुष्मान् नन्दक को संबोधित किया—
“तो नन्दक! तू कल भी उसी भिक्षुणियों को उस अववाद से उपदेश कर।’
“अच्छा, भन्ते!”—(कह) आयुष्मान् नंदक ने भगवान् को उत्तर दिया।
तब आयुष्मान् नन्दक उस रात के बीतने पर, पूर्वाह्न समय पहिन कर, पात्र-चीवर ले श्रावस्ती में पिंड के लिये प्रविष्ट हुये। श्रावस्ती में भिक्षाटन कर, भिक्षा से निवृत्त (=निबट) हो भोजनोपरान्त, जहाँ राजकाराम था, वहाँ गये। उन भिक्षुणियों ने दूर से ही आयुष्मान् नन्दक को आते देखा। देख कर आसन बिछा दिया; और पैरों को (धोने के लिये) पानी भी (रख दिया)। ॰ एक ओर बैठी उन भिक्षुणियों से आयुष्मान् नन्दक ने यह कहा—
“भगिनियों! प्रतिपृच्छ कथा होगी ॰ भिक्षुणियों से भगवान् ने यह कहा—
“जाओ, भिक्षुणियों! (यह जाने का) काल है।”
॰ उन भिक्षुणियों के चले जाने के थोडे ही समय बाद भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया-”
“जैसे भिक्षुओ! उसी दिन पंचदशी (=पूर्णिमा) के उपोसथ को बहुत (=सारे) लोगों को कांक्षा या विमति (=संशय) नहीं होती—‘क्यों जी, चन्द्रमा क्षीण हैं, या पूर्ण हैं’—क्योंकि चन्द्र पूर्ण होता है; इसी प्रकार, भिक्षुओ! वह भिक्षुणियाँ नन्दक की धर्म-देशना से संतुष्ट हुई हैं, और परिपूर्ण संकल्प भी हुई हैं। भिक्षुओ! उप पाँच सौ भिक्षुणियों में जो (सबसे) पिछली हैं, वह भिक्षुणियाँ भी स्रोतआपन्न हैं, (निर्वाण-मार्ग से) न पतित होने वाली, (निर्वाण-प्राप्ति में) नियत, संबोधि-परायण है।”
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनंदन किया।
על התרגום
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
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