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מ״נ 96

Esukārī sutta: फासुकारि-सुत्तन्त

Esukārīsutta

Brāhmaṇavagga

תרגומים

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

तब फासुकारि ब्राह्मण जहाँ भगवानृ थे, वहाँ गया। जाकर भगवान् के साथ…संमोदन कर एक ओर बैठा। एक ओर बैठै फासुकारि (=प्राशुकारी) ब्राह्मण ने भगवान् से यह कहा—

“भो गौतम! ब्राह्मण चार (प्रकार की) परिचर्या (=सेवाधर्म) बतलाते हैं—ब्राह्मण की परिचर्या बतलाते हैं, क्षत्रिय की परिचर्या ॰, वैश्य की परिचर्या ॰, और शूद्र की परिचर्या। वहाँ भो गौतम! ब्राह्मण ब्राह्मण की परिचर्या इस प्रकार कहते हैं—ब्राह्मण का परिचरण (=सेवा) करें क्षत्रिय ब्राह्मण का परिचरण करे, वैश्य ब्राह्मण का परिचरण करे, शूद्र ब्राह्मण का परिचरण करे…। वहाँ, भो गौतम! ब्राह्मण क्षत्रिय की परिचर्या इस प्रकार कहते हैं—क्षत्रिय क्षत्रिय की परिचरण करे, वैश्य ॰, और शूद्र क्षत्रिय का परिचरण करे…। वहाँ, भो गौतम! ब्राह्मण वैश्य की परिचर्या इस प्रकार बतलाते हैं—वैश्य वैश्य को परिचरण करें, और शूद्र वैश्य को परिचरण करें…।…भो गौतम! ब्राह्माण् शूद्र की परिचर्या इस प्रकार बतलाते हैं—शूद्र ही शूद्र की परिचरण करे—; यह भो गौतम! ब्राह्मण शूद्र की परिचर्या बतलाते है। भो गौतम! ब्राह्मण यह चार (प्रकार की) परिचर्या बतलाते हैं इस विषय में आप गौतम क्या कहते हें?”

“क्या ब्राह्मण! सारी दुनियाँ (=लोक) ब्राह्मणों को इसके लिये अनुज्ञा देती है; कि इन चारों परिचर्याओं को वह प्रज्ञापन करें?”—“नहीं, भो गौतम!”

“जैसे; ब्राह्मण! कोई अ-स्वक=अन-आढ्य, दरिद्र पुरूष हो; अनिच्छु होते भी उसके लिये एक बाँटी (भाग) लगा दी जाय — हे पुरूष! यह तुम्हारे खाले के लिये मांस है और (इसका) मूल्य देना; इसी प्रकार ब्राह्मण! (अन्य संसार के) श्रमण-ब्राह्मणों की अनुज्ञा के बिना ही (खामखां) ब्रह्मणों का इन चार परिचर्याओं को प्रज्ञापन करते हैं। ब्राह्मण! न मैं सभी परिचर्याओं को परिचरणीय (=सेवनीय) कहता हूँ, नहीं मैं सभी को अ-परिचरणीय कहता हूँ। ब्राह्मण! जिसको परिचरण; करते (जिसे) परिचर्या के हेतु अहित (=…) होता है, हित (=श्रेय) (कर्म) नहीं होता, उसे मैं परिचरणीय नहीं कहता। जिसको परिचरण करते, (जिस) परिचर्या के हेतु हित होता है, अहित नहीं; उसे मैं परिचरणीय कहता हूँ। ब्राह्मण! क्षत्रिय को भी पूछें—जिसको परिचरण करते (जिस) परिचर्या के हेतु तेरे लिये अहित होता है, हित न हो; और जिसको परिचरण करते (जिस) परिचर्या के हेतु तेरे लिये हित होता है, अहित नहीं; (इन दोनों) में किस तू परिचरण करेगा?—तो ब्राह्मण! क्षत्रिय भी ठीक से उत्तर देते यही उत्तर देगा—जिसको परिचरण करते, (जिस) परिचर्या हेतु हित होता है, अच्छा नहीं, उसे मैं नहीं परिचरण करूँगा; और जिसको परिचरण करते (जिस) परिचर्या के हेतु हित होता है, अहित नहीं; उसे मैं परिचरण करूँगा। ब्राह्मण! ब्राह्मण से भी पूछें—॰। ॰ वैश्य से भी पूछे—॰। ॰ शूद्र से भी पूछे—॰।

(1) “ब्राह्मण! मैं उच्च कुलीनता को श्रेय-हित (अच्छी) नहीं बतलाता, न मैं उच्च कुलीनता को पापीया (=अहित-बुरी) बतलाता हूँ। (2) ब्राह्मण! मै उदार वर्णता (=ऊँचे वर्ण का होना, या अच्छे रंग का होना, को श्रेय नहीं बतलाता, न मैं उदार वर्णता को पापीय बतलाता हूँ। (3) ब्राह्मण्! मैं उदार-भोगता (=बहुत धन-धान्य सम्पन्न होना) को श्रेय कहता हूँ, न मैं उदार माँगता को पापीय कहता हूँ।

ब्राह्मण ऊँचे कुल वाला भी केाई कोई प्राणातिपाती (=हिंसक) होता है, अदत्तादायी (=चोर) ॰, काम मिथ्याचारी ॰, मृषावादी ॰, पिशुनभाषी (=चुगुलखोर) ॰, परूष-भाषी ॰, संप्रलापी (=बकवादी) ॰, अभिध्यालु (=लोभी) ॰, व्यापन्न-चित्त (=द्वेषी) ॰, मिथ्या दृष्टि (=झूठी धारणा वाला) होता है। इसलिये ब्राह्मण! मैं उच्च कुलीनता को श्रेय नहीं कहता। ऊँचे कुलवाला भी प्राणातिपात-विरत (=अहिंसक) होता है, अदत्तादान-विरत (=अ-चैर) ॰, काम मिथ्याचार-विरत ॰, मृषावाद-विरत ॰, पिशुन भाषण-विरत ॰, परूष-भाषण-विरत ॰, संप्रालाप-विरत ॰, अन्-अभिध्यालु ॰, अ-व्यापन्न-चित्त ॰ (और) सम्यग्-दृष्टि होता है। इसलिये ब्राह्मण! मैं उच्चकुलीनता को पापीय नहीं कहता।

“ब्राह्मण! उदार-वर्णवाला भी कोई कोई प्राणातिपाती ॰; ॰ उदार वर्णवाला भी कोई कोई प्राणातिपात-विरत ॰। ॰ उदार भोग वाला भी कोई कोई प्राणातिपाती ॰। ॰ उदारभोग वाला भी कोई कोई प्राणातिपात-विरत ॰ सम्यग्-दृष्टि होता है, इसलिये ब्राह्मण! मैं उदारवर्णता को पापीय नहीं कहता।

“ब्राह्मण! न मैं सबको परिचरणीय कहता हूँ, और न मैं सबको अ-परिचरणीय (=अ-सेवनीय) कहता हूँ। ब्राह्मण! जिसको परिचरण करते=परिचर्या के हेतु श्रद्धा बढती है, शील (=सदाचार) बढता है, श्रुत (=ज्ञान) बढता है, त्याग बढता है, ज्ञान बढता है; उसे मैं परिचरणीय (=परिचरितब्ब) कहता हूँ।”

ऐसा कहने पर फासुकारी ब्राह्मण भगवान् से बोला—

“भो गौतम! ब्राह्मण चार (प्रकार के) स्व-धन (=अपना धन) बतलाते हैं—(1) भिक्षाचर्या-को ब्राह्मण का स्वधन बतलाते है; भिक्षाचर्या स्वधन को अतिक्रमण करने वाला ब्राह्मण अदत्त को लेने वाले गोप की भाँति अकृत्य-कारी होता है। भो गौतम! ब्राह्मण इसे ब्राह्मणों का स्व-धन बतलाते हैं। (2) भो गौतम! ब्राह्मण धनुकलात (=शस्त्र-शिल्प) को क्षत्रिय का स्वधन बतलाते हैं। धनुकलाप (रूपी) स्वधन को अतिक्रमण करने वाला क्षत्रिय ॰ अकृत्यकारी होता है। ॰। (3) ॰ कृषि, गोरक्ष्य (=गोपालन) को वैश्य का स्वधन बतलाते हैं। ॰। (4) ॰ असितव्याभंगि (=लकडी काटने ढोने आदि) को शूद्र का धन बतलाते है। असितव्यभंगि (रूपी) स्वधन को अतिक्रमण करने वाला शूद्र अदत्त को लेेने वाले गोप की भाँति अकृत्यकारी (=पापकारी) होता है। भो गौतम! ब्राह्मण यह चार (प्रकार के) स्वधन बतलाते है। यहाँ आप गौतम क्या कहते हैं?”

“क्या ब्राह्मण! सारी दुनिया ब्राह्मणों को इसके लिये अनुज्ञा देती है? इन चार स्वधनांे को प्रज्ञापन करें?”

“नहीं, भो गौतम!”

“जैसे ब्राह्मण! कोई ॰ दरिद्र पुरूष हो ॰ ब्राह्मणों का इन चार धनांे का प्रज्ञापन करना है।”

“ब्राह्मण! मैं लोकोत्तर आर्यधर्म को पुरूष का स्वधन प्रज्ञापन करता हूँ। ब्राह्मण! माता-पिता के पुराने कुलवंश को अनुस्मरण करते जहाँ इस (पुरूष) का जन्म होता है, वही उसकी संज्ञा होती है। क्षत्रिय-कुल में उत्पन्न होने पर क्षत्रिय इसकी संज्ञा होती है। ब्राह्मण ॰। वैश्य ॰। शूद्रकुल में उत्पन्न होने पर शूद्र इसकी संज्ञा होती है।

“जैसे ब्राह्मण! जिस जिस प्रत्यय (=आश्रय) को लेकर आग जलती है, वही वही (उसकी) संज्ञा होती है। काष्ठ के आश्रय से जो आग जलती है, काष्ठ-अग्नि उसकी संज्ञा होती है। शकलिका (=चैली) ॰। गोमय (=उपले) के आश्रय से जो आग जलती है, गोमय-अग्नि उसकी संज्ञा होती है। इस प्रकार हे ब्राह्मण! मैं लोकोत्तर आर्यधर्म को पुरूष का स्वधन प्रज्ञापन करता (=कहता) हूँ। ॰ जहाँ इसका जन्म होता है, वहीं इसकी संज्ञा होती है ॰ शूद्र इसकी संज्ञा होती है।

“ब्राह्मण! क्षत्रियकुल से भी यदि घर से बेघर हो प्रब्रजित होता हे। और वह तथागत के जतलाये धर्म (=धर्म-विनय) को पा, प्राणातिपात से विरत होता है ॰ सम्यग्-दृष्टि होता है; तो वह न्याय=कुशल-धर्म (=निर्वाण) का आराधन करने वाला होता हे। ब्राह्मणकुल से ॰। वैश्यकुल से ॰। शूद्रकुल से ॰ तो वह न्याय कुशल धर्म का आराधन करने वाला होता है।

“तो क्या मानते हो, ब्राह्मण! क्या ब्राह्मण ही इस प्रदेश में वैर-रहित व्यापाद (=द्वेष)रहित मैत्री चित्त की भावना कर सकता है, क्षत्रिय नहीं, वैश्य नहीं, शूद्र नहीं?”

“नहीं, हे गौतम! क्षत्रिय भी इस प्रदेश में वैर-रहित, व्यापाद-रहित मैत्रीचित्त की भावना कर सकता है। ब्राह्मण भी ॰; वैश्य भी ॰, शूद्र भी ॰ सारे चारों वर्ण इस प्रदेश में ॰ मैत्री चित्त की भावना कर सकते है।”

“इसी प्रकार ब्राह्मण! क्षत्रियकुल से भी यदि घर से बेघर ॰। सम्यग् दृष्टि होता है; तो वह न्याय कुशल धर्म का आराधक होता है। ब्राह्मण कुल से ॰। वैश्य कुल से ॰। शूद्रकुल से ॰ तो वह न्याय कुशल धर्म का आराधक होता है।

“तो क्या मानते हो ब्राह्मण!! क्या ब्राह्मण ही (=स्नान-चूर्णपिंड (=सोत्ति-सिनाति) ले, नदी पर जा मैल धो सकता है; क्षत्रिय नहीं, वैश्य नहीं, शूद्र नहीं?”

“नहीं, भो गौतम! क्षत्रिय भी ॰; वैश्य भी ॰; शूद्र भी स्नान-चूर्ण-पिंड (=आज कल का साबुन जेसा कोई पदार्थ) ले नदी पर जा मैल धो सकता है। सारे चारो वर्ण ॰।”

“ऐसे ही ब्राह्मण! क्षत्रिय कुल से यदि घर से बेघर ॰। ॰ सम्यग्-दृष्अि हो; तो वह न्याय-कुशल-धर्म का आराधक होता है। ब्राह्मण कुल से ॰। वैश्य कुल से ॰। शूद्र कुल से ॰ तो वह न्याय-कुशल-धर्म का आराधक होता है।

“तो क्या मानते हो, ब्राह्मण! (यदि) यहाँ मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजा नाना जाति के सौ पुरूष इकट्ठा करे (और उन्हें कहे—) आवें आप सब ॰ उस आग से अग्नि का काम नहीं लिया जा सकेगा?”

“नहीं, भो गौतम! जो वह क्षत्रिय ॰ कुलोत्पन्न द्वारा ॰ आग बनाई गई है ॰, वह भी अर्चिमान् ॰ आग होगी, उस आग से भी आग का काम लिया जा सकता है। और जो वह चांडाल ॰ कुलोत्पन्न द्वारा ॰ अग्नि बनाई गई है ॰ वह भी अर्चिमान ॰ अग्नि होगी। सभी आग से आग का काम लिया जा सकता है।”

“ऐसे ही ब्राह्मण! क्षत्रियकुल से भी यदि घर से बेघर ॰। ॰ सम्यग्-दृष्टि हो; तो वह न्याय-कुशल-धर्म आराधक होता है। ब्राह्मणकुल से भी ॰। वैश्यकुल से भी ॰। शूद्रकुल से भी ॰ तो वह न्याय-कुशल-धर्म का आराधक होता हे।”

ऐसा कहने पर फासुकारि ब्राह्मण ने भगवानृ ने यह कहा—“आश्चर्य! भो गौतम! आश्चर्य!! भो गौतम्! जैसे औंधे को सीधा कर दे ॰ आप गौतम आज से मुझे अंजलिबद्ध शरणागत उपासक स्वीकार करें।”

על התרגום

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

מי ייתן וכל היצורים יהיו מאושרים