उपोसथ

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मनि 100

Saṅgārava sutta: संगारव-सुत्तन्त

Saṅgāravasutta

Brāhmaṇavagga

अनुवाद

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् महान् भिक्षुसंघ के साथ कोसल (देश) में चारिका करते थे।

उस समय मंडलकप्प (=मंडल कल्प) में धानंजानी नामक ब्राह्मणी रहती थी, (जो) बुद्ध, धर्म, संघ में अभिप्रसन्ना (=श्रद्धालु) थी। तब (एक समय) धानंजानी ब्राह्मणी ने (अँचलेका कोना) पकड़ कर (=पक्खलेत्त्वा) उदान उदाना —

“उन भगवान् अर्हत्-सम्यक्-संबुद्ध् को नमस्कार।
उन भगवान् अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध् को नमस्कार।

उन भगवान् अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध् को नमस्कार।”

उस समय मंडलकप्प में संगारव नामक माणव (=तरूण ब्राह्मण पंडित) रहता था, (जो कि) पाँचवे इतिहास और (चैथे) निघंटु-केटुभ-अक्षर-प्रभेद-सहित तीनों वेदों का पारंगत, पदश, वैयाकरण, लोकायत (शास्त्र) तथा महापुरूष-लक्षण (-शास्त्र) में परिपूर्ण था। संगारव माणव ने धानंजानी ब्राह्मणी को (उक्त) वाणी उच्चारण करते सुना। सुनकर, धानंजानी ब्राह्मणी से यह बोला —

“अ-मंगला है यह धानंजानी ब्राह्मणी, नष्टा है यह धानंजानी ब्राह्मणी, जो ब्राह्मणों के विद्यमान होते , उस मुंडक श्रमणककी प्रशंसा करती है।”

“तात ! भद्रमुख ! तुम उन भगवान् के शील प्रज्ञा को नहीं जानते। यदि, तात्! भद्रमुख! तुम उन भगवान् के शील, प्रज्ञा को नहीं जानते होते, तो, तात्! भद्रमुख! तुम उन भगवान् का निंदन=परिभाषण न करना चाहते।”

“तो भवति! जब श्रमण गौतम मंडलकप्प में आवें, तो मुझे कहियो।”

“अच्छा, भद्रमुख!” — (कह) धानंजानी ब्राह्मणी ने संगारव माणव को उत्तर दिया।

तब भगवान् कोसल में क्रमशः चारिका करते, जहाँ मंडल-कप्प था, वहाँ पहुँचे। वहाँ मंडलकप्प में भगवान् तौदेय्य ब्राह्मणों के आम के बाग में विहार करते थे।

धानंजानी ब्राह्मणी ने सुना, कि भगवान् मंडलकप्प में पहुँच गये, और ॰ तौदेय्य (=तौदेय्य) ब्राह्मणों के आम्र-वन में विहार करते हैं। तब धानंजानी ब्राह्मणी जहां संगारव माणव था, वहाँ गई, जाकर संगारव माणव से यह बोली-

“तात! भद्रमुख! वह भगवान मंडलकप्प में पहुँच गये हैं, और ॰ तौदेय्य ब्राह्मणों के आम्र-वन में विहार करते हैं। अब तात्! भद्रमुख! जिसका काल समझो (वह करो)।”

“अच्छा, भवति!”-(कह) संगारव माणव ने धानंजानी ब्राह्मणी को उत्तर दे, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान् के साथ “संमोदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे संगारव माणव ने भगवान् से यह कहा —

“भो गौतम! कोई कोई श्रमण ब्राह्मण इष्ट-धर्म-अभिज्ञा-व्यवसान-पारसी-प्राप्त (=इसी शरीर में जान कर, निर्वाण को प्राप्त) हो आदि ब्रह्मचर्य (=शुद्ध ब्रह्मचर्य) (प्रचार करने) का दावा करते हैं। वहाँ, भो गौतम! जो श्रमण-ब्राह्मण इष्ट धर्म —व्यवसान-पारसी-प्राप्त हो आदि ब्रह्मचर्य का दावा करते हैं, उनमें आप कौन हैं?”

“इष्ट-धर्म-अभिज्ञा-व्यवसान-पारसी-प्राप्त हो आदि ब्रह्मचर्य के दावा करने वालों में भी, भारद्वाज! मैं भेद कहता हूँ। (1) भारद्वाज! कोई-कोई श्रमण-ब्राह्मण आनुश्रविक (=अनुश्रव को मानने वाले) हैं, वह अनुश्रव (=श्रुति) से इष्ट-धर्म-अभिज्ञा-व्यवसान-पारसी-प्राप्त हो आदि ब्रह्मचर्य का दावा करते हैं, जैसे कि त्रैविद्य (=तीनों वेदों के अनुयायी) ब्राह्मण हैं, (2) भारद्वाज! कोई-कोई श्रमण-ब्राह्मण केवल श्रद्धा मात्र से इष्ट-धर्म-अभिज्ञा-व्यवसान-पारसी-प्राप्त हो आदि ब्रह्मचर्य का दावा करने वाले, जैसे कि तार्किक=विमर्शी। (3) है, भारद्वाज। कोई-कोई श्रमण-ब्राह्मण पहले न सुने गये धर्मों में से स्वयं धर्म को जानकर इष्ट-धर्म-अभिज्ञा-व्यवसान-पारसी-प्राप्त हो आदि ब्रह्मचर्य का दावा करने वाले हैं, मैं उनमें से हूँ। सो इस पर्याय (=कथन) से, भारद्वाज । तुम्हें जानना चाहिये, कि जो श्रमण-ब्राह्मण पहिले न सुने गये। ॰ आदि ब्रह्मचर्य का दावा करने वाले हैं, मैं उनमें से हूँ।

“यहाँ भारद्वाज। बोधि से पहिले=बुद्ध न हो बोधिसत्त्व होते समय, मुझे ऐसा हुआ — “गृह-वास जंजाल है, मैल का मार्ग है। प्रव्रज्या मैदान (सा खुला स्थान) है। इस नितान्त सर्वथा-परिपूर्ण, सर्वथा परिशुद्ध, खरादे शंख जैसे (उज्ज्वल) ब्रह्मचर्य का पालन घर में रहते सुकर नहीं है। क्यें न मैं शिर-दाढी मुँडा, काषाय-वस्त्र पहन, घर से बेघर (=अनागरिक) हो प्रव्रजित हो जाऊँ। सो मैं भारद्वाज। दूसरे समय दहर (तरूण) ही, बहुत काले काले केशोंवाला, सुंदर यौवन के साथ ही, प्रथम वयसमें, अश्रुमुख माता-पिता के रोते, घर से बेघर हो प्रव्रजित हुआ।

“इस प्रकार प्रव्रजित हो, क्या कुशल (=अच्छा) का खोजी (बन), अनुपम शांति पद को ढूँढते, जहाँ आलार कालाम था, वहाँ गया। जाकर आलार कालाम से बोला—“आवुस कालाम। मैं इस धर्म-विनय (=धर्म) में ब्रह्मचर्य-वास करना चाहता हूँ?” ॰ भारद्वाज। रात के तीसरे पहर यह तीसरी विद्या मुझे प्राप्त हुई, अविद्या गई, विद्या आई, तम नष्ट हुआ, आलोक उत्पन्न हुआ।”

यह कहने पर संगारव माणव ने भगवान् से यह कहा —

“अहो। आप गौतम का प्रधान (=ध्यान-तत्परता) अट्ठित (=उत्तम) प्रधान था। अहो । आप गौतम का प्रधान सत्पुरूष-प्रधान था, जैसा कि वह आप अर्हत् सम्यक् संबुद्ध का (प्रधान था )। भो गौतम। क्या देव हैं?”

“भारद्वाज। मुझे स्थान (=कारण) से विदित है, कि देव हैं।”

“क्या है, भो गौतम । जो —क्या देव हैं” — पूछने पर-भारद्वाज। मुझे स्थान से विदित है—“कि देव हैं” — कहते हो। ऐसा होने पर, भो गौतम । (तुम्हारा कथन) क्या तुच्छ=मृपा नहीं होता?”

“भारद्वाज। “क्या देव हैं” — पूछने पर, जो “देव हैं” कहे, स्थान से विदित होने पर—“मुझे विदित हैं“कहे; तभी यहां विज्ञ पुरूष को पूर्णरूपेण विश्वास करना चाहिये-“देव हैं”।”

“क्यों नहीं, भो गौतम। आरम्भ में ही मुझे (आपने) यह कह दिया?”

“भारद्वाज। लोक में ऊँचें (शब्द) से यह प्रकट है—“देव हैं” ।”

ऐसा कहने पर संगारव माणव ने भगवान् से यह कहा—

“आश्चर्य। भो गौतम! आश्चर्य!! भो गौतम! जैसे औंधे को सीधा कर दे ॰ यह मैं भगवान् गौतम की शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आप गौतम आज से ही मुझे अंजलिबद्ध शरणागत उपासक धारण करें।”

अनुवाद के बारे में

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

सभी प्राणी सुखी हों