उपोसथ

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मनि 106

Āneñjasappāya sutta: आनेञ्ज-सम्पाय-सुत्तन्त

Āneñjasappāyasutta

Devadahavagga

अनुवाद

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान्, कुरू (देश) में, कुरूओं के कम्भासदम्म (कल्माष-दम्य) नामक निगम (कस्बे) में विहार करते थे।

वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया- “भिक्षुओ !”

“भदन्त !” कह उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा- “भिक्षुओं ! काम (विषय भोग) अनित्य, तुच्छ-मृषा (झूठा) नाशमान् है। भिक्षुओं! यह माया से बने, बच्चों के बहलाव हैं। भिक्षुओं। जो कि यह ऐहिक (इष्ट-धर्मी, इस शरीर के ) काम हैं, और जो पारलौकिक (सांपरायिक) काम हैं, जो कि ऐहिक काम-संज्ञा (विषयों का ख्याल) और जो पारलौकिक (सांपदायिक) काम हैं, यह दोनों मार का फंदा है, मार का विषय है, मार का (फॅंसाने के लिये फेंका) चारा (निवाप) है, मार का एक गोचर (लक्ष्य) है। यहाँ यह पापक (अ-कुशल) बुरे मन के (भाव) उत्पन्न होते हैं- अभिध्या (लोभ) भी, व्यापार (द्वेष) सारम्भ (पीडा) भी, और वह इसे अभ्यास करने वाले आर्य श्रावक के अन्तराय (विघ्न) होते हैं।

(1) “वहाँ भिक्षुओं ! आर्य-श्रावक यह सोचता है- जो यह ऐहिक काम है। आर्यश्रावक के अन्तराय होते हैं। क्यों न मैं विपुल (विशाल) चित्त से लोक को अभिभूत (वश में) कर, मन से अधिष्ठित कर विहरूँ (इस प्रकार) जो अमिध्या, व्यापाद, सारम्भ-मानसिक बुराइयाँ न होगी। उनके नाश (प्रहाण) से मेरा चित्त अ-परीत्त (अ-प्रमाण, विशाल), स-भावित (असंयत्) होगा। उसके इस प्रकार संलग्न (प्रतिपक्ष) होने पर बहुतायत से इस प्रकार विहरने पर आयतन (स्थान) में चित्त प्रसन्न होता है। संप्रसाद (पूरी प्रसन्नता, चित्त-शुद्धि) होने पर उसी समय वह आनेंजको प्राप्त होता है, या प्रज्ञाद्वारा मुक्त होता है। और काया छोड मरने के बाद यह जगह (संभव) है, कि उस प्रकार लग्न विज्ञान (जीवन) आनेंजको प्राप्त होवे। भिक्षुओ ! आनेज-सत्प्राय (आनंज सप्पाय, आनेंज-उपयोगी) की यह प्रथम प्रतिपदा (मार्ग) कही जाती है।

(2) और फिर भिक्षुओं ! आर्यश्रावक यह सोचता है- जो यह ऐहिक काम है। और जो पारलौकिक काम संज्ञा है। जो कुछ रूप —चार महाभूत हैं, और चारों महाभूतों को लेकर जो रूप है, वह मार का फंदा है। आर्यश्रावक के विघ्न होते हैं। क्यों न मैं विपुल ॰ चित्त से ॰ विहरूँ ॰। मेरा चित्त, सुभाषित होगा। उसके इस प्रकार संलग्न होने पर। संप्रसाद होने पर उसी समय वह आनेंजको प्राप्त होता है। और यह संभव है, कि काया छोड मरने के बाद, इस प्रकार लग्न विज्ञान (जीवन) आनेंजन को प्राप्त होवे। भिक्षुओं! टानंज-सप्पयकी (यह) दूसरी प्रतिपदा कही जाती है।।

(3) और फिर, जो पारलौकिक काम-संज्ञा है। जो ऐहिक रूप हैं, जो पारलौकिक रूप है, जो ऐहिक रूप-संज्ञा है, जो पारलौकिक रूप-संज्ञा है। वह दोनों अनित्य है। जो अनित्य (नाशमान) है, उसको अभिनंदित करना, अभिवंदित करना, उचित नहीं।“उसके इस प्रकार संलग्न होने पर, भिक्षुओं ! तीसरी प्रतिपदा कही जाती है।

(1) “और फिर, जो पारलौकिक काम-संज्ञा, है, और जो आनंज-संज्ञा (आनंजपद का ख्याल) यह सारी संज्ञायें (ख्याल) जहाँ बिल्कुल ही विरूद्धहोती हैं, वह आकिंचन्यायतन शान्त, प्रणीत (उत्तम) है। उसके इस प्रकार संलग्न होने पर, बहुतायत से इस प्रकार विहरने पर आयतन में चित्त प्रसन्न होता है। संप्रसाद होने पर उसी समय वह आकिचन्यायतन को प्राप्त होता है या प्रज्ञा द्वारा मुक्त होता है, और (अन्यथा) काया छोड मरने के बाद, यह जगह है, कि उस प्रकार लग्न विज्ञान (जीवन) आकिंचन्यायतन को प्राप्त होवे। भिक्षुओं ! आकिंचन्यायतनन-सत्प्रायकी प्रथम प्रतिपदा कही जाती है।

(2) “और फिर भिक्षुओं ! आर्यश्रावक, अरण्य, वृक्ष के नीचे या शून्य गृह में रहते हुये यह सोचता है- यह (सब संसार) आत्मा या आत्मीयता से शून्य है — उसके इस प्रकार संलग्न होने पर, उस प्रकार लग्न विज्ञान आकिंचन्यायतन को प्राप्त होवे। दूसरी प्रतिपदा कही जाती है।

(3) ”-न मैं कहीं किसी का कुछ हॅूं, न मेरा कहीं किसी में कुछ है। उसके इस प्रकार संलग्न होने पर। तीसरी प्रतिपदा कही जाती है।

“और फिर भिक्षुओं ! आर्य श्रावक यह सोचता है- जो कुछ ऐहिक काम है, जो कुछ पारलौकिक काम है। काम-संज्ञा, रूप, जो कुछ ऐहिक रूप-सज्ञा है, और जो कुछ पारलौकिक रूप-संज्ञा है, और जो आकिंचन्यायतन संज्ञान है। यह सारी संज्ञा में जहाँ बिल्कुल विरूद्ध होती है। वह नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन शान्त प्रणीत है। यह सारी संज्ञायें जहाँ बिल्कुल विरूद्ध होती है, वह नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन शान्त, प्रणीत है। उसके इस प्रकार संलग्न होने पर। संप्रसाद होने पर उसी समय वह नैवसंज्ञा-नासंज्ञातन को प्राप्त होता है, या प्रज्ञाद्वारा मुक्त होता है।, (अन्यथा) काया छोड मरने के बाद, संभव है, कि उस प्रकार लग्न विज्ञान नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन को प्राप्त होवे। भिक्षुओं! यह नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन की प्रतिपदा कही जाती है।”

ऐसा कहने पर आयुष्मान् आनंद ने भगवान से यह कहा-

“भन्ते ! यहाँ (कोई) भिक्षु इस प्रकार प्रतिपक्ष (समझनेवाला ) है- न होता, न मेरा होता, न होगा, न मेरा हेागा, जो है, जो विद्यमान् है, उसे मैं त्यागता हूँ। इस प्रकार (वह) उपेक्षा को प्राप्त करता है। क्या भन्ते ! ऐसा भिक्षु परिनिर्घायी (निर्वाण प्राप्त करने वाला है?”

“आनन्द ! कोई ऐसा भिक्षु निर्वाण प्राप्त कर सकता है। कोई ऐसा भिक्षु नहीं भी प्राप्त कर सकता है।”

“भन्ते ! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जो कि कोई ऐसा भिक्षु निर्वाण प्राप्तकर सकता हैं, कोई ऐसा भिक्षु नहीं भी … प्राप्त कर सकता है ?”

“आनन्द ! यहाँ (जो) भिक्षु इस प्रकार प्रतिप्रश्न है- न होता, उसे मैं त्यागता हॅूं- इस प्रकार उपेक्षा को प्राप्त करता है। (तब) जो उस उपेक्षा को अभिनंदित (अभिवंदित) है, उसमें आसक्त हो रहता है, (तो) (चित्त-प्रवाह) उसमें मिश्रिम (लिप्त) होता है, उसको उपादान ( ग्रहण की इच्छा, आसक्ति) करने वाला होता है। आनन्द ! उसको उपादान करने वाला भिक्षु निर्वाण को नहीं प्राप्त होता।”

“भन्ते ! कहाँ वह भिक्षु उपादान (ग्रहण) करते, उपादान करता है ?”

“आनन्द ! नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन को।”

“भन्ते ! यह उपादान करते भी श्रेष्ण उपादान को उपादान कर रहा है। आनन्द! यही श्रेष्ठ उपादान है। जो कि यह नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतनहै। आनन्द ! यहाँ इस प्रकार समझने वाला होता है — न होता, उसे मैं त्यागता हॅू- इस प्रकार यह अपेक्षा को प्राप्त करता है। (किन्तु) वह इस उपेक्षा को प्राप्त करता है। किन्तु वह इस उपेक्षा को अभिनंदित —अभिवंदित नहीं करता, उसमें आसक्त नहीं होता, तो विज्ञान उसमें मिश्रित (लिप्त) नहीं होता, उसको उपादान करने वाला नहीं होता। आनन्द ! उसको उपादान करनेवाला भिक्षु निर्वाण को प्राप्त होता है।”

“आश्चर्य भन्ते ! अद्भुत ! कारण-कारण से (निस्साय) भन्ते ! भगवान् ने हमें ओघनिस्तरण (संसार-प्रवाह को पार होना) बतलाया। भन्ते! क्या है आर्य-विमोक्ष ?”

“यहाँ आनन्द ! आर्यश्रावक यह सोचता है- जो कुछ ऐहिक काम, जो आर्नेज-संज्ञा आकिंचन्यायतन-संज्ञा है, जो नैवसंज्ञा-नासज्ञायतन-संज्ञा है, यह सत्काय है, यहाँ तक सत्काय है। उत्पन्न न हो, चित्त का जो विमोक्ष (मोक्ष, छूटना) है, यह अमृत है।

“आनन्द ! इस प्रकार मैंने आनंज-सप्पाय प्रतिपदा उपदेशों, नवसंज्ञा-नासंज्ञायतन प्रति-पदा उपदेशी, कारण (कह कह कर) ओघ निस्तरण को उपदेशा, आर्य-विमोक्ष को उपदेशा। आनन्द ! जो कुछ अनुकम्पा करके, अनुकम्पक, हितैषी शास्ता (गुरू) को करना चाहिये, वह मैंने तुम्हारे लिये कह दिया। आनन्द ! यह वृक्ष-मूल (वृक्षों की छाया) है। यह शून्य-गृह हैं, आनन्द ! (इन में बैठकर) ध्यान करो, मत प्रमाद (गफलत) करो, मत पीछे अफसोस करना। तुम्हारे लिये यह हमारी सीख (अनुशासन) है।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् आनंद ने भगवान के भाषण को अभिनंदित किया।

अनुवाद के बारे में

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

सभी प्राणी सुखी हों