मनि 120
Saṅkhārupapatti sutta: संखारूप्पति-सुत्तन्त
Saṅkhārupapattisutta
Anupadavagga
अनुवाद
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथ-पिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।
वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को सम्बोधित किया—“भिक्षुओं!”
“भदन्त!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओं! संखारूप्पति (=संस्कार-उत्पत्ति) को तुम्हे उपाशता हूँ, उसे सुनों, अच्छी तरह मन में करों, कहता हूँ।”
“अच्छा, भन्ते!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओं! यहाँ भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है, शील से ॰, श्रुत (=विद्या) से॰, त्याग से ॰, प्रज्ञा से ॰। उसके ऐसा होता है—‘अहोवत! मैं काया छोड मरने के बाद महाधनी (=महाशाल) क्षत्रियों के बीच जन्मूँ’। वह उस चित्त को धारण करता है, उस चित्त का अधिष्ठान करता है, उस चित्त की भावना करता है। उसके वह संस्कार, वह विहार, इस प्रकार भावित=बहुलीकृत हो, वहाँ (=लोकान्तर) उत्पत्ति के लिये (समर्थ) होते हैं। भिक्षुओं! यह मार्ग है=यह प्रतिपदा है, वहाँ उत्पत्ति के लिये।
“और फिर, भिक्षुओं! भिक्षु श्रद्धा से युक्त होता है ॰, ॰।—अहोवत! मैं ॰ ब्राह्मण-महाशालों के बीच में जन्मूँ”। ॰।
“॰—अहोवत! मैं ॰ गृहपति (=वैश्य) महाशालों के बीच में जन्मूँ। ॰।
(1) ”॰ प्रज्ञा से युक्त होता है। उसने सुना होता है—‘चातुर्महाराजिक देवता दीर्घायु, सुंदर और बहुत सुखसम्पन्न होते है।’ उसको वह होता है—‘अहोवत! मैं काया छोड, मरने के बाद चातुर्महाराजिक देवों में जन्मूँ”। वह उस चित्त को ॰।
(2) ”॰ सुना होता है—त्रयस्त्रिंश देव ॰।
(3) ”॰ सुना होता है—याम-देव ॰।
(4) ”॰ सुना होता है—तुषित देव ॰।
(5) ”॰ सुना होता है—निर्माणरति देव ॰।
(6) ”॰ सुना होता है—परनिर्मितवशवर्ती ॰।
(7) ”॰ सुना होता है—साहस्र ब्रह्मा दीर्घायु, सुन्दर, बहुत सुख-सम्पन्न होता है। भिक्षुओं! साहस्र ब्रह्मा साहस्री-लोकधातु (=एक हजार ब्रह्मंड) को स्फरण कर=परिग्रहण कर विहरता है। वहाँ जो भी प्राणी उत्पन्न होते हैं, वह भी ॰ परिग्रहण कर विहरते हैं। जैसे भिक्षुओं! आँखवाल पुरूष्ज्ञ एक आमलक (=आँवले) को हाथ में ले प्रत्यवेक्षण करे (=निहारे); ऐसे ही भिक्षुओं! साहस्र ब्रह्मा ॰। वहाँ ॰ प्राणी ॰ भी ॰ परिग्रहण कर विहरते है। उस (पुरूष) को ऐसा होता है—“अहोवत! मैं काया छोड मरने के बाद साहस्र ब्रह्मा की सहव्यता (=समान-भोग-भागिता) में जन्मूँ ॰।
(8) ”॰ सुना होता है—द्विसाहस्र ब्रह्मा ॰।
(9) ”॰ सुना होता है—चतुः साहस्र ब्रह्मा ॰।
(10) “सुना होता है—पंच साहस्र ब्रह्मा ॰। ॰ पंच साहस्री लोक-धातु ॰। जैसे, भिक्षुओं! आँखवाला पुरूष पाँच आमलक को हाथ में ले प्रत्यवेक्षण करें ॰।
(11) ”॰ सुना होता है—दश-साहस्र-ब्रह्मा ॰। ॰ दश-साहस्री लोकधातु ॰। जैसे, भिक्षुओं! शुभ्र, उत्तमजाति की अठकोणी, पािलश की हुइ्र वैदूर्य-मणि (=हीरा) पांडु-कम्बल (=लाल दोशाले) में रक्खी, भासित होती है, चमकती है, विरोचित होती है; इसी प्रकार, भिक्षुओं! दशसाहस्र ब्रह्मा दश साहस्री लोक-धातु को स्फरण कर=परिग्रहण कर विहरता है। वहाँ जो भी प्राणी ॰।
(12) ”॰ सुना होता है—शतसाहस्र ब्रह्मा ॰। ॰ शतसाहस्री लोकधातु ॰। जैसे भिक्षुओं! निष्क जाम्बुनद (सुवर्ण) चतुर कर्मारपुत्र (=सुनार) द्वारा उल्कामुख (=भट्ठी) में अच्छी प्रकार तपाकर, लाल दोशाले में रक्खा भासित होता है, चमकता है, विरोचित होता है; इसी प्रकार भिक्षुओं! शतसाहस्र ब्रह्मा ॰।
(13) ”॰ सुना होता है—आभ देव दीर्घायु ॰।
(14) ”॰ सुना होता है—परित्ताभ देव ॰।
(15) ”॰ सुना होता है—अ-प्रमाणाम देव ॰।
(16) ”॰ सुना होता है—आभास्वर देव ॰।
(17) ”॰ सुना होता है—परित्तशुभ देव ॰।
(18) ”॰ सुना होता है—अ-प्रमाण-शुभ देव ॰।
(19) ”॰ सुना होता है—शुभकृत्स्न देव ॰।
(20) ”॰ सुना होता है—बृहत्फल देव ॰।
(21) ”॰ सुना होता है—अ-विभ देव ॰।
(22) ”॰ सुना होता है—अ-तप्य देव ॰।
(23) ”॰ सुना होता है—सुदर्श देव ॰।
(24) ”॰ सुना होता है—सुदर्शी देव ॰।
(25) ”॰ सुना होता है—अ-कनिष्ट देव ॰।
(26) ”॰ सुना होता है—आकाशानन्त्यायतन को प्राप्त देव ॰।
(27) ”॰ सुना होता है—विज्ञानन्त्यायतन को प्राप्त देव ॰।
(28) ”॰ सुना होता है—आकिंचन्यायतन को प्राप्त देव ॰।
(29) ”॰ सुना होता है—नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन को प्राप्त देव ॰।
“और फिर, भिक्षुओं! भिक्षु श्रद्धा ॰, शील ॰, श्रुत ॰, त्याग ॰, प्रज्ञा से युक्त होता है। उसको ऐसा होता है—‘अहोवत! मैं आस्रवों (=चित्त-मलों) के क्षय से आस्रव-रहित चेतो-विमुक्ति, प्रज्ञा-विमुक्ति को इसी जन्म में स्वयं जानकर, साक्षात्कार कर, प्राप्त कर विहरूँ’—(और) वह आस्रवों के क्षय से ॰ प्राप्त कर विहरता है। भिक्षुओं! यह भिक्षु कहीं नहीं उत्पन्न होता, कहीं नहीं उत्पन्न होकर विहरता।”
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।
अनुवाद के बारे में
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
सभी प्राणी सुखी हों