मनि 122
Mahāsuññata sutta: महा-सुञ्ञता-सुत्तन्त
Mahāsuññatasutta
Suññatavagga
अनुवाद
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् शाक्य (देश) में कपिलवस्तु के न्यग्रोधराम में विहार करते थे।
तब भगवान् ने पूर्वाह्न समय पहनकर पात्र-चीवर ले कपिलवस्तु में भिक्षा के लिये प्रवेश किया। कपिलवस्तु में भिक्षाटन कर, भोजनोपरान्त, भिक्षा से निवृत्त हो दिन के विहार के लिये जहाँ काल-खेमक शाक्य का विहार था, वहाँ गये। उस समय काल-खेमक शाक्य के विहार में बहुत से शयन-आसन लगे हुये थे। भगवान् ने ॰ बहुत से शयनासन लगे हुये देखे। देखकर भगवान् को यह हुआ—“यहाँ काल-खेमक शाक्य के विहार में बहुत से शयनासन लगे हुये हैं; यहाँ बहुत से भिक्षु विहरते होंगे।”
उस समय आयुष्मान् आनन्द, बहुत से भिक्षुओं के साथ घटाय शाक्य के विहार में चीवर-कर्म (=भिक्षुवस्त्र की सिलाई) कर रहे थे। तब भगवान् सायंकाल को ध्यान से उठकर जहाँ घटाय शाक्य का विहार था, वहाँ गये। जाकर बिछे आसन पर बैठे। बैठकर भगवान् ने आयुष्मान् आनन्द को संबोधित किया-
“आनन्द! कालखेमक शाक्य के विहार में बहुत से शयनासन लगे हुये हैं, वहाँ बहुंत से भिक्षु विहार करते हैं?”
“भन्ते! ॰ विहार में बहुत से शयनासन लगे हुये हैं; वहाँ बहुत से भिक्षु विहार करते हैं। भन्ते! यह हम लोगों का चीवर-कार (=वस्त्र सीने) का समय है।”
“आनन्द! संगणिका (=जमात-बंदी में) राम, संगणिकारत, संगणिकारामता में सलग्न, गणाराम=गण-रत, गण (=जमात) में प्रमुदित भिक्षु नहीं शोभा देता। आनन्द! वह ॰ गण में प्रमुदित भिक्षु निष्कामता के सुख, प्रविवेक (=एकांत-चिंतन) सुख, उपशम (=रामाधि) सुख समबोध-सुख, चितैकाग्रता-सुख का इच्छानुसार लाभी, बिना कठिनाई के लाभी=अकृच्छलाभी होगा; इसके लिये जगह नही। आनन्द! जो भिक्षु गण से अलग अकेला विहरता है; उसके लिये आशा रखनी चाहिये, कि वह उस निष्कामता के सुख ॰ का ॰ अ-कृच्छलाभी होगा, इसके लिये जगह है। आनन्द! वह ॰ गण में प्रमुदित भिक्षु तात्कालिकी (=सामयिक) कान्त (=प्रिय) चेतोविमुक्ति को प्राप्त हो विहरेगा, या न करते सार्वकालिकी (=असामयिक) को—इसके लिये स्थान नहीं। आनन्द! जो भिक्षु गण से अलग अकेला विहरता है; उसके लिये आशा रखनी चाहिये; कि वह तात्कालिकी कान्त चेतोविमुक्ति को प्राप्त हो विहरेगा ॰ या न करते हुये सार्व-कालिकी को—इसके लिये स्थान है। आनन्द! मैं एक रूप (=पदार्थ) भी ऐसा नहीं देखता, जिसमें रक्त, यथाभिरत को, रूप का विपरिणाम=अन्यथाभाव के कारण, शोक, परिदेव (=रोना-काँदना), दुःख, दौर्मनस्य, उपायास (=हैरानी-परेशानी) न उत्पन्न हो। आनन्द! तथागत ने इस सारे निमित्तों (=लिंग, आकृति आदि) को मन में न कर, आध्यात्मिक (=भीतरी) शून्यता को प्राप्त कर विहरने को अच्छी तरह बूझा (=अभि-संबुद्ध) है। वहाँ, यदि आनन्द! इस विहार से विहरते तथागत के पास भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक, उपासिका, राजा, राज-महामात्य, तीर्थिक, तीर्थिक-श्रावक आते है; तो तथागत विवेक (=एकाग्रता की ओर) झुके=विवेक-प्रवण=विवेक-प्राग्भार, एकाकी, निष्कामता-रत, सारे आस्रव (=चित्तमल) स्थानीय धर्मो से अलग चित्त हो उद्योजन (=उद्योग) सम्बन्धी बात को ही करने वाले होते है। इसलिये आनन्द! यदि भिक्षु आध्यात्मिक शून्यता के साथ विहरना चाहे, तो, आनंद! उस भिक्षु को अध्यात्म में (=अपने भीतर) ही चित्त को संस्थापित=सन्निसातिर, एकाग्र=समाहित करना चाहिये। आनंद! किस प्रकार भिक्षु अध्यात्म में ही चित्त को संस्थापित ॰ करता है?—यहाँ आनन्द! भिक्षु कामों से विरहित ॰ प्रथमघ्यान को प्राप्त हो विहरता है। ॰ द्वितीयध्यान ॰। ॰ तृतीय ध्यान ॰। ॰ चतुर्थ ध्यान ॰। इस प्रकार, आनन्द! भिक्षु अध्यात्म में ही चित्त को संस्थापित ॰ करता है। वह अध्यात्म शून्यता को मन में करता है। अध्यात्म शून्यता को मन में करते हुये, उसका चित्त शून्यता में ॰ नहीं ठहरता ॰। ऐसा होते,…भिक्षु ऐसे जानता है—‘अध्यात्म शून्यता को मन में करते मेरा चित्त अध्यात्मशून्यता में ॰ नहीं ठहरता ॰—इस प्रकार वहाँ समझने वाला होता है। वह बाह्य शून्यता को मन में करता है ॰। वह आनिंज्य (=चित्त की अ-चंचलता) को मन में करता है। ॰ आनिज्य को मन में करते हुये, उसका चित्त आनिंज्य में नही ठहरता ॰। ॰ ऐसे जानता है—आनिंज्य को ॰ नहीं ठहरता ॰—॰ समझने वाला होता है।
आनंद! उस भिक्षु को उस पहिले वाले समाधि-निमित्त (=लक्ष्य) में, अपने भीतर ही चित्त को ॰ संस्थापित ॰ करना चाहिये। (तब) वह अध्यात्म शून्यता को मन में करता हैं। ॰।—॰ समझने वाला होता है।
“आनन्द! इस विहार से विहरते हुये उस भिक्षु का चित्त यदि चक्रम (=टहलने) को चाहता है; (तो) वह टहलता है—‘इस प्रकार टहलते हुये मेरे (चित्त में) अभिध्या (=लोभ), दौर्मनस्य (=बुरा मन होना), (यह) पाप=अकुशल धर्म (=बुराइयाँ) नहीं आ चूयेगी’—इस प्रकार वह समझने वाला होता है।
‘आनंद! इस विहार से विहरते हुये, उस भिक्षु का चित्त यदि खड़ा होना चाहता है; (तो) वह खड़ा होता है। ‘इस प्रकार खडे हुये मेरे (चित्त में) अभिध्य, दौर्मनस्य पाप ॰ नहीं आ चूयेंगी’—इस प्रकार वह समझने वाला होता है।
“आनंद! इस विहार से विहरते हुये, उस भिक्षु का चित्त यदि बैठने को चाहता है; (तो) वह बैठता है। ‘इस प्रकार बैठे हुये ॰।
“॰ यदि लेटने को चाहता है; (तो) वह लेटता है। ‘इस प्रकार लेटे हुये ॰।
“॰ यदि कथा (=बात) करने को चाहता है; (तो) वह, जो यह कथाये हीन, ग्राम्य, पृथग्जनीय (=अज्ञों की), अनार्या की, अनर्थ-युक्त निर्वेद-विराग-निरोध के अनुपयोगी, उपशम-अभिज्ञा-सम्बोध-निर्वाण के अयोग्य हैं; जैसे कि राज-कथा ॰ ऐसी इस प्रकार की कथाओं को नहीं कहूँगा’—इस प्रकार यहाँ जानने वाला होता है। और आनन्द! जो यह कथा अभि-संलेख (=मानस तप) वाली, चित्तसंयम-सहायक, सर्वथा निर्वेद-विराग-निरोध-उपयोगी, उपशम-अभिज्ञा-सम्बोध-निर्वाण के योग्य है; जैसे कि अल्पेच्छ (=निर्लोम) कथा, सन्तोष-कथा, प्रविवेक-कथा, अ-संसर्ग-कथा, वीर्यारम्भ (=उद्योग)-कथा, शील-कथा, समाधि-कथा, प्रज्ञाकथा, विमुक्ति-कथा, विमुक्ति-ज्ञान-दर्शन-कथा—ऐसी इस प्रकार की कथाओं को कहूँगा’—इस प्रकार वहाँ जानने वाला होता है।
“॰ यदि वितर्क करने को चाहता है; तो जो वह वितर्कहीन, ग्राम्य ॰ निर्वाण के अयोग्य है; जैसे कि काम-वितर्क, व्यापाद-वितर्क, विहिंसा-वितर्क, ऐसे इस प्रकार के वितर्को को नहीं वितर्कन करूँगा—इस प्रकार वहाँ संप्रजन्य-युक्त (=जानने वाला) होता है। और आनंद! जो यह वितर्क आर्य, नेर्याणिक=वैसा करने वाले को अच्छी प्रकार दुःख के क्षय की ओर ले जाने वाले है; जैसे कि—निष्कामता-वितर्क, अ-व्यापाद-वितर्क, अ-विहिंसा (=अ-हिंसा)-वितर्क, ऐसे इस प्रकार के वितर्को का वितर्कन करूँगा—इस प्रकार वहाँ संप्रजन्य-युक्त होता है।
“आनन्द! यह पाँच काम-गुण है। कौन से पाँच?—इष्ट ॰ प्रिय ॰ चक्षु द्वारा विज्ञेय रूप ॰ श्रोत्र-विज्ञेय शब्द ॰, घ्राण-विज्ञेय गंध, ॰ जिह्वा-विज्ञेय रस, ॰ काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य आनंद! यह पाँच कामगुण हैं; जिनसे भिक्षुकों…निरंतर अपने चित्तों को प्रत्यवेक्षा करना चाहिये—क्या इन पाँच कामगुणों में से किसी एक में भी, या किसी एक आयतन में चित्त का संपर्क होता है?’ यदि आनंद! भिक्षु प्रत्यवेक्षण करते यह जानता है—इन पाँच काम-गुणेां में से किसी एक में, या कसी एक आयतन में मेरे चित्त का संपर्क (=समुदाचार) उत्पन्न होता है—वह भिक्षु…ऐसा होते हुये को ऐसे जानता है। इन पाँच कामगुणों में जो छन्द=राग है, सो मेरा प्रहीण (=नष्ट) नहीं हुआ — इस प्रकार वह समझने वाला होता है। यदि, आनन्द! भिक्षु प्रत्यवेक्षण करते यह जानता है—इन पाँच कामगुणों में किसी एक में ॰ मेरे चित्त का समुदाचार उत्पन्न नहीं होता, वह भिक्षु…ऐसा होते हुये को ऐसे जानता है। इन पाँच कामगुणों में जो छन्द=राग है, सो मेरा प्रहीण है—इस प्रकार यह समझने वाला होता है।
“आनन्द! यह पाँच उपादान-स्कंध है; जिन में भिक्षु को उदय-व्यय (=उत्पत्ति-विनाश) देखते हुये विहरना चाहिये—इस प्रकार रूप हैं, इस प्रकार रूप का समुदय (=उत्पत्ति) होता है, इस प्रकार रूप का अस्तगमन (=नाश) होता है। इस प्रकार वेदना है ॰। इस प्रकार संज्ञा ॰। इस प्रकार संस्कार ॰। इस प्रकार विज्ञान ॰। इस प्रकार इन पाँच उपादान-स्कंधों में उदयव्यय देखते हुये विहरते, उन पाँच उपादान-स्कंधों में अस्मि-मान (=यह मैं हूँ,, यह ख्याल) नष्ट हो जाता है। वह भिक्षु ऐसा होते हुये को ऐसे जानता है। इन पाँच स्कंधो में जो अस्मिमान है, सो मेरा प्रहीण (=नष्ट) हो गया—इस प्रकार वह समझने वाला होता है। आनन्द! यह धर्म हैं एकान्त-कुशल (=बिल्कुल अच्छे) से आये, आर्य, लोकोत्तर, पाप्मा (=मार) की पहुँच से बाहर।
“तो क्या मानते हो, आनंद! कि श्रावक (=शिष्य) को मतलब (=अर्थ) देखकर भगाये जाने पर भी शास्ता का अनुसरण करना चाहिये?”
“भन्ते! भगवान् हमारे धर्म के मूल हैं, भगवान् नेता हैं, भगवान् प्रतिशरण (=अवलब) है। अच्छा हो, भन्ते! भगवान् ही इस वचन का अर्थ कहे। भगवान् से सुनकर भिक्षु धारण करेंगे।”
“आनन्द! सूत्र, गेय, व्याकरण (भेदवाले उपदेशों) के लिये शिष्य को शास्ता (=गुरू) का अनुसरण नहीं करना चाहिये। सो किस हेतु—दीर्घकाल के हित के लिये, आनन्द! धर्म सुने, धारण किये जाते है, वचन से परिचित् मन से अनुपेक्षित (=विचारित), दृष्टि से सुप्रतिबद्ध (=तह तक पहुँचकर समझे गये) होते है। आनन्द! जो यह कथा (=बात) अभिसंलेखवाली ॰ विमुक्ति-ज्ञान-दर्शन-कथा है; आनंद! इस प्रकार की कथा के लिये शिष्य को ॰ शास्ता का अनुसरण करना चाहिये।
“ऐसा होने पर, आनंद! आचार्य-उपद्रव होता है, ॰ अन्तेवासी-उपद्रव ॰, ॰ ब्रह्मचारी-उपद्रव होता है। आनन्द! कैसे आचार्य-उपद्रव होता है?—यहाँ, आनन्द! कोई शास्ता (=गुरू) अरण्य, वृक्ष-छाया, पर्वत-कन्दरा, गिरि-गुहा, श्मशान, वनप्रस्थ, खुले-मैदान, पुआल के गंज — ऐसे एकान्त शयनासन को सेवन करता है। ऐसे एकान्त में विहरते हुये उसका, नैगम (=नागरिक) और जानपद (=दीहाती), ब्राह्मण-गृहपति अनुगमन करते है। ॰ ब्राह्मण-गृहपतियों द्वारा अनुगमन किये जाने पर वह प्रश्न का इच्छुक होता है, लोभ (=गंध) को प्राप्त होता है, बटोरू होने लगता है। आनंद! यह है आचार्य-उपद्रव। आचार्य-उपद्रव के कारण, संक्लेशिक (=मलिन करने वाले) पौनर्भविक (=आवागमन देने वाले), भयावह दुःख-परिणामी, भविष्य में जन्म-जरा-मरण देने वाले, पापक=अकुशल-धर्मो (=बुराइयो) ने उसे मार दिया। आनन्द! इस प्रकार आचार्य-उपद्रव होता है। और कैसे, आनन्द! अन्तेवास-उपद्रव होता है?—आनन्द! उसी शास्ता का शिष्य, अपने शास्ता के विवेक (=एकान्त-चिन्तन) का अनुकरण करते अरण्य ॰ ऐसे एकान्त श्यनासन को सेवन करता है। ॰ बटोरू होने लगता है। आनंद! यह है अंतेवासी-उपद्रव। ॰। आनन्द! इस प्रकार अन्तेवासी-उपद्रव होता है। और कैसे, आनंद! ब्रह्मचारी-उपद्रव होता है? आनंद! यहाँ लोक में तथागत अर्हत्-सम्यक्-संबुद्ध विद्या-चरण-युक्त, सुगत, लोकविद्, पुरूषों के अनुपम चाबुक सवार, देवताओं और मनुष्यों के उपदेष्टा भगवान् बुद्ध उत्पन्न होते है। वह अरण्य ॰ ऐसे एकान्त शयनासन (=निवास) को सेवन करते हैं। ऐसे एकान्त में विहरते उनका नैगम, जानपद ब्राह्मण-गृहपति अनुगमन करते है। ॰ ब्राह्मण-गृहपतियों द्वारा अनुगमन किये जाने पर (भी) वह प्रश्न (=पुछार) के इच्छुक नहीं होते, लोभ को प्राप्त नहीं होते, बटोरू नहीं बन जाते। आनंद! यह है ब्रह्मचारी-उपद्रव। ॰। आनंद! इस प्रकार ब्रह्मचारी-उपद्रव होता है।
“वहाँ, आनन्द! जो यह आचार्य-उपद्रव है, और जो अन्तेवासी-उपद्रव है, इन (दोनों) से ब्रह्मचारी-उपद्रव ही अधिक दुःख विपाकवाला, अधिक कटु-विपाक वाला है; और पतन की ओर ले जाने वाला है। इसलिये, आनंद! मुझे मित्रवत् बनाओं, शत्रुवत् नहीं। यह तुम्हारे लिये दीर्घकाल तक हित-सुख के लिये होगा। आनंद! किस प्रकार शिष्य शास्ता को शत्रुवत् बनाते हैं, मित्रवत् नहीं?—यहाँ, आनंद! अनुकम्पक, हितैषी शास्ता, अनुकम्पा करके शिष्यों को धर्म उपदेशते हैं — यह तुम्हारे हित के लिये है, यह तुम्हारे सुख के लिये है। (किन्तु) श्रावक उसको सुनना नहीं चाहते, कान नहीं देते, दूसरी ओर से (हटाकर) चित्त को (वहाँ) नहीं स्थापते; शास्ता के शासन (=उपदेश) को अतिक्रमण कर वर्तते है। इस प्रकार, आनन्द! शिष्य शास्ता को शत्रुवत् व्यवहार करते हैं, मित्रवत् नहीं। कैसे आनंद! शिष्य शास्ता को मित्रवत् बनाते हैं, शत्रुवत् नहीं?—यहाँ, आनंद! ॰ शास्ता ॰ धर्म उपदेशते हैं—॰। और श्रावक उसको सुनना चाहते हैं, कान देते हैं, दूसरी ओर से (हटाकर) चित्त को (वहाँ) स्थापते हैं; शास्ता के शासन को अतिक्रमण कर नहीं वर्तते। इस प्रकार, आनंद! ॰ शत्रुवत् नही। इसलिये, आनंद! मुझे मित्रवत् बनाओं, शत्रुवत् नहीं। यह तुम्हारे लिये दीर्घकाल तक हित-सुख के लिये होगा। आनन्द! मैं उस प्रकार पराक्रम नहीं करता, जैसे कुम्हार कच्चे, कच्चे मात्र (बर्तनों) मैं । आनन्द! निग्रह कर करके मैं व्याख्यान करता हूँ; प्रग्रह कर करके व्याख्यान करता हूँ; जो सार है, वह ठहरेगा।”
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् आनंद ने भगवान् ने भाषण का अभिनन्दन किया।
अनुवाद के बारे में
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
सभी प्राणी सुखी हों