उपोसथ

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मनि 141

Saccavibhaṅga sutta: सच्च-विभंग-सुत्तन्त

Saccavibhaṅgasutta

Vibhaṅgavagga

अनुवाद

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् वाराणसी में ऋषिपतन-मृगदाव में विहार करते थे।

वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओ!”

“भदन्त!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओं! तथाग अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध ने वाराणसी ऋषिपतन-मृगदाव में अनुपम धर्म-चक्र को प्रवर्तित किया (=घुमाया), (जोकि) श्रमण-ब्राह्मण, देव, भार, ब्रह्मा या लोक में किसी से भी उल्टाया नहीं जा सकता। जो कि यह चार आर्य-सत्यों का आख्यान=देशना=प्रज्ञापन=प्रस्थापन=विवरण =विभाजन=उत्तानीकरण (=स्पष्टीकरण) करना है। किन चारों का?—दुःख-आर्यसत्य आख्यान ॰। दु‘ख-समुदय-आर्य-सत्य का ॰। दुःख निरोध आर्यसत्य का ॰। दुःख निरोध-गामिनी प्रतिपदा-आर्य-सत्य का आख्यान ॰। भिक्षुओ! तथागत ॰ ने ॰ धर्म-चक्र को प्रवर्तित किया, (जो कि) ॰।

“भिक्षुओ! सारिपुत्र, और मौद्गल्यायन को सेवन करो, ॰ भजन करो। भिक्षुओ! सारि-पुत्र, मौद्गल्यायन पंडित हैं, सब्रह्मचारियों के अनुग्राहक है। भिक्षुओं! जन्मदाता (=पिता) की तरह सारिपुत्र हैं; जन्में को पोषनेवाले की तरह मौद्गल्यायन है। भिक्षुओ! सारिपुत्र (अधिकारी को) स्रोत-आपत्ति काल में प्राप्त कराता है; और मौद्गल्यायन उत्तम-अर्थ (=पदार्थ=निर्वाण) में! भिक्षुओ! सारिपुत्र चार आर्य-सत्यों का विस्तारपुर्वक आख्यान ॰ उत्तानीकरण कर सकता है।”

भगवान् ने यह कहा, यह कह सुगत आसन से उठ विहार में चले गये।

तब भगवान् के चले जाने के थोडे ही समय बाद आयुष्मान् सारिपुत्र ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“आवुस भिक्षुओ!”

“आवुस!”—(कह) उन भिक्षुओ ने आयुष्मान् सारिपुत्र को उत्तर दिया।

आयुष्मान् सारिपुत्र ने यह कहा—“आवुसो! तथागत ॰ ने वाराणसी ॰ में अनुपम धर्म चक्र को प्रवर्तित किया ॰ दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा आर्य-सत्य का ॰ उत्तानीकरण किया।’ क्या है आवुसो! दुःख आर्य-सत्य?—॰

“यह कही जाती है, आवुसो! दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा आर्य-सत्य। आवुसो! तथागत ॰ ने ॰ धर्मचक्र को प्रवर्तित किया। ॰ दुःख निरोधगामिनी आर्य-सत्य का ॰ उत्तानीकरण किया।”

आयुष्मान् सारिपुत्र ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने आयुष्मान् सारिपुत्र के भाषण का अभिनन्दन किया।

अनुवाद के बारे में

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

सभी प्राणी सुखी हों