मनि 34
Cūḷagopālaka sutta: चूल-गोपालक-सुत्तन्त
Cūḷagopālakasutta
Mahāyamakavagga
अनुवाद
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् वज्जी (देश) के उक्काचेल (= उल्काचैल) में गंगानदी के तीर पर विहार करते थे।
वहाँ, भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओ!”
“भदन्त!” (कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा “भिक्षुओ! पूर्वकाल में मगध के रहने वाले एक मूर्ख गोपालक ने वर्षा के अन्तिम मास में शरदकाल में, गंगानदी के इस पार को बिना सोचे, उस पार को बिना सोचे, बेघाट ही विदेह (देश) की ओर दूसरे तीर को गाय हाँक दी। तब भिक्षुओ! वह गायें गंगा नदी के स्रोत के मध्य में भँवर में पडकर वहीं विनाश को प्राप्त हो गई। सो किसलिये?—क्योंकि भिक्षुओ! उस मगधवासी मूर्ख गोपालक ने ॰ गाये हाँक दीं। इसी प्रकार भिक्षुओ! जो कोई श्रमण (= सन्यासी) या ब्राह्मण इस लोक से नावाकिफ़ (= अकुशल) हैं, परलोक से नावाकिफ़ हैं, मार के लक्ष्य से नावाकिफ हैं, मार के अलक्ष्य से नावाकिफ़ हैं, मृत्यु के लक्ष्य ॰ मृत्यु के अलक्ष्य से नावाकिफ़ हैं; उनके (उपदेशो) को जो सुनने योग्य, श्रद्धा करने योग्य समझेंगे उनके लिये वह चिरकाल तक अहितकर, दुःखकर होगा।
“भिक्षुओ! पूर्वकाल मंे एक मगधवासी बुद्धिमान ग्वाले ने वर्षा के अन्तिम मास में शरद काल में गंगा नदी के इस पार को ॰ सोचकर घाट से उत्तर तीर पर विदेह की ओर ॰ गायें हाँकीं। उसने जो वह गायों के पितर, गायों के नायक वृषभ (= साँड) थे उन्हें पहिले हाँका। वह गंगा की धार को तिरछे काटकर स्वस्तिपूर्वक दूसरे पार चले गये। तब उसने दूसरी बलवान् शिक्षित गायों को हाँका ॰। फिर बछडे और बछियों को हाँका ॰। फिर दुर्बल बछड़ों को ॰। भिक्षुओ! उस समय तरूण कुछ ही दिनों का पैदा एक बछडा भी माता की गर्दन के सहारे तैरते गंगा की धार को तिरछे काटकर स्वस्तिपूर्वक पार चला गया। सो क्यों?—क्योंकि भिक्षुओ! उस मगध-वासी बुद्धिमान् ग्वाले ने ॰ हाँकी। ऐसे ही भिक्षुओ! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण इस लोक के जानकार ॰ उनको (उपदेश को) जो सुनने योग्य ॰ समझते हैं; उनके लिये वह चिरकाल तक हितकर सुखकर होगा।
“जैसे भिक्षुओ! वह गायों के पितर ॰ वृषभ गंगा की धार को तिरछे काटकर स्वस्तिपूर्वक उस पार चले गये; ऐसे ही भिक्षुओ! जो यह अर्हत् क्षीण-आस्रव, (ब्रह्मचर्य-) वास-समाप्त, कृत-कृत्य, भार-मुक्त, सत्पदार्थ-को-प्राप्त, भव-बंधन-रहित, सम्यक्-ज्ञान-द्वारा-मुक्त हैं, वह मार की धारा को तिरछे काटकर स्वस्तिपूर्वक पार जायेंगे।
“जैसे भिक्षुओ! शिक्षित बलवान् गायें ॰; जैसे ही भिक्षुओ! जो वह भिक्षु पाँच अवरभागीय-संयोजनों के क्षय से औपपातिक (= अयोनिज देव) हो, उस (देव) लोक से लौटकर न आ वहीं निर्वाण प्राप्त करने वाले हैं; वह भी मार की धारा को ॰।
“जैसे, भिक्षुओ! वह बछड़े बछड़ियाँ ॰; वैसे ही भिक्षुओ! जो भिक्षु तीन संयोजनों के क्षय से राग-द्वेष-मोह के निर्बल होने से सकृदागामी हैं, सकृत् (= एक बार) ही इस लोक में आकर दुःख का अंत करेंगे, ; वह भी ॰।
“जैसे भिक्षुओ! वह एक निर्बल बछड़ा गंगा की धार को तिरछे काटकर स्वस्तिपूर्वक दूसरे पार चला गया; वैसे ही भिक्षुओ! जो वह भिक्षु तीन संयोजनों के क्षय से स्रोतआपन्न हैं, नियमपूर्वक संबोधि (= परमज्ञान)-परायण, (= निर्वाण-गामी-पथ से) न भ्रष्ट होने वाले हैं; वह भी ॰।
“भिक्षुओ! मैं इस लोक का जानकार हूँ, परलोक ॰, ॰ मृत्यु अलक्ष्य का जानकार हूँ; भिक्षुओ! ऐसे मेरे (उपदेश) को जो सुनने योग्य, श्रद्धा के योग्य मानेंगे उनके लिये वह चिरकाल तक हितकर सुखकर होगां”
भगवान् ने यह कहा; यह कहकर सुगत शास्ता ने यह भी कहा—
“जानकार ने इस लोक परलोक को सुप्रकाशित किया;
जो मार की पहुँच में हैं और जो मृत्यु (= मार) की पहुँच में नहीं हैं।
जानकार संबुद्ध ने सब लोक को जानकर।
निर्वाण की प्राप्ति के लिये क्षेम (युक्त) अमृतद्वार को खोल दिया।
पापी (= मार) के स्रोत को छिन्न, विध्वस्त, विश्रृंखलित कर दिया।
भिक्षुओ! प्रमोदयुक्त होवो, क्षेम की चाह करो।”
अनुवाद के बारे में
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
सभी प्राणी सुखी हों