मनि 89
Dhammacetiya sutta: धम्मचेतिय-सुत्तन्त
Dhammacetiyasutta
Rājavagga
अनुवाद
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् शाक्य (देश) में, मेतलूप (=मेतलूम्प) नामक शाक्यों के निगम में विहार करते थे।-
उस समय राजा प्रसेनजित् कोसल किसी काम से नगरक में आया हुआ था। तब राजा प्र्रसेनजित् कोसल ने दीर्घ कारायण को आमंत्रित किया—-
“सौम्य कारायण! सुन्दर यानों को जुडवाओ, सुभूमि देखने के लिये उद्यान-भूमि जायेंगे।”
“अच्छा देव!”
“देव! सुन्दर-सुन्दर यान जुत गये, अब जिसका देव काल समझते हों।”
तब राजा प्रसेनजित् ॰ भद्र (=सुन्दर) यान पर आरूढ हो, भद्र-भद्र यानों के साथ, बडे राजसी ठाट से नगरक से नकल कर, जहाँ आराम था, वहाँ गया। जितनी यान की भूमि थी, उतना यान से जा, यान से उतर पैदल ही आराम में प्रविष्ट हुआ। राजा प्रसेनजित् ने टहलते हुये आराम में शब्द-रहित, घोष-रहित, निर्जन,…ध्यान योग्य मनोहर वृक्ष-मूलों को देखा। देखकर भगवान् की ही स्मृति उत्पन्न हुई — यह वैसे ही ॰ मनोहर वृक्षमूल हैं, जहाँ पर हम भगवान् ॰ सम्यक् संबुद्ध की उपासना (=सत्संग) करते थे। तब राजा ॰ ने दीर्घ कारायण से पूछा—
“सौम्य कारायण! यह ॰ मनोहर वृक्षमूल हैं, जहाँ पर ॰। सौम्य कारायण! इस समय वह भगवान् ॰ कहाँ विहरते हैं?”
“महाराज! शाक्यों का मेतलूप नामक निगम (=कस्बा) है, वह भगवान् ॰ वहाँ पर विहर रहे है।”
“सौम्य कारायण! नगरक से कितनी दूर पर शाक्यों का वह मेतलूप निगम है?”
“महाराज! दूर नहीं है, तीन योजन है। बाकी बचे दिन में पहूँचा जा सकता है।”
“तो सौम्य कारायण! जुडवा भद्र यानों को, हम भगवान् ॰ के दर्शन के लिये वहाँ चलेंगे।” “अच्छा देव!”…
…तब राजा प्रसेनजित् सुन्दर यान पर आरूढ हो ॰ नगरक से निकलकर,…उसी बचे दिन में शाक्यों के निगम मेतलूप में पहूँच गया। जहाँ आराम था, वहाँ चला। जितनी यान की भूमि थी, उतनी यान से जा, यान से उतर कर पैदल ही आराम में प्रविष्ट हुआ।
उस समय बहुत से भिक्षु खुली जगह में टहल रहे थे ॰। राजा प्रसेनजित् ने वही खड्ग और उष्णीय दीर्घ कारायण को दे दिया। दीर्घ कारायण न सोचा—‘मुझे राजा यहीं ठहरा रहा है; इसलिये मुझे यहाँ खडा रहना होगा।” तब राजा ॰ जहाँ वह द्वार बंद विहार था ॰ गया। भगवान् ने दर्वाजा खोल दिया। राजा ॰ विहार (=गंधकूटी) में प्रविष्ट हो, भगवान् के चरणों में शिर से पडकर ॰।
“क्या है महाराज! क्या बात देखकर महाराज! इस शरीर में इतना गौरव दिखलाते हो, विचित्र उपहार (=संमान) प्रदर्शन कर रहे हो?”
“भन्ते! भगवान् से मेरा धर्म-अन्वय (=धर्म-संबन्ध) हैं—भगवान् सम्यक् संबुद्ध हैं, भगवान् का धर्म स्वाख्यात हैं, संघ सुमार्ग पर आरूढ़ है। भन्ते! किन्हीं किन्हीं श्रमण ब्राह्मणों को मैं स्वल्प-कालिक (=पर्यंतक) ब्रह्मचर्य पालन करते देखता हूँ—दश वर्ष, बीस वर्ष, तीस वर्ष, चालीस वर्ष भी। वह दूसरे समय सु-स्नात, सु-विलिप्त, केश-श्मश्रु बनवा (=कल्पित कर) पाँच कामगुणों से समर्पित=सम्-अंगीभूत हो, विचरण करते हैं। भन्ते! भिक्षुओं को मैं देखता हूँ, जीवनभर…परिपूर्ण, परिशुद्ध ब्रह्मचर्य पालन करते हैं। भन्ते! यहाँ से बाहर दूसरा इतना परिपूर्ण परिशुद्ध ब्रह्मचर्य नहीं देख्ता। भन्ते! यह भ (कारण है) कि भगवान् में मुझे धर्म-दर्शन (=धर्म-अन्वय) होता है,—‘भगवान् सम्यक् संबुद्ध हैं, भगवान् का धर्म स्वाख्यात हैं, संघ सु-प्रतिपन्न (=सुमार्गारूढ) है।
“और फिर भन्ते! राजा भी राजाओं से विवाद करते हैं, क्षत्रिय क्षत्रिय के साथ विवाद करते हैं, ब्राह्मण भी ॰, गृहपति (=वैश्य) भी ॰, माता भी पुत्र के साथ ॰, पुत्र भी माता के साथ ॰, पिता भी पुत्र के साथ ॰, पुत्र भी पिता के साथ ॰, भाई भी भाई के साथ ॰, भाई भी बहिन के साथ ॰, बहिन भी भाई के साथ ॰, मित्र भी मित्र के साथ ॰। किन्तु यहाँ भन्ते! मैं भिक्षुओं को समय (=एकराय), संमोदमान (=एक दूसरे से मुदित), विवाद-रहित, दूध-जल-बने, एक दूसरें को प्रिय-चक्षु से देखता विहार करता देखता हूँ। भन्ते! यहाँ से बाहर मैं (कहीं) ऐसी एकराय परिषद् नहीं देखता। यह भी भन्ते! ॰।
“और फिर भन्ते! मैं (एक) आराम से (दूसरे) आराम में, (एक) उद्यान से (दूसरे) उद्यान में, टहलता हूँ, विचरता हूँ; वहाँ मैं किन्ही-किन्हीं श्रमण ब्राह्मणों को कृश, रूक्ष, दुर्वर्ण, पीले-पीले, नाडी बँधे गात्र वाले (देखता हूँ); मानों लोगों के दर्शन करने से आँख को बंद कर रहे हैं। तब भन्ते! मुझे ऐसा होता है—‘निश्चय यह आयुष्मान् या तो बेमन (=अन्-अभिरत) हो ब्रह्मचर्य कर रहे है, या इन्होंने कोई छिपा हुआ पापकर्म किया है, जिससे कि यह आयुष्मान् कृश ॰। उनके पास जाकर मैं ऐसे देखता हूँ—‘आयुष्मानों! तुम कृश ॰?” वह मुझे कहते हैं—‘महाराज! हमें बंधुक-रोग (=कुल-रोग) है।’ किन्तु भन्ते! मैं यहाँ भिक्षुओं को हष्ट, प्रहष्ट=उदग्र, अभिरत=प्रसन्न-इन्द्रिय उत्सुकता-रहित, रोमांच-रहित,…मृदु-चित्त से विहार करते देखता हूँ। यह भी भन्ते! ॰।
“और फिर भन्ते! मैं मूर्धाभिषिक्त क्षत्रिय राजा हूँ, मारने योग्य को मरवा सकता हूँ,…निर्वासन योग्य का निर्वासन कर सकता हूँ। ऐसा होते भी भन्ते! मेरे (राज-)कार्य में बैठे वक्त, (लोग) बीच-बीच में बात डाल देते हैं। उनको मैं (कहता हूँ)—‘मैं (काम करने) नहीं पाता, आप लोग कार्य करने के लिये बैठे वक्त बीच बीच में बात मत डालें; आप बात समाप्त हो जाने तक प्रतीक्षा करें।’ तो (भी) बीच-बीच में बात डाल ही देते है। किंतु यहाँ भन्ते! मैं भिक्षुओ को देखता हूँ, जिस समय भगवान् अनेक शत की परिषद् को धर्म-उपदेश करते हैं; उस समय भगवान् के श्रावकों के थूकनें खाँसने का भी शब्द नहीं होता। भन्ते! पहिले एक समय भगवान् अनेक शत परिषद् को धर्म-उपदेश कर रहे थे; उस समय भगवान् के एक श्रावक (=शिष्य) ने खाँसा। तब उसे एक सब्रह्मचारी ने घुटने को दबाकर इशारा किया-आयुष्मान् निःशब्द हो, आयुष्मान् शब्द मत करें, शास्ता भगवान् हमें धर्म-उपदेश कर रहे हैं। तब मुझे ऐसा हुआ—‘आश्चर्य है जी! अद्भूत है जी!! जो बिना दंड के ही, बिना शस्त्र के ही, इस प्रकार की विनय-युक्त (=विनीत) परिषद!!!’ यहाँ से बाहर भन्ते! मैं दूसरी इस प्रकार की सु-विनीत परिषद् नहीं देखता। यह भी ॰।
“और फिर भन्ते! मैं किन्हीं किन्हीं निपुण, कृतपर प्रवाद (=प्रौढ़ शास्त्रार्थी) बाल-‘बेधी क्षत्रिय-पंडितों को देखता हूँ; (जो) मानों (अपनी) प्रज्ञा-गत (युक्तियों से) (दूसरें के) दृष्टि-गत (=मत विषयक बातों) को टुकडे टुकडे करे डालते हैं। वह सुनते हैं—‘श्रमण गौतम अमुक ग्राम या निगम में आवेगा’ वह प्रश्न तय्यार करते हैं—इस प्रश्न को हम श्रमण गौतम के पास जाकर पूछेंगे; ऐसा पूछने पर यदि ऐसा उत्तर देगा, तो हम इस प्रकार उससे वाद रोपेंगे। वह सुनते हैं—‘श्रमण गौतम अमुक ग्राम या निगम में आ गया’। वह जहाँ भगवान् (होते हैं) वहाँ जाते हैं। वह भगवान् की धार्मिक-कथा द्वारा संदर्शित हो, प्रेरित हो, समुत्तेजित हो, संप्रहर्षित हो, भगवान् से प्रश्न भी नहीं पूछते, वाद कहाँ से रोपेंगे? बल्कि भगवान् के श्रावक ही बन जाते है। यह भी ॰।
“और फिर भन्ते! मैं किन्ही किन्ही ॰ ब्राह्मण पंडितों ॰।”
“॰ गृहपति पंडितो ॰।”
“॰ श्रमण पंडितों ॰। भगवान् प्रश्न भी नहीं पूछते, वाद कहाँ से रोपेंगे; बल्कि भगवान् से ही घर से बेघर हो प्रब्रज्या माँगते हैं। उन्हें भगवान् प्रब्रजित करते हैं। वह इस प्रकार प्रब्रजित हो एकाकी ॰ आत्म-संयमी हो विहरते, जल्दी ही जिसके लिये कुल-पुत्र ॰ प्रब्रजित होते हैं, उस अनुत्तर (=सर्वोत्तम) ब्रह्मचर्य-फल को इसी जन्म में स्वयं अभिज्ञान कर, साक्षात्कार कर, प्राप्त कर विहरते है। वह ऐसा कहते हैं—हम नष्ट थे, हम प्र-नष्ट थे; हम पहिले अ-श्रमण होते ही ‘श्रमण हैं’ का दावा करते थे; अ-ब्राह्मण होते ‘ब्राह्मण हैं’ का दावा करते थे। अर्हत् न होते ‘अर्हत् हैं’ का दावा करते थे। अब है हम श्रमण, ॰ ब्राह्मण, ॰ अर्हत्। यह भी ॰।
“और फिर भन्ते! यह ऋषिदत्त और पुराण स्थपति (=फीलवान्) मेरे ही (भोजन से) भोजन वाले, मेरे ही (पान से) पान वाले हैं, मैं ही उनके जीवन का प्रदाता, उनके यश का प्रदाता हूँ; तो भी (वह) मेरे में उतना सन्मान नहीं करते, जितना कि भगवान् मे। पहिले एक बार भन्ते! मै चढाई के लिये जाता था। ऋषिदत्त और पुराण स्थपति ने खोज करएक भीड वाले आवसथ (=सराय) में वास किया। तब भन्ते! वह ऋषिदत्त और पुराण बहुत रात धर्म-कथा में बिता, जिस दिशा में भगवान् के होने को सुना था, उधर शिर कर, मुझे पैर की ओर करके लेट गये। तब मुझे ऐसा हुआ—‘आश्चर्य है जी! अद्भुत है जी!! यह ऋषिदत्त, और पुराण स्थपति मेरे ही भोजन से भोजनवाले ॰। यह आयुष्मान् उन भगवान् के शासन में (=श्रद्धालु) हो, पहिले से अवश्य कोई विशेष देखते होंगे। यह भी ॰।
“और फिर भन्ते! भगवान् भी क्षत्रिय हैं, मैं भी क्षत्रिय हूँ, भगवान् भी कोसलक (=कोसलवसी, कोसल-गोत्रज) हैं, मैं भी कोसलक हूँ। भगवान् भी अस्सी वर्ष के, मैं भी अस्सी वर्ष का। भन्ते! जो भगवान् भी क्षत्रिय ॰, इससे भी भन्ते! मुझे योग्य ही है, भगवान् का परम सन्मान करना, विचित्र गोरव प्रदर्शित करना। हन्त! भन्ते! अब हम जायेंगे, हम बहुकृत्य बहु-करणीय है।”
“महाराज! जिसका तुम काल समझते हो (वैसा करों)”
तब राजा प्रसेनजित् ॰ आसन से उठ, भगवान् को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर चला1 गया।
राजा ॰ के जाने के थोडी ही देर बाद भगवान् ने भिक्षुओं से कहा—
“भिक्षुओं! यह राजा प्रसेनजित् ॰ धर्म-चैत्यों को भाषणकर, आसन से उठकर चला गया। भिक्षुओं! धर्मचैत्यों को सीखो, ॰ धर्मचैत्यों को पूरा करों, ॰ धर्मचैत्यों को धारण करों। भिक्षुओं! धर्म-चैत्य सार्थक और आदि (=शुद्ध) ब्रह्मचर्य के है।”
भगवान् ने यह कहा। सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनंदन किया।
अनुवाद के बारे में
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
सभी प्राणी सुखी हों