Uposatha

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中部 103

Kinti sutta: किन्ति-सुत्तन्त

Kintisutta

Devadahavagga

翻訳

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवा कुसीनारा में बलिहरण वन-खण्ड में विहार करते थे ।

वहां भगवा ने भिक्खुओ़़ं को संबोधित किया — “भिक्खुओ़़ं!”

“भदन्त!” (कह) उन भिक्खुओ़़ं ने भगवा को उत्तर दिया ।

भगवा ने यह कहा — “भिक्खुओं! तुम्हें मेरे विषय में क्या होता है — क्या (=किन्ति) श्रमण गोतम चीवर (=वस्त्र) के लिये धर्म उपदेशते हैं,… पिंडपात (=भोजन) के लिये …, … शयन-आसन के लिये … , …अच्छे-अच्छे-जन्म के लिये…?”

“नहीं, भन्ते! हमें एसा (नहीं) होता — श्रमण गोतम चीवर के लिये घर्म उपदेशते हैं …।”

“भिक्खुओं! यदि तुम्हें यह नहीं होता — श्रमण गोतम चीवर के लिये…। तो फिर तुम्हें मेरे विषय में क्या होता है?”

“भन्ते! भगवा (भगवान) के विषय में हमें ऐसा होता है — ‘भगवा हितैषी अनुकम्पक हैं;अनुकम्पा करके धर्म उपदेशते हैं’।”

“भिक्खुओं! तुम्हें मेरे विषय में यह होता है — ‘भगवा हितैषी… ।’ तो भिक्खुओं मेरे उपदेशित धर्मों का, जैसे कि — (1-4) चार स्मृति-प्रस्थान, (5-8) चार सम्यक् प्रघान, (9-12) चार ऋषिपाद, (13-17) पांच इन्द्रिय, (18-22) पांच बल (23-29) सात बोध्यंग, (30-37) आर्य आष्टांगिक-मार्ग का प्रसन्न, एकतायुक्त, विवाद-रहित अभ्यास करो ।”

“भिक्खुओं! इस प्रकार विवादरहित हो अभ्यास करते जो दो भिक्खु धर्म के विषय(=अभिधर्म) में भी भिन्नमत रखने वाले हों, तो यदि तुम्हें ऐसा हो — ‘इन आयुष्मानों का (कथन) अर्थ में भी भिन्न है, शब्द (=व्यंजन) में भी भिन्न है; तो वहां पहले पक्ष में जिस भक्खु को सु-वचतर(=अधिक आज्ञाकारि) समझो, उसे जाकर कहना — ‘आयुष्मानों का कथन अर्थ में भिन्न है, व्यंजन में भी भिन्न है, इससे जानें कि आयुष्मानों का अर्थ में भी भिन्न है…। मत आयुष्मानों! विवाद करो’। तब दूसरे पक्ष वालों से जिस भिक्खु को सु-वच-तर समझो, उसे जाकर कहना — ‘आयुष्मानों का …अर्थ में भी भिन्न है…। मत आयुष्मानों! विवाद करो’। इस प्रकार उलटा समझे हुए (=दुर्गृहीत) को उल्टा समझा जानो । और उल्टा समझा जानकर, जो धर्म, और जो विनय है, उसे भाषो ।”

“वहां यदि तुम्हें एसा हो — ‘इन आयुष्मानों का (कथन) अर्थ में ही भिन्न है, व्यंजन में समान है’; तो वहां पहले पक्ष में जिस भिक्खु को सुवचतर समझो, … मत आयुष्मानों विवाद करो’। इक प्रकार दुर्गृहीत को दुर्गृहीत जानो, सुगृहीत (=ठीक समझे हुए) को सुगृहीत जानो । और सुगृहीत को सुगृहीत जानकर, जो धर्म है, और जो विनय है, उसे भाषो ।”

“वहां यदि तुम्हें ऐसा हो — ‘इन आयुष्मानों का (कथन) अर्थ में समान है, व्यंजन ही में नाना है तो वहां … जिस भिक्खु को सुवचतर समझो, … मत आयुष्मानों ! विवाद करो’। इक प्रकार दुर्गृहीत को दुर्गृहीत जानो, सुगृहीत को सुगृहीत जानो । … जो धर्म है, और जो विनय है, उसे भाषो ।”

“वहां यदि तुम्हें ऐसा हो — ‘इन आयुष्मानों का (कथन) अर्थ में भी समान है, व्यंजन में भी समान है’; मत आयुष्मानों विवाद करो’। … जो धर्म है, और जो विनय है, उसे भाषो ।”

“भिक्खुओं इस प्रकार विवादरहित अभ्यास करते (सीखते) यदि किसी भिक्खु से कोई कसूर (आपत्ति) हो जाए, व्यतिक्रम हो जाए, तो भिक्खुओं! वहां अभियोग (=चोदना) लाने की जल्दी नहीं करनी चाहिए; (पहले) आदमी (=पुद्गल) की परीक्षा करनी चाहिए — ‘ऐसा (अभियोग) करने पर मुझे तकलीफ तो न होगी, उस आदमी को हानि (=उपघात) तो न होगा? वह (अपराधी), आदमी अक्रोधी, वैर-न-रखने वाला (अन्-उपनाही), अ-मन्ददृष्टी (=समझदार) सुप्रति-निस्सर्गी (=आसानी से त्यागने वाला) तो है? क्या मैं उस आदमी को बुराई से हटाकर, भलाई में प्रतिष्ठित कर सकता हूं?’ यदि भिक्खुओं! ऐसा हो, (तो दोष) कहना चाहिए ।”

“यदि भिक्खुओं ऐसा हो — ’(एसा करने पर) मुझे तो तकलीफ न होगी, किंतु, उस आदमी का उपघात होगा । वह आदमी क्रोधी, उपनाही (=वैर बनाए रखने वाला), मन्द दृष्टी, सुप्रतिनिस्सर्गी है। (किन्तु) मैं उस आदमी को बुराई से हटाकर, भलाई में प्रतिष्ठित कर सकता हूं । यह छोटी बात है, यदि उस आदमी को थोड़ा उपघात(कष्ट) हो; यही बड़ी बात है, जो मैं उस आदमी को बुराई से हटाकर भलाई में प्रतिष्ठित कर सकूंगा ।’ यदि, भिक्खुओं ऐसा हो, तो कहना चाहिए ।”

“यदि भिक्खुओं ऐसा हो — ‘मुझे तकलीफ होगी, किंतु उस आदमी का उपघात न होगा । वह आदमी अक्रोधी, अनुपनाही, अमन्द-दृष्टी, (किंतु) दुष्प्रतिनिस्सर्गी (मुश्किल से छोड़ने वाला) है। (तो भी) मैं उस आदमी को बुराई से हटाकर, भलाई में प्रतिष्ठित कर सकता हूं । यह छोटी बात है, यदि मुझे थोड़ी सी तकलीफ हो; यही बड़ी बात है, जो मैं उस आदमी को … भलाई में प्रतिष्ठित कर सकूंगा ।’ यदि, भिक्खुओं ऐसा हो, तो कहना चाहिए ।”

“यदि भिक्खुओं ऐसा हो — मुझे भी तकलीफ होगी, उस आदमी को तकलीफ होगी । वह आदमी क्रोधी, उपनाही, मन्ददृष्टी (=मन्दबुद्धी), दुष्प्रतिनिस्सर्गी है । मैं उस आदमी को बुराई से हटाकर, भलाई में प्रतिष्ठित नहीं कर सकता । भिक्खुओं इस प्रकार के पुद्गल के लिए उपेक्षा करनी चाहिए ।”

“भिक्खुओं ! इस प्रकार … विवाद-रहित हो, अभ्यास करते यदि परस्पर वचन का अन्तर पड़ जाए, समझ में फर्क पड़ जाए, या चित्त में आघात (बुरा भाव), अ-विश्वास, असंतोष (उत्पन्न हो जाए); तो यहां पहले पक्ष वालों में जिस भिक्खु को सु-वच-तर समझे, उसे जाकर कहे — ‘आवुस!… विवादरहित हो, अभ्यास करते जो हम लोगों का परस्पर वचन का अन्तर पड़ गया,… उसको जानने वाला निन्दा करेगा न?’ ठीक से उत्तर देते हुए उस (सु-वच-तर) भिक्खु को कहना चाहिए — ‘आवुस!… जो हम लोगों का परस्पर वचन का अन्तर पड़ गया, उसको जानने वाला निन्दा करेगा। ‘आवुस इस धर्म (=बात) को छोड़े बिना निर्वाण का साक्षात्कार किया जा सकता है?’ ठीक से उत्तर देते हुए उस भिक्खु को कहना चाहिए — ‘आवुस! इस धर्म को छोड़े बिना निर्वाण का साक्षात्कार नहीं किया जा सकता!’ फिर दूसरे पक्ष वालों में जिस भिक्खु को सु-वच-तर समझे, उसे जाकर कहे — ’…इस धर्म को छोड़े बिना निर्वाण का साक्षात्कार नहीं किया जा सकता।’”

“भिक्खुओं! उस (मेलजोल करने वाले) भिक्खु को यदि दूसरा यह पूछे — ‘आयुष्मान् ने इन भिक्खुअों को बुराई से हटाकर भलाई में प्रतिष्ठित किया’? तो यथार्थ उत्तर देते हुए वह भिक्खु यह कहे — ‘आवुस! मैं जहां भगवान् थे, वहां गया । भगवान् ने मुझे धर्म उपदेशा । उस धर्म सो सुनकर, मैंने उन भिक्खुअों से कहा । उस धर्म को सुनकर वह भिक्खु बुराई छोड़, भलाई में प्रतिष्ठित हुए । भिक्खुअों ! इस प्रकार उत्तर देते हुए वह भिक्खु न अपने को श्लाघेगा, न दूसरे को निन्देगा, धर्म के अनुसार ही उत्तर देगा, और न किसी धर्मानुसारी वादानुवाद में वह निन्दा का पात्र होगा ।”

भगवा ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्खुअों ने भगवा के भाषण का अभिनन्दन किया ।

この翻訳について

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

生きとし生けるものが幸せでありますように