中部 94
Ghoṭamukha sutta: घोटमुख-सुत्तन्त
Ghoṭamukhasutta
Brāhmaṇavagga
翻訳
ऐसा मैंने सुना —
एक समय आयुष्मान् उदयन वाराणसी में खेमिय-अम्बवन में विहार करते थे।
उस समय घोटमुख ब्राह्मण किसी काम से बनारस (वाराणसी) आया हुआ था। तब घोटमुख-ब्राह्मण जंघा-विहार के लिये घूमते टहलते जहाँ खेमिय-अम्बवन (=क्षेमिक-आम्रवन) था, वहाँ गया! उस समय आयुष्मान् उदयन खुली जगह में टहल रहे थे।
तब घोटमुख ब्राह्मण जहाँ आयुष्मान् उदयन थे, वहाँ गया; जाकर आयुष्मान् उदयन के साथ…संमोदन कर, आयुष्मान् उदयन के पीछे पीछे ॰ टहलते हुये यह बोला—
“अहो श्रमण! मुझे ऐसा होता है—धार्मिक प्रब्रज्या (=संन्यास) नहीं है। आप जैसों के अ-दर्शन (=न देखे जाने) से ही यह है; किन्तु जो धर्म यहाँ है (वही) हमारे लिये प्रमाण है।”
ऐसा कहने पर आयुष्मान् उदयन चंक्रम (=टहलने के चबूतरे) से उतर कर, विहार (=कोठरी) में प्रविष्ट हो बिछे आसन पर बैठे। घोटमुख ब्राह्मण भी विहा में प्रविष्ट हो एक ओर खडा हो गया। एक ओड खडे हुये घोटमुख ब्राह्मण के आयुष्मान् उदयन ने यह कहा—
“ब्राह्मण! आसन मौजूद हैं, यदि इच्छा हो तो बैठो।”
“आप उदयन की इसी (आज्ञा) की प्रतीक्षा में हम नहीं बैठते थे। मेरे जैसा (पुरूष) बिना निमंत्रण के कैसे (स्वयं आकर) आसन पर बैठ जायेगा।”
तब घोटमुख (=घोड़े जैसा मुँहवाला) ब्राह्मण एक नीचा आसन ले कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे घोटमुख ब्राह्मण ने आयुष्मान् उदयन से यह कहा—
“अहो श्रमण! मुझे ऐसा होता है—॰ किन्तु जो धर्म यहाँ है, (वही हमारे लिये प्रमाण है)।”
“ब्राह्मण! यदि मेरी (कोई बात) को स्वीकरणीय समझना, तो स्वीकार करना, खंडनीय समझना, तो खंडन करना। जिस मेरे कथन का अर्थ न समझना, उसे मुझसे ही पूछना—‘भो उदयन! यह कैसे है, इसका अर्थ है?’—इस प्रकार हमारा यहाँ कथा-संलाप हो।”
“आप उदयन की स्वीकरणीय (बात) को स्वीकार करूँगा, खंडनीय को खंडन करूँगा। आप उदयन जिस बात का अर्थ न समझूँगा, उसे आप से ही पूछूँगा—‘हे उदयन यह कैसे है, इसका क्या अर्थ है’—इस प्रकार हमारा कथा-संलाप हो।”
“ब्राह्मण! लोक मे चार (प्रकार के) पुद्गल (=पुरूष) विद्यमान हैं। कौन से चार?—ब्राह्मण! (1) यहाँ कोई पुद्गल आत्मंतप अपने को संताप देने वाले कामों लगा होता है; (2) ॰ परंतप ॰; (3) ॰ आत्मंतप-परंतप ॰; (4) ॰ न आत्मन्तप-न-परंतप ॰ सुखा ब्रह्मभूत (=विशुद्ध)-आत्मा से विहरता है। ब्राह्मण! इन चार पुद्गलों में कौन सा तुम्हारे को पसन्द आता है?”
“भो उदयन! ॰ जो यह अनात्मंतप-अ-परंतप ॰ पुद्गल है, वह ॰ मुझे पसंद है।
“ब्राह्मण! क्यों यह तीन पुद्गल तुम्हारे चित्त को पसंद नहीं हैं?”
“भो उदयन? ॰ (जो) ब्रह्मभूत आत्मा से विहरता है; ॰ यह पुद्गल मेरे चित्त को पसन्द आता है।”
“ब्राह्मण! यह दो (प्रकार की) परिषद् होती है। कौन सी दो?—(1) ब्राह्मण यहाँ एक परिषद् मणि-कुंडल में सारत्व (=धन आदि) में रक्त (=अनुरक्त) होती है। भार्या चाहती हे, दास-दासी ॰, क्षेत्र-वास्तु (=खेत-मकान) ॰, सोना-चाँदी चाहती है। (2) ब्राह्मण! यहाँ एक परिषद् मणि-कुंडलों के विषय में, सारत्व में नहीं रक्त होती, पुत्र छोड ॰ सोना-चाँदी छोड घर से बेघर हो प्रब्रजित हुई है। ब्राह्मण! जो यह पुद्गल न आत्मंतप ॰, न परंतप ॰, न-आत्मंतप-न-परंतप ॰ हैं, वह अनात्मंतप-अपरंतप पुद्गल इसी जन्म में निर्वाण-प्राप्त, शीतल (-स्वभाव) सुखानुभवी, ब्रह्मभूत आत्मा से विहरता है। ब्राह्मण! इस … को तु किस परिषद् (=मंडल) में अधिक देखता है? जो यह सारत्व में रक्त होंती है ॰; … या जो कि ॰ सारत्व में नहीं रक्त होती ॰ उसमें?”
“भो उदयन! जो यह पुद्गल ॰ अनात्मंतप-अपरंतप है ॰, उसको इस परिषद् में … देखता हूँ, जो कि ॰ सारत्व में रक्त नहीं होती, ॰ बेघर हो प्रब्रजित हुइ्र है।”
“ब्राह्मण! अभी तूने कहा था, हम ऐसा जानते हैं—अहा श्रमण! मुझे ऐसा होता है ॰”
“तो भो उदयपन! मैंने सदोष बात कही; ‘है धार्मिक प्रब्रजया’—ऐसा मुझे होता है, मुझे आप उदयन समझें। आप उदयन ने जो यह चार पुद्गल, विस्तार से न विभाजित कर … कहे; अच्छा हो आप उदयन कृपाकर उन चारों पुद्गलों को मुझे विस्तार से कहे।”
“तो ब्राह्मण! सुनो अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।”
“अच्छा भो!”—(कह) घोटमुख ब्राह्मण ने आयुष्मान् उदयन को उत्तर दिया।
आयुष्मान् उदयन ने यह कहा—“ब्राह्मण! कौनसा पुद्गल आत्मंतप, अपने को सताने … कामों में लग्न है—ब्राह्मण! यहाँ कोई पुदगल! अचेलक ॰ ऐसे अनेक प्रकार से काया के … तापन परितपान के व्यापर में लग्न हो विहरता है। ब्राह्मण! यह पुद्गल आत्मंतप ॰ कहा जाता …”
“ब्राह्मण! कौनसा पुद्गल पंरतप ॰ है?—ब्राह्मण! यहाँ कोई पुद्गल औरभ्रिक (=मारने वाला) ॰ दूसरे क्रुर व्यवसाय हैं (=उनका करने वाला होता है) ॰।
“ब्राह्मण! कौनसा पुद्गल आत्मंतप-परंतप ॰ हैं?—यहाँ कोई पुरूष मूर्धाभिषिक्त … राजा होता है ॰ इसके दास ॰ भी ॰ होते कामों को करते है। ॰।
“ब्राह्मण! कौनसा पुद्गल अनात्मंतप-अपरंतप ॰ है?—ब्राह्मण! यहाँ लोक में तथा ॰ चतुर्थध्यान को प्राप्त हो विहरता है। सो वह इस प्रकार चित्त के एकाग्र परिशुद्ध ॰ यहाँ करने के लिये कुछ शेष नहीं है’—यह जान लेता है। ब्राह्मण! यह कहा जाता है अनात्मंतप-अपरंतप ॰ पुद्गल ॰।”
ऐसा कहने पर घोटमुख ब्राह्मण ने आयुष्मान् उदयन से यह कहा—
“आश्चय्र! भो उदयन! आश्चर्य भो उदयन! जैसे औंधे को सीधा कर दे ॰ ऐसे ही आप उदयन ने अनेक प्रकार से धर्म को प्रकाशित किया; यह मैं आप उदयन की शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आज से आप उदयन मुझे अंजलिबद्ध शरणागत उपासक स्वीकार करें।”
“मत तू ब्राह्मण! मेरी शरण जा, उसी भगवान् की तू भी शरण जा, जिसकी शरण मैं आया हूँ।’-’
“भो उदयन! वह भगवान् अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध कहाँ विहर कर रहे हैं?” ॰ तो निर्वाण प्राप्त भी उन भगवान् की हम शरण जाते है, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आज से आप उदयन मुझे अंजलिबद्ध शरणागत उपासक स्वीकार करें।
“भो उदयन! मुझे अंग-राजा दैनिक नित्य भिक्षा देता हैं, उनमें से मैं आप उदयन को दैनिक नित्य भिक्षा देता हूँ।”
“ब्राह्मण! अंग-राजा तुझे क्या दैनिक नित्य-भिक्षा देता है?”
“भो उदयन! पाँच सौ कार्षापण (=कहापण, एक सिक्का)।”
“ब्राह्मण! हमारे लिये सोना-चाँदी ग्रहण करना कल्प्य (=विरतिहित) नहीं है।”
“यदि वह आप उदयन को कल्प्य नहीं है, तो आप उदयन के लिये, विहार (=निवास-स्थान) बनवाऊँगा।”
“यदि ब्राह्मण! तू मेरे लिये विहार बनवाना चाहता है, तो पाटलिपुत्र (=पटना) में संघ की उपस्थान-शाला (=समागृह) बनवा दें।”
“आप उदयन के इस (कथन) से मैं और भी सन्तुष्ट, प्रसन्न हुआ, जो कि आप उदयन मुझे संघ को दान देने के लिये कहते हैं। सो मैं भो उदयन! इस नित्य-भिक्षा और दूसरी नित्य भिक्षा से पाटलिपुत्र में संघ के लिये उपस्थान-शाला बनवाऊँगा।”
तब घोटमुख ब्राह्मण ने इस नित्य-भिक्षा और दूसरी नित्य-भिक्षा से पाटलिपुत्र में संघ के लिये उपस्थान-शाला बनवाई; जो आज भी घोटमुखी कही जाती है।
この翻訳について
राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
生きとし生けるものが幸せでありますように