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MN 125

Dantabhūmi sutta: दन्त-भूमि-सुत्तन्त

Dantabhūmisutta

Suññatavagga

Oversettelser

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् राजगृह में वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार करते थे।

उस समय अचिरवत श्रमणोद्देश जंगल की कुटिया में विहरता था। तब जयसेन राजकुमार जंघा-विहार के लिये टहलते घूमते हुये, जहाँ अचिरवत श्रमणोद्देश था, वहाँ गया। जाकर अचिरवत श्रमणोद्देश (=समणुद्देस) के साथ…संमोदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे जयसेन राजकुमार ने अचिरवत श्रमणोद्देश से यह कहा—

“अग्निवेश! मैने सुना है, कि भिक्षु प्रमाद-रहित, उद्योगी, संयमी हो विहरते चित्त की एकाग्रता को प्राप्त होता है।”

“ऐसा ही है, राजकुमार! ऐसा ही है, राजकुमार! भिक्षु प्रमादरहित ॰ विहरते ॰।”

“अच्छा, आप अग्निवेश, (अपने) सुने और समझे अनुसार धर्म का उपदेश करें।”

“राजकुमार! मैं तुम्हे सुने-समझे अनुसार धर्म नहीं उपदेश सकता। राजकुमार! मैं तुम्हे सुने-समझे अनुसार धर्म उपदेशूँ; और तुम मेरे भाषण का अर्थ न समझो; तो वह मेरे लिये (नाहक की) परेशानी, पीडा होगी।”

“उपदेशें आप अग्निवेश! मुझे सुने-समझे अनुसार धर्म को; क्या जाने, आप अग्निवेश के भाषण का अर्थ मै समझ पाऊँ।”

“राजकुमार! मैं तुम्हें ॰ धर्म उपदेशूँगा; यदि तुम मेरे भाषण का अर्थ समझ पाये, तो अच्छा; यदि तुम मेरे भाषण का अर्थ न समझ पाये, तो अपने (मत) के अनुसार स्थित रहना; वहाँ फिर आगे की (बात) मुझसे न पूछना।”

“उपदेशें आप अग्निवेश ॰; यदि मैंने आप अग्निवेश के भाषण का अर्थ समझ पाया ॰ फिर आगे की (बात) आपसे न पूछूँगा।”

तब अचिरवत श्रमणोद्देश ने जयसेन राजकुमार के लिये (अपने) सुने-समझे अनुसार धर्म को उपदेशा। उपदेशने के बाद जयसेन राजकुमार ने अचिरवत श्रमणोद्देश से यह कहा—

“भो अग्निवेश! इसके लिये स्थान (=कारण) नहीं, अवकाश नहीं, कि भिक्षु प्रमाद-रहित ॰ विहरते चित्त की एकाग्रता को प्राप्त होता है।”

तब जयसेन राजकुमार अचिरवत श्रमणोंद्देश को स्थान नहीं, ‘अवकाश नहीं’—बतला, आसन से उठकर चला गया।

जयसेन राजकुमार के जाने के थोडे समय बाद अचिरवत श्रमणोद्देश, जहाँ भगवान थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठ अचिरवत श्रमणोंद्देश ने जो कुछ कथा-संलाप जयसेन राजकुमार के साथ हुआ था, (उसे) भगवान् से कह सुनाया। ऐस कहने पर भगवान् ने अचिरवत श्रमणोद्देश से यह कहा—

“अग्निवेश! वह यहाँ कैसे मिल सकता है; जसे वह निष्कामता से ज्ञातव्य (=जाना जा सकता है) ॰ दृष्टव्य है, ॰ प्राप्तव्य है, ॰ साक्षात्कर्तव्य हैं, उसे, कामें (=भोगों) के मध्य बसता, कामों को भोगता, काम-वितर्को से खाया जाता, का-दाह से दग्ध किया जाता, कामों की पर्येषणा (=फिक्र) में चिन्तापन्न जयसेन राजकुमार जानेगा, देखेगा, साक्षात्कार करेगा, इसका स्थान नहीं; अवकाश नहीं। जैसे, अग्निवेश!् सुशिक्षित (=सुदान्त)=सुविनीत दो दम्य हाथी, ॰ घोडे, या ॰ बैल हो औ अ-दान्त=अ-विनीत दो दम्य हाथी, ॰ घोडे, या ॰ बैल हो । तो क्या मानते हो, अग्निवेश! जो वह सुशिक्षित ॰ दो दम्य हाथी ॰ हैं; क्या शिक्षित होते वह शिक्षित क्रिया को समझ जायेंगे? वह दान्त (=शिक्षित) दान्त-भूमि (=शिक्षित-अवस्था) को प्राप्त होंगे?”

“हाँ, भन्ते!”

“और जो वह, अग्निवेश! अदान्त=अविनीत दो हाथी ॰ हैं; क्या वह अदान्त होते शिक्षित-क्रिया को समझ जायेंगे, वह अदान्त दान्त-भूमि को प्राप्त होंगे? जैसे कि वह दान्त=विनीत दो हाथी?”

“नही, भन्ते!”

“इसी प्रकार, अग्निवेश! जो वह निष्कामता से ज्ञातव्य ॰ उसे ॰ जयसेन राजकुमार ॰ साक्षात्कार करेगा, इसका स्थान नहीं। जैसे, अग्निवेश! ग्राम या नगम के पास महापर्वत हो। तब दो मित्र उस गाँव या निगम से निकलकर, जहाँ वह पर्वत हैं, वहाँ जायें। जाकर एक मित्र निचे पर्वत की जड़ में खड़ा रहे; दूसरा मित्र पर्वत के ऊपर चढ़ जाये। तब नीचे खडा मित्र ऊपर पर्वत पर स्थित मित्र से यह कहे—

“सौम्य! ऊपर पर्वत पर खडे तुम क्या देख रहे हो?”

“वह यह कहे—‘सौम्य! मैं ऊपर पर्वत पर खडा आराम-रमणीयता, वन ॰, भूमि ॰, पुष्करिणी-रमणीयता को देख रहा हूँ।’

“वह यह कहे—सौम्य! इसके लिये स्थान नहीं, अवकाशन हीं; कि तुम ऊपर पर्वत पर खडे आराम-रमणीयता ॰ को देखों।

“तब वह ऊपर पर्वत पर स्थित मित्र नीचे पर्वत-पाद पर उतर, उस मित्र का हाथ पकड, (फिर) पर्वत के ऊपर चढ, थोडी देर सुस्ता लेने पर यह कहे—

“सौम्य! ऊपर पर्वत पर खडे तुम क्या देख रहे हो?’

“वह यह कहे—सौम्य! मैं ॰ आराम-रमणीयता ॰ को देख रहा हूँ।”

“वह (दूसरा) यह कहे—‘सौम्य! अभी अभी तुमने कहा—हम ऐसा जानते हैं—इसके लिये स्थान नहीं ॰ आराम-रमणीयता को देखो।’ और अभी तुम कह रहे हो-हम ऐसा जानते हैं—सौम्य! मैं ॰ आराम-रमणीयता ॰ को देख रहा हूँ।”

“वह ऐसा कहे—‘सौम्य! मैं इस महापर्वत से इस प्रकार छिपा हुआ था, कि दृश्य को नहीं देख सकता था’।”

“अग्निवेश! जयसेन राजकुमार इस (महापर्वत) से भी बडे अ-विद्या-स्कंध से आच्छादित=निब्युढ=अवस्फुट, परिबद्ध है; वह, जो कि वह निष्कामता से ज्ञातव्य ॰ उसे ॰ साक्षात्कार करेगा, इसके लिये स्थान नहीं, अवकाश नहीं। यदि अग्निवेश! तू जयसेन राजकुमार को इन उपमाओं (=दृष्टान्तो) को सुझाता, आश्चर्य नहीं, जयसेन राजकुमार प्रसन्न (=सन्तुष्ट) होता; प्रसन्न हो प्रसन्नाकार (क्रिया) तेरे लिये करता।”

“किन्तु, भन्ते! कहाँ से मैं जयसेन राजा नागवनिक (=हाथी के जंगल के रक्षक) को संबोधित करे—‘आओ, सौम्य नागविनक! राजकीय नाग पर आरूढ हो, नागवन में प्रवेश कर, नागराज के गले में बंधन डाल दो।’ ‘अच्छा, देव!’—(कह) अग्निवेाश! नागवनिक ॰ राजा को उत्तर दे; राजकीय नाग पर आरूढ हो नागवन में प्रवेश कर, जंगली नाम (=हाथी) को देख उसे राजकीय नाग के गले में बाँध दे। फिर उसे राजकीय नाग खुली जगह में ले आये। अब अग्निवेश! आरण्यक नाग खुली जगह में चला जाये। अग्निवेश! आरण्यक नाग को नागवन प्रिय (=गेधावहि) होता है। तब नागवनिक…राजा से जाकर कहे—‘देव! आपका नाग खुली जगह में (लाया गया) है’। तब…॰ राजा हस्ति-दमक (=हाथी को सिखलाने वाले) को संबोधित करें—‘आओ, तुम सौम्य! हस्ति-दमक! आरण्यक नाग के जंगली आदतों ॰। जंगली स्वर-संकल्पों ॰, जंगली दरथ=किलमय (=उत्पीडा) ॰ परिदाहां ॰ को हटाने के लिये, गाँव में अभिरमण करने के लिये, मनुष्यों को पसन्द होने वाली आदतों को बताने के लिये, शिक्षा दो।’ ‘अच्छा, देव!’ (कह) ॰ राजा को उत्तर दे, वह हस्ति-दमक भूमि में महास्तम्भ को गाड कर, उससे आरण्यक नाग के गले को बाँध दें। और जंगली आदतो ॰, ॰, मनुष्यों को पसन्द आदतों को बतलाने के लिये; उसे वह हस्ति-दमक, कोमल कर्ण-प्रिय, पे्र्रमणीय=हृदयंगम, पौरी, बहुजन-कान्त=बहुजनमनाप (=॰ प्रिय) वाणी का प्रयोग करे। जब अग्निवेश! आरण्यक नाग, हस्ति-दमक के वैसे वचनों से समुदाचरित (=प्रेरित) हो (उसे) सुनना चाहे, उधर कान लगाये, चित्त को अन्यत्र से (हटा) वहाँ स्थापित करें; तब हस्तिदमक उसे आगे तृण-भोजन-जल प्रदान करें। जब, अग्निवेश! आरण्यक नाग हस्ति-दमक के तृण-घास-जल को ग्रहण करने लगे; तब हस्ति-दमक को ऐसा हो—‘अब आरण्यक नाग जियेगा’। जब हस्ति-दमक उससे आगे के करण (=शिक्षा) को कराये—‘पकडो हो’, ‘छोडो हो’। जब, अग्निवेश! नागराज, पकडने, छोडने में हस्ति-दमक की बात का करने वाला होवें, शिक्षा को आचरण करने वाला होवे; तब उसे हस्ति-दमक आगे का करण कराये—‘चहो हो’, ‘लौटो हो’। ॰; तब ॰ आगे का करण कराये—‘उठो हो’, ‘बैठो हो’। ॰; तब आगे का आनेंज नामक करण कराये—उसके सूँड़ में बडी ढाल (=फलक) बाँधे; भला (=तोमर) हाथ में लिये पुरूष उसकी गर्दन पर बैठा रहे। चारों ओर भी तोमर हाथ में लिये पुरूष घेर कर खडे हो। हस्ति-दमक लम्बी तोमर-यष्टि को (हाथ में) लिये सामने खडा रहे। वह आनेंज-करण को करावे न अगले पैर के पास जो, न पिछले पैर ॰, न शरीर के अगले भाग को ॰, न शरीर के पिछले भाग को ॰, न शिर को ॰, न कर्ण को ॰, न दाँत को ॰, न पूँछ को ॰, न सूँड को ॰। (तब) वह राजा का नाग शक्ति (=शस्त्र) के प्रहारों का, तलवार की चोटों का, इषु-प्रहारों का, शर-पत्र-प्रहारों का सहने वाला होये। भेरी-पणव-वंश-शंख-डिंडिम के कोलाहल का सहने वाला हो। सारी कुटिलता, और दोषांे से रहित, कषाय से मुक्त हो वह राजार्ह=राजाभोग्य, राजा का अंग ही कहा जायेगा।

“इसी प्रकार, अग्निवेश! यहाँ लोक में तथागत ॰ घर से बेघर हो प्रब्रजित होता है। अग्निवेश! इतने से आर्यश्रावक (आरण्यक नाग की भाँति) खुली जगह में प्राप्त होता है।…देव मनुष्य इन पाँच काम-गुणों में आसक्त होते है। तब उसे तथागत विनयन (=शिक्षण, ले जाना) कहते हैं—आ तू भिक्षु! शीलवान् बन। प्रातिमोक्ष सवर से संवृत (=रक्षित) हो विहर। आचार-गोचर से युक्त हो, अणु मात्र पाप (=वद्य) में भी भयदर्शी हो, स्वीकृत कर शिक्षापदों (=भिक्षु नियमों) का अभ्यास कर। जब अग्निवेश! आर्यश्रावक शीलवान् होता है, प्रातिमोक्ष संवर से संवृत हो विहरता है। आचार-गोचर से युक्त ॰ शिक्षापदों का अभ्यास करता है। तब उसे तथागत आगे को विनयन करते हैं—आ, तू भिक्षु! इन्द्रियों में गुप्तद्वार (=सयम-युक्त) बन — आँख से रूप को देखकर ॰ वह हटा, प्रज्ञा को दुर्बल करने वाले चित्त के उपक्लेश (=कालुष्य) इन पाँच नीवरणों को ॰ काया में कायानुपश्यी हो विहरता है। ॰ वेदनाओं में वेदनानुपश्याी ॰। ॰ चित्त में चित्तानुपश्यी ॰। ॰ धर्म में धर्मानुपश्यी ॰। जिस प्रकार, अग्निवेश! हस्ति-दम महास्तम्भ को पृथिवी में गाडकर, आरण्यक नाग के गले में बाँधता हैं, और जंगली आदतो ॰, मनुष्यों को पसन्द आदतों को बतलाने के लिये; ऐसे ही; अन्निवेश! आर्यश्रावक के लिये यह चार स्मृति-प्रस्थान, चित्त के बंधन होते हैं; गेह में बँधें शीलों के हटाने के लिये, ॰ स्वरसंकल्पों के ॰, ॰ दरथ-क्लमथ ॰, न्याय (=निर्वाण) की प्राप्ति के लिये निर्वाण के साक्षात्कार के लिये। तब उसे तथागत आगे को विनयन करते हैं—आ तू भिक्षु! काया में कायानुपश्यी हो विहर, और मत काम-सम्बन्धी वितर्को का वितर्कन कर। वेदनाओं में ॰। चित्त में ॰। धर्म में धर्मानुपश्यी हो विहर; और मत काम सम्बन्धी वितर्को का वितर्कन कर। वह वितर्क और विचार के शान्त होने पर ॰ द्वितीय ध्यान ॰। ॰ तृतीय ध्यान ॰। ॰ चतुर्थ ध्यान ॰। वह इस प्रकार चित्त के एकाग्र ॰ पूर्व जन्मों की स्मृति के ज्ञान के लिये चित्त को झुकाता है ॰। ॰ प्राणियों के च्युति और उत्पत्ति के ज्ञान के लिये ॰ स्वर्गलोक को प्राप्त हुये है। ॰ आस्रवों के क्षय के ज्ञान के लिये ॰ अब यहाँ (करने) के लिये कुछ (शेष) नहीं है’—इसे जानता है। अग्निवेश! वह भिक्षु शीत-उष्ण, भूख-प्यास के प्रतिघात, दंश-मशक-वायु-आतप-सरीसृपों को स्पर्श, दुरूक्त, दुरागत वचनों का सहने वाला उत्पन्न दुःख, तीव्र, खर, कटुक, असात=अमनाप (=अप्रिय), प्राणहर वेदनाओं को अधिवासन (=सहर्ष स्वीकार) करने वाला होता है। सारे राग-द्वेष-मोह (रूपी) कषाय से विरहित=निम्रिम हो, (वह) आहुणेय=पाहुणेय, दक्षिणेय, अंजलिकरणीय, लोक के लिये पुण्य (बोने) का अनुपम क्षेत्र होता है।

“अग्निवेश! राजकीय नाग चाहे वृद्ध भी हो, (किन्तु) यदि वह अ-दान्त=अ-विनीत मरता है; तो कहा जाता है,—‘राजकीय नाग वृद्ध अदान्त=अविनीत ही मरा’। ॰ मध्यम-वयस्क भी ॰। ॰ अल्पवयस्क भी ॰। इसी प्रकार, अग्निवेश! यदि स्थविर भिक्षु भी, क्षीणावस्रव (=अर्हत्) हुये बिना मरता है; तो कहा जाता है—स्थविर भिक्षु ने अदान्त हो मरण पाया।॰ मध्यम वयस्क भिक्षु भी ॰। ॰ नया भिक्षु भी ॰। अग्निवेश! यदि राजा का नाग वृद्ध भी, दान्त=विनीत हो मरता है; तो कहा जाता हे—‘राजा का नाग वृद्ध भी दान्त=विनीत मरा है। ॰ मध्यम वयस्क ॰। ॰ अल्प वयस्क ॰। इसी प्रकार अग्निवेश! स्थवितर भिक्षु भी यदि क्षीणास्रव (=अर्हत्) हो मरता है; तो कहा जाता है—स्थविर भिक्षु ने दान्त हो मरण पाया। ॰ मध्यम-वयस्क भिक्षु भी ॰। ॰ नया भिक्षु भी ॰।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो अचिरवत श्रमणोद्देश ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Måtte alle vesener være lykkelige