MN 131
Bhaddekaratta sutta: भद्देकरत्त-सुत्तन्त
Bhaddekarattasutta
Vibhaṅgavagga
Oversettelser
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवतन मे विहार करते थे।
वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को सम्बोधित किया—“भिक्षुओ!”
“भदन्त!”— (कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ!! तुम्हें भद्देकरत्त (=अकेले अच्छे में अनुरक्त) के उद्देश (=नाम-कथन), और विभंग (=विभाग) को उपदेशता हूँ; उसे सुनों, अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।”
“अच्छा, भन्ते!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।
भगवान् ने यह कहा—
“अतीत का अनुगमन न करे, न भविष्य की चिन्ता में पड़े।
जो अतीत है, वह तो नष्ट हो गया, और भविष्य अभी आ नहीं पाया।(1)।।
वर्तमान जो धर्म (=बात है), (उसी को) तहाँ तहाँ देखे।
जो असंहारी, असंकोषी हैं, उसे विद्वान् बढावे।।(2)।।
आज ही कर्तव्य में जुडना चाहिये, कौन जानता है, कल मरण हो।
महासेन मृत्यु से युद्ध करते हमारा (कोई निश्चय) नहीं है।।(3)।।
रात दिन निरालस, उद्योगी हो इस प्रकार विहरने वाले को ही,
शान्त मुनि (जन) भद्रैक-रक्त कहते है।।(4)।।
‘कैसे भिक्षुओ! भविष्य (=अनागत) की चिन्ता नहीं करता?—‘भविष्य में इस प्रकार के रूप वाला होऊँगा’—(सोच) उसमें नन्दी करता है। ‘॰ वेदना ॰। ‘॰ संज्ञा ॰। ‘॰ संस्कार ॰। ‘॰. विज्ञान ॰ ! इस प्रकार भिक्षुओ! अनागत की चिन्ता नहीं करता।
“कैसे भिक्षुओ! प्रत्युत्पन्न (=वर्तमान, विद्यमान) धर्मों में आसक्त होता है?—यहाँ, भिक्षुओं! आर्यों के दर्शन से वंचित ॰ अश्रुतवान्, पृथग्जन (=अनाडी), रूप (=डंजजमत) को आत्मा के तौर पर या आत्का को रूपवान् (=डंजजमतपंस), आत्मा में रूप को या रूप में आत्मा को देखता (=समझता) है। वेदना ॰। संज्ञा ॰। संस्कार ॰। ॰ विज्ञान को आत्मा के तौर पर, ॰ इस प्रकार भिक्षुओं! प्रत्युत्पन्न धर्मो में आसक्त होता है (=संहिरति)। कैसे, भिक्षुओ! प्रत्युत्पन्न धर्मो में नही आसक्ति होता?—यहाँ भिक्षुओ! आर्यों के दर्शन को प्राप्त ॰ बहुश्रुत आर्य-श्रावक, रूप को आत्मा के तौर पर, या आत्मा को रूपवान्, आत्मा में रूप को, या रूप में आत्मा को नहीं देखता। वेदना ॰। संज्ञा ॰। संस्कार ॰। ॰। विज्ञान को आत्मा के तौर पर, या आत्मा को विज्ञानवान्; आत्मा में विज्ञान को, या रूप में विज्ञान को नहीं देखता। इस प्रकार, भिक्षुओं! प्रत्युत्पन्न धर्मों में नहीं आसक्त होता—
“अतीत का अनुगमन न करे ॰2
शान्त, मुनि (जन) भद्रैक रक्त कहते हैं।
“भिक्षुओ! जो मैंने कहा—‘भिक्षुओ! तुम्हें ॰ भद्देकरत्त के उद्देश और विभंग को उपदेशता हूँ’; वह इसी के लिये कहा।”
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Måtte alle vesener være lykkelige