MN 87
Piyajātika sutta: पियजाति-सुत्तन्त
Piyajātikasutta
Rājavagga
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ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में…जेतवन में विहार करते थे।
उस समय एक गृहपति (=वैश्य) का प्रिय=मनाप एकलौता-पुत्र मर गया था। उसके मरने से (उसे) न काम (=कर्मान्त) अच्छा लगता था, न भोजन अच्छा लगता था—“कहाँ हो (मेरे) एकलौते-पुत्रक? कहाँ हो (मेरे) एकलौते-पुत्रक?” तब वह गृहपति जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया।…अभिवादन कर एक ओर बैठे उस गृहपति से भगवान् ने कहा—-
“गृहपति! तेरी इन्द्रियाँ (=चेष्टायें) चित्त में स्थित नहीं जान पडतीं; क्या तेरी इन्द्रियों में कोई खराबी (=अन्यथात्व) तो नहीं है?”
“भन्ते! क्यों न मेरी इन्द्रियाँ अन्यथात्व को प्राप्त होंगी? भन्ते! मेरा प्रिय=मनाप एकलौता-पुत्र मर गया। उसके मरने से न काम अच्छा लगता है, न भोजन अच्छा लगता है। सो मै आदाहन (=चिता) के पास जाकर क्रंदन करता हूँ—‘कहाँ हो एकलौते-पुत्रक (=पुतवा)!”
“ऐसा ही है गृहपति! प्रिय-जातिक=प्रिय से उत्पन्न होने वाले ही हैं, गृहपति! (यह) शोक, परिदेव (=क्रंदन), दुःख=दौर्मनस्य, उपायास (=परेशानी)?”
“भन्ते! यह ऐसा क्यों होगा—‘प्रिय जातिक ॰ हैं शोक ॰ उपायास?”
वह गृहपति भगवान् के भाषण को न अभिनन्दन कर, निंदा कर आसन से उठकर चला गया।
उस समय बहुत से जुआरी (=अक्ष-धुर्त) भगवान् के अदूर में जुआ खेल रहे थे। तब वह गृहपति जहाँ वह जुआरी थे, वहाँ गया, जाकर उन जुआरियों से बोला—
“मै जी! जहाँ श्रमण गौतम है, वहाँ…जाकर…अभिवादन कर एक ओर बैठे मुझे श्रमण गौतम ने कहा—‘गृहपति! तेरी इन्द्रियाँ (=चेष्टायें) अपने चित्त में स्थित-सी नहीं हैं ॰ प्रिय जातिक ॰ शोक ॰ हैं’। प्रियजातिक=प्रिय से उत्पन्न तो, आनन्द=सौमनस्य हैं। तब मैं श्रमण गौतम के भाषण को न अभिनन्दन कर ॰ चला गया।”
“यह ऐसा ही है गृहपति! प्रिय-जातिक=प्रिय-उत्पन्न तो हैं गृहपति! आनन्द=सौमनस्य।”
तब वह गृहपति ‘जुआरी भी मुझसे सहमत है’ (सोच) चला गया। यह कथावस्तु (=चर्चा) क्रमशः राज-अन्तःपुर में चली गई। तब राजा प्रसेनजित् कोसल ने मल्लिका देवी को आमंत्रित किया—
“मल्लिका! तेरे श्रमण गौतम ने यह भाषण किया है—‘प्रिय-जातिक=प्रिय-उत्पन्न हैं शोक ॰ उपायास’।”
“यदि महाराज! भगवान् ने ऐसा भाषण किया है, तो यह ऐसा ही है।”
“ऐसा ही है मल्लिका! जो जो श्रमण गौतम भाषण करता है, उस उसको ही तू अनुमोदन करती है—‘यदि महाराज! भगवान् ने ॰’। जैसे कि आचार्य जो जो अन्तेवासी को कहता है, उस उसको ही उसका अन्तेवासी अनुमोदन करता है—‘यह ऐसा ही है आचार्य! ॰ आचार्य!’ ऐसे ही तू मल्लिका! जो जो श्रमण ॰। चल परे हट मल्लिका!”
तब मल्लिका देवी ने नाली-जंघ ब्राह्मण को आमंत्रित किया—
“आओ तुम ब्राह्मण! जहाँ भगवान् हैं, वहाँ जाओ। जाकर मेरे वचन से भगवान् के चरणों में शिर से वन्दना करना;…(कुशलक्षेम) पूछना—‘भन्ते! मल्लिकादेवी भगवान् के चरणो में शिर से वन्दना करती है;—(=कुशलक्षेम) पूछती है।’ और यह भी कहना—‘क्या भन्ते! भगवान् ने यह वचन कहा ळे—‘प्रिय जाति ॰ हैं, शोक ॰ उपायास’। भगवान् जैसा तुम्हे उत्तर दें, उसे अच्छी तरह सीख कर, मुझे आकर कहना; तथागत व्यर्थ नहीं बोलते।”
‘अच्छा भवती!”…नाली-जंघ ब्राह्मण…जहाँ भगवान् थे, वहाँ…जाकर, भगवान् के साथ संमोदन कर, एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे नाली-जंघ ब्राह्मण ने भगवान् से कहा”
“हे गौतम! मल्लिका देवी! आप गौतम के चरणों में शिर से वन्दना करती है ॰। और यह पूछती है—क्या भन्ते! भगवान् ने यह वचन कहा है—‘प्रिय जातिक ॰ हैं, शोक ॰ उपायास’?”
“यह ऐसा ही है ब्राह्मण! ऐसा ही है ब्राह्मण! प्रिय जातिक=प्रिय-उत्पन्न हैं ब्राह्मण! शोक ॰ उपायास। इसे इस प्रकार से भी…जानना चाहिये कि कैसे-प्रिय जातिक ॰ शोक’? पहिले समय में (=भूत पूर्व में) ब्राह्मण! इसी श्रावस्ती की एक स्त्री की माता मर गई थी; वह उसकी मृत्यु से उन्मत्त=विक्षिप्त-चित्त हो एक सडक से दूसरी सडक पर, एक चैरस्ते से दूसरे चैरस्ते पर जाकर कहती थी—‘क्या मेरी मा को देखा, क्या मेरी मा को देखा।’ इस प्रकार से भी ब्राह्मण! जानना चाहिये कि कैसे ॰। पहिले समय में ब्राह्मण! इसी श्रावस्ती में एक स्त्री का पिता मर गया था ॰। ॰ भाई मर गया था ॰। ॰ भगिनी मर गई थी ॰। पुत्र मर गया था ॰। ॰ दुहिता मर गई थी ॰।॰ स्वामी (=पति) मर गया था ॰।
“पूर्व काल में ॰ एक पुरूष की माता ॰—॰ भार्या ॰।”
“पूर्वकाल में ब्राह्मण! इसी श्रावस्ती की एक स्त्री पीहर गई। उसके भाई-बन्धु उसे उसके पति से छीनकर, दूसरे को देना चाहते थे; और वह नहीं चाहती थी। तब उस स्त्री ने पति से यह कहा—‘आर्यपुत्र! यह मेरे भाई-बन्धु मुझे तुमसे छीनकर दूसरे को देना चाहते हैं, और मैं नहीं चाहती।- तब उस पुरूष ने—‘दोनों मरकर इकट्ठा उत्पन्न होंगे (सोच) उस स्त्री को दो टुकडे कर, अपने को भी मार डाला। इस प्रकार से भी ब्राह्मण! जानना चाहिये।”
तब नालि-जंघ ब्राह्मण भगवान् के भाषण को अभिनन्दन कर, अनुमोदन कर आसन से उठ कर जहाँ मल्लिकादेवी थी, वहाँ गया। जाकर भगवान् के साथ जो कथा-संलाप हुआ था, वह सब मल्लिकादेवी से कह सुनाया। तब मल्लिकादेवी जहाँ राजा प्रसेनजित् था, वहाँ गई; जाकर राजा प्रसेनजित् कोसल से बोली—
“तो क्या मानते हो महाराज तुम्हें वजिरी (=वज्रिणी) कुमारी प्रिय है न?”
“हाँ, मल्लिका! वजिरी कुमारी मुझे प्रिय है।”
“तो क्या मानते हो, महाराज! यदि तुम्हारी वजिरी कुमारी को कोई विपरिणाम (=संकट) या अन्यथात्व होवे, तो क्या तुम्हें शोक ॰ उपायास उत्पन्न होंगे?
“मल्लिका! वजिरी कुमारी के विपरिणाम-अन्यथात्व से मेरे जीवन का भी अन्यथात्व हो सकता है, ‘शोक ॰ उत्पन्न होगा’ की तो बात ही क्या?”
“महाराज! उन भगवान् जाननहार, देखनहार अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध ने यही सोचकर कहा है—‘प्रिय-जातिक ॰।’ तो क्या मानते हो महाराज! वासम क्षत्रिया तुम्हें प्रिय है न?”
“हाँ, मल्लिका! वासम-क्षत्रिया मुझे प्रिय है।”
“तो क्या मानते हो महाराज! वासम क्षत्रिया को कोइ्र विपरिणाम=अन्यथात्व हो, तो क्या तुम्हें शोक ॰ उत्पन्न होंगे?”
“मल्लिका! ॰ जीवन का भी अन्यथात्व हो सकता है ॰।”
“महाराज! ॰ यही सोच कर ॰ कहा है ॰। तो क्या मानते हो महाराज! विडूडम सेनापति तुम्हें प्रिय है न?” ॰। ॰।
“॰ । तो क्या मानते हो महाराज! मैं तुम्हें प्रिय हूँ न?”
“हाँ मल्लिके! तू मुझे प्रिय है।”
“तो क्या मानते हो, महाराज! मुझे कोई विपरिणाम, अन्यथात्व हो, तो क्या तुम्हे शोक ॰ उत्पन्न होंगे?”
“मल्लिका! ॰ जीवन का भी अन्यथात्व हो सकता है ॰।”
“महाराज! ॰ यही सोचकर कहा है ॰। तो क्या मानते हो, महाराज! काशी और कोसल (के निवासी) तुम्हें प्रिय हैं न?”
“हाँ मल्लिके! काशी-कोसल में प्रिय है। काशी-कोसलों के अनुभाव (=बरक्कत) से ही तो हम…काशिकचन्दन को भोगते हैं, माला, गंध, विलेपन (=उबटन) धारण करते हैं।”
तो ॰ महाराज! काशी-कोसलों के विपरिणाम=अन्यथात्व (=संकट) से, क्या तुम्हे शोक ॰ उत्पन्न होंगे?”
‘॰ जीवन का भी अन्यथात्व हो सकता ॰ हैं?”
“महाराज! उन भगवान् ॰ ने यही सोचकर कहा है—‘प्रिय-जातिक=प्रिय से उत्पन्न हैं, शोक ॰।”
“आश्चर्य! मल्लिके!! आश्चर्य! मल्लिके!! कैसे वह भगवान् हैं!!! मानेां प्रज्ञा से बेधकर देखते है। आओ, मल्लिके! हम दोनों…।”
तब राजा प्रसेनजित् कोसल ने आसन से उठक्र, उत्तरासंग (=चद्दर) को एक (बायें) कंधे पर रख, जिधर भगवान् थे, उधर अंजली जोड़ तीन बार उदान कहा—
“उन भगवान्, अर्हत्, सम्यक् संबुद्ध को नमस्कार है; उन भगवान् अर्हत् सम्यक् सम्बुद्ध नमस्कार है; उन भगवान् अर्हत्, सम्यक् संबुद्ध को नमस्कार है।”
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Måtte alle vesener være lykkelige