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MN 117

Mahācattārīsaka sutta: महा-चत्तारीसक-सुत्तन्त

Mahācattārīsakasutta

Anupadavagga

Tłumaczenia

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

तब भगवान् ने भिक्षुओं को सम्बोधित किया—“भिक्षुओ!”

“भदन्त!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

“भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ! उपनिषद् (=रहस्य) और परिष्कार (=सहायक सामग्री) सहित तुम्हे आर्य सम्यक् समाधि को उपदेशता हूँ, उसे सुनो, अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।”

“अच्छा, भन्ते!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ! क्या है उपनिषद्-परिष्कार-सहित आर्य सम्यक्-समाधि?—जैसे कि सम्यक्-दृष्टि (=ठीक धारणा), सम्यक्-संकल्प, सम्यक्वाक्, सम्यक्-कर्मान्त, सम्यग्-आजीव, सम्यग्-व्यायाम, सम्यक्-स्मृति। भिक्षुओं! इन सात अंगो (=बातों) से चित्त की एकाग्रता परिष्कृत होती है। भिक्षुओं! यह उपनिषद्-सहित अथवा परिष्कार-सहित आर्य सम्यक् समाधि कही जाती है। यहाँ, भिक्षुओ! सम्यग्-दृष्टि पूर्वगामी होती है। किस प्रकार भिक्षुओ! सम्यग्-दृष्टि पूर्वगामी होती है, मिथ्या दृष्टि को—‘मिथ्या दृष्टि हैं’—जानता है? सम्यग्-दृष्टि को—‘सम्यग्-दृष्टि है’—जानता है। यह उसकी सम्यग्-दृष्टि है। क्या है, भिक्षुओ! मिथ्यादृष्टि (=छूठी धारणा)?—‘दान कुछ नहीं ॰ स्यं जानकर ॰ जतलायेंगे’—यह भिक्षुओ! मिथ्या दृष्टि है। क्या है भिक्षुओं! सम्यग्-दृष्टि?—भिक्षुओं! मैं सम्यग् दृष्टि दो प्रकार की कहता हूँ। भिक्षुओं! (एक) सम्यग् दृष्टि आस्रव (=समल), उपाधि नामक विपाक को देने वाली पुण्यभागी है। भिक्षुओं! (एक) सम्यग्-दृष्टि आर्य, अनास्रव (=मल रहित) लोकोत्तर (=अलौकिक) मार्ग का अंग है। भिक्षुओ! क्या है ॰ अनास्रव सम्यग्-दृष्टि?—‘दान है ॰ स्वयं जानकर ॰ जतलायेंगे’…। क्या है, भिक्षुओं! ॰ अनास्रव आर्य सम्यग्-दृष्टि!—भिक्षुओ! जो वह आर्य मार्ग सम्बद्ध आर्य-चित्त=अनास्रव-चित्त के आर्य मार्ग की भावना (=अभ्यास) करते प्रज्ञा, प्रज्ञा-इन्द्रिय, प्रज्ञाबल, धर्म विचय, संबोधि-अंग, सम्यग्-दृष्टि मार्ग का अंग है…। जो वह मिथ्या दृष्टि के छोडने के लिये प्रयत्न करता है, और सम्यग्-दृष्टि की प्राप्ति के लिये; यह सम्यग्-व्यायाम (=ठीक उद्योग) है। जो यह स्मृतिपूर्वक मिथ्यादृष्टि को छोडता है, स्मृति पूर्वक सम्यग्-दृष्टि को ग्रहण कर विहरता है; सो यह सम्यग्-स्मृति है। इस प्रकार यह तीन धर्म (=बाते) जैसे कि—सम्यग्-दृष्टि, सम्यग्-व्यायाम, सम्यक्-स्मृति, सम्यग्-दृष्टि का अनुगमन करते=अनु-परिवर्तन करते है; उनमें, भिक्षुओ! सम्यग्-दृष्टि पूर्वगामी होती है।

“कैसे भिक्षुओं! सम्यग्-दृष्टि पूर्वगामी होती है? — मिथ्या-संकल्प को ‘मिथ्या-संकल्प है’ — जानता है। सम्यक्-संकल्प को ‘सम्यक्-संकल्प है’ — जानता है; उसकी सम्यग्-दृष्टि होती है। क्या है, भिक्षुओं! मिथ्या-संकल्प? काम (=विषय का) संकल्प, व्यापाद (=द्वेष) संकल्पव, विहिंसा (=हिंसा) संकल्प — यह, भिक्षुआं! मिथ्या-संकल्प है। क्या है, भिक्षुओं! सम्यक्-संकल्प? — भिक्षुओं मैं सम्यक्-संकल्प को दो प्रकार का बतलाता हूँ — (1) भिक्षुओं! सम्यक-संकल्प सास्रव, ॰ पुण्य भागीय है; (2) भिक्षुओं! सम्यक्-संकल्प आर्य, अनास्रव, लोकोत्तर मार्ग का अंग है। भिक्षुओं! क्या है, ॰ सास्रव सम्यक्-संकल्प? नैष्काम्य (=निष्कामता)-संकल्प, अ-व्यापासद-संकल्प, अ-हिंसा-संकल्प — यह, भिक्षुओं! ॰ सास्रव सम्यक्-संकल्प है। क्या है, भिक्षुओं ॰ अनास्रव सम्यक्-संकल्प? भिक्षुआं! जो आर्यमार्ग-संबद्ध, आर्य-चित्त=अनास्रव-चित्त के आर्य-मार्ग की भावना करते, तर्क वितर्क, संकल्प, अर्पणा, व्यर्पणा (=तन्मयता), चित्त का अभि-निरोपण, वाचिक संस्कार — यह है, भिक्षुओं! ॰ अनास्रव सम्यक्-संकल्प। जो मिथ्या संकल्प के प्रहाण (=नाश) और सम्यक्-संकल्प की प्राप्ति के लिये, व्यायाम (=उद्योग) करता है; यह सम्यग्-व्यायाम है। वह जो स्मृति पूर्वक मिथ्या-संकल्प को छोडता है, और स्मृति-पूर्वक सम्यक्-संकल्प को ग्रहण कर विहरता है,—यह सम्यक्-स्मृति है। इस प्रकार यह तीन धर्म, जैसे कि — सम्यग्-दृष्टि, सम्यग-व्यायाम, सम्यक्-स्मृति — सम्यग्-संकल्प का अनुगमन=अनु-परिवर्तन करते है। वहाँ, भिक्षुआं! सम्यग् दृष्टि-पूर्वगामी है।

“कैसे भिक्षुओ! सम्यग्-दृष्टि पूर्वगामी होती है? — मिथ्या-वचन को ‘मिथ्यावचन’ — जानता है; सम्यग् (=सत्य) वचन को ‘सम्यग्-वचन’ — जानता है — सो यह होती है, उसकी सम्यग्-दृष्टि। क्या है, भिक्षुओं! मिथ्यावचन? — मृषावाद (=झूठ), चुगली, कटुवचन, बकवाद — यह है, भिक्षुओं! मिथ्यावचन। क्या है, भिक्षुओं! सम्यग्-वचन? — भिक्षुओं! सम्यग्-वचन को मैं दो प्रकार का बतलाता हूँ — (1) सम्यग्-वचन, सास्रव, विपक् उपधि से पुण्यभागीय होता है; (2) सम्यग्-वचन, आर्य=अनास्रव, लोकोत्तर-मार्ग का अंग है। क्या है भिक्षुओं! ॰ सास्रव सम्यग्-वचन? — झूठ, चुगली, कटुवचन, बकवाद से वितर होना—यह है, भिक्षुओं! ॰ सास्रव सम्यग् वचन। क्या है, भिक्षुओ! अनास्रव सम्यग्-वचन? — भिक्षुओं! जो आर्यमार्ग-संबंद्ध आर्य-चित्त=अनास्रव चित्त के आर्य-मार्ग की भावना करते, चार वाचिक दुष्कर्मो (=झूठ, चुगली, कटुवचन, बकवाद) से अ-रति, वि-रति=प्रति-वि-रति=विरमण — यह है, भिक्षुओं! ॰ अनास्रव सम्यग्-वचन। वह जो मिथ्या-वचन के प्रहाण, और सम्यग्-वचन की प्राप्ति के लिये व्यायाम करता है; यह सम्यगृ व्यायाम है। वह जो स्मृति-पूर्वक मिथ्या-वचन को छोडता है; और स्मृति पूर्वक सम्यग्-वचन को ग्रहण कर विहरता है; यह सम्यक्-स्मृति है। इस प्रकार यह तीन धर्म ॰।

“कैसे, भिक्षुओं! सम्यग्-दृष्टि पूर्वगामी होती है? — मिथ्याकर्मान्त (=अनुचित कर्म) को ‘मिथ्या कर्मान्त है’ — जानता है। सम्यक्-कर्मान्त को ‘सम्यक् कर्मान्त है’ — जानता है; सो यह होती है, उसकी सम्यग्-दृष्टि। क्या है, भिक्षुओ! मिथ्याकर्मान्त? — हिंस, चोरी, व्यभिचार — यह है, भिक्षुओ! मिथ्याकर्मान्त। क्या है, भिक्षुओं! सम्यक्-कर्मान्त? — भिक्षुओं! सम्यक्-कर्मान्त को मैं दो प्रकार का बतलाता हूँ — (1) सम्यक्-कर्मान्त सास्रव ॰; (2) सम्यग्-कर्मान्त अनास्रव ॰। क्या है, भिक्षुओ! ॰ सास्रव सम्यक्-कर्मान्त? हिंसा चोरी व्यभिचार से विरत होना — ॰। क्या है, भिक्षुओं! ॰ अनास्रव सम्यक्-कर्मान्त? — ॰ जो ॰ आर्यमार्ग की भावना करते तीन कायिक दुष्कर्मो से ॰ विरति ॰ — ॰। वह जो मिथ्या कर्मान्त के प्रहाण और सम्यक् कर्मान्त की प्राप्ति के लिये व्यायमा करता है; यह सम्यग् व्यायाम है। ॰ स्मृति-पूर्वक सम्यक् वचन को ग्रहण कर विहरता है; वह सम्यक्-स्मृति है। इस प्रकार यह तीन धर्म ॰।

“कैसे, भिक्षुओं! सम्यग् दृष्टि पूर्वगामी होती है?—यह सम्यग् आजीव को ‘सम्यग् आजीव है’ — जानता है; मिथ्या-आजीव को ‘मिथ्या-आजीव है’ — जानता है — ॰ यह ॰ सम्यग्-दृष्टि। क्या है ॰ मिथ्या-आजीवत्र-कुहना (=पाखंड द्वारा वंचना), लयना (=बात जानना), नैतित्तिकता (=दैवज्ञ का पेशा), निप्पेसिकता (=जादूगरी), लाभ से लाभ की खोज — यह है, भिक्षुओं! मिथ्या-आजीव। क्या है, ॰ सम्यग्-आजीव? — ॰ दो प्रकार का बतलाता हूँ — (1) सम्यग्-आजीव सास्रव ॰; (2) सम्यग्-आजीव अनास्रव। क्या है ॰ सास्रव सम्यग्-आजीव? — भिक्षुओं! यहाँ आर्यश्रावक मिथ्याजीव को छोड सम्यगाजीव से जीवितका करता है—यह है, भिक्षुओं! ॰ सास्रव सम्यग् आजीव। क्या है, ॰ अनास्रव सम्यगाजीव? — ॰ जो ॰ आर्यमार्ग की भावना करते, मिथ्या-आजीव से ॰ विरति॰ — ॰। ॰ मिथ्याजीव के प्रहाण और सम्यगाजीव की प्राप्ति के लिये व्यायाम करता है; यह सम्यग्-व्यायाम है। ॰ स्मृति-पूर्वक सम्यगाजीव को ग्रहण कर विहरता है, यह सम्यक्-स्मृति है। इस प्रकार यह तीन धर्म ॰।

“कैसे भिक्षुओं! सम्यग्-दृष्टि पूर्वगामी होती है?—भिक्षुओं! सम्यग्-दृष्टि उसको सम्यक्-संकलप होता है। सम्यक्-संकल्प को सम्यग् वचन ॰, सम्यग-वचन को सम्यक्-कर्मान्त ॰, सम्यक्-कर्मान्त को सम्यगाजीव ॰, सम्यगाजीव को सम्यग्-व्यायाम ॰, सम्यग्-व्यायाम को सम्यक्-स्मृति ॰, सम्यक्-स्मृति को सम्यक्-समाधि ॰, सम्यक्-समाधि को सम्यग्ज्ञान ॰, सम्यग्-ज्ञान को सम्यग्-विमुक्ति होती है। इस प्रकार, भिक्षुओं! आठ समाधि को सम्यग्ज्ञान ॰, सम्यग्-ज्ञान को सम्यग्-विमुक्ति होती है। इस प्रकार, भिक्षुओं! आठ अंगो से युक्त है, शैक्ष्य (=निर्वाण-पद का उम्मीदवार) का प्रातिपद् (=मार्ग); और दश अंगो से युक्त है अर्हत्। वहाँ, भिक्षुओं! ज्ञान से बहुत सी बुराइयाँ (=अ-कुशल धर्म) चली जाती है, (और) भावना की परिपूर्णता को प्राप्त होती हैं। यहाँ सम्यग्-दृष्टि पूर्वगामी होती है।

“कैसे, भिक्षुओं! सम्यग्-दृष्टि पूर्वगामी होती है?—भिक्षुओं! सम्यग्-दृष्टि से मिथ्यादृष्टि नष्ट (=निजीर्ण) होती है, और मिथ्यादृष्टि के कारण जो अनेक पाप, बुराइयाँ (=अकुशल-धर्म) होती हैं वह भ इसके नष्ट होते है। सम्यग्-दृष्टि के कारण अनेक भलाइयाँ (=कुशल धर्म) भावना की परिपूर्णता को प्राप्त होती है। भिक्षुओ! सम्यक्-संकल्प से मिथ्या-संकल्प नष्ट होती हैं, और मिथ्या-संकल्प के कारण जो अनेक पाप=बुराइयाँ होती है, वह भी इसके नष्ट होते है। सम्यक्-संकल्प के कारण अनेक भलाइयाँ भावना की परिपूर्णता को प्राप्त होती है। ॰ सम्यग्-वचन ॰। ॰ सम्यक्-कर्मान्त ॰। ॰ सम्यग्-आजीव ॰। ॰ सम्यग्-व्यायम ॰। ॰ सम्यक्-स्मृति ॰। ॰ सम्यक्-समाधि ॰। ॰ सम्यक्-ज्ञान ॰। ॰ सम्यग्-विमुक्ति ॰। ॰

“इस प्रकार, भिक्षुओं कुशल (=अच्छे) पक्ष के बीस, और अकुशल (=बुरे) पक्ष के बीस, (दोनो मिलकर) महा-बत्तारीसक (=महान् चव्वालीस) धर्म-पर्याय प्रचारित (=प्रवर्तित) किया गया, (जो कि) किसी श्रमण, ब्राह्मण, देव, मार, ब्रह्मा से या लोक में किसी से प्रतिवत्र्य (=मोडा) नहीं किया जा सकता। भिक्षुओं! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण इस महाचत्तारीसक-धर्म-पर्याय (=॰ धर्मोपदेश) को गर्हणीय=निंदनीय समझेगा; उसके लिये इसी समय (=दृष्ट-धर्म में) धर्मानुसारी दश वाद-अनुवाद में निन्दा का पात्र होगा—(1) यदि आप सम्यग्-दृष्अि क्ज्ञै निन्दते हैं; तो जो मिथ्या-दृष्टि श्रमण ब्राह्मण हैं, वह आपके पूज्य=प्रशंसनीय होंगे। (2) यदि आप सम्यक्-संकल्प को निन्दते हैं; तो जो मिथ्या-संकल्प श्रमण-ब्राह्मण हैं, वह आपके पूज्य-प्रशंसनीय होंगे। (3) ॰ सम्यग्-वचन ॰। (4) ॰ सम्यक्-कर्मान्त ॰। (5) ॰ सम्यग्-आजीव ॰। (6) ॰ सम्यग्-व्यायाम ॰। (7) सम्यक्-स्मृति ॰। (8) ॰ सम्यक्-समाधि ॰। (9) ॰ सम्यग्-ज्ञान ॰। (10) ॰ सम्यग् विमुक्ति ॰। भिक्षुओं! जो कोई ॰ निंदनीय समझेगा, ॰ निन्दा का पात्र होगा। जो कि उत्कल-निवासी ॰ अहेतुवाद=अ-क्रियावाद=नास्तिकवाद के मानने वाले, उत्कल(देश) निवासी वस्स (=वर्ष) और भञ्ञ (=भण्य) थे, वह भी (इस) महा-चत्तारीसक धर्म पर्याय को गर्हणीय=निंदनीय नहीं समझते। सो किस हेतु? निन्दा, रोष, उपालम्भ के भय से।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

O tym tłumaczeniu

राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Niech wszystkie istoty będą szczęśliwe