MN 90
Kaṇṇakatthala sutta: कण्णत्थलक-सुत्तन्त
Kaṇṇakatthalasutta
Rājavagga
Tłumaczenia
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् उजुका (=उजुञ्जा=उरूञ्जा) में कण्णत्थलक (=कर्ण-स्थलक) मृगदाव (मिगदाय) में विहार करते थे ।
उस समय राजा प्रसेनजित् कोसल किसी काम से उजुका (=ऋजुका) में आया हुआ था, राजा प्रसेनजित् कोसल ने एक आदमी को आमंत्रित किया—
“आओ हे पुरूष! जहाँ भगवान् हैं, वहाँ जाओ। जाकर मेरे वचन से भगवान् के चरणों में सिर से वन्दना करना। अल्पाबाधा (=आरोग्य)=अल्पांतक, लघु-उत्थान (=फुर्ती) बल, प्राशुविहार (=सुखपूर्वक विहरना) पूछना—‘भन्ते! राजा प्रसेनजित् कोसल भगवान् के चरणों में सिर से वन्दना करता है ॰। और यह भी कहना—भन्ते! आज भोजनोपरान्त, कलेऊ करने पर, राजा प्रसेनजित् कोसल भगवान् के दर्शनार्थ आयेगा’।”
“अच्छा देव!”
सोमा और सुकुला (दोनों) बहिनों ने सुना—‘आज राजा…भगवान् के दर्शनार्थ जायेगा। तब सोमा, सकुला बहिनों ने राजा प्रसेनजित् ॰ के पास, परोसने के समय जाकर कहा—
“तो महाराज! हमारे भी वचन से भगवान् के चरणों में शिर से वन्दना करना। अल्पाबाधा ॰ पूछना—॰।
तब राजा प्रसेनजित् कोसल कलेऊ करके भोजनोपरान्त जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् को अभिवादन कर…एक और बैठ भगवान् से बोला—
“भन्ते! सोमा और सकुला (दोनों) बहिनें भगवान् के चरणों को शिर से वन्दना करती हैं ॰।”
“क्या महाराज! सोमा और सकुला बहिनों को दूसरा दूत नहीं मिला?”
“भन्ते! सोमा और सकुला बहिनों ने सुना, कि आज राजा…भगवान् के दर्शनार्थ जायेगा…। आकर मुझे यह कहा…।”
“सुखिनी होवें महाराज! सोमा और सकुला (दोनों) बहिनें।”
तब राजा प्रसेनजित् कोसल ने भगवान् से यह कहा—
“भन्ते! मैंने यह सुना है, कि श्रमण गौतम ऐसा कहता है—‘ऐसा (कोई) श्रमण या ब्राह्मण नहीं है, जो सर्वज्ञ, सर्वदर्शी (हो), निःशेष ज्ञान दर्शन को जाने, यह सम्भव नहीं है।’ भन्ते! जो ऐसा कहते हैं कि श्रमण गौतम ऐसा कहते हैं—‘ऐसा (कोई) ॰।’ क्या भन्ते! वह भगवान् के बारे में सच कहते हैं? भगवान् को असत्य=अभूत से लांछन तो नहीं लगाते? धर्म के अनुसार कहते हैं, कोई धर्मानुसारी कथन (=वादानुवाद) गर्हणीय (=निंदनीय) तो नहीं होता?”
“महाराज! जो ऐसा कहते हैं कि श्रमण गौतम ने ऐसा कहा हैं—‘ऐसा (कोई) श्रमण या ब्राह्मण नहीं है, जो सर्वज्ञ=सर्वदर्शी (होगा); निःशेष ज्ञान दर्शन को जानेगा, यह सम्भव नहीं हैं।’ वह मेरे बारे में सच नहीं कहते, वे अ-सत्य=अभूत से मुझे लांछन लगाते है।”
तब राजा प्रसेनजित् ॰ ने विडूडभ सेनापति को आमंत्रित किया—
“सेनापति! आज राजान्तःपुर में किसने बात (=कथावस्तु) कही थी?”
“महाराज! आकाश-गोत्र संजय ब्राह्मण ने।”
तब राजा प्रसेनजित् ने ॰ एक पुरूष को आमंत्रित किया—
“आओ, रे पुरूष! मेरे वचन से ॰ संजय ब्राह्मण को कहो—‘भन्ते! तुम्हें राजा प्रसेनजित् बुलाते है’।”
“अच्छा देव!”
“तब राजा प्रसेनजित् ॰ ने भगवान् से कहा—
“भन्ते! शायद आपने कुछ और सोच (यह) वचन कहा हो, आदमी अन्यथा…न कहेगा।”
“तो भन्ते! जो वचन कहा उसे कैसे भगवान् जानते हैं,” “महाराज! मैं जानता हूँ—जो वचन (मैनें) कहा।”
“महाराज! मैंने जो वचन कहा उसे इस प्रकार जानता हूँ—‘ऐसा श्रमण ब्राह्मण नहीं, जो एक ही बार (=सकृद् एव) सब जानेगा=सब देखेगा, यह सम्भव नहीं’।”
“भन्ते! भगवान् ने हेतु-रूप कहा; सहेतु-रूप भन्ते! भगवान् ने कहा—‘ऐसा श्रमण ब्राह्मण नहीं जो एक ही बार सब जानेगा=सब देखेगा, यह सम्भव नहीं।’ भन्ते! यह चार वर्ण हैं—क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र। भन्ते! इन चारों वर्णो में है कोई विभेद, है कोई नाना-करण?”
“महाराज! ॰ इन चार वर्णो में अभिवादन, प्रत्युत्थान, हाथ जोड़ने (=अंजलि-कर्म)=सामीचि-कर्म में दो वर्ण अग्र (=श्रेष्ठ) कहे जाते हैं—क्षत्रिय और ब्राह्मण।”
“भन्ते! मैं भगवान् से इस जन्म के सब धर्म को नहीं पूछता, मैं…परलोक के सम्बन्ध (=सांपरायिक) में पूछता हूँ…।”
“महाराज! यह पाँच प्रधानीय अंग है। कौन से पाँच? महाराज! भिक्षु (1) श्रद्धालु होता है। तथागत की बोधि (=बुद्ध-ज्ञान) पर श्रद्धा करता—‘ऐसे वह भगवान् अर्हत् …।’ (2) अल्पाबाध (=अरोग)… होता है । (3) शठ=मायावी नहीं होता है … (4) … आरब्ध-वीर्य (=उद्योगशील) हाता है । (5) प्रज्ञावान् होता है …। महाराज! यह पाँच प्रधानीय अंग है। महाराज! चार वर्ण — ब्राह्मण … शुद्र है। यह यदि पाँच प्रधानीय-अंगो से युक्त हो, तो वह उनके दीर्घ-रात्र (=चिरकाल) तक हित, सुख के लिये होगा।”
“भन्ते! चार वर्ण … हैं । और यदि वे प्रधानीय-अंगो से युक्त हों । तो भन्ते! क्या उन में भेद-नानाकरण नहीं होगा?”
“महाराज उनका प्रधान, नानात्व (=भेद) नहीं करता । जैसेकि महाराज ! दो दमनीय हाथी; दमनीय घोड़े,=बैल, सु-दान्त=सु-विनीत (अच्छी प्रकार सिखलाए) हों, दो दमनीय हाथी,…घोड़े,…बैल अ-दान्त अ-विनीत (बिना सिखलाए) हों तो महाराज ! जो वे … सु-दान्त, सु-विनीत हैं, क्या वे दान्त होने से दान्त-पद को पाते हैं=दान्त होने से दान्त-भूमि को प्राप्त होते हैं ?”
“हां भन्ते!”
“और जो महाराज ! अ-दांत, अविनीत हैं, क्या वे अ-दांत (बिना सिखाए)…ही,दान्त-पद को पाते हैं, अदान्त हो दान्तभूमि को प्राप्त हो सकते हैं? जैसे कि वे दो…सुदान्त=सुविनीत ?”
“नहीं, भन्ते!”
“ऐसे ही महाराज ! जोकि श्रद्धालु, निरोग, अशठ=अमायावी, आरभ-वीर्य, प्रज्ञावान द्वारा प्राप्य (वस्तु) है, उसे अ-श्रद्ध, बहुरोगी, शठ=मायावी, आलसी, दुष्प्रज्ञ पाएगा, यह सम्भव नहीं है ।”
“भन्ते ! भगवान से हेतु-रूप (=ठीक) कहा… भंते! चारों वर्ण क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र हैं, और वे यदि इन प्रधानीय अंगों से युक्त हों — =सम्यक प्रधान वाले हूों। तो भन्ते! क्या उनमें (कुछ) भेद नहीं होगा = कुख नानाकरण नहीं होगा?”
“महाराज ! मैं उन में कुछ भी ‘यह जो की विमुक्ति का विमुक्ति से भेद (नानाकरण) है’ नहीं कहता । जैसे महाराज ! (एक) पुरुष सूखे शाक की लकड़ी को लेकर अग्नि तैयार करे, तेज प्रादुर्भूत करे, और दूसरा पुरुष सूखे शाल (=साखू)-काष्ठ से तैयार करे; और दूसरा पुरुष आम के काष्ठ से…; और दूसरा पुरुष सूखे गूलर-काष्ठ से; तो क्या मानते हो महाराज ! क्या उन नाना काष्ठों से बनाई आगों का, लौ से लौ का, रंग से रंग का, आभा से आभा का कोई भेद होगा?”
“नहीं, भनते !”
“ऐसे ही महाराज ! जिस तेज (=मुक्ति) को वीर्य (=उद्योग) तैयार करता है । उस में, इस विमुक्ति से दूसरी विमुक्ति में कुछ भी भेद मैं नहीं कहता हूं ।”
“भन्ते! भगवान ने हेतुरूप (=ठीक) कहा …। क्या भनते! देव(=देवता) हैं?”
“महाराज ! तू क्या ऐसा कह रहा है — ‘भन्ते! क्या देव हैं’?”
“कि भन्ते! क्या देवता मनुष्य लोक में आने वाले होते हैं, या मनुष्य लोग में आने वाले नहीं होते ?”
“महाराज ! जो वे देवता दुख-सहित हैं वे मनुष्य लोक (इत्थत्त) में आने वाले होते हैं, जो लोभ-रहित हैं, वे … नहीं आने वाले होते हैं”
ऐसा कहने पर वीडूडभ सेनापति ने भगवान से कहा —
“भंते! जो वे देवता लोभ-रहित मनुष्य लोक में न आने वाले हैं, क्या वे देवता अपने स्थान से च्युत होंगे=प्रव्रजित होंगे?”
तब आयुष्मान आनन्द को यह हुआ — “यह विडूडभ सेनापति कोसलराज पसेनदी का पुत्र है, मैं भगवान् का पुत्र हूं; यह समय है, जब पुत्र को, पुत्र आमन्त्रित करे ।” तब आयुष्मान आनन्द ने विडूडभ सेनापति को आमन्त्रित किया —
“तो सेनापति! तुम्हें ही पूछता हूँ, जैसा तुम्हें ठीक जँचे वैसा कहो। तो सेनापति! जितना राजा प्रसेनजित् कोसल का राज्य (=विजित) है, जहाँ पर कि राजा प्रसेनजित् ॰ ऐश्वर्य=आधिपतय करता है; राजा प्रसेनजित् ॰ श्रमण या ब्राह्मण को; पुण्यवान् या अपुण्यवान् को, ब्रह्मचर्यवान् या अब्रह्मचर्यवान् को, क्या उस स्थान से हटा या निकाल सकता है?”
“॰ सकता हूँ।”
“तो क्या मानते हो सेनापति! जितना राजा प्रसेनजित् ॰ का अ-विजित (=राज्य से बाहर) है, जहाँ ॰ आधिपत्य नहीं करता है, ॰ क्या उस स्थान से हटा या निकाल सकता है?”
“॰ नहीं सकता।”
“तो क्या मानते हो सेनापति! क्या तुमने त्रयस्त्रिंश देवों को सुना है?”
“हाँ, भो! मैने त्रयंस्त्रिश देव सुने हैं, आप राजा-प्रसेनजित् कोसल ने भी त्रयंस्त्रिश देव सुने हैं।”
“तो क्या मानते हो सेनापति! क्या राजा-प्रसेनजित् कोसल त्रयस्ंित्रंश देवों को उस स्थान से हटा या निकाल सकता है?”
“त्रयस्त्रिंश देवों को राजा प्रसेनजित् ॰ देखने को भी नहीं पा सकता, कहाँ से उनको स्थान से हटाये या निकलेगा?”
“ऐसे ही सेनापति! जो देवता लोभ-सहित हैं, वह मनुष्य-लोक में आते हैं, जो लोभ-रहित हैं, वह ॰ नहीं आते। वह देखने को भीं नहीं पाये जा सकते, कहाँ से उस स्थान से हटाये या निकाले जायेंगे?”
तब राजा प्रसेनजित् कोसल ने भगवान् से कहा—
“भन्ते! यह कौन नामवाला भिक्षु है?”
“आनन्द नामक महाराज।”
“ओ हो! आनन्द हैं!! ओहो! आनन्द-रूप हैं!! भन्ते! आयुष्मान् आनन्द ठीक कहते हैं। भन्ते! क्या ब्रह्मा है?”
“तू क्या महाराज! ऐसे कहता है,—भन्ते! क्या ब्रह्मा है?”
“भन्ते! क्या वह ब्रह्मा मनुष्य लोक में आता है, या मनुष्य-लोक में नहीं आता?”
“महाराज! जो…ब्रह्मा लोभ-सहित हैं ॰ आता है, लोभ-रहित ॰ नहीं आता।”
तब एक पुरूष ने राजा प्रसेनजित् ॰ से कहा—
“महाराज! आकाश-गोत्र संजय ब्राह्मण आ गया।”
तब राजा प्रसेनजित् ॰ ने ॰ संजय ब्राह्मण से कहा—
“ब्राह्मण! किसने इस बात (=कथा-वस्तु) को राज-अन्तःपुर में कहा था?”
“महाराज! विडूढभ सेनापति ने।”
विडूडभ सेनापति ने कहा—“महाराज! आकाश-गोत्र संजय ब्राह्मण ने।”
तब एक पुरूष ने राजा प्रसेनजित् से कहा —
“जाने का समय है, महाराज!”
तब राजा प्रसेनजित् ॰ भगवान् से यह बोला —
“हमने भन्ते! भगवान् से सर्वज्ञता पूछी, भगवान् ने सर्वज्ञता बतलाई, वह हम को रूचती है, पसन्द है, उससे हम सन्तुष्ट हैं। चारों वर्ण की शुद्धि (=चातुर्वर्णी शुद्धि) … पूछी …। देवों के विषय में…पूछा…ब्रह्मा के विषय में…पूछा…जो-जो ही भन्ते! हमने भगवान् ते पूछा, वही-वही भगवान् ने बतलाया; और वह हम को रूचता है, पसन्द है, उससे हम सन्तुष्ट हैं । अच्छा तो भन्ते! अब हम जाएंगे, हम बहु-कृत्य हैं, बहु-करणीय हैं ।”
“जिसका महाराज! तू (इस समय) काल समझे ।”
तब राजा प्रसेनजित् … भगवा के भाषण को अभिनन्दित कर, अनुमोदित कर, आसन से उठ भगवा को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर चला गया ।
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
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