MN 93
Assalāyana sutta: अस्सलायण-सुत्तन्त
Assalāyanasutta
Brāhmaṇavagga
Tłumaczenia
ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार कर रहे थे।
उस समय नाना देशों के पाँच सौ ब्राह्मण किसी काम से श्रावस्ती में ठहरे थे। तब उन ब्राह्मणों को यह (विचार) हुआ — यह श्रमण गौतम चारों वर्णो की शुद्धि (=चातुव्वण्णी सुद्धि) का उपदेश करता है। कौन है जो श्रमण गौतम से इस विषय में वाद कर सके? उस समय श्रावस्ती में आश्वलायन नामक निघंटु-केटुभ (=कल्प)-अक्षर-प्रभेद (=शिक्षा)-सहित तीनों वेदों तथा पाँचवें इतिहास में भी पारंगत, पदक (=कवि), वैयाकरण, लोकायत महापुरूष-लक्षण (शास्त्रों) में निपुण, वपित (=मुण्डित)-शिर, तरूण माणवक (=विद्यार्थी) रहता था। तब उन ब्राह्मणों को यह हुआ — यह श्रावस्ती में आश्वलायन ॰ माणवक रहता है, यह श्रमण गौतम से इस विषय में वाद कर सकता है।
तब वह ब्राह्मण जहाँ आश्वलायन माणवक था, वहाँ गये। जाकर आश्वलायन माणवक से बोले—
“आश्वलायन! यह श्रमण गौतम चातुर्वर्णी शुद्धि उपदेश करता है। जाइये आप आश्वलायन श्रमण गौतम से इस विषयम में वाद कीजिये।”
ऐस कहने पर आश्वलायन माणवक ने उन ब्राह्मणों से कहा—
“श्रमण गौतम धर्मवादी है। धर्मवादी वाद करने में दुष्प्रति-मंत्र्य (=वाद करने में दुष्कर) होते है। मैं श्रमण गौतम के साथ इस विषय में वाद नहीं कर सकता।”
दूसरी बार भी उन ब्राह्मणों ने आश्वलायन माणवक से कहा ॰।
तीसरी बार भी उन ब्राह्मणों ने आश्वलायन माणवक से कहा—
“भो आश्वलायन! यह श्रमण गौतम चातुर्वर्णी शुद्धि का उपदेश करता है। जाइये आप आश्वलायन श्रमण गौतम से इस विषयमें वाद कीजिये। आव आश्वलायन युद्ध में बिना पराजित हुये ही मत पराजित हो जाये।”
ऐसा कहने पर आश्वलायन माणवक ने उन ब्राह्मणों से कहा—
“…मैं श्रवण गौतम के साथ नहीं (पार) पा सकता है। श्रमण गौतम धर्म-वादी है ॰। मैं श्रमण गौतम के साथ इस विषय में वाद नहीं कर सकता। तो भी मैं आप लोगों के कहने से जाऊँगा।”
तब आश्वलायन माणवक बडे भारी ब्राह्मण-गण के साथ जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान् के साथ ॰ संमोदन कर। (कुशल-प्रश्न-पूछ)…एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुये आश्वलायन माणवक ने भगवान् से कहा—
“भो गौतम! ब्राह्मण ऐसा कहते है—‘ब्राह्मण ही श्रेष्ण वर्ण है, दूसरे वर्ण छोटे हैं। ब्राह्मण ही शुक्ल वर्ण है, दूसरे वर्ण कृष्ण हैं। ब्राह्मण ही शुद्ध होते हैं, अ-ब्राह्मण नहीं। ब्राह्मण ही ब्राह्मा के औरस पुत्र हैं, मुख से उत्पन्न, ब्रह्म-ज ब्रह्म-निर्मित, ब्रह्मा के दायाद हैं’। इस विषय में आप गौतम क्या कहते हैं।”
“लेकिन आश्वलायन! ब्राह्मणों की ब्राह्मणियाँ ऋतुमती, गर्भिणी, जनन करती, पिलाती देखी जाती हैं। योनि से उत्पन्न होते हुए भी वह (ब्राह्मण) ऐसा कहते हैं—ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है ॰!!”
“यद्यपि आप गौतम ऐसा कहते हैं, फिर भी ब्राह्मण तो ऐसा ही कहते हैं—ब्राह्मण ही श्रेष्ठ ॰।’
“तो क्या मानते हो आश्वलायन! तुमने सुना है कि यवन और कम्बोज में और दूसरे भी सीमान्त देशों में दो ही वर्ण होते हैं—आर्य और दास (=गुलाम)। आर्य हो दास हो (सक) ता हैं, दास हो आर्य हो (सक)ता है?”
“हाँ, भो! मैंने सुना है कि यवन और कम्बोज में ॰।”
“आश्वलायन! ब्राह्मणों को क्या बल=क्या आश्वास हैं, जो ब्राह्मण ऐसा कहते हैं—‘ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है ॰?”
“यद्यपि आप गौतम ऐसा कहते हैं, फिर भी ब्राह्मण तो ऐसा ही कहते है ॰।”
“तो क्या मानते हो, आश्वलायन! क्षत्रिय, प्राणि-हिंसक, चोर, दुराचारी, झूठा, चुगुलखोर, कटुभाषी, बकवादी, लोभी, द्वेषी, मिथ्या-दृष्टि (=झूठी धारणावाला) हो; (तो क्या) काया छोड, मरने के बाद अपाय=दुर्गति=नरक में उत्पन्न होगा, या नहीं? ब्राह्मण प्राणि-हिंसक ॰ हो ॰ नरक में उत्पन्न होगा या नहीं? वैश्य ॰? शुद्र ॰ नरक में उत्पन्न होगा या नहीं ?”
“भो गौतम! क्षत्रिय भी प्राणि-हिंसक ॰ हो ॰ नरक में उत्पन्न होगा। ब्राह्मण भी ॰। वैश्य भी .॰। शूद्र भी ॰। सभी चारो वर्ण भो गौतम! प्राणि-हिंसक ॰ हो ॰ नरक मे उत्पन्न होंगे।”
“तो फिर आश्वलायन! ब्राह्मणों को क्या बल=क्या आश्वास हैं, जो ब्राह्मण ऐसा कहते है ॰।”
“॰ फिर भी ब्राह्मण तो ऐसा ही कहते हैं ॰।”
“तो क्या मानते हो, आश्वलायन! क्या ब्राह्मण ही प्राणि-हिंसा से विरत होता है, चोरी से विरत होता है, दुराचार ॰, झूठ ॰, चुगली ॰, कटुवचन ॰, बकवाद से विरत होता है, अ-लोभी, अ-द्वेषी, सम्यक्-दृष्टि (=सच्ची दृष्टिवाला) हो, शरीर छोड मरने के बाद, सुगति स्वर्गलोक में उत्पन्न होता है; क्षत्रिय नहीं, वैश्य नहीं, शूद्र नहीं?”
“नहीं, भो गौतम! क्षत्रिय भी प्राणि-हिंसा-विरत ॰ सुगति स्वर्ग-लोक में उत्पन्न हो सकता है, ब्राह्मण भी ॰, वैश्य भी ॰, शूद्र भी ॰, सभी चारों वर्ण ॰।”
“आश्वलनायन! ब्राह्मणों को क्या बल ॰?।॰
“तो क्या मानते हो, आश्वलायन! क्या ब्राह्मण ही वैर-रहित द्वेष-रहित मैत्रचित्त की भावना कर सकता है, क्षत्रिय नहीं, वैश्य नहीं, शूद्र नहीं?”
“नहीं, भो गौतम! क्षत्रिय भी इस स्थान में, भावना कर सकता है ॰। ॰। सभी चारों भावना कर सकते हैं।
“यहाँ आश्वलायन! ब्राह्मणों का क्या बल ॰?” ॰।
“तो क्या मानते हो, आश्वलायन! क्या ब्राह्मण ही मंगल (=स्वस्ति) स्नान-चूर्ण लेकर नदी को जा, मैल धो सकता है, क्षत्रिय नहीं ॰?”
“नहीं, भो गौतम! क्षत्रिय भी मंगल स्नान-चूर्ण ले, नदी जा मैल धो सकता है ॰, सभी चारों वर्ण ॰।”
“यहाँ आश्वलायन! ब्राह्मणों को क्या बल ॰?”
“तो क्या मानते हो, आश्वलायन! (यदि) यहाँ भूद्र्धा-भिषिक्त क्षत्रिय राजा, नाना जाति के सौ-पुरूष इकट्ठे करें (और उन्हें कहे)—आवें आप सब, जो कि क्षत्रिय कुल से, ब्राह्मण-कुल से और राजन्य (=राजसंतान) कुल से उत्पन्न हैं; और शाल (=साखू) की या सरल (-वृक्ष) की या चन्दन की या पद्म (काष्ठ) की उत्तरारणी लेकर आग बनावें, तेज प्रादुर्भूत करे। (और) आप भी आवे जो कि चण्डाल कुल से, निषाद कुल से बसोर (=वेणु)-कुल से रथकार-कुल से, पुक्कसकुल से उत्पन्न हुये हैं, और कुत्ते के पीने की, सुअर के पीने की कठरी की, धोबी की कठरी की, या रेंढ की लकडी की उत्तरारणी लेकर, आग बनावें, तेज प्रादुर्भूत करें। तो क्या मानते हो, आश्वलायन क्षत्रिय-ब्राह्मण-वैश्य-शूद्र कुलों से उत्पन्नों द्वारा शाल-सरल-चन्दन-पद्म की उत्तरारणी को लेकर, जो आग उत्पन्न की गई है, तेज प्रादुर्भूत किया गया, क्या वही अर्चिमान् (=लौवाला), वर्णवान् प्रभास्वर अग्नि होगा? उसी आग से अग्नि का काम लिया जा सकता है? और जो वह चांडाल-निषाद-बसोर-रथकार-पुक्कस-कुलोत्पन्नों द्वारा श्वपान-कठरी की शूकर-पान-कठरी की, रेंड-काष्ठ की उत्तराराणी को लेकर उत्पन्न आग हैं, प्रादुर्भूत तेज (है) , वह अर्चिमान् वर्णवान् प्रभास्वर न होगा? उस आग से अग्नि का काम नहीं लिया जा सकेगा?”
“नहीं, भो गौतम! जो वह क्षत्रिय ॰ कुलोत्पन्न द्वारा ॰ आग बनाई गई है ॰ वह भी अर्चिमान् ॰ आग होगी, उस आग से भी अग्नि का काम लिया जा सकता है; और जो वह चांडाल ॰ कुलोत्पन्न द्वारा ॰ आग बनाई गई है ॰ वह भी अर्चिमान् ॰ आग होगी। सभी आग से अग्नि का काम लिया जा सकता है।”
‘यहाँ आश्वलायन! ब्राह्मणों का क्या बल ॰?” ॰।
“तो क्या मानते हो, आश्वलायन! यदि क्षत्रिय-कुमार ब्राह्मण-कन्या के साथ संवास करें। उनके सहवास से पुत्र उत्पन्न हो। जो वह क्षत्रिय-कुमार द्वारा ब्राह्मण-कन्या में पुत्र उत्पन्न हुआ है, क्या वह माता के समान और पिता के समान, ‘क्षत्रिय (है)’, ‘ब्राह्मण (है)’ कहा जाना चाहिये?” “भो गौतम! ॰ कहा जाना चाहिये।”
“॰ आश्वलायन! यदि ब्राह्मण-कुमार क्षत्रिय-कन्या के साथ संवास करें ॰ ‘ब्राह्मण (है)’ कहा जाना चाहिये?” ”॰ ‘ब्राह्मण (है)’ कहा जाना चाहिये।”
“॰ आश्वलायन! यहाँ घोडी को गदहे से जोडा खिलायें, उनके जोड से किशोर (=बछडा) उत्पन्न हों। क्य वह माता ॰ पिता के सामन, ‘घोडा हैं’ ‘गदहा है’ कहा जाना चाहिये?”
“…भो गौतम! वह अश्वतर (=खच्चर) होता है। यहाँ…भेद देखता हूँ। उन दूसरों में कुछ भेद नहीं देखता।”
“॰आश्वलायन! यहाँ दो माणवक जमुवे भाई हों। एक अध्ययन करने वाला, और उपनीत (=उपनयन द्वारा गुरू के पास प्राप्त) है; दूसरा अन्-अध्यायक और अन्-उपनीत (है)। श्राद्ध, यज्ञ या पाहुनाई (=पाहुणे) में, ब्राह्मण किसको प्रथम भोजन करायेंगे?”
“भो गौतम! जो वह माणवक अध्यायक और उपनीत है, उसी को ॰ प्रथम भोजन करायेंगे। अन-अध्यायक अन्-उपनीत को देने से क्या महाफल होगा?”
“तो क्या मानते हो, आश्वलायन! यहाँ दो माणवक जमुये भाई हों। एक अध्यायक उपनीत, (किन्तु) दुःशील (=दुराचारी) पाप-धर्मा (=पापी) हो; दूसरा अन्-अध्यायक अन्-उपनीत, (किन्तु) शीलवान् कल्याण धर्मा। इनमें किसको ब्राह्मण साध्य या यज्ञ या पाहुनाई में प्रथम भोजन करायेंगे?”
“भो गौतम! जो वह माणवक अन्-अध्यायक, अन्-उपनीत, (किन्तु) शील-वान् कल्याण-धर्म है, उसी को ब्राह्मण ॰ प्रथम भोजन करायेंगे। दुःशील=पाप-धर्म को दान देने से क्य महा-फल होगा?”
“आश्वलायन! पहिले तू जाति पर पहुँचा, जाति पर जाकर मंत्रों पर पहुँचा, मन्त्रों पर जाकर अब तू चातुर्वर्णी शुद्धि पर आ गया, जिसका कि मैं उपदेश करता हूँ।”
ऐसा कहने पर आश्वलायन माणवक चुप हो गया, मूक हो गया, अधोमुख चिन्तित, निष्प्रतिम हो बैठा।
तब भगवान् ने आश्वलायन माणवक को चुप मूक ॰ निष्प्रतिम बैठे देख…कहा—
“पूर्वकाल में आश्वलायन! जंगल में, पर्णकुटियों में वास करते हुये सात ब्राह्मण-ऋषियों को, स प्रकार की पाप-दृष्टि (=बुरी धारणा) उत्पन्न हुई — ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है ॰। आश्वलायन! तब असित देवल ऋषि ने सुना, ॰ सात ब्राह्मण ऋषियों को इस प्रकार की पाप-दृष्टि उत्पन्न हुई है ॰। तब आश्वलायन! असित देवल ऋषि सिर-दाढी मुँडा मंजीठ के रंग का (=लाल) धुस्सा पहिन, खडाऊँ चढ, सोने-चाँदी का दंड धारणकर, सातों ब्राह्मण ऋषियों को कुटी के आँगन में प्रादुर्भूत हुये। तब आश्वलायन! असित देवल ऋषि सातो ब्राह्मण ऋषियों के कुटी के आँगन में टहलते हुये कहने लगे—“हैं! आप ब्राह्मण-ऋषि कहाँ चले गये? हैं! आप ब्राह्मण-ऋषि कहाँ चले गये?” तब आश्वलायन! उन सातों ब्राह्मण ऋषियों को हुआ—‘कोन है यह गँवार लडके की तरह सातों ब्राह्मण ऋषियों के कुटी के आँगन में टहलते ऐसे कह रहा है—हैं! आप ॰ अच्छा तो इसे शाप देवें।’ तब आश्वलायन! सात ब्राह्मण-ऋषियों ने असित देवल ऋषि को शाप दिया—‘शुद्र! (=वृषल) भस्म हो जा।’ जैसे जैसे आश्वलायन! सात ब्राह्मण ऋषि असित देवल ऋषि को शाप देते थे, वैसे ही वैसे…देवल ऋषि अधिक सुन्दर, अधिक दर्शनीय=अधिक प्रसादिक होते जा रहे थे। तब आश्वलायन! सातों ब्राह्मण ऋषियों को हुआ—‘हमारा तप व्यर्थ हैं, ब्रह्मचर्य निष्फल है। हम पहिलो जिसको शाप देते—‘वृषल! भस्मा हो जा’, भस्म ही होता था। इसको हम जैसे जैसे शाप देते हैं, वैसे वैसे यह अभिरूप-तर, दर्शनीय-तर, प्रासादिक-तर, होता जा रहा है।’ (देवल ने कहा)—‘आप लोगो का तप व्यर्थ नहीं, ब्रह्मचर्य निष्फल नहीं, आप लोगो का मन जो मेरे प्रति दूषित हो गया है, उसे छोड दे।’ (उन्होंने कहा)—‘जो मनोदपदोस (=मानसिक दुर्भाव) हैं, उसे हम छोडते हैं, आप कौन हैं?” ‘आप लोगो ने असित देवल ऋषि को सुना है?’ ‘हाँ, भो!’ ‘वही मैं हुँ।’
“तब आश्वलायन! सातों ब्राह्मण ऋषि, असित देवल ऋषि को अभिवादन करने के लिये पास गये। असित देवल ऋषि ने कहा—‘मैंने सुना…कि ‘अरण्य के भीतर पर्णकुटियों में वास करते, सात ॰ ऋषियों को इस प्रकार की ॰ उत्पन्न हुई है—ब्राह्मण ही श्रेष्ठ वर्ण है ॰।’ ‘हाँ भो!’ ‘जानते हैं आप, कि जननी=माता ब्राह्मण ही के पास गई, अ-ब्राह्मण के पास नहीं?” “नहीं।’ ‘जानते हैं आप, कि जननी=माता की माता सात पीढी तक माता महायुगल (=नानी) ब्राह्मण ही के पास गई, अ-ब्राह्मण के पास नहीं?’ ‘नहीं भो!’ ‘जानते है आप कि जनिता=पिता ॰ पितामह-युगल (=दादा) सातवीं पीढी तक ब्राह्मणी ही के पास गये, अ-ब्राह्मणी के पास नहीं?’ ‘नहीं भो!’ ‘जानते हैं आ, गर्भ कैसे ठहरता है?’ ‘हाँ जानते हैं भो! जब माता-पिता एकत्र होते हें, माता ऋतुमती होती है, और गंधर्व (=उत्पन्न होने वाला सत्व) उपस्थित होता है; इस प्रकार तीनों के एकत्रित होने से गर्भ ठहरता हैं।’ ‘जानते हैं आप, कि यह गंधर्व क्षत्रिय होता है, ब्राह्मण, वैश्य या शूद्र होता है?’ ‘नहीं भो! हम नहीं जानते, कि वह गधर्व ॰।’ ‘जब ऐसा (है) तब जानते हो कि तुम कौन हो?’ ‘भो! हम नहीं जानते हम कौन हैं।’
“हे आश्वलायन! असित देवन ऋषि द्वारा जातिवाद के विषय में पूछे जाने पर,…‘वह सातों ब्राह्मण ऋषि भी (उत्तर) न दे सके; तो फिर आज तुम…क्या (उत्तर) दोगे; (जब कि) अपनी सारी पण्डिताई-सहित तुम उनके रसोईदार (=दर्विग्राहक) (के समान) हो।”
ऐसा कहने पर आश्वलायन माणवक ने भगवान् से कहा—“आश्चर्य! भो गौतम!! आश्चर्य! भो गौतम!! ॰ आज से मुझे अंजलि-बद्ध उपासक धारण करें।”
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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन
Niech wszystkie istoty będą szczęśliwe