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MN 112

Chabbisodhana sutta: छब्बिसोधन-सुत्तन्त

Chabbisodhanasutta

Anupadavagga

Traduceri

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया — “भिक्षुओं !”

“भदन्त !” (कह) उन भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा- “(यदि कोई) भिक्षु आज्ञा (अर्हंत्-पद-प्राप्ति) की घोषणा करे — जन्म क्षीण हो गया, ब्रम्हचर्य-वास पूरा हो गया, करना था सो कर लिया, और कुछ (करने के लिए) यहाँ नहीं हैं- जानता हूँ। तो भिक्षुओं! उस भिक्षु के भाषण को न अभिनंदित करना चाहिये न खंडित (निंदित) करना चाहिये। अभिनंदन, प्रतिक्रोशन (निंदन) न कर प्रश्न पूछना चाहिये — आवुस ! उन जानने वाले, देखनेवाले, भगवान् अर्हंत्, सम्यक् संबुद्ध ने चार व्यवहार अच्छी तरह बतलाये हैं। कौनसे चार? — (1) इष्ट (देखे हुए) में दृष्ट वादिता (देखा हुआ कहना) (2) श्रुत (सुने) में श्रुतवादिता, (3) स्मृत (याद किये) में स्मृतवादिता, (4) विज्ञात (जाने) में विज्ञानवादिता। आवुस! उन भगवान् ने यह चार व्यवहार अच्छी तरह बतलाये हैं। इन चार व्यवहारों में कैसे जानत कैसे देखते (आप) आयुष्मान् का चित्त आस्त्रवों (चित्तमलों) से विमुक्त हो गया ? भिक्षुओं ! (जो) भिक्षु क्षीण आस्त्रव, (ब्रम्हचर्य) वास समाप्त कृतकृत्य, मुक्त-मार, सच्चे अर्थ (निर्वाण) को प्राप्त, भव-बधन-मुक्त सम्यग् जानकर विमुक्त (होता है), (उस) के उत्तर देते वक्त यह अनुधर्म (नियम,प्रकृति) होते हैं- आवुस ! दृष्ट में अन्-उपाय-अ-निःश्रित अबद्ध, विप्रमुक्त-विसंयुक्त अ-मर्यादित चित्त से विहरता हॅूं। आवुस ! श्रुतमें ! स्मृत में। विज्ञात में। आवुस! ठस प्रकार जानते देखते मेरा चित्त इन चार व्यवहारों में आस्त्रवों से विमुक्त हो गया।

“(तब) भिक्षुओं ! उस भिक्षुके कथन को साधु (ठीक) कह अभिनंदित-अनुमोदित करना चाहिये। अभिनंदित अनुमोदित कर आगे का प्रश्न पूछना चाहिये-आवुस! उन भगवान् अर्हंत् सम्यक् संबुद्ध ने यह पाँच उपादान-स्कंध अच्छी तरह बतलाये हैं। कौनसे पाँच ? जैसे कि- रूप —उपादान-स्कंध, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान इन पाँच उपादान —स्कंधों के विषय में कैसे जानते देखते आयुष्मान् का चित्त आस्त्रवों से विमुक्त हो गया है ? उसके उत्तर देते वक्त वह अनुधर्म होते हैं- आवुसो! मैं रूपको अ-बल, विराग (राग के अयोग्य) न-आश्वासनप्रद, जानकर रूप के संबंध में जो उपाय-उपादान-चित्त के अधिष्ठान्, अभिनिवेश (ममता)- अनुशय थे, उनके क्षय, विराग, निरोध, त्याग-प्रतिनिस्सर्गसे मेंरा चित्त मुक्त हुआ — यह जानता हॅूं। वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान। आवुसो ! इस प्रकार पाँच उपादान स्कंधोंके संबंध में जानते देखते मेरा चित्त आस्त्रवों से विमुक्त हो गया।

“तब भिक्षुओं ! साधु कह, अभिनंदित-अनुमोदित कर आगे का प्रश्न पूछना चाहिये- आवुस ! यह छः धातुयें बतलाई हैं। कौन सी छः ?(1) पृथिवी-धातु, (2) आप (जल), (3) तेज, (4) वायु (5) आकाश, और (6) विज्ञान-धातु। इन छः धातुओं के विषय में कैसे जानते देखते ? यह अनुधर्म हैं — आवुसो ! न मैंने पृथिवी धातुको आत्मा के तौर पर ग्रहण किया, न पृथिवी में आत्मा को आश्रित ग्रहण किया। पृथिवी धातु के निःश्रित (आश्रित) जो उपाय अनुशय, उनके विराग, प्रतिनिस्सर्ग से मेरा चित्त विमुक्त हुआ — यह जानता हॅूं। तेज धातु। वायु धातु। आकाश धातु। विज्ञान। आवुसो! इस प्रकार इन छः धातुओं के विषय में जानते देखते।

“आगे का प्रश्न — आवुस ! यह छः आध्यात्मिक (शरीर संबंधी) और और वादा आयतन, बतलाये हैं। कौनसे छः ? (1) चक्षु और रूप (2) श्रोत्र और शब्द, (3) घ्राण और गंध, (4) जिव्हा और रस (5) काया और स्पष्टव्य (6) मन ओर धर्म। इन छः आयतनों के विषय में कैसे जानते देखते ? यह अनुधर्म होते हैं- आवुसो ! चक्षुमें, रूप में, चक्षुर्विज्ञान (चक्षु द्वारा मिलने वाले ज्ञान) में, और चक्षु-र्विज्ञान द्वारा विज्ञेय धर्मों (पदार्थों) में जो छनद-राग, नन्दी-तृष्णा और जो उपाय,अनुशय थे, उनके क्षय से, मेरा चित्त विमुक्त हुआ — यह जानता हॅूं। श्रोत्र-शब्द, श्रोत्र-विज्ञान, घ्राण, गंध, घ्राण-विज्ञान, जिव्हा, रस, जिव्हा विज्ञान। काया, स्प्रष्टव्य, काय-विज्ञान। मन, धर्म, मनोविज्ञान, आवुसो! इस प्रकार इन छः आध्यात्मिक ब्राह्य आयतनों के विषय में जानते।

“आगे का प्रश्न — आवुस ! इस स-विज्ञानक (जीवित) काया में और बाहर के सारे निमित्तों (आकृति आदि) में कैसे जानते देखते अहंकार, समकार, मान, अनुशय अच्छी प्रकार नष्ट हुये ? यह अनुधर्म होते हैं — आवुसो ! पहिले गृहस्थ होते समय मैं अजान था। तब मुझे तथागत या तथागत श्रावक ने धर्म उपदेशा। उस धर्म को सुनकर मुझे तथागत के विषय में श्रद्धा हुई। उस श्ऱद्धा से युक्त हो मैं सोचने लगा- गृहवास जंजाल है। चतुर्थ ध्यान को प्राप्त हो विहरने लगा। सो इस प्रकार चित्त के एकाग्र, परिशुद्ध — पर्यवदात, अंगणा-रहित, उपक्लेश (मल)-रहित, मृदुभूत-कार्योपयोगी, स्थिर- अचलता प्राप्त (और) समाधि-युक्त हो जाने पर आस्त्रवों के क्षय के ज्ञान के लिये मैंने चित्त को झुकाया। फिर मैंने — यह दुख है, इसे यथार्थ से जान लिया। अय यहाँ (करने) के लिए कुछ (शेष) नहीं है। इसे जान लिया । आवुसो ! इस प्रकार इस सविज्ञानक काया में , अच्छी प्रकार नष्ट हुये।”

“तब, भिक्षुओं ! उस भिक्षु के कथन को साधु — (कह) अभिनंदित अनुमोदित कर उसे ऐसा कहना- “लाभ है हमें आवुस ! सुलाभ मिला हमें आवुस ! जो कि हम आप जैसे समझचारी को देखते हैं।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

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राहुल सांकृत्यायन · सार्वजनिक डोमेन

Fie ca toate ființele să fie fericite